munger school of yoga
दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (79)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

योगविद्यालय से बुलावे के लिए जो पोस्टकार्ड आया था, उसमें आवश्यक सामानों की एक सूची थी जिन्हें साथ में लेकर आने का निर्देश था। उस सूची में कुछ ऐसे नाम थे जिनके कारण वहाँ होने वाले संभावित कष्टों का पूर्वानुमान किया जा सकता था, जैसे सोने के लिए एक पतली दरी बिना तकिया; बर्तन में केवल एक थाली और गिलास। और इसी कारण मैं वहाँ नहीं जाने का निर्णय कर चुका था। पर होनी को कौन टाल सकता है! सुधा के आग्रह पर रमेश भाई ने एक तरह से गिरफ्तार करके मुझे योगविद्यालय के गेट के अंदर पहुँचा दिया था। तबतक मैं 15 दिनों के वनवास के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुका था। नामांकन आदि की औपचारिकता पूरी हुई तो पता चला कि कुल 135 लोगों का बैच बना है। हमें बड़े-बड़े कमरों वाले होस्टल में एक-एक चौकी आबंटित कर दी गयी थी। उसी के नीचे अपना बक्सा रखना था। आवश्यक सामानों की अति संक्षिप्त सूची अधिकांश लोगों को परेशान कर रही थी, किन्तु मैं तबतक प्रकृतिस्थ हो गया था। जेपी आंदोलन में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का प्रशिक्षण मेरा आत्मबल बढ़ा रहा था। प्रो0 राधेश्याम योगी के सानिध्य में कम-से-कम चीजों के साथ जीने की कला जो मैंने सीखी थी, वह यहाँ काम आने वाली थी।

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नामांकन रशीद के साथ सम्पूर्ण प्रशिक्षण सत्र से संबंधित जो नियमावली हस्तगत करायी गयी थी, उसमें समय-प्रबंधन और अनुशासन पर बहुत जोर था। समय-सारिणी के अनुसार रात का भोजन सूर्यास्त के पहले करना था, जो लगभग सभी प्रशिक्षणार्थियों को काफी अखरा था। शाम में अपनी-अपनी थाली लेकर लाइन में बारी बारी से भोजन लेने का दृश्य बड़ा कौतुक उत्पन्न कर रहा था। भोजन की व्यवस्था और भोज्य पदार्थों को लेकर कोई भेदभाव नहीं था। विद्यालय प्रबंधन के लोगों से लेकर संन्यासी, योगी और प्रतिभागियों तक सबके लिए एक ही पंक्ति और एक ही भोजन। मेरे लिए तो ‘प्रथम ग्रासे मक्छिका पातः’ वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। पीठ दर्द के कारण मुझे कई वर्षों से कदीमे (कद्दू), सीम और मटर की सब्जी से परहेज करने की हिदायत थी। हिदायत वाजिब भी थी, क्योंकि जब भी ये चीजें खाता तो तकलीफ बढ़ जाती थी। पहली शाम को सूखी मोटी रोटियों के साथ कदीमे की सब्जी परोसी जा रही थी। मैंने तीन रोटियाँ ले लीं और कदीमे की सब्जी लेने से मना कर दिया। सब्जी बाँटने वाले संन्यासी ने कारण पूछा तो मैंने अपनी समस्या बतायी। उन्होंने कहा, “अरे बंधु, सारी बातें भूल जाएँ और बेफिक्र होकर सब कुछ खाएँ। आप सही जगह आ गये हैं। सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी।” झिझकते हुए मैंने सब्जी ले ली और जी भरकर खा भी ली, क्योंकि रोटियों के साथ खाने का और कोई विकल्प नहीं था। खाना खाने से लेकर सोने के लिए बिछावन पर जाने तक मैं दर्द बढ़ने का इंतजार करता रहा था, किन्तु आश्चर्यजनक रूप से उस दिन कदीमे का कोई असर नहीं हुआ। अगली सुबह से प्रशिक्षण का विधिवत आरंभ हुआ था। उस