लिए लुकाठी हाथ

बड़ावाला पुस्तक प्रेमी

 

बहुत दिनों के बाद जब मैं अपने मित्र रामभरोसे  के साथ  श्रीमान कखग  के घर गया तो वह मुझे देखकर सकपका गया। मित्र को कारण समझ में नहीं आया मगर मैं भी मन-ही-मन मुस्कुराने लगा क्योंकि कारण मेरी समझ में आ गया था। जिसे आप भी कुछ देर बाद जान जाएँगे।

मित्र रामभरोसे  ने चाय-नाश्ता करने के बाद कहा, ” घर तो तुम्हारा बड़ा आलीशान है। सुना है तुम्हारी कोई छोटी-सी लाइब्रेरी भी है।  उसे नहीं दिखाओगे क्या?” यह सुनकर कखग ने लड़खड़ाती ज़ुबान से कहा, ”हाँ-हाँ,क्यों नहीं। ज़रूर।”  फिर वह अपनी लाइब्रेरी दिखाने ले गया और ‘अभी आता हूँ’ कह कर बाहर निकल गया। एक छोटे-से कमरे में अनेक किताबें अलमारी में कसमसाती हुई और धूल फांकती हुई पड़ी थीं। रामभरोसे ने कहा,  ”वाह!! कितनी सुंदर लाइब्रेरी है।”

उसकी बात सुनकर मैंने फौरन ही मुस्कराते हुए कहा, ”कभी यह हमारी थी!”

रामभरोसे ने पूछा ,”यह क्या कह रहे हो, तुम्हारी थी, मतलब?” मैंने आहें भरते हुए कहा, ” यह बहुत दुख भरी कहानी है। घर से बाहर निकल कर ही सुनाऊंगा। क्योंकि यह शिष्टाचार का मामला है।”
फिर हम कखग के घर से लौट आए। रास्ते में मैंने कखग के बारे में बस एक ही पंक्ति कहीं कि ”बच के रहना। वह पुस्तक-दस्यु है।”
मेरी बात सुनकर रामभरोसे हँस पड़े फिर बोले, ”ओह! अब बात समझ में आई। यह बंदा पिछले दिनों मेरे घर भी आया था। उसके हाथ में एक झोला भी था। उसके जाने के बाद में मैं अपनी दो किताबें ढूँढ़ता रह गया था। कहीं उसी ने ही हाथ साफ न किया हो।”

मैंने कहा, ”उसी ने किया होगा। वह जिसके यहाँ जाता है, झोला लेकर ही जाता है। और इसकी खोजी नज़र कमरे में पड़ी पुस्तकों और पत्रिकाओं पर रहती हैं। जैसे ही घर का मालिक चाय-पान की व्यवस्था करने अंदर जाता है, यह फौरन एक-दो किताबें या पत्रिकाएं  उदरस्थ की तरह ‘झोलस्थ’ कर लेता है। फिर प्रकट में भी एक-दो पुस्तकों की डिमांड करके पुस्तक प्रेमी होने का खिताब हासिल कर लौट जाता है। पिछले कई सालों से यही कर रहा है।  और अब देखते-ही-देखते बंदे ने एक कमरे को लाइब्रेरी में बदल दिया। और दुनिया भर में बोलता फिरता है कि लाइब्रेरी देखनी है, तो मेरे घर आओ। लोग भी जानते हैं उसकी लाइब्रेरी में अनेक लोगों की लाइब्रेरियां भी शामिल है। लेकिन कौन इसके मुंह लगे।”
रामभरोसे चकित हो गया और बोला, ” कमाल का आदमी है। यह तो नंबर एक का चोर है।”

मैंने मुस्कराते हुए कहा, ”नहीं, इसे चोर या दस्यु कहना ठीक नहीं। देश में बड़े-बड़े चोर धन चुराते हैं  लेकिन यह चोर क्षमायोग्य है क्योंकि यह सिर्फ पुस्तकें चुराता है। इसलिए हम इसे बड़ावाला पुस्तक प्रेमी कह सकते हैं”

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रामभरोसे ने कहा, ” यह तो अच्छी बात है कि बंदा केवल पुस्तकों पर हाथ साफ करता है लेकिन घर ले जाकर पढ़ता भी तो होगा।”
मैंने हँसते हुए कहा, ”यार, यहीं तो मार खा गया इण्डिया। यह बंदा केवल पुस्तक-दस्यु है। किताबें घर की लाइब्रेरी में जमा देता है और मगन रहता है। कभी पढ़ता-वढ़ता नहीं। अगर पढ़ता होता, तो इसकी लाइब्रेरी की किताबें धूल से संवाद नहीं क़रतीं।  एक बार मैंने कखग से पूछ लिया कि क्या तुमने प्रेमचंद का ‘गोदान’ पढ़ लिया, तो हड़बड़ा कर बोला, ”अभी पढ़ा नहीं है।  कुछ महीने पहले खरीद कर लाया था।” इतना बोल कर वह नौ दो ग्यारह हो गया। दरअसल गोदान की कॉपी उसने मेरे यहाँ से ही पार की थी।  उसकी भनक मुझे लग गयी थी, लेकिन अगले की ‘बेइज्जती खराब’ न हो इसलिए मैंने कहा नहीं कि अपना झोला दिखाओ।”

मेरी बात सुनकर रामभरोसे हँसा, ”अब समझ में आया कि कखग हर वक्त कंधे पर एक झोला क्यों लटकाये रहता है। घर से निकलता है तो झोला खाली रहता है और जब लौटता है तो झोले के पैर भारी नजर आते हैं।  मैं उसे देखता तो सोचता था, घर-गिरस्ती का सामान लेकर लौट रहा होगा। एक दिन मैंने पूछा भी कि ‘छोला लटका कर कहाँ चले जा रहे हो, तो उसने कहा था, सब्जी खरीदने निकला हूँ। अब पता चला कि बंदा सचमुच बहुत बड़ावाला टाइप का पुस्तक-प्रेमी है। कोई बात नहीं। आज पुस्तकें चुरा कर जमा कर रहा, कल पढ़ेगा भी।’

मैंने दार्शनिक लहजे में  कहा, “जो लोग मालेमुफ्त दिलेबेरहम के फंडे वाले होते हैं, मुफ्त में मिली या चुराई गयी पुस्तकों को पढ़ते नहीं। पुस्तकें वही पढ़ता है, जिसने खरीदी है। क्योंकि उसने कुछ मोल चुकाया है मगर ऐसे लोग अब गधे के सिर से सींग की तरह गायब होते जा रहे हैं।”
मेरी बात पर रामभरोसे मंद-मंद मुस्का रहा था।
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लेखक व्यंग्यकार हैं। महत्वपूर्ण समसामयिक विषयों पर भी निरन्तर लिखते रहते हैं। सम्पर्क +918770969574, girishpankaj1@gmail.com

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