शख्सियत

आजाद भारत के असली सितारे – 19

नर्मदा घाटी की अखण्ड आवाज : मेधा पाटकर

मेधा पाटकर (जन्म-01.12.1954) अपना 66 वां जन्मदिन भी दिल्ली में देशभर से जुटे किसानों के साथ प्रदर्शन करते हुए मना रही हैं। कृषि कानूनों के विरोध में लंबे संघर्ष के लिए, तरह तरह की बाधाएं पार करते हुए वे भी किसानों तथा नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली बॉर्डर पर डटी हैं। मेधा पाटकर को भी यहाँ पहुँचने में पांच दिन लग गये। उनका कहना है, “संविधान की रक्षा करना जरूरी हो गया है। मजदूर किसान सबके साथ अन्याय हो रहा है। केन्द्र सरकार ने सारा कुछ निजी हाथों में ले लिया है। बस अब खेती किसानी बची है और आम आदमी बचा है। इनका अस्तित्व भी खतरे में है।” (हिन्दुस्तान, 27.11.2020)

वैसे तो मेधा पाटकर हर दलित पीड़ित प्रताड़ित समुदाय के हक के लिए लड़ने को तत्पर रहती हैं किन्तु उनकी पहचान नर्मदा बचाओ आन्दोलन की अनथक योद्धा के रूप में है। ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ बाँध परियोजनाओं के खिलाफ संभवत: दुनिया का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला अहिंसक आन्दोलन है। सादाजीवन, सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली, गाँधीजी को अपना आदर्श और उनके द्वारा दिखाए गये संघर्ष के पथ पर अपनी एकनिष्ठ आस्था रखने वाली मेधा पाटकर इस आन्दोलन की अगुआ हैं। उनका जन्म ही मानो नर्मदा बचाओ आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने के लिए हुआ है। उन पर न जाने कितने हमले हुए, कीचड़ उछाले गये, उनका कार्यालय जलाया गया, तरह तरह से उन्हें दबाने की कोशिश की गयी किन्तु जितना दबाया गया वे और अधिक मजबूत होकर उभरीं।

मेधा पाटकर का जन्म 1 दिसम्बर 1954 को मुंबई के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री वसंत खानोलकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और उनकी माँ इंदु खानोलकर की रुचि भी महिलाओं के शैक्षिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी सामाजिक कार्यों में थी। इस तरह मेधा को सामाजिक कार्यों में रुचि विरासत में मिली है।Medha Patkar: A short biography of Medha Patkar

विद्यार्थी जीवन में भी मेधा एक प्रतिभाशाली छात्रा थीं। वे स्कूल और कालेज के प्रत्येक कार्यक्रम में पूरी तत्परता से भाग लेती थीं और सफलता प्राप्त करती थीं। गीत, नृत्य, अभिनय, भाषण-प्रतियोगिता, वाद-विवाद, काव्य-पाठ आदि सभी क्षेत्रों में मेधा ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। किन्तु समाज सेवा की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई से ‘सामाजिक कार्य’ विषय लेकर 1976 में एम.ए. किया और उसके बाद पाँच साल तक मुंबई तथा गुजरात की कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ जुड़कर सामाजिक काम करना शुरू किया और इसी के साथ वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में स्नातकोत्तर विदयार्थियों को पढ़ाती भी रहीं। तीन साल तक उन्होंने इस संस्थान में अध्यापन किया और इसी बीच वहाँ शहरी और ग्रामीण सामुदायिक विकास में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया। इन्ही दिनों बाईस वर्ष की उम्र में उनकी शादी हुई और कुछ वर्ष तक उन्होंने निभाया भी किन्तु उनके लक्ष्य में यह बड़ा अवरोध था और अंत में बातचीत करके बड़ी शालीनता के साथ वे दांपत्य बंधन से मुक्त हो गयीं।

