
स्त्री देह पर लिखी गयी क्रूर कहानी
युद्ध शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा रचा गया एक क्रूर राजनीतिक कृत्य है, जो वैचारिक-रणनीतिक सन्तुलन एवं प्रभुत्व स्थापित करने के लिए लाखों निर्दोष लोगों को कुर्बान कर देता है। किन्तु इसकी सबसे गहरी और निःशब्द पीड़ा स्त्रियों की देह, आत्मा तथा सपनों से होकर गुजरती है। बलात्कार, यौन दासता, जबरन गर्भधारण और सामूहिक अपमान के माध्यम से युद्ध में स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। युद्ध के दौरान तथा उसके बाद स्त्रियों पर पड़ने वाला शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक आघात उनके सम्पूर्ण अस्तित्व को चूर-चूर कर देते हैं। हालाँकि, वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित स्त्री, शान्ति और सुरक्षा प्रस्ताव ने पहली बार संघर्ष की स्थितियों में स्त्रियों की सुरक्षा तथा शान्ति बहाली की प्रक्रियाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी को औपचारिक मान्यता प्रदान की लेकिन जमीनी स्तर पर उसका क्रियान्वयन बहुत कमजोर है।
मानव इतिहास में हुए युद्ध केवल राजनीतिक या सामरिक घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि उन्होंने समाज की संरचना, संस्कृति और मानवीय सम्बन्धों को गहराई से प्रभावित किया है। युद्ध की सबसे भयावह परिणतियों में से एक है मानव जीवन का व्यापक विनाश, सामाजिक संरचनाओं का विघटन तथा विशेष रूप से स्त्रियों की गरिमा और अस्मिता पर गहरा आघात। युद्ध के समय स्त्रियाँ केवल प्रत्यक्ष हिंसा की शिकार नहीं होतीं, अपितु विस्थापन, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक असुरक्षा जैसी अप्रत्यक्ष त्रासदियों का भी सामना करती हैं। इस प्रभाव को समझने के लिए केवल युद्ध के सैन्य पक्ष का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और लैंगिक आयामों का भी सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है।
साहित्यिक कृतियों में युद्ध के प्रति स्त्री दृष्टि गहन, करुणामयी और विद्रोही विमर्श रचती है। यह पुरुष केन्द्रित युद्ध कथाओं से भिन्न होकर युद्ध को शारीरिक हिंसा, वीरता या रणनीति के रूप में नहीं बल्कि बहुआयामी त्रासदी के रूप में देखती है, जिसकी सबसे बड़ी मार स्त्रियों की देह, मन और सामाजिक अस्तित्व पर पड़ती है। महादेवी वर्मा अपने निबन्ध ‘युद्ध और नारी’ में लिखती हैं- ‘युद्ध की विभीषिका सबसे पहले स्त्रियों को अपना निशाना बनाती है। युद्ध पुरुष की आक्रामकता का प्रतीक है, जबकि स्त्री शान्ति, करुणा और सृजन का प्रतीक होती है।’ हिन्दी साहित्य में स्त्रीवादी चिन्तन के विकास के साथ युद्ध-कथाएँ भी क्रमशः स्त्री-केन्द्रित होती गयीं। प्रगतिवाद और उसके बाद की रचनाओं में स्त्रियों के युद्धजन्य संघर्ष वैधव्य, आर्थिक विपन्नता, सामाजिक बहिष्कार और भावनात्मक शून्यता को प्रमुखता मिली। गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’ में युद्ध एवं प्रेम की विपरीत अनुभूतियों को तन्मयता के साथ बुना गया है। यह रचना मानव इतिहास के एक क्रूरतम कालखण्ड यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियों के साथ हुई हिंसा की परत-दर परत पड़ताल है। इस उपन्यास का महत्त्वपूर्ण पक्ष है युद्ध एवं प्रेम के बीच