आन्दोलन परिक्रमा

अमृत है कहाँ

 

चाहे जिस किसी ने भी यह शब्द – अलंकरण – बनाया हो भाजपा नेतृत्व या उनके किसी कन्सल्टेन्ट ने, ‘भारत की आजादी बार-बार मरणासन्न होती है’ – इस वास्तविकता को यह शब्दावली स्वीकार तो करता ही है। 75 वीं वर्षगाँठ या हीरक जयन्ती भारत के स्वतन्त्र अस्तित्व की चुनौती को रेखांकित नहीं कर पाता। निस्संदेह अमृत तो चाहिए, पर वह है कहाँ? न तो अब क्षीर-सागर है, न ही देव और समुद्र जो असुर मन्थन करें? भारत का जन-जीवन, और इसके 140 करोड़ लोग ही एक महासमुद्र हैं, जो स्वयं अमृत बना सकते हैं। आजादी तभी अक्षुण्ण हो सकती है।

19 वीं और 20वीं सदी के राष्ट्रीय नवजागरण में भारतीय बुद्धिमत्ता केवल ‘ब्रिटिश उपनिवेशवाद’ से आजादी लेने तक ही सीमित हो गयी। फिर इस तात्कालिक उद्देश्य के पक्ष में जितने गोल-मटोल तर्क जुटाए गये, वे सारी सतही बातें थी। जान-बूझकर ऐतिहासिक तथ्य ढँके गये, ‘अँग्रेजों भारत छोड़ो’- आजादी को यहीं तक सीमित कर दिया गया। इस घेरे के बाहर सोचने और संघर्ष करने की बात जिस किसी ने भी की, स्वयं ‘महात्मा’ ने उसे आड़े-हाथों लिया। इस नये दधीची की हड्डियों के वज्र प्रहार से डरकर अनेकों मुखर नेताओं ने मौन साध लिया। भारत की आजादी सीमित हो गयी – भूगोल, इतिहास और एक समेकित राष्ट्र इस पूरे परिप्रेक्ष्य में।

पौराणिक कथाओं का भरतखण्ड या प्राचीन ईरानियों ने जिसे हिन्दूस्तान नाम दिया वह महज एक सांस्कृतिक इयत्ता थी। एक राष्ट्र होना तो बहुत दूर की बात है, एक समेकित देश भी यह शायद ही बन पाया। छोटे-छोटे सामन्त व रजवाड़े, अनिश्चित सीमा, शासन-विहीन राज्य, ढाई हजार वर्षों का ज्ञात इतिहास यही तो उजागर करता है। उच्छृंखल कबीलाई या जातीय नेतृत्व, भारत की प्रकृति प्रदत्त सीमाओं के बाहर मनुष्यों के कोई और समूह भी हो सकते हैं – वे शत्रुवत आक्रमणकारी भी हो सकते हैं, यह कभी भारतीय सोच का हिस्सा नहीं बन सका। ऐसी चुनौतियों भी हैं, जिनका मुकाबला करना सहज नहीं होगा – इतनी दूर-दृष्टि कभी थी ही नहीं। परिणाम हुआ भारतीय प्रायद्वीप के किसी न किसी हिस्से को गुलामी झेलना।

भारतीय क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोगों को, जिनमें स्त्रियाँ बच्चे भी शामिल होते थे, पकड़कर महीनों पैदल चलाकर एशिया माईनर के ‘स्लेव-मार्केट’ में बेच दिया जाता था। हिन्दूकुश की पहाड़ी श्रृंखलाएँ जो पश्चिमी हिमालय से आरम्भ होकर मध्यपूर्व तक जाती हैं, में आज भी भारतीय गुलामों की दुर्दशा की कहानियाँ लोगों में प्रचलित हैं।