 अध्ययन के दौरान फील्डवर्क के लिये जब वे आदिवासी क्षेत्रों में गयीं और वहाँ उनके प्रत्यक्ष हालात देखे तो उनका संवेदनशील हृदय अपने को रोक नहीं पाया। उनका शोध-कार्य बीच में ही छूट गया और वे समाज सेवा के क्षेत्र में उतर पड़ीं। 

मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की संस्थापक सदस्य हैं। 1985 से वे नर्मदा से जुड़े हर आन्दोलन में अग्रणी भूमिका में रहीं। यह आन्दोलन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के एक लाख से अधिक लोगों के विस्थापन तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले भयंकर दुष्प्रभावों के प्रतिरोध सेजुड़ा है।

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन 1961 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। लेकिन तीन राज्यों-गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान के मध्य एक उपयुक्त जल वितरण नीति पर कोई सहमति नहीं बन पायी। 1969 में, सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया ताकि जल संबंधी विवाद का हल करके परियोजना का कार्य शुरु किया जा सके। 1979 में न्यायाधिकरण के सुक्षावों से नर्मदा घाटी परियोजना ने जन्म लिया जिसमें नर्मदा नदी पर बनने वाले 30 बांधों में सरदार सरोवर और महेश्वर– दो सबसे बड़े बाँध थे। इन्हीं के साथ 3000 जल परियोजनाओं का निर्माण भी शामिल था। 1985 में इस परियोजना के लिए विश्व बैंक ने 450 करोड़ डॉलर का ऋण देने की घोषणा की। सरकार के अनुसार इस परियोजना से मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के सूखा ग्रस्त क्षेत्रों की 2.27 करोड़ हेक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल सुलभ हो सकेगा, पीने के लिए पानी मिल सकेगा औरबिजली का निर्माण होगा। इसके अलावा इससे, बड़े क्षेत्र में बाढ़ को रोकने में भी मदद मिलेगी।Social worker Medha Patkar called the government system useless | समाजसेवी मेधा पाटकर ने कहा- लोगों को नारकीय जीवन जीना पड़े तो सरकारी तंत्र ही बेकार - Dainik Bhaskar

किन्तु दूसरी ओर अनेक विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार इस परियोजना से तीन राज्यों की 37000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी जिसमें 13000 हेक्टेयर वन भूमि है। यह भी अनुमान किया गया कि इससे 248 गांव के एक लाख से अधिक लोग विस्थापित होंगे, जिनमें 58 प्रतिशत लोग आदिवासी क्षेत्र के हैं। इसलिए प्रभावित गाँवों के करीब ढाई लाख लोगों के पुनर्वास का मुद्दा सबसे पहले स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उठाया। 1985 में मेधा पाटकर ने अपने कुछ साथियों के साथ नर्मदा घाटी का दौरा किया और वहाँ की वस्तुस्थिति का अध्ययन किया। उन्होंने वहाँ के स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों से भी बात की। उन्हें लगा कि उनकी लड़ाई सिर्फ सरकार से ही नहीं, विश्वबैंक से भी है और बिना संगठित हुए विश्व बैंक को नहीं हराया जा सकता। उन्होंने मध्य प्रदेश से सरदार सरोवर बाँध तक अपने साथियों के साथ 36 दिनों की यात्रा की। यह यात्रा पूरी तरह गांधी के आदर्शों पर आधारित थी। इस यात्रा में शामिल लोग सीने पर दोनो हाथ मोड़कर चलते थे। यह यात्रा राज्य सरकार और विश्व बैंक को खुली चुनौती थी। इसके नाते लोग विकास के वैकल्पिक स्रोतों पर भी सोचने लगे।

1985  में उन्होंने ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ का औपचारिक गठन किया। अनेक समाजसेवी, पर्यावरणविद, छात्र-संगठन, महिला -संगठन, आदिवासी -संगठन, किसान-संगठन तथा बड़ी संख्या में मानवाधिकार कार्यकर्ता इस आन्दोलन से जुड़ गये। आंदोलन ने न्यायालय के शरण में जाने के साथ साथ भूख हड़ताल, पदयात्राएं तथा जनजागरण के माध्यम से आम लोगों तथा सरकार तक अपनी मांगें पहुँचाने की कोशिश की।