स्त्रियों का जड़वत (काठ) होते चले जाना। यह उपन्यास पोलैंड और कलकत्ता में लगभग एक ही समय में हुई हिंसा का मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध दोनों देशों की स्त्रियों के साथ जोड़ता है और कहानी अपने अन्त तक आते-आते पाठकों के समक्ष स्त्री जीवन और उसकी गाँठों में छुपी कई अनकही तकलीफों को तफसील से बयां करती है:“ये औरतें मनुष्य नहीं हैं, रही होंगी कभी, इन्हें याद नहीं। दन्तमंजन से भी महरूम ये औरतें बन्दी मजदूर हैं। पिशाच जैसा चेहरा, कोटरों में दो बुझी आँखें, पूरे शरीर पर चकते और खुजली, बढ़े मैले नाखूनों वाली स्त्रियों को देखकर कल्पना करना मुश्किल था कि ये किसी सम्भ्रान्त परिवार की स्त्री रही होंगी। उस यातना शिविर में स्त्रियों को अपनी महवारी का खून पोंछने के लिए गन्दे कपड़े की लीरें तक नसीब नहीं थीं। यहाँ सुन्दर स्त्रियों के साथ बलात्कार होता था और बार-बार होता था। यूक्रेन से लाई गयी एक सुन्दर स्त्री के साथ वहाँ के सुपरवाइज़र से लेकर सिपाही तक रोज शारीरिक सम्बन्ध बनाते और फिर उसे लहूलुहान कर छोड़ देते। यातना शिविर की लगभग हर स्त्री के बाल मुड़वा कर उन्हें निर्वस्त्र कर छोड़ दिया गया था जिससे वे जब चाहें उनका इस्तेमाल कर सकें।”
विश्व साहित्य में भी लेखिकाएँ युद्ध को पुरुष वर्चस्व की हिंसा के रूप में अभिव्यक्त करती आई हैं। वर्जीनिया वुल्फ़ अपनी कृति ‘थ्री जीनियस’ में युद्ध और पितृसत्ता के बीच गहन अन्तरसम्बन्धों की पड़ताल करती हैं। वे प्रश्न करती हैं कि आखिर युद्ध क्यों होता है? और स्वयं उत्तर देती हैं कि युद्ध पुरुष-प्रधान शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति का अनिवार्य परिणाम है। द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गयी कई रचनाएँ घरेलू मोर्चे पर संघर्ष, प्रतिरोध, विस्थापन और युद्धोत्तर पुनर्निर्माण में स्त्रियों के अनुभवों को केन्द्र में रखती हैं। लेखिकाएँ युद्ध को केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उसे घर, परिवार और भावनात्मक रूप तक विस्तार देती हैं। वे मानती हैं कि ‘युद्ध पुरुषों को मारता है, किन्तु स्त्रियों को जीवित रहते हुए मरने की सजा देता है’।
भारत के लोगों ने आउशवित्ज़ या उस जैसे किसी यातना शिविर की भयावहता को अपने जीवन में कभी अनुभव नहीं किया। बावजूद इसके, इस देश के लोगों ने धर्म के नाम पर मुल्कों को बँटते और साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा की गयी हिंसा के कारण लाखों लोगों का कत्लेआम होते अनगिनत बार देखा है। भारत विभाजन की हिंसक परिस्थितियों के दौरान इस देश की हिन्दू, मुस्लिम एवं सिख स्त्रियों ने जिस बर्बर यौन हिंसा का सामना किया, वह किसी होलोकास्ट से कम नहीं था। उर्वशी बुटालिया ने ‘खामोशी के उस पार’ में, भीष्म साहनी ने ‘तमस’ में, खुशवंत सिंह ने ‘पाकिस्तान मेल’ में और ‘पिंजर’, ‘गदर’ में लज्जो और सकीना मैडम जैसी स्त्रियाँ यौन हिंसा और बलात्कार के जिस भयावह दौर से गुजरीं उसकी एक झलक हमें राही मासूम रजा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में दिखती है। उस भयानक दौर में औरतों के जिस्म पर हुई जंग और जीत को बयां करते हुए रजा लिखते हैं : ‘चारों ओर बड़े बड़े शहर धाँय धाँय इस तरह जल रहे थे कि उस आग में बच्छन औए सगीर फातमा