राजनीति

क्या लोकतन्त्र को ऑक्सीजन दे पाएगा चुनाव?

 

कोलकाता के एक बड़े अखबार के पत्रकार ने भोपाल और इंदौर के युवाओं से जो बात की वह अपने में इस बात का द्योतक है कि इन दस वर्षों और खास कर मध्य प्रदेश में बीस वर्षों के भाजपा शासन में देश का मानस कितना बदल चुका है। मध्य प्रदेश के युवा भ्रष्टाचार, पेपर लीक, बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षा का ऊंचा बजट, महंगाई वगैरह की बात तो करते हैं लेकिन उनके लिए न तो ढहता हुआ लोकतन्त्र कोई मुद्दा है और न ही सर्वधर्म समभाव व संवैधानिक  नैतिकता। वे मानते हैं कि मोदी जबरदस्त काम कर रहे हैं और उन्होंने देश को विश्वगुरु बना दिया है, पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। उनमें यह भी मान्यता है कि इससे पहले भारत को कोई जानता नहीं था। वे नहीं मानते कि इंदिरा गाँधी ने 1971 में पाकिस्तान को विभाजित और बांग्लादेश बनाकर कोई चमत्कारिक काम किया और न ही वे यह मानते हैं कि देश में उदारीकरण और उसकी जीडीपी बढ़ाने की शुरुआत पीवी नरसिंह राव ने की और बाद में उसे डा मनमोहन सिंह ने बढ़ाया। वे मानते हैं कि मनमोहन सिंह तो बोल ही नहीं पाते थे और मोदी जी कितना बढ़िया बोलते हैं। वे यह भी नहीं मानते कि वाजपेयी जी ने जब सरकार बनायी तो अनुच्छेद 370, राम मंदिर और कामन सिविल कोड जैसे मुद्दों को दरकिनार कर दिया था। हाँ वे यह जरूर स्वीकार करते हैं कि बीस साल के शासन के बाद मध्यप्रदेश शासन में एक थकान आ गयी है इसके लिए सरकार बदलने की जरूरत है। लेकिन वे मानते हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और आखिर कमलनाथ भी तो हनुमान भक्त हैं।

दिल्ली के एक मीडिया समूह के वरिष्ठ पत्रकार ने जब इंदौर में देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय के छात्रों से बात की तो कुछ चौंकाने वाली प्रतिक्रियाएं आयीं। कुछ युवकों ने ऊँचे स्वर में कहा कि गाँधी ने देश को बाँटा और उनकी हत्या करने वाला गोडसे वास्तव में देश का नायक है। हालांकि उम्मीद की बात यह रही कि उनके पास खड़े बहुसंख्यक युवाओं ने उनसे असहमति जतायी और कहा कि गाँधी बड़े राजनेता और सन्त थे और उन्होंने देश की आजादी में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

इस चुनाव की विशेषता यह है कि भारतीय जनता पार्टी इसे राष्ट्रीय चुनाव मानकर लड़ रही है जबकि काँग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इसे स्थानीय चुनाव मानकर लड़ रहे हैं। भाजपा ने अगर राजस्थान से लेकर छत्तीसगढ़ तक किसी स्थानीय नेता को मुख्यमन्त्री के उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया है और मोदी के नेतृत्व में ही सारे पांसे रख दिये हैं तो काँग्रेस, बीआरएस और एमएनएफ मुख्यमन्त्री के उम्मीदवार को ज्यादातर जगहों पर तय मान कर चुनाव लड़ रही है। लेकिन काँग्रेस ने इस चुनाव में इण्डिया गठबन्धन को मुल्तवी कर रखा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सभी स्थानों पर इण्डिया गठबन्धन के घटक अलग चुनाव लड़ रहे हैं और उनके नेता काँग्रेस पर हमला करते हुए प्रचार कर रहे हैं। कमलनाथ से धोखा खाने के बाद अखिलेश यादव तो काँग्रेस पर खासे हमलावर हैं और उनके भाषणों को सुनकर तो लगता है कि इण्डिया गठबन्धन जो घुटनों के बल चल रहा था और जिसने घोसी चुनाव में खड़े होने की कोशिश की उसने विधानसभा चुनाव में अपना घुटना तुड़वा दिया।

काँग्रेस के जिम्मेदार नेता कह रहे हैं कि विधानसभा चुनावों के बाद गठबन्धन सक्रिय होगा तो शरद पवार कह रहे हैं कि इण्डिया गठबन्धन लोकसभा के लिए है विधानसभा के लिए नहीं। लेकिन इस ऊहापोह के बीच राहुल गाँधी जाति जनगणना जैसे राष्ट्रीय मुद्दे तो उठा रहे हैं और भाजपा से आगे बढ़कर गारंटी योजनाओं की घोषणा भी कर रहे हैं। लेकिन या तो काँग्रेस उस आख्यान से रणनीतिक तौर पर पीछे हट रही है जो उसने भारत जोड़ो यात्रा में उठाया था और जिसका असर कर्नाटक और हिमाचल के चुनावों में दिखा या फिर उसने उन्हें 2024 के लिए बचा कर रखा है। लेकिन इन चुनावों में काँग्रेस की ओर से संविधान बचाने का राष्ट्रीय आह्वान का वैसा स्वर नहीं सुनाई पड़ रहा है जैसी कि उससे उम्मीद थी।