जो निर्विवादित इतिहास है, उसके तथ्य भी बताते हैं कि भारत पर पहला आक्रमण, पर्सियन सम्राट ‘डेरियस’ ने ईशा से 550 वर्षों पहले किया था और उस दौर के गान्धार , तक्षशिला को अपने साम्राज्य का एक प्रदेश बना दिया। लगभग 200 वर्षों बाद ही सिकन्दर विश्वविजेता बनने की महत्त्वाकांक्षा के साथ पंजाब आ पहुँचा और पुरु जैसे बड़े राज्य की सैन्यबल के बावजूद सिकन्दर की जीत हुई। उस दौर में पर्शिया को नेस्तनाबूद करने के बाद ही सिकन्दर पंजाब पहुँचा था, पर गान्धार प्रान्त के राजा के रूप में आम्भी चाहता तो सम्मिलित सेना सिकन्दर को हरा सकती थी पर आम्भी और पुरु दोनों को अपना अधीनस्थ बनाकर सिकन्दर लौट गया। ईशा से 324 वर्ष पूर्व ही भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से अपनी आजादी गँवा बैठे थे।

इसके बाद शकों की अनेक शाखाएँ आयीं, पर्शिया से भागकर पहल्लाव भी आये, तथा छोटे-छोटे हमलों में जीतते हुए भारत के मध्य भागों तक पहुँचे और फिर यहीं अपना शासन स्थापित कर दिया।

इस बीच हूणों तथा अवरों की छोटी-छोटी शाखाएँ लूट-पाट मचाकर भागती रहीं पर समेकित रूप से भारतीय राजतन्त्र ने कभी भी उनका मुकाबला नहीं किया। शायद ‘भिक्टिमहुड’- एक न एक दिन विदेशी हमलों का शिकार हो जाना- भारतीयों की नियति बन रही थी। केवल चन्द्रगुप्त से लेकर अशोक तक भारतीय सभ्यता एक निर्भीक राजतन्त्र की तरह रही, लेकिन इनके राज्यक्रम का अवसान होते ही, वही शिकार बन जाने की प्रवृत्ति हावी होने लगी।

लगभग ईशा काल की प्रथम सदी में बैक्ट्रि‌या के शासक एक बार फिर उत्तर पश्चिमी भारत के शासक बन गये। बैक्ट्रि‌या वस्तुतः एक ग्रीक कॉलोनी थी जो सिकन्दर के अभियानों के दौरान उसके सैनिकों ने बसाया था एवं गैर-सैनिक नागरिकों को आमन्त्रित कर एक ग्रीक देश मध्य एशिया में बना डाला। लेकिन तब के गान्धार प्रदेश पर आक्रमण कर उसने भारत में एक ग्रीक राजवंश की स्थापना की और काशी तक अपने राज्य का विस्तार किया। पर इस आक्रमण का एक सुखद पहलू भी है, इस ग्रीक राजा मिनान्डर ने बौद्ध-धर्म अपना लिया। साथ ही अपने नये नाम ‘मिलिंद’ के साथ सेन्ट्रल एशिया में दूर-दूर बौद्ध विहारों व संघारामों का निर्माण कराया एवं उनको आर्थिक संरक्षण भी दिया।

इसके बाद, महज एक सदी के भीतर एक चीनी मूल के कबीला-समूह ‘यूची’ने पामीर होते हुए एकबार फिर उत्तर-पश्चिमी राज्यों पर हमला किया। और एक नये साम्राज्य की स्थापना की जो उनके कुल नाम ‘कुषाण’ के रूप में मशहूर हुआ। पर एकबार फिर इस वंश के दूसरे ही शासक ने अपना नाम संस्कृत भाषा से ले लिया। सम्राट कनिष्क ने अपने को भारत का सम्राट घोषित कर दिया जिसका विस्तार उसने मथुरा तक कर लिया। बाद में उसने भी बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया एवं अनेकों स्तूप और ‘विहार’ बनवाये जिसकी शैली मूर्तिकला में गान्धार शैली के नाम से विख्यात हुई। कनिष्क के पुत्र ने अपना नाम ‘वसुदेव ‘रख लिया और वह हिन्दू-धर्म के कृष्ण भक्तों के रूप में जाना जाता है।