एक तिनके की तरह पड़ीं और भक से उड़ गयीं। दिल्ली, लाहौर, रावलपिंडी, अमृतसर, कलकता, ढाका, चटगाँव, सैदपुर, लालकिला, जामा मस्जिद, गोल्डेन टेंपल, जालियाँवाला बाग, हाल बाजार, उर्दू बाजार, अनारकली…अनारकली का नाम सगीर फातमा था या रजनी कौर या नलिनी बनर्जी था। अनारकली की लाश खेत में थी, सड़क पर थी, मस्जिद और मंदिर में थी और उनके नंगे बदन पर नाखूनों और दांतों के निशान थे और लोगों ने खून से भीगे हुए गरारों, सलवारों और साड़ियों के टुकड़ों को यादगार के तौर पर हाफ्ज़े के संदूकों में सैंत कर रख लिया था’।
युद्ध का सबसे नकारात्मक एवं विचारणीय पक्ष है स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक मानना। युद्ध सम्बन्धी सभी गतिविधियों में स्त्रियों की हिस्सेदारी प्रत्यक्ष रूप में न के बराबर है पर युद्ध में लड़ने वाले पुरुष किसी स्त्री के पुत्र, पति, पिता अथवा भाई ही होते हैं। युद्ध की त्रासदी की दोहरी मार स्त्रियों की पीठ पर ही पड़ती है। हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ हिंसा की संकल्पना बहुत सूक्ष्म संरचना के रूप में हमारे अवचेतन में बसाई जाती है और हम जाने-अनजाने एक हिंसक समाज का हिस्सा बनते जाते हैं। हिंसा चाहे किसी भी व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र के प्रति हो, अन्ततः वह सम्पूर्ण मानवता के प्रति किया गया एक जघन्य अपराध होता है जिसका प्रत्युत्तर अहिंसक प्रतिरोध ही हो सकता है। गाँधी हिंसक राज्य व्यवस्था के समक्ष अहिंसक सत्याग्रह को अनिवार्य विकल्प के रूप में न सिर्फ पेश करते हैं बल्कि हिन्दुस्तान को आजादी दिलाकर वे अहिंसक दर्शन के प्रति लोगों में विश्वास भी पैदा करते हैं। आजादी की लड़ाई की आँखों देखी स्थिति युनाइटेड प्रेस को बयां करने भारत भेजे गए प्रतिनिधि अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने गाँधीजी के सहयात्री के रूप में, उस दृश्य का वर्णन ‘गाँधी’ फिल्म में कुछ यूं बयां किया है : “वे बढ़ते ही गए, हिंदू और मुसलमान एक साथ, शान से सर उठाए, कहीं कोई घबराहट नहीं कि चोट लगेगी या मरेंगे। ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा,आधी रात तक…औरतें घायलों की मरहम पट्टी करती रहीं, हिम्मत देती रहीं, जब तक वह स्वयं थककर न गिर पड़ीं,…फिर भी यह जुल्म न रूक। ब्रिटिश हुकूमत का अखलाक, जिस पर उसे नाज था, वह आज टूट गया, हिन्दुस्तान आज आजाद हो गया क्योंकि हिन्दुस्तानियों ने अँग्रेजों की सारी ज़्यादतियाँ सीना तान कर सहीं। न उन्होंने सर झुकाया, न हिंसा की और न ही वह हारे।”
मानव इतिहास के प्रत्येक दौर में आमतौर पर यह धारणा रही है कि स्त्रियाँ युद्ध के दौरान होने वाली ‘लूट’ का हिस्सा हैं। इस धारणा में यह विचार गहराई से निहित है कि स्त्रियाँ विजयी योद्धाओं की सम्पत्ति हैं। युद्ध के दौरान एवं उपरान्त स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा होने का एक प्रमुख कारण पराजित पुरुष समुदाय के गौरव को नष्ट करना भी है। जो पुरुष अपनी स्त्रियों की रक्षा करने में विफल रहे हैं उन्हें इस कृत्य से अपमानित और कमजोर किया जाता है। यौन हिंसा को मनोवैज्ञनिक तौर पर किसी राष्ट्र या समुदाय की आबादी में बड़े पैमाने पर आतंक फैलाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यौन हिंसा