शख्सियत

आजाद भारत के असली सितारे -8

 

साइकिल वाली दीदी: सुधा वर्गीज

 

बिहार में एक ‘महादलित’ जाति है मुसहर। कुछ वर्ष पहले तक मुसहरों की गरीबी, बदहाली और अशिक्षा अकल्पनीय थी। उन्हें पेट भरने के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता था। शिक्षा और स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकता नहीं थी। मुसहर लड़कियों का बाल विवाह और यौन उत्पीड़न उनकी नियति का हिस्सा था। मुसहरों की जिन्दगी सुधारने के लिए सुधा ने सबसे पहले लड़कियों को शिक्षित करने का प्रयास किया था। वे लड़कियों से मिलतीं, उन्हें नियम और कानून की जानकारी देतीं और उन्हें पढ़ने-लिखने को प्रेरित करतीं। मुसहरों की बस्ती में वर्षों तक रहते हुए वे शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध करने के लिए उन्हें प्रेरित करतीं और कई बार जब उनकी शिकायत पर भी पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती तो उन्हें थाना का घेराव करने को कहतीं और इसमें भी वे सबसे आगे रहतीं। इन सबमें गाँव के दबंग लोग रोड़ा अटकाते और धमकी देते, लेकिन सुधा वर्गीज पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। वे अपने काम में मुस्तैदी से लगीं रहतीं।

आरंभ में बच्चियों के घरवालों से बात करने और उन्हें मनाने के लिए सुधा को घर-घर जाकर उनके अभिभावकों से मिलना पड़ा ताकि वे उन्हें पढ़ने के लिए भेज सकें। इसके लिए वे साइकिल का इस्तेमाल करतीं। धीरे-धीरे लोग सुधा वर्गीज को ‘साइकिल वाली दीदी’ के नाम से पुकारने लगे।

സിസ്റ്റര്‍ സുധാ വര്‍ഗ്ഗീസിന് ഫിലഡല്‍ഫിയ പൗരാവലിയുടെ ആദരവ് | us news

सुधा वर्गीज का जन्म 5 सितम्बर, 1944 को केरल के कोट्टायम जिले के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। सुधा वर्गीज के पिता किसान थे और माँ गृहिणी। अपनी तीन बहनों में वे सबसे बड़ी हैं। वे बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली रही हैं। उनकी स्कूली पढ़ाई केरल में हुई। इसके बाद मैसूर यूनिवर्सिटी से उन्होंने ग्रेजुएशन किया। 1965 में वे रोमन कैथोलिक गर्ल्स स्कूल की बहनों के साथ गरीबों के बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से बिहार चली आईं। इससे पहले सुधा न तो कभी बिहार गयी थीं और न ही उन्होंने कभी इस तरह की गरीबी और भेदभाव को देखा था।

कुछ दिनों तक वे बिहार के कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षिका रहीं। उनका कई जिलों में तबादला होता रहा। इससे उनको राज्य के लोगों के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। जब वे रोहतास जिले में पढ़ा रही थीं तो उन्होंने हर सप्ताह दो दिन गांवों में बिताने शुरू कर दिए। पाँच दिन स्कूल में पढ़ातीं और दो दिन ग्रामीणों के बीच गुजारतीं। उन्हीं दिनों उन्हें पता चला कि बिहार के गांवों की अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक गरीबी है। उनके जीवन स्तर को देखकर सुधा के जीवन की दिशा ही बदल गयी। वे गरीबों और जरुरतमंदों की स्वतःस्फूर्त ढंग से मदद करने लगीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात परेशान हाल कुष्ठ रोगियों से हुई। वे उन्हें भी मदद करने लगीं। उनके सामाजिक कार्यों और दलितों को हर तरह से मदद पहुँचाने के कारण बहुत से असमाजिक तत्व उन्हें परेशान करने लगे। इसके बाद वे अपना कार्यक्षेत्र बदलकर मुंगेर चली गयीं और वहाँ पहली बार मुसहर समुदाय के लोगों से उनका सम्पर्क हुआ।

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 उन्हें पता चला कि मुसहर लोग, आम गरीबों से भी ज्यादा गरीब हैं। मुसहर जाति के लोग खास तौर से बिहार और उत्तर प्रदेश में मिलते हैं। ये लोग अनुसूचित जाति के अन्तर्गत भी सबसे गरीब तबके के होते हैं। इनको ‘आर्य’, ‘बनबासी’ भी कहा जाता है। पहाड़ तोड़कर सड़क बनाने वाले बिहार के दशरथ माँझी, तिलका माँझी, जीतन राम माँझी आदि इसी समुदाय के रहे हैं। देश में शिक्षा का स्तर ऊंचा होने के चाहे जितने ढिढोरे पीटे जाएँ, मुसहर समुदाय की 98 प्रतिशत महिलाएँ और 90 प्रतिशत पुरूष आज भी अशिक्षित पाए जाते हैं।