बैच में कुल 135 प्रतिभागी शामिल हुए थे। सभी किसी न किसी रोग से पीड़ित थे, कोई भी स्वस्थ नहीं था जो इस उद्देश्य से आया हो कि बीमार न पड़े। एक बड़े प्रशाल में सभी को अलग अलग दरी या कम्बल बिछाकर आसान-अभ्यास करने लायक दूरी बनाकर बैठने का निर्देश दिया गया। निर्देशानुसार सबकी पोशाक ढीली थी ताकि अभ्यास के दौरान कहीं दबाव न पड़े। प्रशिक्षक आचार्य ने शुरुआत में योग के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। शरीर के जोड़ों को चालू करने के निमित्त पवन मुक्तासन के साथ अभ्यास शुरू किया गया। हमारे साथ एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी थे जो सबसे अधिक कष्ट में थे। विशेष अनुमति लेकर उनकी सहायता के लिए उनकी पत्नी आयी थीं। बुजुर्ग का शरीर गठिया रोग के कारण अष्टावक्र ऋषि के समान टेढ़ा-मेढ़ा हो गया था। उनके लिए सीधा चित या पट्ट लेटना भी सम्भव नहीं था। अन्य कई विभिन्न प्रकार के दर्द, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, गैस्ट्रिक, अल्सर आदि के मरीज थे।

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सुबह 5 बजे जगना और नित्यकर्मों से निबटकर 6 बजे अभ्यास सत्र में भाग लेना। 8 से 9 के बीच जलपान करके एक घंटा फुलवारी आदि में हल्के-फुल्के शारीरिक श्रम वाले काम। पुनः10 बजे से 12 बजे तक अभ्यास, फिर भोजन। 12 से 2 बजे तक आराम की छुट्टी। 2 से 5 के बीच अपनी पसंद और कौशल के अनुसार संस्था के उपयोग में श्रम। 5 से 5:45 के बीच भोजन और फिर एक घंटे का मौन। 7 बजे शाम से कीर्तन-भजन-प्रवचन का कार्यक्रम होता था, जिसमें अपनी कला के प्रदर्शन करने की छूट थी। रात के 9 बजे अनिवार्य रूप से बिछावन पर चले जाना होता था। इस दिनचर्या का पालन करना आवश्यक था। सुबह अभ्यास के बाद मैं फुलवारी में काम करता था और उपयोगी कार्य के लिए मैंने योगविद्यालय के प्रेस में प्रूफ रीडिंग का काम चुना था।
सुबह के अभ्यास सत्र में पवन मुक्तासन (व्यायाम), आसान, प्राणायाम और ध्यान कराया जाता था। एक सप्ताह तक सभी प्रतिभागियों को एक साथ अभ्यास कराया गया। फिर एक प्रपत्र भरवाकर उपचार के हिसाब से अलग-अलग समूह बनाया गया था। इस बीच मैं बताऊँ कि मेरा बैकपेन लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका था। पहली रात जब बिना तकिए के केवल एक दरी और चादर के बिछावन पर सोया था तो नींद आने में भले ही कुछ विलम्ब हुआ था, किन्तु कष्ट में बहुत अंतर महसूस किया था। तीन-चार दिन बाद मेरा वह दर्द केवल याद बनकर रह गया था। रिटायर्ड बुजुर्ग आइएएस अधिकारी भी मेरे समूह में थे। उनकी स्थिति में भी निरंतर सुधार हो रहा था। शरीर का टेढ़ापन और कड़ापन रोज थोड़ा कम हो रहा था। उनके चेहरे पर उदासी की जगह खुशी हावी हो रही थी। लगभग ऐसा ही हाल सभी प्रतिभागियों का था। सभी चेहरों पर मुस्कान की मात्रा बढ़ गयी थी। धीरे धीरे माहौल खुशनुमा होता जा रहा था। यह विश्वास दृढ़तर हो रहा था कि जो कष्ट लेकर आए थे, उन्हें यहीं छोड़कर जाना है। रीढ़ की तकलीफ से पीड़ित लोगों को विशेष रूप से मकरासन, सर्पासन, भुजंगासन, मयूरासन, धनुरासन, नौकासन, अर्द्धशलभासन और शलभासन का सघन अभ्यास कराया जा रहा था। साथ ही आगे