फोटो सोर्स : विकिपीडिया

हालांकि ये दोनों राजवंश शुरुआती दौर में हमलावर ही थे, पर भारत के धार्मिक जीवन से जुड़कर वे भारतीय इतिहास के सपूतों में गिने जाते हैं। बौद्ध साहित्य में, विशेषकर जातक कथाओं में अशोक के बाद कनिष्क को बौद्ध-धर्म का बड़ा संरक्षक माना जाता है। मिलिंद की प्रशंसा में भी कितनी ही कथाओं में उसका उल्लेख है। ‘तक्षशिला विश्वविद्यालय’ जो सही अर्थों में मानव सभ्यता में प्रथम-विश्वविद्यालय माना जाता है, को राज्य का संरक्षण इन्हीं तीन बौद्ध राजाओं ने दिया, किन्तु इसकी स्थापना का इतिहास अभी तक अज्ञात है। सम्भवतः उस समय के मनीषीयों व विद्वानों की किसी मण्डली ने इसकी स्थापना की होगी जैसा आगे चलकर यूरोप में सारे विश्वविद्यालयों के साथ हुआ। उनकी स्थापना विद्वानों की मण्डलियों ने ही किया, भले आगे चलकर उन्हें राज्याश्रय़ प्राप्त हुआ, और वे प्रख्यात हुए। तक्षशिला भारतीय प्रायदीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में खड़ा हुआ जो उस समय की सभी सभ्यताओं के – मध्य पूर्व, दक्षिणी यूरोप से चीन की ओर जाने वाले प्रचलित मार्ग पर था। इसलिए इन तमाम देशों या सभ्यताओं के विद्यार्थियों का यह सबसे बड़ा विद्या केन्द्र था। यह इतिहास की अजीब विडम्बना है कि तत्कालीन सेन्ट्रल एशिया, विशेषकर अफगानिस्तान के लुटेरे कबीले हूण एवं ‘अंवर’ जाति के घूमन्तु कबीलों का यह शिकार हुआ। आम तौर पर उन दिनों अपने-अपने देशों के धनी वर्ग से विद्यानुरागी छात्र आया करते थे, कुषान वंश के कमजोर पड़ जाने पर ये छापामार आक्रामक छात्रों की किड्नैपिंग और उनके परिवार से बड़ी मात्रा में ‘सोना’ रैन्सम के रूप में वसूलने लगे। अन्ततः तक्षशिला में छात्रों का आना रुक गया और विश्वविद्यालय परिसर एक खण्डहर में तब्दील हो गया।