अशिक्षा, गरीबी और शोषण से तो उनका सदियों पुराना नाता था। वहाँ न तो बिजली-पानी की व्यवस्था थी और न शौचालय थे। रहने के लिए मिट्टी के बने छोटे-छोटे घर, खाने के लिए नालियों में घूमते चूहे और बदन ढकने के लिए फटे-पुराने कपड़ों के टुकड़े। बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों में आज भी उनकी बस्तियाँ आम वर्ग के लोगों की आबादी से अलग बसाई गयी होती हैं। उन्हें सामाजिक स्तर पर किसी तरह का मान-सम्मान नसीब नहीं होता था। यही मुसहरों के जीवन का यथार्थ था। ये सब देखने के बाद सुधा ने निर्णय लिया कि वह इन लोगों की मदद में ही अपनी जिन्दगी बिताएँगी और इसी के साथ उनके जीवन का नया सफर शुरू हुआ।बिहार के 'महादलितों' की अंधेरी जिंदगी में रोशनी ला रही हैं सुधा वर्गीस

इरादे दृढ़ हों तो रास्ते निकल ही आते हैं। धीरे- धीरे सुधा को समझ में आ गया कि उनकी मदद कैसे की जा सकती है। अगर गरीबों की मदद करनी है, तो पहले उनके साथ रहकर उनकी परेशानी समझनी पड़ेगी। इसके बाद उन्होंने अपना सामान बाँधा और पटना के समीप ‘जमसौत’ नामक गाँव में आ गयीं। यह मुसहर जाति का ही गाँव था। जैसे-तैसे सुधा को वहाँ एक घर मिल गया। उनका घर बहुत ही छोटा और गन्दगी से भरा हुआ था। मुसहर लोगों के साथ रहने के लिए उन्होंने अपने को ढाला। इसके लिए उन्हें रोज सुबह 4 बजे उठना पड़ता था, ताकि वह गाँव की महिलाओं के साथ शौच करने जा सकें। चारो तरफ गन्दगी का साम्राज्य था। सुधा को एहसास नहीं था कि समाज का एक हिस्सा इतने बुरे हालातों में जी रहा है। मुसहर जाति का ‘महादलित’ होना उनकी असली परेशानी थी। उन्हें अपने हक के बारे में पता तक नहीं था। मुसहर जाति के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, क्योंकि वहाँ उन्हें अछूत कहकर क्लास से दूर रखा जाता था। कई बच्चों को तो बेंच पर बैठने भी नहीं दिया जाता था। मुसहर लोग इस भेदभाव के खिलाफ कुछ नहीं कह पाते थे। सुधा वर्गीज ने ऐसे ही महादलित लोगों के हक के लिए आवाज उठाने का फैसला किया।

1986 में अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर वे मुसहर जाति का जीवन बदलने के लिए मैदान में उतर गयीं। उन्होंने सबसे पहले मुसहर महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। जब वे यहाँ आई थीं, तब उन्हें अंग्रेजी भाषा की भी कम समझ थी। दूसरों की मदद करने के लिए उन्होंने अंग्रेजी व हिन्दी भाषा का ज्ञान अर्जित किया। आगे चलकर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के उद्देश्य से हीसुधा ने बंगलौर विश्वविद्यालय से 1989 में वकालत की डिग्री हासिल की।

    सुधा लड़कियों को पुस्तकीय ज्ञानके अलावा व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा भी देना चाहती थीं। घर-घर जाकर ये काम करना थोड़ा मुश्किल था इसलिए उन्होंने एक स्कूल खोलने की सोची। 2005 में उन्होंने अपना पहला स्कूल ‘प्रेरणा’ शुरू किया। यह विद्यालय दानापुर, पटना में स्थित है। यह सिर्फ लड़कियों का विद्यालय था। इस विद्यालय का मकसद था कि मजदूरी करने वाली लड़कियों को शिक्षित करके उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना। इस स्कूल में लड़कियों को खेल-कूद, पढ़ाई, हस्त-कला वाले काम और कराटे जैसी चीजें सिखाई जाने लगीं। इनमें से अधिकांश लड़कियाँ वह थीं, जिनके खानदान में कभी कोई स्कूल गया ही नहीं था। स्कूल जाने से गाँव की लड़कियों के अंदर आत्मविश्वास पैदा होने लगा। इतना ही नहीं, उनमें आगे बढ़ने की ललक भी दिखाई देने लगी।बिहार के 'महादलितों' की अंधेरी जिंदगी में रोशनी ला रही हैं सुधा वर्गीस

