मुद्दालोकसभा चुनाव

दलितों को समझना होगा आर्थिक आन्दोलन के मायने – संजय रोकड़े

 

  • संजय रोकड़े

 

भारत की सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर जीवन बसर करने वाली अनुसूचित जाति के उत्थान के लिए अब तक किसी भी दल या सरकार ने ईमानदारी से काम नही किया है। अब तक जितनी भी सरकारें बनी उनने इनके साथ दोगली नीति को ही प्रमुखता में रखा। केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से वार्षिक बजट में दलित उत्थान के लिए राशि का आवंटन किया इससे भी मंशा जाहिर हो जाती है। भाजपा की मोदी सरकार दलितों की कितनी हितैषी है और सही मायने में यह सरकार उनका कितना सामाजिक, आर्थिक उत्थान चाहती है ये दलितों के लिए बजट में जारी राशि को देख कर भी अंदाज लगाया जा सकता है। बजट में इस समुदाय की महिलाओं की बेहतरी के लिए जितनी राशि जारी की गयी है वह गायों की बेहतरी से भी कम है। जिस तरह से चुनावी बजट होने के बावजूद दलित समुदाय के हित में राशि आवंटित की गयी है उससे पूरे देश के दलितों में नाराजगी पसरी हुई है।

बता दें कि दलितों ने 2014 में भाजपा की लोकसभा चुनाव जीत में अहम योगदान दिया था बावजूद इसके ऐसा दुराभाव किया है। पिछले चार वर्षों में नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में अनुसूचित जाति (एससी) और जनजातियों (एसटी) के लोगों के साथ मारपीट और लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं से भी साबित होता है कि ये लोग दलित और आदिवासियों को लेकर कितनी विरोधी मानसिकता रखते है। अगर कहा जाए कि आरएसएस और उसका अनुषांगिक संगठन भाजपा दलित विरोधी है तो अतिशयोक्ति नही होगा। अब लोकतन्त्र के इस उत्सव में एक बार फिर दलित और आदिवासियों को अपना शासक चुनने का अवसर मिला है। जो दल इस समुदाय का घोर विरोधी माना जाता है उसे अपना मत देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।

बहरहाल चुनावी दौर में भाजपा ने दलितों को लुभाने के लिए बजट में टुकड़ा फेकने का काम तो किया है लेकिन इस दोगलेपन को समझना जरूरी है। भाजपा कभी भी दलितों का हित नही कर सकती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब भी जहाँ- जहाँ भी भाजपा की सरकारें बनी है तब-तब वहाँ दलितों पर अन्याय अत्याचार बढ़े हैं। इनकी कथनी और करनी को छोटे से उदाहरण से समझना होगा। एक तरफ तो इनकी सरकारें दलित अत्याचार में रिकार्ड बनाती है वहीं दूसरी तरफ ये दलित- आदिवासियों की भावनाओं के साथ शोषण कर हितैषी बनने की कोशिश करते हैं। सनद रहे कि पिछले साल भाजपा एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के उल्लंघन पर तुरंत गिरफतारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश लेकर आ गई थी, वहीं केन्द्र में चुनावों को देखते हुए एससी-एसटी कल्याण मद में थोड़ा सा बजट बढ़ाकर खुद को आर्थिक विकास का पक्षधर बताने का भरषक प्रयास किया है।  मोदी सरकार ने एससी कल्याण के लिए आवंटित राशि में 35.6 फीसदी की वृद्धि करते हुए 2018-19 के  56,619 करोड़ रु. के मुकाबले उसे 2019-20 में 76,801 करोड़ रु. कर दिया जबकि एसटी के लिए आवंटित राशि, जो 2018-19 में 39,135 करोड़ रु. थी, 2019-20 में बढ़ाकर 50,086 करोड़ रु. कर दी है। यह लालीपॉप देकर दलित वोट साधने की  कोशिश तो कि लेकिन इसका दलितों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। एससी-एसटी समुदाय के बीच में काम करने वाले सामाजिक संगठनों का भी यही मानना है कि  एससी-एसटी फंड में वृद्धि दलित समुदायों के लिए अप्रासंगिक है, क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से आवंटित राशि बहुत कम है और फंड आवंटन के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करता है। नीति आयोग के 2017 के दिशा निर्देशों के अनुसार एससी-एसटी के विकास के लिए आवंटित फंड उनकी आबादी के अनुपात से कम नहीं होना चाहिए जबकि मोदी सरकार ने ऐसा ही किया है।