 7 वीं सदी के उत्तरार्ध से अरब में उद्‌घाटित एक नये धर्म ईस्लाम ने पश्चिम की ओर मध्य एशिया में पैर बढ़ाना शुरू किया। चूँकि इन पथरीले पठारी इलाकों में कृषि के उभरने की सम्भावना लगभग नगण्य थी, खानाबदोश कबीलों ने लूट-मार को ही अपने जीवन-यापन का आधार बनाया जिनके शिकार उत्तर-पश्चिम के विकसित कृषि वाले क्षेत्र होते थे या कूनलून पहाड़ों के पार विकसित कृषि के चीनी गांव। चीन के शासकों ने इन्हीं से अपने इलाकों को बचाने के लिए विशाल दीवार बनवाई, जबकि भारत में ऐसा कोई उपक्रम नहीं हुआ क्योंकि कोई भी केन्द्रित राज्यसत्ता भारतीय सभ्यता में खड़ी ही नहीं हुई। न ही कोई समेकित सेना गठित हो सकी जबकि चीनी सम्राटों ने अपनी सेना का भी काफी विस्तार किया, और अक्सर इन लुटेरे खानाबदोष कबीलों से लड़ते भी रहे। फिर भी इन आक्रमणों और बचाव के बीच शाही वंश का शासन काबुल घाटी में 10 वीं सदी तक रहा। हालांकि ये अपराध-वृति वाले खानाबदोष कबीले और उनके नये-नये दल ईशा-पूर्व की सदियों से सक्रिय रहे। 9 वीं सदी तक उनमें से अधिकांश खन्नात (खान सरदारों के अधीनस्त क्षेत्र) मुसलमान बन गये थे। दुर्भाग्य यह रहा कि इस नये धर्म के प्रचारकों ने विधर्मियों (गैर-इस्लामी) को शत्रु-वर्ग के रूप में चिन्हित किया, उनकी सारी सम्पत्ति को लूट लेना, बच्चों तथा स्त्रियों को भी छीनकर उन्हें गुलाम बना देना- यह धार्मिक कर्तव्य बताया गया। लगभग 11वीं सदी से वही लूट-मार करने वाले कबीले भारत में मुस्लिम आक्रान्ता के रूप में कुख्यात होने लगे।

अब्राहम एराली, एक प्रखर भारतीय इतिहासकार है, उन्होंने जहाँ गुप्तकाल को भारतीय सभ्यता का ‘फर्स्ट स्प्रिंग’ (प्रथम वसन्त) कहा है, वहीं मध्ययुगीन भारत, विशेषकर दिल्ली सल्तनत’ के शासन काल को ‘इन्डियाज डार्केस्ट एज’ कहा है, जिसकी शुरुआत महमूद गजनी के हमलों से हुई और लगभग 500 वर्षों तक अफगानों तुर्कों के 6 वंशों ने राज किया जब तक कि तुर्क-मंगोल जिन्हें हम मुगल राज के रूप में जानते हैं, नहीं पहुँचे। हद तो यह हुई कि भारत को गुलाम बनाने वाले इन अफगानी हमलावरों ने जो खुद ही अरबों द्वारा गुलाम बनाये गये थे, भारत में गुलाम वंश की स्थापना की। दो शुरुआती हमलावर महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी में से महमूद गजनी का पिता खुद ही गुलाम था और अरबी खलीफा के पूर्वी कमान का एक सेनापति था, जो भागकर गजनी आया भारत में काफिरों को मुसलमान बनाने के लिए, लेकिन बुढ़ापे के दिनों में उसने एक गुलाम बच्चे को गोद लिया जो महमूद था। इसी तरह मुहम्मद गोरी ने , जो सबसे बड़ा लुटेरा साबित हुआ और भारत की ओर से पृथ्वीराज को छोड़‌कर कहीं से भी विरोध की संभावना न देखकर, गुलामों के अपने सेनापति को सल्तनत स्थापित करने की आज्ञा दे दी। इस तरह दिल्ली सल्लनत में गुलाम सल्तनत की स्थापना हुई।

एक तरह से भारत लगभग 2000 वर्षों से गुलामी झेल रहा था, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में ये सारे तथ्य ढँक दिये गये। हमारी आजादी को छिनने वाले जितने भी आक्रान्ता आए, यह स्वीकार कर लेने की जरूरत है कि उनमें अपेक्षाकृत सबसे सभ्य अँग्रेज ही थे जिनके विरुद्ध पहली बार हम खड़े हुए, और आजादी के लिए खुद को उत्सर्ग करने की जो जन-भावना खड़ी हुई वह प्रकारान्तर से अँग्रेजों के शासन में अँग्रेजों द्वारा ही खड़ी हुई। बर्बर दरिंदों के सामने हम कभी खड़े नहीं हो सके और बहुत हद तक उसके लिए हिन्दू धर्म की जीवन दृष्टि जिम्मेदार है। चाहे कितने भी सुभाषित लिखे गये हों, महान मनीषियों द्वारा महान उपदेश दिये गये हों कि मनुष्य के लिए अन्तिम अभीष्ट मोक्ष प्राप्ति है, पर इसके ठीक विपरीत अपने स्व का दायरा अपनी सन्तान, और अपने परिवार तक सीमित रखना यही विचार हिन्दू मानव पर हावी रहा। इतनी सम्पत्ति बटोर लेना, किसी भी अन्याम, छल-छ‌द्म, दुष्टाचार, अनैतिक रास्ते का सहारा लिये हुए कि अगली पाँच पीढ़ियाँ मजे का जीवन जीती रहें। कैसी दुरभिसन्धि रही है यह !

