
विश्वविद्यालय, विचार और संविधान की कसौटी
22 सितम्बर 2026 को रिपब्लिक वर्ल्ड में प्रकाशित जेएनयू की कुलपति प्रो. शान्तिश्री धुलिपुडी पण्डित का लेख(https://www.republicworld.com/amp/opinion/the-dangerous-rise-of-woke-jihadi-ideology-in-indian-higher-education-campuses-2026-09-22-137489)भारतीय उच्च शिक्षा परिसरों में कथित ‘वोक-जिहादी’ विचारधारा के उदय को लेकर गम्भीर आरोप लगाता है। लेख में दावा किया गया है कि आईआईटी, आईआईएसईआर, एनआईटी और निजी विश्वविद्यालयों के परिसर किसी संगठित वैचारिक नेटवर्क के प्रभाव में आ रहे हैं, जो युवाओं को ‘एण्टी-इण्डिया’ विचारों की ओर ले जा रहा है। लेख आगे चलकर कुछ मानविकी विभागों को ‘मार्क्सवादी वैचारिक प्रभुत्व’, कुछ सामाजिक-भाषाई समूहों को संस्थागत नियन्त्रण की कोशिश तथा कुछ परिसरों को ‘अर्बन नक्सल’ और कट्टरपन्थी गतिविधियों के लिए सुरक्षित स्थान तक बताता है। लेख की लेखिका स्वयं जेएनयू की कुलपति हैं और रिपब्लिक वर्ल्ड ने स्पष्ट किया है कि ये उनके निजी विचार हैं।
इन दावों को केवल राजनीतिक पसन्द-नापसन्द के आधार पर देखना उचित नहीं होगा। विश्वविद्यालय आखिरकार समाज के बौद्धिक विवेक को निर्मित करने वाली संस्थाएँ हैं। इसलिए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि विश्वविद्यालयों में वैचारिक पक्षधरता, अकादमिक स्वतन्त्रता, राष्ट्रीय मूल्यों और संस्थागत स्वायत्तता के बीच सीमा कहाँ खींची जाए। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर स्वयं संविधान की कसौटी पर तलाशना होगा, न कि किसी एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा से बदलकर।
सबसे पहली समस्या लेख की भाषा और उसकी प्रमाण-पद्धति से पैदा होती है। ‘वोक-जिहादी’, ‘अकादमिक साम्राज्य’, ‘जिहादी उपनिवेशीकरण’, ‘अन्दर के दुश्मन’, ‘शहरी नक्सल समर्थक’ और ‘भारत-विरोधी एजेण्डा’ जैसे शब्द अत्यन्त गम्भीर आरोपों का संकेत देते हैं। ऐसे आरोप यदि किसी व्यक्ति, विभाग या संस्थान पर लगाए जाएँ तो उनके लिए विशिष्ट नाम, शोध, पाठ्यक्रम, नियुक्ति का रिकॉर्ड, प्रशासनिक दस्तावेज, वित्तीय स्रोत या किसी जाँच की प्रमाणित रिपोर्ट अपेक्षित होगी। लेकिन लेख में अधिकांश दावे व्यापक और सामूहिक रूप में किए गये हैं। मसलन, आईआईटी के मानविकी विभागों को वैचारिक प्रभुत्व का केन्द्र बताया गया है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन शिक्षकों, किन शोधों या किन संस्थागत निर्णयों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। यही वह जगह है जहाँ आलोचना और आरोप के बीच का अन्तर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। लेख के अपने शब्दों में भी कई जगह ‘रिपोर्टें चिन्ताजनक हैं’, ‘ऐसा प्रतीत होता है’ और ‘कथित मामले’ जैसी अभिव्यक्तियाँ हैं; अर्थात लेख स्वयं सभी आरोपों को प्रमाणित तथ्य के रूप में स्थापित नहीं करता।
इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संविधान ‘राष्ट्रीय मूल्य’ किस अर्थ में स्वीकार करता है। भारतीय संविधान किसी एक धार्मिक, सांस्कृतिक या वैचारिक परम्परा को राज्य की अनिवार्य वैचारिक कसौटी नहीं बनाता। प्रस्तावना न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता को लोकतान्त्रिक गणराज्य की आधारभूत प्रतिज्ञा बनाती है। मौलिक कर्तव्यों में नागरिकों से विविधताओं से ऊपर उठकर भाईचारा बढ़ाने, भारत की समग्र सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा एवं सुधार की भावना विकसित करने की अपेक्षा की गयी है।