भी जनसंहार रणनीति का अहम हिस्सा होती है। इस राजनीतिक प्रक्रिया में न तो प्रत्यक्षतः स्त्रियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है और न ही युद्ध से उत्पन्न दुष्परिणामों का स्त्रियों के सन्दर्भ में कोई मूल्यांकन ही किया जाता है। बलात्कार और जबरन गर्भधारण के माध्यम से दुश्मन की नस्ल को नष्ट करने या अपनी नस्ल थोपने का प्रयास किया जाता है। महिलाएँ घर से बाहर निकलने से डरने लगती हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं। हर बलात्कार पीड़िता की चुप्पी में दबी चीख, हर विधवा माँ की आँखों में छिपे आँसू और हर बेटी के टूटे सपने ये सब युद्ध की सच्ची कीमत हैं।
पहले विश्व युद्ध के दौरान नारीवादी कार्यकर्ता एस्टेले सिल्विया पंकहर्स्ट ने खुलकर युद्ध का विरोध किया जिसके कारण वह सार्वजनिक हमले की शिकार भी हुईं। वह न केवल युद्ध के खिलाफ बनी रहीं, बल्कि युद्ध के दौरान विधवा हो चुकी स्त्रियों की आर्थिक सुरक्षा और बच्चों के लिए भी भरपूर कार्य किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यौन हिंसा की घटनाओं के सम्बन्ध में एक रहस्यमयी चुप्पी कायम है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना द्वारा हजारों एशियाई स्त्रियों और लड़कियों को यौन दासता लिए मजबूर किया गया था। 1992 में,जापानी सरकार ने इन स्त्रियों से इस आपराधिक कृत्य के लिए आधिकारिक तौर पर माफी मांगी। हालाँकि इस सम्बन्ध में ऐतिहासिक दस्तावेजों में पुख्ता तौर पर कोई दावा नहीं किया गया। ऐसा इसलिए नहीं है कि यौन हिंसा हुई नहीं, बल्कि इसका मूल कारण यह है कि इस युद्ध के दौरान सभी पक्षों द्वारा यौन हिंसा की गयी थी। नतीजतन, युद्ध के समापन के उपरान्त सभी एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगा पाने में नाकाम रहे। विगत कुछ वर्षों में स्त्रीवादी लेखन एवं सामाजिक समूहों ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई यौन हिंसाओं के मुद्दे पर पुनर्विचार करना शुरू किया है। 1994 में रवांडा में हुए जनसंहार के दौरान 100 दिनों के अंदर लाखों लोगों की हत्या की गयी और 250,000 से 5,00000 के बीच स्त्रियों के साथ यौन हिंसा एवं बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गयीं। इस घटनाक्रम में व्यस्वस्थित रूप से बलात्कार को एक हथियार के रूप में अपनाया गया। 1991 से 1995 के दौरान चले क्रोएशिया-सर्बिया के युद्धों पर केन्द्रित गरिमा श्रीवास्तव की कृति क्रोएशियाई प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ के प्रारम्भिक पृष्ठों पर लेखिका उद्धृत करती हैं : “उन हजारों लाखों औरतों के नाम जिनकी देह पर ही लड़े जाते हैं सारे युद्ध। दुनिया भर के युद्धों का न सिर्फ भाष्य प्रस्तुत करता है बल्कि युद्धग्रस्त क्षेत्रों को आधी आबादी के नजरिये से देखने की समझ भी पैदा करता है। युद्ध भले पृथ्वी के किसी खास भूभाग पर लड़ा जाए लेकिन अन्ततः वह घटित होता है स्त्री की देह पर”।