हजारों देवी-देवताओं का पूजन, आत्मा को शुद्ध करने के लिए नहीं बल्कि परिवार की धन-पिपासा तथा शरीर को सुरक्षित रखने के लिए, यह हजारों वर्षों से दैनन्दिन जीवन के करतब रहे हैं। समष्टि के बारे में सोचना, सामूहिकता को स्वीकार करना, सामाजिक एकता को मजबूत करना, एवं बाहरी आक्रमणों का सामूहिक शक्ति से विरोध करना, मनुष्य के लिए या फिर समाज के आत्मगौरव को जीवित रखना – यह भारत में कम से कम पिछले पाँच हजार वर्षों में रहा ही नहीं। बार-बार मनीषी जनों ने भगवद्‌गीता की कितनी भी मीमांसा की हो, पर ‘जब धर्म का ह्रास होगा, मैं जन्म लूंगा और दुष्टों का संहार करूँगा’ – इस उक्ति को ही उल्टे अर्थ में लिया गया। जब भी आपदा आयेगी, शत्रु आयेंगे तो भगवान ही प्रकट हो जायेंगे हमें कुछ करने की क्या जरूरत है? सामूहिकता, और उसके सैन्य बल को स्थायी तौर पर समाज के गठन और प्रशासन में मूल-भूमिका दी जाय – यह भारतीय जीवन से तिरोहित होता गया। गाँधी के नेतृत्व के साथ काँग्रेस खड़ी तो हुई, पर उनके प्रिय गीत “वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे”, वह महात्मा तक ही सीमित रह गयी। खुद काँग्रेस पार्टी भारतीय समाज के दुष्टतम तत्त्वों से भर गयी – राज्य के माध्यम से धन बटोरने और दूसरों को सताने की भीतरी मंशा ! इस आजादी से इन्हें यही लेना था — उच्छृंखलता, तथा स्थानीय स्तर पर अपना आतंक राज कायम रखना लेकिन बड़े शत्रुओं को देखते ही दुम दबा लेना और या फिर उनके तलवे चाटना। आजादी के पीछे केवल ‘व्हाईट रेस’ के अँग्रेजों का चले जाना ही था, तो महात्मा की यह जिद जरूर पूरी हो गयी पर अर्द्ध-काले, अर्द्ध-गोरे भारतीय जो सत्ता के आसनों पर विराजे, उनका वास्तविक अभिष्ट अभीष्ट क्या था – लोकतान्त्रिक जीवन पद्धति, कानून का राज, और उसके सामने सबों को बराबर मानना। किन्तु हुआ-जल्दी ही कानून की अवहेलना, बड़े जनों, दुष्टाधिपतियों के सामने प्रशासन और न्याय-व्यवस्था का नतमस्तक हो जाना, और फिर कुछ परिवारों तक तथाकथित आजादी के नये राजाओं का अविर्भाव!