 सितम्बर, 1989 में मध्य प्रदेश के हरसूद नामक शहर में एक आम सभा हुई जिसमें 200 से अधिक गैर सरकारी संगठनों के 45000 लोगों ने भाग लिया। भारत में पहली बार ‘नर्मदा’ का प्रश्न  एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। यह पर्यावरण के मुद्दे पर अब तक की सबसे बड़ी रैली थी जिसमें देश के सभी बड़े गैर-सरकारी संगठनों तथा आम आदमी के अधिकारों की रक्षा में लगे समाजसेवियों ने हिस्सा लिया। हरसूद सम्मेलन ने न केवल बांध का विरोध किया बल्कि इसे ‘विनाशकारी विकास’ का नाम भी दिया। पूरी दुनिया में इस सम्मेलन का संदेश गया।

Medha Patkar - Goldman Environmental Foundation : Goldman Environmental Foundation

1991 में मेधा पाटकर ने 22 दिन तक अनशन किया। उस समय उनकी हालत बहुत बिगड़ गयी थी। इन सबका यह परिणाम हुआ कि विश्व बैंक ने 1991 में बांध की समीक्षा के लिए एक निष्पक्ष आयोग का गठन किया। इस आयोग ने कहा कि परियोजना का कार्य विश्व बैंक तथा भारत सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं हो रहा है। इस प्रकार विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपने हाथ खींच लिए। किन्तु राज्य सरकार ने स्वयं आर्थिक मदद करके परियोजना जारी रखने का निर्णय लिया। इस पर मेधा पाटकर के 1993 में फिर से अनशन शुरू कर दिया जिसका मुख्य उद्देश्य बांध निर्माण स्थल से लोगों के विस्थापन को रोकना था।

आंदोलनकर्ताओं ने जब देखा कि राज्य सरकार द्वारा पर्यावरण तथा वन मंत्रालय द्वारा दिये गये दिशा-निर्देशों का भी ठीक से पालन नहीं किया जा रहा है तो 1994 में मेधा पाटकर ने फिर से अनशन शुरू कर दिया। इसी वर्ष सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गयी और कोर्ट से केस के निपटारे तक बांध के निर्माण कार्य को रोकने की गुजारिश की गयी। 1995 के आरम्भ में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार बांध के बाकी कार्यों को तब तक रोक दे जबतक विस्थापित हो चुके लोगों के पुर्नवास का प्रबंध नहीं हो जाता।

Neverending Struggle Of Medha Patkar For River Narmada | Youth Ki Awaaz

18 अक्टूबर, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय ने बांध के कार्य को फिर शुरू करने तथा इसकी ऊंचाई बढ़ाने की मंजूरी दे दी, लेकिन इसी के साथ यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उससे पर्यावरण को खतरा न हो और विस्थापन के शिकार लोगों को बसाने का कार्य सुचारु ढंग से हो। कोर्ट ने विस्थापित लोगों के पुर्नवास के लिए नये दिशा-निर्देश भी जारी किए जिनके अनुसार नये स्थान पर बसाए गये लोगों के लिए 500 व्यक्तियों पर एक प्राईमरी स्कूल, एक पंचायत घर, एक चिकित्सालय, पानी तथा बिजली की व्यवस्था तथा एक धार्मिक स्थल अवश्य होना चाहिए। इसके बाद मेधा पाटकर का आन्दोलन खासतौर पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश को लागू करवाने से संबंधित मुद्दों पर केन्द्रित हो गया।