बता दे कि दलितों के बीच काम करने वाली सामाजिक संस्थान एनसीडीएचआर ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में उसने पाया कि पिछले पांच बजटों में एससी कल्याण कोषों के लिए आवंटित राशि में कुल 2,75,772 करोड़ रु. की कमी कर दी गई है। दलितों के खिलाफ हिंसा में वृद्धि के बावजूद नागरिक अधिकारों के संरक्षण के अधिनियम 1995 और अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 को लागू करने की मशीनरी को मजबूत करने के लिए बजट में 2018 के 404 करोड़ रु. के मुकाबले मामूली बढ़त के साथ 490 करोड़ रु. आवंटित किए है। सामाजिक न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 31 जनवरी तक एडब्ल्यूएससी फंड का करीब 52 फीसदी यानी 29,912 करोड़ रु. ही मंजूर किए। हालाकि एसटी मद में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन दिखा है। बेशक इस बजट के कुल आवंटन में थोड़ी वृद्धि हुई है, पर मैट्रिक बाद मिलने वाली छात्रवृत्ति जैसी अहम योजनाओं के लिए तो राशि घटा ही दी है। बहरहाल इस बजट में बड़ी-बड़ी राशियां तो हैं पर गहराई नहीं। गर इस बजट में सरकार की प्राथमिकताओं की तरफ नजरें इनायत करें तो पायेगें कि गायों के संरक्षण के लिए 700 करोड़ रु. आवंटित किए गए हैं, जबकि दलित और आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा के लिए पीसीआर और अत्याचार निवारण अधिनियम पर अमल करने के लिए सिर्फ 147 करोड़ रु. रखे गए हैं। कितना हास्यास्पद है। ऐसी स्थिति में अजा-जजा वर्ग को स्वंय समझना होगा कि उसका सामाजिक और आर्थिक उत्थान कौन चाहता है।

फिर ऐसी स्थिति में क्या करना होगा यह एक विचारणीय प्रश्र है। क्या केाई अपनी स्वंय की राजनीतिक ताकत खड़ी करनी होगी या जो राजनीतिक ताकते है उन पर अपने हितों के लिए दबाव बनाना होगा। या इसके इतर भी समाज में जो तबका आरक्षण पाकर शिक्षा के सहारे नौकरी-पैशा में आकर आर्थिक रूप से संपन्न हो गया है उसे आर्थिक आंदोलन के लिए अनुपम पहल करनी चाहिए। सच तो यही है कि इस वर्ग को अत्त दीपो भव की तर्ज पर आर्थिक आंदोलन की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए। गर ऐसा होता है देश में औद्योगिकीकरण का भी एक नया दौर शुरू होगा। अब इसे जमीनी अमलीजामा कैसे पहनाया जाए इसके लिए भारत के दलित समुदाय को अमेरिका के अश्वेतों से कुछ सीखना होगा।

बता दे कि यहाँ अश्वेतों ने अमेरिकी सरकार की तरफ टुकटुकी लगा कर देखने की बजाय अपने स्तर पर आर्थिक पहल की ओर कदम बढ़ाने का काम बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। बड़े गर्व और आश्चर्य की बात है कि आज अमेरिका में अश्वेतों के स्वामित्व वाले 21 बैंक हैं। इनकी संयुक्त पूंजी 4.7 अरब डॉलर है। यानी लगभग 330 अरब रूपए। यह अमेरिकी अश्वेतों की हिम्मत के ही सौदे है कि अब यहाँ इनके स्वामित्व की तमाम क्रेडिट यूनियंस के साथ ही इनके स्वामित्व वाली इंश्योरेंस कंपनियां और अनेक वित्तीय संस्थाएं है। लेकिन भारत के दलित बाबा साहब भीम राव अंबेड़कर के द्वारा दिए गए आरक्षण के सहारे खुद का ही जीवन स्तर उंचा कर पाए है। वह भी ठीक-ठाक नही।