हिन्दू समाज, जो मूलत: एक स्वायत्त जीवन जीता है, उसमें बाहरी शत्रुओं से लड़ने की आन्तरिक शक्ति व ऊर्जा होती ही नहीं। बिना राज्यशक्ति, ‘स्टेट पावर’ के संरक्षण के बिना, यह समाज मानसिक रूप से अपाहिज है। किन्तु लम्बे दौर के इतिहास में यहाँ तक कि अशोक के शासन काल में भी जब पूरा भारतीय प्रायदीप उनके अधीन था, कोई मजबूत स्टेट पावर गठित नहीं था, भले ही उनकी सेना कितनी भी बड़ी हो – कम से कम कलिंग विजय के दौर तक। पूरे भारतीय इतिहास काल में अकबर ही ऐसा सम्राट हुआ है, जिसने ‘सार्वदेशिक स्टेट पावर’ को खड़ा किया, और हर स्तर के प्रशासनिक छोर को मजबूत किया। आम तौर पर मध्य-युग के इतिहासकार राज्य-व्यवस्था को ‘मुगल-स्टेट’ की संज्ञा देते हैं। लेकिन भारत की अगली पीढ़ियों को कृतज्ञता पूर्वक इसे अकबरियन स्टेट ही माना जाना चाहिए। मुगल राजवंश के संस्थापक बाबर या उनके पुत्र हुमायूँ का शासन काल अत्यन्त ही सीमित रहा है। अकबर जैसे दूरदर्शी और हिन्दूस्तान को अपना घर करने की निष्ठा वाले व्यक्ति के समान मेधा उनकी अगली पीढ़ियों में किसी में भी नहीं थी। औरंगजेब में तो कट्टर मुस्लिम और गाजी बनने के अलावा और कोई इच्छा ही नहीं थी।

भारत में पहली बार जिले के स्तर पर सरकारें गठित की गई जहाँ दो उच्चाधिकारी अमलगुजार और सूबेदार बनाये गये। अमलगुजार सूबे की सरकार का प्रतिनिधि होता था – रेवेन्यू और ट्रेजरी के लिए जिम्मेवार जबकि सूबेदार अपनी स्थानीय सेना का प्रधान एवं कानून-व्यवस्था के प्रति उत्तरदायी, और अन्तत: केन्द्रीय सरकार के प्रति समर्पित। अँग्रेजों ने इन दोनों पदों के लिए कई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ कीं लेकिन कोई कारगर साबित नहीं हुआ। बस अमलगुजार को इंगलिश नाम दिया गया- ‘कलेक्टर’ और सूबेदार की जगह डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट। बाद में दोनों ही अधिकार क्षेत्र एक ही मुख्य प्रशासक में समाहृत कर दिये गये – कलेक्टर सह डिस्ट्रीक्ट मैजिस्ट्रेट।

अँग्रेजों का एक और बड़ा योगदान है – बड़ी मिलिट्री का गठन और उसको स्वायत्त राज्यसत्ता का अंग बना देना जो राजनीतिक उलट-फेर से प्रभावित न हो। मुगलकालीन भारत तक सेना ‘स्वायत राजसत्ता’ का हिस्सा नहीं बन पायी थी। यूरोप में जब राष्ट्र-राज्य ‘नेशन स्टेट’ की अवधारणा प्रायोगिक स्तर पर मूर्त होने लगी उस दौर में ‘कोडे नेपोलियन’ जो डेमोक्रेटिक स्टेट के मूल तत्त्वों को सूत्रबद्ध करता है, अँग्रेजों ने उसी के अनुरूप भारतीय सेना को भी अराजनीतिक, स्वायत राज्यसत्ता का संयुक्त अंग बना दिया। भारतीय सेना को हर समय देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना एवं इसके स्थायी रखरखाव की व्यवस्था पहली बार अंग्रेजी शासन-काल में ही की गई, जो प्राचीन काल से लेकर मध्यकालीन सदियों तक कभी भी नहीं हो पाया था। इसलिए आज जब भारतीय आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, तो इसका आशय भारत की स्वतन्त्रता के बार-बार मरणासन्न होने से बचने का अब स्थायी निदान हो गया है – इसे गहरे रेखांकित करने की जरूरत है, जनता के स्तर पर जो पहली बार राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में उसकी संवेदनशीलता दिखाई पड़ी।

