
गाँधी की विरासत और बाजार का दबाव : गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान पर कुछ प्रश्न
सच्चिदानन्द सिन्हा पर केन्द्रित सबलोग का अंक निकालने की प्रक्रिया में मेरा सम्पर्क अच्युतानंद किशोर नवीन जी से हुआ था। मई के अंतिम सप्ताह में मैं दिल्ली आया। संयोग से नवीन जी भी इन दिनों दिल्ली में ही थे। तय हुआ कि गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में बैठकर विस्तार से बातचीत की जाए। आज लगभग साढ़े ग्यारह बजे हम दोनों गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान पहुँचे। हमारी यह पहली मुलाकात थी। सोच यह थी कि प्रतिष्ठान में डेढ़-दो घंटे बैठकर आराम से बातचीत करेंगे, लेकिन वहाँ पहुँचकर जो दृश्य देखा, उसने बातचीत से अधिक चिंतन का विषय दे दिया।
प्रतिष्ठान में बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ और नवनिर्माण का काम चल रहा है। स्वागत कक्ष में पहले जो कुर्सियाँ और सोफे हुआ करते थे, वे गायब थे। कैंटीन बन्द थी। बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। अंततः हमें बिना बातचीत किए ही लौटना पड़ा। बातचीत नहीं कर पाने का तो अफसोस था लेकिन गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान को देखकर जो निराशा हुई वह ज्यादा बड़ी थी। यह एक साधारण अनुभव हो सकता था, यदि इसके साथ प्रतिष्ठान के भविष्य को लेकर उठ रहे गम्भीर प्रश्न न जुड़े होते।

दिल्ली का गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान केवल एक इमारत नहीं है। यह स्वतन्त्र भारत की लोकतान्त्रिक, गाँधीवादी और जनान्दोलनकारी परम्परा का एक जीवन्त स्मारक है। यह वह स्थान है जहाँ सात दशकों से अधिक समय तक गाँधी, विनोबा, जयप्रकाश और सर्वोदय की परम्परा ने सांस ली है। यह वह परिसर है जहाँ देश भर से आए सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र, लेखक, किसान नेता और लोकतान्त्रिक आन्दोलनों से जुड़े लोग अपने लिए एक नैतिक आश्रय पाते रहे हैं।
लेकिन आज इस परिसर की बदलती हुई काया के साथ कुछ ऐसे प्रश्न भी उठ रहे हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहली दृष्टि में यह सामान्य नवीनीकरण प्रतीत हो सकता है, किन्तु इसके साथ जुड़ी चर्चाएँ और आशंकाएँ कहीं अधिक गम्भीर हैं।
कहा जा रहा है कि प्रतिष्ठान के नवीनीकरण के लिए एक निजी कॉरपोरेट समूह ने बड़ी धनराशि उपलब्ध करायी है और इसके साथ परिसर के उपयोग की प्रकृति भी बदलने जा रही है। चर्चा है कि जो सभागार कभी सामाजिक-सांस्कृतिक बैठकों के लिए दो-चार हजार रुपये में उपलब्ध हो जाता था, उसका किराया अब पचास-पचपन हजार रुपये तक पहुँच सकता है। जो कमरे गाँधीवादी कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों और दूर-दराज से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को आठ-नौ सौ रुपये में मिल जाते थे, वे अब तीन से साढ़े तीन हजार रुपये प्रतिदिन के हो सकते हैं।
यदि यह सच है तो प्रश्न केवल किराए का नहीं है। प्रश्न यह है कि गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान आखिर किसके लिए है? क्या यह उन लोगों के लिए है जो गाँधी के विचारों पर काम करते हैं, सामाजिक आन्दोलनों से जुड़े हैं और सीमित संसाधनों के साथ दिल्ली आते हैं? या फिर यह धीरे-धीरे एक ऐसे व्यावसायिक केन्द्र में बदल जाएगा जहाँ प्रवेश का आधार विचार नहीं, भुगतान करने की क्षमता होगी?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान का इतिहास किसी साधारण संस्था का इतिहास नहीं है। 1958 में स्थापित इस संस्था ने गाँधीवादी विचार, शान्ति, सामाजिक न्याय और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इसके शुरूआती दौर में डॉ.राजेन्द्र प्रसाद, पण्डित जवाहर लाल नेहरू और आर.आर. दिवाकर जैसे राष्ट्रीय नेता इससे जुड़े हुए थे। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र से लेकर अनेक प्रतिष्ठित गाँधीवादियों ने इसे अपनी कर्मभूमि बनाया। गाँधी मार्ग जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका यहीं से प्रकाशित होती रही। यह भवन केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, बल्कि एक वैचारिक विरासत है।

इस प्रतिष्ठान का सम्बन्ध भारतीय लोकतन्त्र के एक निर्णायक अध्याय से भी है। 1974-75 के जेपी आन्दोलन के दौरान यह लोकतान्त्रिक प्रतिरोध का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। 25 जून 1975 की रात आपातकाल लागू होने के बाद जयप्रकाश नारायण को इसी परिसर से गिरफ्तार किया गया था। भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में यह घटना एक प्रतीक की तरह दर्ज है। जिस भवन ने लोकतन्त्र की रक्षा की आवाजों को आश्रय दिया, क्या वही भवन अब बाजार की शर्तों पर संचालित होगा?