मुसहरों के गाँवों के लोगों की जिन्दगी इतनी बदतर थी कि उसे शब्दों में बयान कर पाना बहुत मुश्किल है। सदियों से मुसहर जाति के लोग एक अन्धकार भरी जिन्दगी जीने को मजबूर थे। सुधा वर्गीज की बदौलत मुसहरों का यह समुदाय तीव्र गति बेहतर कल की ओर बढ़ रहा है।

सुधा वर्गीज ने पटना के पुनपुन इलाके के एक क्षेत्र डुमरी गाँव में कई मुसहर युवाओं को दारू पीकर ताश खेलते देखा। धान एवं अन्य फसलों की कटाई होने के बाद उनके पास कोई काम नहीं होता था। लिहाजा वे समय काटने के लिए अलग-अलग उपक्रम करते थे। इनमें मुख्य रूप से दारू पीना और ताश खेलना होता था।

उन्होंने ऐसे युवाओं से बात की और उनसे पूछा कि वे क्या करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि वे क्रिकेट खेलना चाहते हैं। यह जानकारी मिलते ही उन्होंने एक क्रिकेट किट उन युवाओं को उपलब्ध करा दिया। इससे वे नियमित रूप से क्रिकेट खेलने लगे। उन्होंने इसके लिए एक बैंक से भी मदद लिया। आज उस क्षेत्र में दर्जनों क्रिकेट टीमें हैं जिनमें से कई टीमों ने अलग- अलग प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की है। क्रिकेट खेलने के कारण उनका दारू और ताश के प्रति आकर्षण कम हुआ और सोच में भी बदलाव आया।बिहटा में घरेलू हिंसा के खिलाफ नारी गुंजन का साइकिल रैली,लड़के-लड़कियों ने लिया हिस्सा,रोक के लिये की नारेबाजी - Bihar News Live | DailyHunt

1987 में सुधा वर्गीज ने एक स्वयं सेवी संगठन शुरू किया, जिसका नाम रखा गया ‘नारी गुंजन’, मतलब ‘औरतों की आवाज’। इसके जरिए वह औरतों को उनके कानूनी अधिकार के बारे में बताकर, उन्हें आगे बढ़ाना चाहती थीं। कुछ ही दिनों में सुधा वर्गीज के ‘नारी गुंजन’ से करीब 850 सेल्फ हेल्प ग्रुप जुड़ गये। इसके बाद ही उनका संगठन बिहार के पाँच जिलों तक फैल गया। इस संगठन के जरिए आज बहुत सी महिलाएँ घर चलाने के लिए कुछ धन भी अर्जित कर ले रही हैं। सुधा ने हजारों महिलाओं को ‘किचेन गार्डेनिंग’ से भी जोड़ा है।

‘नारी गुंजन’ प्रतिभाशाली मुसहर लड़कियों को निःशुल्क शिक्षा, छात्रावास, भोजन, कपड़ा आदि भी उपलब्ध करा रही है। उन्हें पुस्तकीय शिक्षा के साथ नृत्य, कराटे आदि भी सिखाए जाते हैं। सुधा वर्गीज को लगता है कि आज के समय में महिलाओं को अपनी सुरक्षा करने में भी सक्षम होना चाहिए। उनकी कठिन साधना का ही नतीजा है कि उनके स्कूल की एक दर्जन छात्राएँ यूरोपीय देश आर्मेनिया की राजधानी येरेवान की उस अंतर्राष्ट्रीय वुडो काई कराटे चैंपियनशिप में भाग ले चुकी हैं, जिसमें 60 देशों की छात्राओं ने करतब दिखाए थे। इसके अलावा 2011 में हुए गुजरात स्कूल गेम्स में ‘प्रेरणा’ स्कूल की बच्चियों ने भी भाग लिया था। उन्होंने इसमें कराटे का बेहतरीन प्रदर्शन किया और वहाँ से 5 गोल्ड, 5 सिल्वर और 14 ब्रोंज मेडल उन्हें मिले।

सुधा वर्गीज के अनुसार मुसहर समुदाय में लोगों की मृत्यु का मुख्य कारण कुपोषण है। समुदाय की मदद करने के लिए संस्थान ने भेड़-बकरियों को पालने की व्यवस्था की है जो उनके लिए पैसे कमाने का एक जरिया भी बना है।

‘प्रेरणा’ की सफलता को देखकर बिहार के मुख्य मंत्री श्री नीतीश कुमार ने स्कूल की दूसरी शाखा शुरू करने के लिए उनसे आग्रह किया। इसके बाद गया में ‘प्रेरणा-2’ के नाम से स्कूल की दूसरी शाखा खोली गयी है।बिहार (Bihar) की कुछ दलित महिलाएं जिन्होंने देश की पहली महिला म्यूजिकल बैंड (Naari Gunjan Sargam Mahila Band) बना डाली इनके बुलंद हौसलों के आगे समाज के ...

