धर्मराजनीति

मैं अन्धा हूँ साहब, मुझे तो हर शख्स में इंसान दिखता हैं

  • तमन्ना फरीदी 
आज राजनीति का असल लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना है, इसके लिए हर प्रयोग किया जाता है जाति का इस्तेमाल होता और धर्म का।
आज हम राजनीति में धर्म विषय पर चर्चा करेंगे और बात करेंगे ‘राजा का धर्म’ क्या है या ‘राजा का कर्तव्य’ क्या है
धर्म राजनीति की तरफ नहीं जाता, राजनीति धर्म में दखल करती है। राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति की दखल मुनासिब है?
वैसे ये कहना गलत नहीं है राजनीति में धर्म का इस्तेमाल करके जनता को मूर्ख बनाकर सत्ता प्राप्त करने का  साधन बन चुका है।
कभी महात्माओं ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा था कि जो सहज है वही धर्म है. रामानंद ने कहा था ‘जाति-पाति पूछे न कोई/हरि को भजै सो हरि को होई’. यानी जो ईश्वर की स्तुति करता है वही ईश्वर का होगा.धार्मिक कट्टरता आज वैश्विक धरातल पर कई रूपों में उभर रही है. इसके पीछे सत्ता’ और ‘वर्चस्व’ की भावना निहित है.
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि धर्म ग्रंथों में सबसे ज्यादा प्रेम, दया, करुणा और त्याग की बात कही गयी है, लेकिन सबसे ज्यादा क्रूरता और घृणा धर्म के नाम पर ही फैलती है. इसकी वजह धर्म को सत्ता की तरह इस्तेमाल करना है. । कुछ नेता और दलों ने अपनी सोच बना ली है कि धर्म की  राजनीति उन्हें देश भर में महत्व दिलाएगी और सत्ता तक पहुँचाएगी।
 एक कहावत है जैसा देश वैसी बोली, जैसा राजा वैसी प्रजा, जैसी जमीन वैसा पानी, और जैसा बीज वैसा अंकुर होता है । आज अगर राजनितिक दल अपनी राजनीति  में  धर्म में दखल करती है तो उसके लिए जनता भी कम दोषी नहीं। वो
‘राजा का धर्म’ या ‘राजा का कर्तव्य’ क्या है सत्ता में बैठने वाले भूल जाते है। वो ये भी भूल जाते शासक को देश का संचालन कैसे करना है, अपने इस कर्तव्य से आज सभी दूर होते  है। देश को एकता के सूत्र में बांधने के बजाये अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए डिवाइड एंड रूल का फार्मूला अपनाते है। और डिवाइड का सबसे आसान साधन उनको धर्म दिखता है।  जबकि सत्ता आसीन का कर्तव्य है दुष्ट एवं  अपराधियों  के साथ कभी मेल-मिलाप न करे और  संरक्षण न दे।  परन्तु आज कोई दल ऐसा नहीं है जो अपराधियों के साथ कभी मेल-मिलाप न करता हो शासक का धर्म है अपने गुणों का स्वयं ही बखान न करे।
अंत में इतना ही कहूँगी पूरा देश एक साथ मिलकर आगे बढ़ सके इसकी कोशिश नहीं हो रही है बल्कि धार्मिक आधार पर लोगो के बीच वैमनस्य को बढ़ाने का काम ज़्यादा हो रहा है।
राजनीति का अर्थ होता है: दूसरों को कैसे जीत लूं?
धर्म का अर्थ होता है: स्वयं को कैसे जीत लूं?
आपको तय करना है दूसरों को कैसे जीत लूं वाले समूह में जाना है या स्वयं को कैसे जीत लूं वाले में।
नजर वाले को हिन्दू और मुसलमान दिखता हैं,
मैं अन्धा हूँ साहब, मुझे तो हर शख्स में इंसान दिखता हैं.
  
लेखिका सबलोग के उत्तरप्रदेश ब्यूरो की प्रमुख हैं|
सम्पर्क- +919451634719, tamannafaridi@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “मैं अन्धा हूँ साहब, मुझे तो हर शख्स में इंसान दिखता हैं

  1. अमित कुमार सिंह Reply

    आज के समय के लिए एक बड़ी जरूरी लेख रचना है।
    कुछ लेखक भी लोगों को बरगला रहे हैं। ऐसे में आपके जैसे सचेतक लोगों की भूमिका काफी जिम्मेदाराना हो जाती है कि लोगों को समय-समय पर सचेत और जागरूक करते रहें।

    एक बेहतरीन लेख रचना के लिए बधाई!💐👏

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