हाल ही में पी.वी.राजगोपाल, सुदर्शन अयंगार, सुरेन्द्र कुमार और निशांत अखिलेश जैसे गाँधीवादी चिन्तकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक सार्वजनिक अपील जारी कर कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं। उन्होंने पूछा है कि नवीनीकरण के लिए धन कौन दे रहा है? उसकी शर्तें क्या हैं? क्या कोई लिखित समझौता हुआ है? क्या प्रबन्धन समिति ने सभी आवश्यक अनुमतियाँ प्राप्त की हैं? और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि यदि कमरे और सुविधाएँ इतनी महँगी हो जाएँगी तो गाँधीवादी कार्यकर्ताओं तथा सामाजिक आन्दोलनों से जुड़े लोगों के लिए इस परिसर में जगह कहाँ बचेगी?
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आये हैं। गाँधीवादी परम्परा का मूल तत्त्व पारदर्शिता है। गाँधी स्वयं मानते थे कि सार्वजनिक संस्थाओं का संचालन सार्वजनिक विश्वास पर आधारित होना चाहिए। इसलिए यदि प्रतिष्ठान के भीतर कोई बड़ा परिवर्तन हो रहा है तो उसके बारे में समाज को बताने में संकोच क्यों होना चाहिए?
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है। इसका उद्देश्य आरोप लगाना भी नहीं है। लेकिन यह पूछना आवश्यक है कि क्या गाँधी की संस्थाएँ भी उसी रास्ते पर चल पड़ेंगी जिस पर आज अनेक सार्वजनिक और सामाजिक संस्थाएँ चल चुकी हैं, जहाँ विचार पीछे छूट जाते हैं और सम्पत्ति केन्द्र में आ जाती है?
और यह प्रश्न इसलिए और भी पीड़ादायक है क्योंकि यह सब उस समय हो रहा है जब प्रतिष्ठान के नेतृत्व में कुमार प्रशांत जैसे प्रतिष्ठित गाँधीवादी मौजूद हैं। उनसे और प्रबन्धन से अपेक्षा स्वाभाविक रूप से अधिक है। गाँधीवादी संस्थाएँ केवल कानूनी वैधता से नहीं, नैतिक वैधता से चलती हैं। इसलिए आवश्यक है कि सारे तथ्य सार्वजनिक किए जाएँ, खुला संवाद हो और समाज को विश्वास में लिया जाए।
गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान को बचाने का अर्थ किसी भवन को बचाना नहीं है। इसका अर्थ है उस परम्परा को बचाना जिसने सत्ता के सामने सच बोलने का साहस दिया, जिसने जेपी आन्दोलन को नैतिक आधार दिया और जिसने दशकों तक सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिया कि दिल्ली में उनका भी एक घर है।
हो सकता है कि नवनिर्माण के बाद गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान का भवन पहले से अधिक भव्य दिखाई दे। हो सकता है कि वहाँ आधुनिक सुविधाएँ हों, चमकदार सभागार हों और आर्थिक दृष्टि से वह अधिक लाभकारी बन जाए। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या उस भव्यता में गाँधी की आत्मा भी बसी रहेगी? क्या वहाँ अब भी सीमित साधनों वाला कोई गाँधीवादी कार्यकर्ता सहजता से ठहर सकेगा? क्या कोई जनान्दोलनकारी समूह वहाँ बैठकर अपनी रणनीति बना सकेगा? क्या वह परिसर अब भी वैचारिक संवाद, असहमति और सामाजिक सरोकारों का आश्रय बना रहेगा?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर चाहे भवन कितना भी भव्य क्यों न हो जाए, वह गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान नहीं रहेगा, वह केवल एक और इमारत बनकर रह जाएगा।
गाँधी की संस्थाओं का मूल्य उनकी दीवारों में नहीं, उनके दरवाजों की खुली प्रकृति में होता है। चिन्ता इस बात की है कि कहीं यह नवनिर्माण उन दरवाजों को ही बन्द न कर दे, जो दशकों से समाज के सबसे प्रतिबद्ध और सबसे कम संसाधन वाले लोगों के लिए खुले रहे हैं।