1989 में जिस हरसूद शहर में मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आन्दोलन के लिए सबसे बड़ी रैली की थी उस शहर ने 2004 में सदा के लिए जलसमाधि ले लिया। हरदूद, इंदिरा सागर डैम से सबसे आखिर में डूबने वाला शहर था। उस समय वहाँ उमा भारती मुख्य मंत्री थीं। हरसूद के विस्थापन को कवर करने वाले और ‘हरसूद 30 जून’ नाम कीपुस्तक लिखने वाले पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने लिखा है, “मेधा के जाते ही चिखल्दा (मेधा का धरना स्थल। उन्हें धरना स्थल से उठवा लिया गया था।) की बिजली गुम है। इंटरनेट भी काम नहीं कर रहा। हरसूद अपने सामने बीती हर घड़ी के साथ बिखरता गया था। मगर जब हम वहाँ गये तब वहाँ जिन्दगी रोज जैसी आम चहल-पहल से भरी थी। सिर्फ तीन हफ्तों के भीतर यह शहर उजड़ना शुरू हो गया था।” उन्होंने आगे लिखा है, “1200 की आबादी के जिस चिखल्दा गांव में मेधा धरने पर रहीं, वह रियासत के दौर में चार रियासतों की सीमा चौकी थी। होलकर, सिंधिया, पवार और स्थानीय बड़वानी रियासत। तहसील के खंडहर सबसे पहले पानी में जायेंगे। बगल में रंगापुता नीलकंठेश्वर महादेव का मंदिर परिसर भी जलसमाधि लेगा।”

Instant ख़बर | मेधा लेंगी जल समाधि नहीं खाली करेंगी जगह | Instant ख़बर

जब नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे बाँध की ऊंचाई बढ़ाने का सरकार ने फैसला किया तो उसके विरोध में भी मेधा पाटकर 28 मार्च 2006 को अनशन पर बैठ गयीं थीं और वे आज भी विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रही हैं। उनका कहना है कि उनकी यह लड़ाई तबतक चलती रहेगी जबतक सभी प्रभावित परिवारों का पुनर्वास सही ढंग से नहीं हो जाता।

कृष्णकान्त ने ‘द वायर’ में 11 अक्टूबर 2017 को अपनी रिपोर्टिंग में सरदार सरोवर बाँध के कारण जलसमाधि लेने वाले भादल गाँव के एक आदिवासी बुजुर्ग पुस्लिया पटेल के मार्मिक वक्तव्य का उल्लेख किया है जिससे उस क्षेत्र के लोगों में मेधा पाटकर की लोकप्रियता का भी पता चलता है। पुस्लिया पटेल कहते हैं, “हम जेल गये। मेधा पाटकर के साथ गये थे आन्दोलन में। हमको सरकार बोली कि आन्दोलन का संगत छोड़ दो। हम बोले शिवराज पहले गद्दी छोड़ दे, मैं भी आन्दोलन की संगत छोड़ दूंगा। तूं पहले राज छोड़, मैं आन्दोलन की संगत छोड़ दूंगा। हमने सरकार से बोला कि जिन्दगी खतम कर दो तब भी संगत नहीं छोड़ूंगा…. सरकार को मेधा पाटकर की क्या चिन्ता? इस सरकार को जनता की क्या चिन्ता? इसे नर्मदा घाटी की क्या चिन्ता? जनता से बोलते रहे कि तुम नहीं डूबोगे। थोड़ा थोड़ा डूब आएगी, लेकिन अचानक सबको डुबा दिया।”Sardar Sarovar Dam Project: Narendra Modi protested for it as Gujarat CM, lays foundation as PM - सरदार सरोवर बांध परियोजना: गुजरात सीएम रहते हुए नरेंद्र मोदी ने किया था अनशन, पीएम

      उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर सरदार सरोवर बाँध का लोकार्पण हुआ था किन्तु मेधा पाटकर के अनुसार, “(उस समय तक) इस परियोजना को लेकर लगभग पचास प्रतिशत काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है। मध्य प्रदेश में करीब 40 हजार परिवार ऐसे हैं जिनका अभी तक पुनर्वास नहीं हुआ है। पर्यावरणीय कार्य भी पूरा नहीं हुआ है। हम अब लड़ाई का दूसरा दौर शुरू करेंगे।”