स्त्री की गरिमा की रक्षा वास्तव में मानवता की रक्षा है। इतिहास में युद्ध के दौरान स्त्रियों की स्थिति पर दुनिया की चुप्पी लगभग उतनी ही गहरी रही है, जितनी उन स्त्रियों की होती है जो युद्ध में हाशिए पर धकेल दी जाती हैं या शान्ति वार्ताओं से बाहर रखी जाती हैं। हालाँकि, संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में अनेक महिलाएँ विपरीत परिस्थितियों में भी अपने समुदायों की सुरक्षा और कल्याण के लिए उल्लेखनीय योगदान देती रही हैं। तालिबान शासन के दौरान अफगानिस्तान में स्त्रियों ने न सिर्फ गुप्त बैठकें आयोजित कीं, बल्कि भूमिगत गृह-विद्यालय चलाए और चिकित्सा सहायता के नक्शे तैयार कर अन्य स्त्रियों तक पहुँचाया। सूडान में विरोधी जातीय और धार्मिक समूहों की स्त्रियों ने शान्ति वार्ता के लिए एकजुट होकर काम किया एक ऐसा कार्य जिसे पुरुष सफलतापूर्वक नहीं कर पाये थे।
पुरुष और स्त्रियाँ युद्ध का अनुभव एक-दूसरे से भिन्न रूप में करती हैं। तथापि, संघर्ष के अध्ययन में लिंग (जेण्डर) को लम्बे समय तक विश्लेषण की एक गम्भीर श्रेणी के रूप में उपेक्षित किया जाता रहा है और जब कभी इसे स्वीकारा भी गया, तो प्रायः पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण ही उस पर हावी रहा। नारीवादी शोध हमें युद्ध के उन जटिल, सूक्ष्म और बहुस्तरीय अनुभवों से परिचित कराता है, जो इस सरलीकृत द्विभाजन को चुनौती देते हैं। युद्ध का स्त्रियों पर प्रभाव कदापि द्विआधारी नहीं होता। यह प्रभाव अत्यन्त असमान और प्रायः गहरा नकारात्मक होता है, विशेषकर उन स्त्रियों पर जो कई प्रकार के उत्पीड़न वर्ग, जाति, धर्म, नस्ल या यौनिकता के चक्रव्यूह में फँसी होती हैं। सेनाएँ स्वभावतः पुरुष-प्रधान संस्थाएँ हैं, जो पितृसत्तात्मक सत्ता-सम्बन्धों को न केवल बनाए रखती हैं, बल्कि उन्हें और मजबूत भी करती हैं। फिर भी, स्त्रियाँ युद्ध की इस प्रक्रिया में निष्क्रिय दर्शक नहीं, अपितु सक्रिय सहभागी के रूप में भी उपस्थित रहती हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अधिकांश स्त्रियों को मतदान करने या सैन्य भूमिकाओं में सेवा करने से वंचित रखा गया था। फिर भी, कई स्त्रियों ने युद्ध को न केवल देश की सेवा करने, बल्कि अधिक अधिकार और स्वतन्त्रता प्राप्त करने के अवसर के रूप में देखा। लाखों पुरुषों के घर से दूर होने के कारण स्त्रियों ने घरेलू मोर्चे को सम्भालने और कृषि क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। कुछ स्त्रियों ने नर्स, डॉक्टर, एम्बुलेंस चालक और अनुवादक के रूप में कार्य किया और गम्भीर मामलों में उन्होंने युद्ध के मैदान में मोर्चे पर भी सहायता प्रदान की।
संघर्ष कभी-कभी लिंग-भूमिकाओं को पुनर्परिभाषित कर देता है और स्त्रियों को नये अवसर, नयी जिम्मेदारियाँ तथा नयी शक्तियाँ प्रदान करता है। परन्तु ये परिवर्तन प्रायः क्षणिक और अल्पकालिक सिद्ध होते हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद पुनर्निर्माण के दौर में अक्सर पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्थाएँ और शासन-संरचनाएँ पुनः बलपूर्वक स्थापित हो जाती हैं, जिससे स्त्रियों द्वारा प्राप्त की गयी अल्पकालिक स्वतन्त्रता और भूमिकाएँ एक बार फिर सीमित कर दी जाती हैं। गरीबी, विकलांगता,जातीयता और यौनिक अभिविन्यास जैसी स्थितियाँ स्त्रियों की हिंसा के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं। युद्धजन्य यौन हिंसा एक बढ़ता हुआ खतरा, मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन और शान्ति निर्माण में बड़ी बाधा है। इसे समाप्त किया जाना चाहिए।