चुनावों के दौरान एक ओर भाजपा छत्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है तो दूसरी ओर उसके अपने केंद्रीय मन्त्री नरेंद्र तोमर के बेटे का वीडियो वायरल हो रहा है। उसमें 500 करोड़ रुपए लेनदेन की बात है। यह वीडियो उस समय का है जब नरेंद्र तोमर खनन मन्त्री थे। लेकिन विंडबना देखिए कि ईडी और सीबीआई के छापे वहाँ पड़ रहे हैं जहाँ पर विपक्षी दलों और विशेषकर काँग्रेस की सरकारें हैं यानी राजस्थान और छत्तीसगढ़। भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप जब भाजपा पर लगते हैं तो सरकारी जांच एजेंसियां और प्रधानमन्त्री खामोश हो जाते हैं। इस अन्यायपूर्ण खामोशी को राष्ट्रवाद के आक्रामक आख्यान और राममंदिर के जनवरी में होने वाले उद्घाटन से ढक दिया जाता है। विडम्बना देखिए कि इस चुनाव में इजराइल और हमास को मुद्दा बनाया जा रहा है और उस पर सबसे ज्यादा भाषण उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ दे रहे हैं।

पहले भारतीय मीडिया संसाधनों की कमी के कारण मध्यपूर्व देशों की खबरों के लिए पश्चिमी मीडिया पर निर्भर होता था। लेकिन आज अपनी बढ़ी ताकत के बावजूद वह इन पर कई गुना निर्भर हो गया है। लेकिन पहले गुटनिरपेक्ष संगठन के नाते भारतीय राजनीति फिलस्तीनियों के इतने विरुद्ध नहीं थी और इजराइल की साजिशों में इतनी शामिल नहीं हुई थी। आज हमारी राजनीति इस स्तर तक पहुँच गयी है कि दावा कर रही है कि अगर आप के कानों में अजान की आवाज पहुँच रही है तो आप हमास के रेंज में हैं। हमास की आतंकवादी गतिविधि की पुरजोर निंदा और विरोध करते हुए भी अस्पतालों पर बमबारी और निहत्थे बच्चों और औरतों की हत्याओं को भला कैसे सही ठहराया जा सकता है। क्या यह आतंकी कार्रवाई नहीं है?  लेकिन विडम्बना यह है कि रामायण और महाभारत का पारायण करने वाला यह देश और उसके नेता न्याय और अन्याय का फर्क भूल गये हैं और यह भी भूल गये हैं कि प्राचीन युग में भी युद्ध की नैतिकता के कुछ नियम होते थे जिनमें रात को युद्ध नहीं होता था और न ही निहत्थे लोगों और औरतों बच्चों पर वार किया जाता था।

बिखरती संवैधानिक नैतिकता लोकतन्त्र की उखड़ती सांसों के बीच दो मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में उठे हैं और कुछ कहा नहीं जा सकता कि उनका इन चुनावों पर कितना असर पड़ेगा। एक है जातीय जनगणना और उसके आधार पर आरक्षण पर लगी 50 प्रतिशत की सीमा को हटाने की बात। दूसरा मुद्दा है इलेक्टोरल बांड का जिस पर सुप्रीमकोर्ट सुनवाई कर रहा है। हालांकि उसने कोई भी रोक लगाने से मना कर दिया है।

बिहार देश का पहला राज्य है जिसने जाति जनगणना पूरी की और पचहत्तर प्रतिशत आरक्षण लागू करने का विधेयक पास कर दिया। बिहार की इस कार्रवाई का असर निश्चित तौर पर पूरे देश पर पड़ेगा। देर सबेर सभी राज्य इस ढर्रे पर कदम बढ़ाएँगे। क्योंकि आरक्षण की राजनीति ने हाल में महाराष्ट्र को गरमा रखा था और आश्चर्य नहीं कि आगे देश के अन्य राज्य इस ओर बढ़ेगे। सवाल यह है कि क्या इस राजनीति का असर इन चुनावों पर पड़ेगा?  क्या जाति की राजनीति, साम्प्रदायिक राजनीति या राष्ट्रवाद की भावुक अपील को काट पाएगी?  इसका परीक्षण अभी नहीं तो 2024 में तो होगा है।

दूसरा मुद्दा भ्रष्टाचार का है। क्या इस देश की जनता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मौलिक बहस करने और उसका कोई रेडिकल समाधान करने के लिए तैयार है?  अगर है तो उसे चुनावी बांड पर सोचना होगा। चुनावी बांड में मिलने वाले चन्दे की गोपनीयता और उस पर आयकर की छूट दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। ये लोकतन्त्र की पारदर्शी भावना के विरुद्ध हैं और लगता है कि आयकर विभाग काले धन पर कर की छूट दे रहा है। इस स्थिति के रहते हुए हमारा लोकतन्त्र कभी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो सकता भले ही हमारे मोदी जी हर विपक्षी नेता के घर पर ईडी और सीबीआई दौड़ाते रहें। क्या हमारा मतदाता और हम भारत के लोग इस बीमार होते लोकतन्त्र को चंगा करने के लिए कोई निदान और इलाज सोच रहे हैं या वे उसकी बीमारी को ही स्वास्थ्य मान कर चल रहे हैं?  लोकतन्त्र में सिर्फ राजनीतिक दल ही भागीदार नहीं होते। उसमें लोकतन्त्र की संस्थाएं और जनता भी बराबर की भागीदार होती है। लोकतन्त्र में जो गड़बड़ी होती है उसकी जितनी जिम्मेदारी संस्थाओं पर होती है उतनी ही जनता पर होती है। क्या जनता इस जिम्मेदारी को समझेगी और 2024 के लिए कोई उम्मीद पैदा करेगी?

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अरुण कुमार त्रिपाठी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भकार हैं। सम्पर्क +919818801766, tripathiarunk@gmail.com
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