      इस आन्दोलन की खूबी यह है कि इसमें भिन्न भिन्न विचारधारा के लोग शामिल होते रहे हैं किन्तु लक्ष्य एक है और मार्ग भी एक- गाधीवादी।  मेधा पाटकर ने लक्ष्य से अपनी नजरें कभी नहीं हटाईं। वे इतनी व्यवहारकुशल और उदार हैं कि जो लोग उनसे जुड़े वे पूरी निष्ठा से उनके साथ रहे। प्रतिष्ठित लेखकों, बुध्दिजीवियों और ईमानदार पत्रकारों ने भी हमेशा उनका साथ दिया। उनका साथ देने वालों में लेखिका महाश्वेता देवी तथा अरुंधती रॉय, पत्रकार संजय शर्मा, इंजीनियर श्रीपाद धर्माधिकारी, आलोक जी और हिमांशु जी, गुजरात की नंदिनी बहन जैसे लोग प्रमुख हैं। ये सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ रहे हैं। ये लोग पहले पूरी योजना के प्रत्येक पहलू पर गंभीर विचार विमर्श करते थे और उसके बादउसे आन्दोलन के कार्यक्रम में शामिल करते थे। प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें उपयोगी जगह लगा कर उनसे सार्थक काम करवा लेना मेधा पाटकर का विशेष गुण है।

मेधा पाटकर के ऊपर दमन चक्र कम नहीं चले। कोंकण जा रही मेधा व उनके सहकर्मियों को जबरदस्ती बस से उतार कर इतना पीटा गया कि कुछ लोग बेहोश हो गये थे। भूख हड़ताल के दौरान डंडे बरसाना, अपशब्द कहना और गिरफ्तार करके जेल में डाल देने जैसे कार्य अनेक बार हुए।

मार्च 2006 में उन्होंने बीस दिन की लंबी भूख हड़ताल की थी। नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अलावा भी देश में जहाँ कहीं भी गरीबों, दलितों,आदिवासियों पर अत्याचार या उनके शोषण की खबर मिलती है, मेधा पाटकर बिना किसी झिझक के वहाँ पहुंच जाती हैं और संघर्ष में शामिल हो जाती हैं। 2 दिसम्बर 2006 को उन्हें सिंगूर (प. बंगाल) में उस समय गिरफ्तार किया गया था जब वे किसानों के हक के समर्थन में वहाँ गयी थीं।Medha Patkar | Nainital Samachar

2005 में जब मुंबई की झुग्गियों में रहने वाले 75000 गरीबोंके पुनर्वास के नाम पर बिल्डरों ने उनके साथ धोखा किया तो मेधा वहाँ पहुँच गयीं और मुंबई के आजाद मैदान में उन्होंने बड़ी मीटिंग करके उन्हें ललकारा। उन्होंने बिल्डरों द्वारा उसके लिए निर्धारित क्षेत्र में पानी, बिजली, शौचालय आदि की समुचित सुविधाओं के साथ आवास बनाने को बाध्य किया। मुंबई शहर के विकास और उसके निवासियों के लिए झुग्गियों में रहने वाले लोगों की क्या भूमिका है, मेधा पाटकर ने इसे विस्तार से रेखांकित किया।

चिपको आन्दोलन के प्रमुख सर्वोदयी नेता सुन्दरलाल बहुगुणा जब टिहरी में आमरण अनशन पर थे और उनके अनशन के 51 दिन पूरे होने वाले थे तो मेधा पाटकर उनसे मिलने जा रही थीं। उस समय 5 जून 1995 को टिहरी से पहले ही नरेन्दनगर नामक स्थान पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे आन्दोलनों के दौरान अनेक बार जेल जा चुकी हैं।