अभी तक यहाँ के दलितों ने सामुदायिक स्तर से आर्थिक बेहतरी की पहल नही की है। अब तक भारत में दलितों के बीच जितने भी आंदोलन हुए या संगठन बने है उनका एक ही काम है- नौकरी-पैशा वर्ग को और सुविधाएं कैसे हासिल हो। इस वर्ग की बड़ी आबादी की खुशहाली के लिए कोई ईमानदार पहल नही हुई है। जब भी इस वर्ग की बड़ी आबादी के लिए समाज के नौकरी पैशा वर्ग की तरफ आशा भरी नजरों से देखा गया तब-तब इस वर्ग ने समाज के पिछड़े दबके के साथ यह कह कर शोषण किया कि देश में अभी मनुवादियों की सरकारें है और वह हमारे समाज के लिए कोई काम नही कर सकती है। असल में इनने ऐसा कह कर अपनी जिम्मेदारी से ही पल्ला झाड़ा है। असल में भारत में दलितों के बीच में एक नए ब्राह्मणवाद का उदय हुआ है, जबकि अमेरिका में ऐसा नही हुआ। यहाँ दास प्रथा के अंत के मात्र 25 साल बाद ही 1886 में एक पूर्व दास ने ‘ग्रैंड फाउंटेन नाम से पहला अश्वेत बैंक स्थापित कर दिया था। मतलब साफ है कि अश्वेतों ने अपने आर्थिक विकास के लिए किसी के रहमों करम पर आश्रित नही रहने का फैसला कर लिया था। और किसी का इंतजार भी नही किया। वे निरंतर इस दिशा में आगे बढते रहे। आर्थिक संस्थाओं के निर्माण को लेकर उनका प्रयोग रूकने के बजाय नए-नए रूप में सामने आया।

काबिलेगौर है कि सन 1900 में ही एक पूर्व अश्वेत दास बुकर टी वॉशिंगटन ने प्रथम ‘नैशनल नीग्रो बिजनस लीग की स्थापना कर दी थी। इसका मुख्य भाव अश्वेतों में आर्थिक शक्ति खड़ी कर देना था। मजेदार बात तो यह है कि इसी समय एक अश्वेत महिला मैडम सी. जी. वॉकर ने पहला अश्वेत ब्रांड मार्केट में लॉन्च कर दिया था। इसका वहाँ पर खासा सकारात्मक असर भी देखा गया। इस नैशनल नीग्रो बिजनेस लीग से प्रभावित होकर तमाम अश्वेत युवाओं ने उद्योग-धंधों व व्यापार को अपना करियर बनाना शुरू कर दिया। वॉल स्ट्रीट पर सेल्समेन के रूप में पहला अश्वेत व्यक्ति भी वर्ष 1949 में  रजिस्टर्ड हो गया और 1952 में ही पहली अश्वेत सिक्यॉरिटीज फर्म को नैशनल असोसिएशन ऑफ सिक्यॉरिटीज डीलर्स द्वारा शेयर ट्रेडिंग का लाइसेंस मिल गया। इसके साथ ही वर्ष 1960 में पहली दफा एक अश्वेत कंपनी वॉल स्ट्रीट पर रजिस्टर्ड हो गई। आज तमाम अश्वेत वॉल स्ट्रीट में इन्वेस्टमेंट बैंकर्स, फाइनेंशियल अनालिस्ट, ट्रेडर्स, फंड मैनेजर्स और वेंचर कैपिटलिस्ट के रूप में बड़ी ही सफलता और जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे है। अश्वेतों का अमेरिका के आर्थिक बाजार पर अपने अधिपत्य को बढ़ाने का यह अभियान कहीं भी नही रूका। यह साल दर साल निखरता चले गया।