अन्ततः ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ कोई ‘स्वतन्त्रता संग्राम’ वार ऑफ इन्डीपेन्डेन्स नहीं था जिसमें जनाभिभुख सेना को विदेशी सत्ता से युद्ध लड़‌कर देश को आजादी मिली। यह मूलरूप से एक जन आन्दोलन था जो मात्र तीन दशकों में सविनय अवज्ञा के अहिंसक संघर्षों से हासिल हुआ, और वह भी क्रमवार ब्रिटिश संसद में ‘स्वीकृत इन्डीपेन्डेन्स ऐक्ट’ के द्वारा जो 1947 के जुलाई में पास किया गया था, के प्रावधानों के तहत एक डोमिनियन स्टेट के रूप में हुआ। फिर 1950 में इसे निरस्त कर भारतीय गणराज्य रिपब्लिक बनाये जाने को पूर्ण सहमति दी गयी। इससे भी पहले 1935 में ही ‘गवर्नमेन्ट ऑफ इन्डिया एक्ट पास कर प्रान्तीय सरकारों को मताधिकार दारा चुनने की आजादी मिल चुकी थीं। आज के सन्दर्भ में सबसे तीखा मूल्यांकन यही हो सकता है कि क्या हम ढाई हजार वर्ष के लज्जित करने वाले इतिहास को लेकर संकल्पबद्ध हुए हैं कि हम प्राण देने तक गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे? अम्बेदकर ने संविधान सभा में ही छोटे-छोटे हमलावरों के आगे घुटने टेक देने की प्रवृत्ति को उथले पानी में डूब मरने जैसी बात भारतीय समाज के लिए कही थी- अगर पुराने यथास्थितिवाद में ही आजाद भारत को रखा गया, तो बेहतर है हम आजादी अँग्रेजों से मांगे ही नहीं।

यथास्थितिवाद के ही लिए, या उनकी सोच के रामराज्य के लिए महात्मा को भी आधी ही आजादी मिली। देश का विभाजन वे नहीं रोक पाये, और स्थायी तौर पर शत्रु देश, हमारा निकटतम पड़ोसी बन गया। ब्रिटिश भद्रजनों के बीच पार्टियों में विचरने वाले नेहरू और कृष्ण मेनन सोसलिस्ट नहीं सोशलाईट साबित हुए और इनकी लफ्फाज राजनीतिक समझ के कारण दूसरा पड़ोसी चीन हमारा दूसरा शत्रु देश बन बैठा। हजारों वर्षों से तिब्बत जैसा मानवीय आदर्शों वाला देश हमारा पड़ोसी हुआ करता था जिसे चीन खा गया। और अब पता नहीं कब तक भारतीय जन-जीवन इन दो शत्रु देशों के नये-नये षडयन्त्रों से घायल होता रहेगा। भारत की आजादी मूलरूप से लोकतान्त्रिक राष्ट्र के रूप में इसके कायान्तरण के लिए मिली थी। किन्तु सर्वोच्च सत्ता पर बैठे लोगों ने इसे एक अनौपचारिक राजतन्त्र और एक छ्द्म राज परिवार के हवाले कर जनता की प्रभुसत्ता छीनकर एक परिवार की प्रजा बनाने के काम में लग गये।

आशा की एक ही किरण है- वह है एक नये मध्यवर्ग का लगातार विस्तार जिसकी स्वचेतना इसकी आजादी की गांरटी होगी। इसे ही पल्लवित करने के लिए जो विचार श्रृंखला बने, बनाया जाय, वहीं अमृत होगा इस आजादी के लिए

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शशिभूषण

लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक अर्थशास्त्री और समाजकर्मी हैं।‪ सम्पर्क +919948123722, ztshashi@gmail.com‬
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