मेधा पाटकर ने भारत के अधिकांश जन-संगठनों को एक सूत्र में जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया है। इस संगठन का नाम है ‘नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट’। इसमें भारतीय संविधान  और जनतंत्र में विश्वास रखने वाले देशभर के सैकड़ों संगठन शामिल हैं। इस प्रकार जनान्दोलनों को उन्होंने एक नई परिभाषा दी है।

मेधा पाटकर छवि पूरी तरह बेदाग हैं। वे ज्यादातर नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथियों के बीच ही रहती हैं। वहाँ के लोग भूल चुके हैं कि वे मुंबई से उनके बीच आई हैं। हर जुलूस में सबसे आगे रहने वाली मेधा पाटकर की आवाज उत्साह बढ़ाने वाले नारों के रूप में अवश्य सुनाई देती है।

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में जब टाटा के नैनो कार के निर्माण के लिए वहाँ की तत्कालीन वाममोर्चा की सरकार ने किसानों की खेती योग्य भूमि आवंटित की और कार की फैक्टरी लगने लगी तो वहाँ की जनता के साथ मेधा पाटकर भी खड़ी हो गयीं थीं। अंत में टाटा को अपना लगभग तैयार प्रोजेक्ट रोकना पड़ा और उसे गुजरात में शिफ्ट करना पड़ा।जेल में कटेगी मेधा पाटकर की आजादी की रात

इसी तरह महाराष्ट्र में लवासा प्रोजेक्ट के खिलाफ भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की और उस क्षेत्र के किसानों के पक्ष में खड़ी हो गयीं जिनपर इस परियोजना का बुरा प्रभाव पड़ने वाला था। यह वह क्षेत्र था जहाँ के किसानों ने बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की थीं।

उन्होने मुंबई के हीरा नंदानी भूमि घोटाले के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कीं और आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के कोववाडा न्यूकीलियर प्रोजेक्ट का विरोध किया जिससे पर्यावरण पर गंभीर खतरा होने की संभावना थी।

13 जनवरी 2014 को उन्होंने आम आदमी पार्टी में शामिल होने की घोषणा की। उन्हें उत्तर पूर्व मुंबई की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिये आम आदमी पार्टी का टिकट मिला। इस चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी से चुनाव हार गयीं और तीसरे स्थान पर रहीं। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया।

मेधा पाटकर आज भी नर्मदा परियोजना से प्रभावित लोगों के बेहतर पुनर्वास के लिये लड़ रही हैं। अगस्त 2019 में अनशन के दौरान एक इंटरव्यू में बीबीसी को उन्होंने बताया था कि, “34 साल बाद भी हमारा धरना जारी है और आज भी गांवों का कत्ल जारी है। बाँध के बढ़ते जल स्तर में कई गाँव डूबते जा रहे हैं। कई गांव द्वीप बन गये हैं। जबतक सभी प्रभावित लोगों का पुनर्वास नहीं किया जाएगा, हमारा विरोध जारी रहेगा।” उनकी शिकायत है कि प्रशासन ने लोगों का पुनर्वास तो किया है किन्तु उन मानदंडों पर नहीं, जो सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है। उनके साथी कहते हैं, “ नर्मदा हमारी जीवन रेखा है, हम इसे अपनी मृत्युरेखा नहीं बनने देंगें।”

गैर सरकारी संगठनों की ओर से सामाजिक कार्यों के लिये मेधा पाटकर को बहुत से पुरस्कार मिल चुके हैं जिनमें महात्मा फुले अवार्ड, जनसेवा पुरस्कार, एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से ह्यूमन राइट्स डिफेंनेडर अवार्ड, जस्टिस के.एस.हेगड़े फाउन्डेशन अवार्ड आदि प्रमुख हैं।

निस्संदेह मेधा पाटकर जैसी दूसरी नहीं हो सकतीं। हम मेधा जी को उनके जन्मदिन पर हार्दिक बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य व अपने लक्ष्य की सफलता के लिए शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं।

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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