झुककर कोई काम करने या वजन उठाने से परहेज करने का निर्देश दिया जा रहा था। बैठने के लिए सही कुर्सी का चयन और रीढ़ को 90 डिग्री पर रखने की हिदायत दी गयी थी। अंतिम तीन दिन योगनिद्रा, जल नेति और शंखप्रक्षालन का प्रशिक्षण दिया गया था। मेरी समझ में हजारों वर्षों के भारतीय इतिहास में हमारे मनीषियों की उपलब्धियों में योग सबसे बड़ा वरदान है और योगविद्या में प्राणायाम, योगनिद्रा, नेति और शंखप्रक्षालन का स्थान सर्वोपरि है। जल नेति से मुझे साइनोसाइटिस से मुक्ति मिली है और योगनिद्रा का प्रयोग अपने दर्जनों छात्रों पर करके अनुकूल परिणाम प्राप्त किया है।

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शंखप्रक्षालन वस्तुतः हठयोग की एक क्रिया है जो सम्पूर्ण पाचनतंत्र की सफाई और रखरखाव (ओवरहालिंग) का बहुत कारगर उपाय है। प्रशिक्षण सत्र की समाप्ति के दो दिन पूर्व से लगभग दो दर्जन के अलग अलग समूह में इसका अभ्यास करवाया गया था। ऐसा इसलिए कि इस क्रिया में हरेक अभ्यासी को बिल्कुल तैयार शौचालय चाहिए। नमक मिश्रित गुनगुना पानी जो जितना पी सके, पिलाया जाता है। फिर पाँच आसन की आठ आवृत्ति करायी जाती है। फौरन शौच की तलब लगती है। पहली बार सामान्य ढंग का पतला पाखाना होता है। दूसरी आवृत्ति में पेट से जैसे कचरा निकलता है। यह तबतक चलता है जबतक जैसा पानी पिया था, वैसा ही नहीं निकल जाए। शरीर थककर चूर हो जाता है। अभ्यासियों को शवासन में लिटाए लगभग एक घंटे जगाकर रखा जाता है क्योंकि नींद आ जाने पर कोमा में चले जाने का खतरा होता है। अंत में अरवा चावल और मूंग दाल की बिना नमक की खिचड़ी भरपूर घी के साथ ठूँस-ठूँसकर खिलायी जाती है। घी इसलिए कि बिल्कुल साफ हो चुकी आँत में खरोंच न लगे। शंखप्रक्षालन के सफल समापन के बाद पेट संबंधी लगभग सभी गड़बड़ियों का समाधान हो जाता है।
पाठ्यक्रम के अंतिम दो दिन शंका-निवारण के लिए प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित हुआ था। मैंने एक प्रश्न किया था कि “हमलोग जितना खाते हैं, उससे बहुत कम खाकर भी आप स्वामीजी लोग अधिक स्वस्थ कैसे रहते हैं?” जवाब बहुत ही दिलचस्प था, “हम कम अन्न खाते हैं पर प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से भी प्रकृति से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। लीकेज के द्वारा ऊर्जा का अपब्यय नहीं होने देते हैं। आप संसारी लोग अपनी अधिकांश ऊर्जा लीकेज में बर्बाद कर डालते हैं। बेमतलब के बकबक और बहसबाजी करना और ताकझांक करना छोड़ दीजिए, फिर देखिए चमत्कार!” स्वामी जी की वह गंभीर आवाज आज भी मेरे मानस में गूंजती है। व्यस्तता और दिनचर्या में गड़बड़ी के कारण अब नियमित योगाभ्यास नहीं कर पाता हूँ किन्तु यह आत्मविश्वास बना रहता है कि बीमार नहीं पड़ूँगा और यदि हुआ भी तो ठीक हो जाऊँगा। 63 की उम्र हुई किन्तु कोई दवा नहीं खाता हूँ। मुंगेर योगविद्यालय ने मुझे जो दिया उसका वर्णन सम्भव नहीं है। अब तो वह योग विश्वविद्यालय बन गया है, पर अफसोस कि स्थानीय लोगों में उसकी वह प्रतिष्ठा नहीं है जो होनी चाहिए।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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