यहीं लेख का सबसे बुनियादी अन्तर्विरोध दिखाई देता है। लेखिका स्वयं विविधता, लोकतन्त्र, भिन्नता, बहस और असहमति को विश्वविद्यालय का मूल्य मानती हैं, लेकिन दूसरी ओर उन विचारों को, जिन्हें वह ‘एण्टी-इण्डिया’ या ‘वोक-जिहादी’ मानती हैं, लगभग एक संगठित शत्रु-नेटवर्क की संज्ञा देती हैं। संविधान की दृष्टि से असहमति और राष्ट्र-विरोध एक ही बात नहीं हैं। किसी इतिहास-व्याख्या, आर्थिक सिद्धान्त, सामाजिक न्याय की अवधारणा या राज्य की नीति की आलोचना को तभी राष्ट्र-विरोधी कहा जा सकता है जब उसके लिए ठोस संवैधानिक अथवा कानूनी आधार हो। केवल इसलिए कि कोई शोध या विचार स्थापित राष्ट्रीय आख्यान से अलग है, उसे राष्ट्र-विरोधी मान लेना वैज्ञानिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से समस्याग्रस्त होगा।
वास्तव में भारतीय संविधान नागरिक को केवल सहमति की स्वतन्त्रता नहीं देता। अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को मान्यता देता है, यद्यपि अनुच्छेद 19(2) के अन्तर्गत सम्प्रभुता और अखण्डता, सुरक्षा, लोक-व्यवस्था आदि के हित में कानून द्वारा युक्तिसंगत प्रतिबन्ध सम्भव हैं। इसलिए विश्वविद्यालय में असहमति का अस्तित्व अपने-आप में समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब असहमति हिंसा, अपराध, भेदभाव या कानून-विरोधी गतिविधि में बदलती है। इसी तरह किसी वास्तविक आपराधिक नेटवर्क के प्रमाण हों तो उसकी जाँच और कार्रवाई होनी चाहिए; लेकिन पहले से पूरे अकादमिक समुदाय को ऐसे नेटवर्क का हिस्सा मान लेना अलग बात है।
उच्च शिक्षा की आधिकारिक नीति भी इस बात की पुष्टि करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार या तकनीकी दक्षता नहीं मानती, बल्कि संविधान के अनुरूप लोकतान्त्रिक, न्यायपूर्ण, सामाजिक रूप से संवेदनशील और मानवीय समाज के निर्माण से जोड़ती है। नीति बौद्धिक जिज्ञासा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रचनात्मकता और संवैधानिक मूल्यों को उच्च शिक्षा के आवश्यक उद्देश्यों में रखती है। साथ ही वह शिक्षक और संस्थागत स्वायत्तता की कमी को भारतीय उच्च शिक्षा की प्रमुख समस्याओं में गिनती है।
इस सन्दर्भ में आईआईटी के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों को ही समस्या का स्रोत मानना भी तथ्यों की एकतरफा व्याख्या प्रतीत होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति स्वयं इंजीनियरिंग संस्थानों में कला और मानविकी को अधिक महत्त्व देने तथा बहुविषयक शिक्षा विकसित करने की बात करती है। उसका स्पष्ट तर्क है कि 21वीं सदी की शिक्षा में विज्ञान और तकनीक को समाज, संस्कृति, भाषा, इतिहास और मानवीय प्रश्नों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए आईआईटी में समाज, संस्कृति, अर्थशास्त्र, दर्शन या साहित्य पढ़ाया जाना किसी वैचारिक षड्यन्त्र का स्वतः प्रमाण नहीं है; उसकी गुणवत्ता और वैचारिक विविधता को पाठ्यक्रम, शोध और अकादमिक मानकों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