भारत के दलितों ने अपने विकास का माध्यम केवल और केवल राजनीतिक सत्ता को मान लिया है। वे अक्सर यह कहते फिरते है कि जब देश में दलितों की सत्ता होगी तब तमाम विकास के द्वार खुल जाएगें। और इसी की आड़ में दलित कुछ करने की बजाय सत्ता शासकों को कोसने में लगा रहा। लेकिन अमेरिका के अश्वेतों में ऐसा नही रहा। वे हमेशा आर्थिक तरक्की के लिए चलते रहे। शायद इसी आर्थिक समृद्धि के कारण ही ओबामा वहाँ के सफल राष्ट्रपति भी बन पाए।

ध्यान रहे कि अमेरिका में अश्वेतों के पास पैसा आने के बाद उनका करीब-करीब सभी धंधों पर एकाधिकार होते चला गया। आज यहाँ के अश्वेतों के पास अपने खुद की बड़ी-बड़ी कंपनियां है। बड़े-बड़े मीडिय़ा संस्थान है। अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो स्टेशन, न्यूज चैनल सब कुछ है। दूर्भाग्य है कि भारत के सुविधा संपन्न दलित समाज को अब तक इस बात का भान नही है कि खुद के स्वामित्व वाला कोई बड़ा मीडिय़ा संस्थान होना चाहिए। भारत में जब तक इस समाज का खुद का कोई बड़ा मीडिय़ा संस्थान नही होगा तब तक कोई भी गैर दलित मुख्यधारा का मीडिय़ा सच्चाई को सामने नही लाएगा।

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आज भी भारत का दलित समाज स्थातिप लोगों को दोष देने के सिवाय अपनी बेहतरी के लिए कोई ईमानदार पहल नही कर रहा है। बेशक आज भारतीय मीडिय़ा में स्वर्णों का 99 फीसदी अधिपत्य है लेकिन इस बात को कोई समझने के लिए तैयार नही है कि मीडिय़ा भी आज की तारीख में बड़ा व्यापार है। अब यह समाज से सरोकार रखने वाला कोई सामाजिक संगठन नही। भारत की आजादी के सत्तर सालों में आरक्षण पाकर दलित समुदाय का इंसान आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर्स, वैज्ञानिक, जज और तमाम विभागों में बड़े-बड़े अफसर तो बन गए है लेकिन आरक्षण विहीन स्थानों पर इनकी मौजूदगी नगण्य है। अभी तक इस वर्ग ने कभी यह नही सोचा कि खुद का मुख्यधारा का कोई बड़ा मीडिय़ा संस्थान बना कर सत्ताधारियों पर अपना प्रभाव डाल सके। दूर्भाग्यवश, गीत, संगीत, फिल्म, कला, खेल, सेना, कानून, विज्ञान, राजनीति- हर क्षेत्र  क्षेत्र में भारत के दलितों की मौजूदगी नगण्य है। जबकि अमेरिकी अश्वेतों का हर स्तर पर दब- दबा है। अमेरिका में अश्वेत समाज ने हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है। यहाँ बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनना अश्वेत समाज के लिए गौरव का विषय रहा पर भारत में आज जो दलित वर्ग का राष्ट्रपति बना है उसकी लाचारी किसी से छिपी नही है। वह यहाँ के दलितों की प्रगति के प्रतीक की बजाय गुलामी का प्रतीक बन कर ही सामने आया है। ऐसे गुलाम प्रतीकों से भारत के दलित समुदाय का मनोबल नही बढने वाला है। अब दलितों को  स्वंय आर्थिक प्रगति के लिए नए तरीके से इस राह पर चलना पड़ेगा। दोषारोपण की मानसिकता से हटकर सामुदायिकता के भाव को मजबूत कर अपनी आर्थिक सत्ता हासिल करना होगा।

लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।

सम्पर्क- +919827277518, mediarelation1@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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