सुधा वर्गीज ने नारी गुंजन का एक बैंड पार्टी भी बनाया जिसे ‘नारी गुंजन सरगम बैंड’ कहते हैं। इस बैंड में केवल महिलाएँ काम करती हैं। शुरुआत में इस बैंड को बनाने में कई तरह की समस्याएँ आईं। पहले अधिकांश महिलाओं ने इस काम को करने से मना कर दिया, लेकिन सुधा वर्गीज ने धीरे-धीरे उन महिलाओं का विश्वास जीता और उन्हें बैंड पार्टी में शामिल होने पर राजी कर लिया। उन्होंने चयनित महिलाओं को प्रोफेशनल ट्रेनर से बैंड का प्रशिक्षण दिलवाया। इस बैंड टीम को शुरू में लोगों की तरह-तरह की फिकरेबाजियों का सामना करना पड़ा। जब पहली बार इस महिला बैंड ने बिहारशरीफ में अपने हुनर का प्रदर्शन किया तोहर कोई उनका मुरीद हो गया। इसके बाद इन्हें हर जगह से बुलाया जाने लगा। यह बैंड आज बिहार का प्रतिनिधित्व तो करता ही है, बल्कि दूसरे राज्यों में भी अपनी छाप छोड़ रहा है। ‘नारी गुंजन’ महिलाओं के मासिक धर्म (पीरियड्स) की समस्या के लिए भी काम करता है और कम दाम में सेनेटरी नैपकिन भी महिलाओं को उपलब्ध कराता है।

आज बिहार के पाँच जिलों में ‘नारी गुंजन’ सक्रिय है और समाज को बदलने की कोशिश कर रहा है। राज्य सरकार द्वारा भी कई बार संस्थान को मदद मुहैया कराई जाती है। राज्य में स्थित महादलित विकास आयोग ने भी संस्थान को कई बार सहयोग किया है।

समाज में बदलाव लाने के लिए जो काम सुधा वर्गीज ने कियाहै, उसके आगे हर पुरस्कार छोटा है। यही कारण है कि आज सुधा वर्गीज को ‘चेंजमेकर’ कहा जाता है। डॉ. दयाल फाउंडेशन सहित अनेक स्वयं सेवी संगठन आज ‘नारी गुंजन’ और ‘प्रेरणा’ को हर तरह की मदद दे रहे हैं और संगठन सफलता के नए नए कीर्तिमान रच रहा है।WomanOfWonder चूहे खाकर जीवन बिताने को मजबूर मूसहर समुदाय की तस्वीर बदलने वाली सुधा वर्गीस से मिलिए | Meet Sudha Varghese Who Changed The Poor Plight of Mooshar Community Of Bihar

निस्संदेह जो सपना लेकर सुधा वर्गीज मुसहर लोगों के पास गयी थीं, उन्होंने उसे काफी हद तक साकार कर लिया है। सपने को हकीकत में बदलने में उन्हें लगभग 30 साल लग गये। सुधा वर्गीज आज भी अपने काम में उसी उत्साह के साथ लगी हुई हैं।

सोनी चैनल पर प्रसारित होने वाले शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के दसवें सीजन में हॉट सीट पर सुधा वर्गीज को भी बुलाया गया था। वे अभिनेत्री अनुष्‍का शर्मा और वरुण धवन के साथ बैठीं थीं अनुष्‍का और वरुण अपनी फिल्म ‘सुई धागा’ के प्रमोशन के लिए पहुंचे थे।KBC 10 के सेट पर बिग बी ने विराट का नाम लेकर उड़ाया अनुष्का शर्मा का मजाक | Laughing Colours Hindi

सुधा वर्गीज ने अमिताभ बच्‍चन द्वारा पूछे गये 13 सवालों का जवाब देकर 25 लाख रुपये जीते। केवल दो लाइफलाइन का इस्‍तेमाल कर सुधा वर्गीज ने इन प्रश्नों के जवाब दिए थे।

कर्मयोगी सुधा वर्गीज को भारत सरकार की ओर से ‘पद्मश्री’ सम्मान मिल चुका है। इसके अलावा बिहार सरकार द्वारा उन्हें ‘आईकन ऑफ बिहार’ का सम्मान भी दिया गया है। किन्तु सबसे बड़ा सम्मान उन्हें बिहार के मुसहर समुदाय के लोगों से प्राप्त ‘दीदी’ का आदर और प्रेम है। उनके द्वारा लाए गये बदलाव के कारण एक पूरे समुदाय की जिन्दगी ही बदल गयी।

जन्मदिन के अवसर पर दलितों के हित के प्रति सुधा वर्गीज के समर्पण और संघर्ष को हम नमन करते हैं और उनके सुस्वास्थ्य और सतत सक्रियता की कामना करते हैं।

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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