इसी प्रकार विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं कि वहाँ किसी प्रकार की जवाबदेही नहीं होगी। यूजीसी के नियम अकादमिक स्वायत्तता के साथ शासन, गुणवत्ता, नियुक्ति, पाठ्यक्रम और अकादमिक निकायों की संस्थागत व्यवस्था निर्धारित करते हैं। यूजीसी के अनुसार स्वायत्त संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम और कार्यक्रम विकसित करने की स्वतन्त्रता दी जाती है, लेकिन शिक्षक नियुक्ति और शैक्षणिक मानकों के लिए निर्धारित नियमों का पालन भी आवश्यक है। अर्थात वास्तविक समाधान स्वायत्तता समाप्त करना नहीं, बल्कि स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संस्थागत सन्तुलन कायम करना है।
लेख में अमेरिकी विश्वविद्यालयों और ट्रम्प प्रशासन की नीतियों को एक प्रकार के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन इस तुलना को भी सावधानी से देखना होगा। अमेरिकी शिक्षा विभाग ने 2025 में अपने कार्यबल में लगभग 50 प्रतिशत की कमी की घोषणा की थी और ट्रम्प प्रशासन ने उच्च शिक्षा की फण्डिंग, मान्यता और जवाबदेही के ढाँचे में कई परिवर्तन किये। लेकिन अमेरिकी प्रशासन द्वारा उठाए गये कदमों को इस बात का स्वतन्त्र प्रमाण नहीं माना जा सकता कि भारत के आईआईटी, आईआईएसईआर या एनआईटी में कोई समान ‘वोक-जिहादी’ नेटवर्क मौजूद है। दो अलग संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक परिस्थितियों और उच्च शिक्षा प्रणालियों की घटनाओं को सीधे समान सिद्ध करना एक तार्किक छलाँग होगी।
लेख में ‘भारतीय सभ्यतागत मूल्यों’ को पाठ्यक्रम में अधिक स्थान देने की बात अपने आप में विवादास्पद नहीं है। वेद, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, जैन परम्परा, भक्ति साहित्य, कबीर, फुले, गाँधी, अम्बेडकर, टैगोर और आधुनिक भारतीय चिन्तन का गम्भीर अकादमिक अध्ययन निश्चित रूप से होना चाहिए। लेकिन ‘भारतीयता’ को अकादमिक अध्ययन का विषय बनाने और उसे अकादमिक सत्य का पूर्वनिर्धारित मानक बनाने में फर्क है। विश्वविद्यालय का काम किसी सभ्यता की प्रशंसा का संस्थान बनना नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धियों, अन्तर्विरोधों, संघर्षों और ऐतिहासिक विकास—सभी का आलोचनात्मक अध्ययन करना है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बौद्धिक स्वतन्त्रता की माँग है।
यहाँ संविधान का ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल विज्ञान और तकनीक में उपलब्धि नहीं है; उसमें प्रश्न करने, प्रमाण माँगने, स्थापित धारणाओं की जाँच करने और आवश्यकता पड़ने पर अपने निष्कर्ष बदलने की क्षमता भी शामिल है। यदि किसी विचारधारा की आलोचना करते हुए स्वयं प्रमाण की जगह लेबल, सामूहिक आरोप और आशंकाओं का इस्तेमाल किया जाए तो वह आलोचना उसी वैज्ञानिक कसौटी को कमजोर कर देती है जिसकी रक्षा का दावा किया जा रहा है। संविधान नागरिकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा और सुधार की भावना विकसित करने का दायित्व देता है।
इसका अर्थ यह भी नहीं है कि विश्वविद्यालय आलोचना से ऊपर हैं। यदि किसी विभाग में नियुक्ति में पक्षपात है, शोध में शोध-चौर्य है, यौन उत्पीड़न है, वित्तीय अनियमितता है या किसी बाहरी संगठन के माध्यम से अनुचित हस्तक्षेप है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। लेख में ऐसे कई आरोप लगाए गये हैं—भर्ती में पक्षपात से लेकर यौन उत्पीड़न और ‘हनी-ट्रैपिंग’ तक। लेकिन गम्भीर आरोपों का समाधान उन्हें वैचारिक आरोपों के साथ जोड़ देना नहीं, बल्कि प्रत्येक मामले की स्वतन्त्र, प्रमाणित और संस्थागत जाँच है। यूजीसी ने स्वयं अकादमिक ईमानदारी और शोध-चौर्य की रोकथाम के लिए नियमन बनाए हैं।
दरअसल भारतीय उच्च शिक्षा के सामने वास्तविक चुनौतियाँ कहीं अधिक ठोस हैं—शोध की गुणवत्ता, पर्याप्त वित्तपोषण, शिक्षक पदों की उपलब्धता, पारदर्शी नियुक्ति, सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित छात्रों की पहुँच, क्षेत्रीय असमानता, भाषा की बाधाएँ और संस्थागत शासन। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी उच्च शिक्षा में कम शोध, कमजोर संस्थागत शासन, सीमित शिक्षक स्वायत्तता और असमान पहुँच जैसी समस्याओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। इन प्रश्नों पर बहस अधिक उपयोगी होगी क्योंकि इनके समाधान के लिए प्रमाण, नीति और संस्थागत सुधार की आवश्यकता है।
इसलिए असली चुनौती यह नहीं कि विश्वविद्यालयों में ‘वाम’ है या ‘दक्षिण’, ‘वोक’ है या ‘एण्टी-वोक’। चुनौती यह है कि क्या भारतीय विश्वविद्यालय ऐसे स्थान बने रह सकते हैं जहाँ एक छात्र वेद पढ़ सके और उसकी आलोचना भी कर सके; जहाँ अम्बेडकर को पढ़ाया जा सके और गाँधी की आलोचना भी की जा सके; जहाँ मार्क्स को समझा जा सके और मार्क्सवाद से असहमति भी व्यक्त की जा सके; जहाँ भारतीय सभ्यता पर गर्व सम्भव हो, लेकिन उसके इतिहास पर प्रश्न उठाना भी सम्भव हो; जहाँ राष्ट्रप्रेम और आलोचनात्मक विवेक परस्पर विरोधी न बनाए जाएँ।
विश्वविद्यालय को विचारधारात्मक रूप से ‘जीतने’ की परियोजना अन्ततः विश्वविद्यालय की प्रकृति को ही बदल देती है। आज यदि किसी एक विचारधारा के नाम पर दूसरे विचारों को बाहर किया जाएगा तो कल सत्ता बदलने पर वही तर्क उलटी दिशा में इस्तेमाल हो सकता है। संस्थान किसी सरकार, दल या विचारधारा की स्थायी सम्पत्ति नहीं होते। उनकी असली निष्ठा संविधान, ज्ञान और सत्य की खोज के प्रति होती है।
इस दृष्टि से लेख में उठाया गया एक प्रश्न जरूर महत्त्वपूर्ण है—क्या विश्वविद्यालयों में वैचारिक एकरूपता या किसी भी प्रकार का संस्थागत पक्षपात अकादमिक स्वतन्त्रता को नुकसान पहुँचा सकता है? उत्तर निश्चित रूप से हाँ है। लेकिन इस प्रश्न का संवैधानिक उत्तर किसी एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा से प्रतिस्थापित करना नहीं हो सकता। समाधान अधिक पारदर्शी नियुक्तियाँ, विविध अकादमिक दृष्टिकोण, प्रमाण-आधारित शोध, स्वतन्त्र शिकायत-निवारण व्यवस्था, शोध की गुणवत्ता की कठोर समीक्षा और सभी प्रकार के वैचारिक दबाव से संस्थानों की रक्षा में है।
भारतीय विश्वविद्यालयों को न तो ‘वोक-जिहादी’ कहकर खारिज किया जा सकता है और न ही किसी दूसरी वैचारिक छतरी के नीचे सुरक्षित मान लिया जाना चाहिए। लोकतन्त्र की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि विश्वविद्यालय में अनेक विचार एक-दूसरे से टकराएँ, लेकिन किसी व्यक्ति को केवल विचार रखने के कारण राष्ट्रद्रोही या शत्रु घोषित न किया जाए। भारतीय संविधान का आग्रह किसी एक ‘राष्ट्रीय आख्यान’ को स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐसी सार्वजनिक संस्कृति निर्मित करना है जिसमें विविधता, असहमति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और संवैधानिक बन्धुता साथ-साथ जीवित रहें।
और शायद यही वह कसौटी है जिस पर विश्वविद्यालयों के साथ-साथ विश्वविद्यालयों की आलोचना करने वालों को भी स्वयं को परखना होगा।










