लोहे की न लोहार की

शहतूत पाने के लिए उछलना पड़ता है!

 

अद्भुत दृश्य था। वे उछल रहे थे। मैंने उनसे पूछा-“आप इस उम्र में भी ऐसा कैसे उछल सकते हैं?” 

जवाब में उन्होंने सिर्फ नौ शब्द कहे-“ यही हाल रहा तो मैं क्या, सारा देश उछलेगा?”

अपने यहाँ बात समझ में न आए तो फिर से नया सवाल पूछने की नचिकेतीय परंपरा रही है। मैंने भी पूछा, “आपकी उम्र तो 70 के करीब होगी? ”

“75 का हूँ मैं…” कहते हुए वे जोर से उछले और पेड़ से लटकती एक टहनी पर पकड़ बनाई तो तीन-चार कच्चे-पक्के शहतूत हाथ में आ गए। मेगा मार्ट के सेल में पड़े अनगिनत मौजों में से कोई ‘खास’ पीस हाथ में आ जाने के बाद, उस हाथ से जुड़े चेहरे पर जिस तरह का तेज पनपता है, ठीक उसी तरह की दिव्य आभा उनके चेहरे पर फैल चुकी थी। अब मैंने बुजुर्ग को गौर से देखा। उनकी आंखें छोटी हो गईं। थोड़ी और सिकुड़ती तो उसे बंद भी माना जा सकता था। होंठ हल्के से फैल गए। उन्होंने उन फैले होंठों के बीच एक पका शहतूत दबाया। वे शहतूत के स्वाद में घुलते हुए दिखे।

वह सुबह का समय था। हवा अतिरिक्त नरम थी। दूर से देखा था तो वहाँ शहतूत के पेड़ पर एक लड़का चढ़ा दिखा था। नजदीक गया तो पेड़ के नीचे वे बुजुर्ग खड़े थे। ‘कैलोरी बर्न’ करने के नाम पर घर से ठेल-ठालकर भेजा गया एक आम भारतीय जितनी कल्पनाएं कर सकता है, मैंने की। लगा कि बुजुर्ग ने उस लड़के को पेड़ पर चढ़ाया है और खुद नीचे रहकर, टूट रहे शहतूत का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन मैं गलत था। इस मामले में वे आत्मनिर्भर दिखे। वह नीचे जड़ के पास, उछल-उछल कर खुद शहतूत तोड़ रहे थे। फल की चाह में भी जड़ से जुड़े रहने की उनकी वैदिक चेष्टा अनुकरणीय थी। उन्होंने मुझे सहज भाव से और मैंने उनको कौतूहल की मुद्रा में देखा।

अब तक शहतूत के बारे में मेरी जानकारी, सिर्फ उसे खा लेने भर तक सीमित थी। लेकिन वे जानकारियों के ऐसे पिंड निकले, मानो शहतूत पर ऋषि चरक की ‘ऑरिजनल कुंजिका’ बचपन में ही उनके हाथ लग गई हो। वे बोले-“ शहतूत एक स्वादिष्ट, मीठा, नाजुक और नर्म फल है। यह त्वचा को जवानी के दिनों में वापस पहुंचा देता है।”

75 की उम्र में भी जिस ढंग से उनको उछलते देखा, उससे एक बात तो साफ थी कि शहतूत को लेकर उनका ज्ञान सिर्फ किताबी नहीं है, जिंदगी में उसे उतारा भी है। त्वचा सहित उनका पूरा मन जवान था। वे फिर उछले। इस बार उनके हाथ में कुछ पत्तियां आईं। और वहाँ ऊपर, डाल पर वह लड़का, घर से साथ लेकर आए पॉलीथीन को भर लेने में तल्लीन था। पत्तियों को लगभग झिड़कते हुए फेंक देने के बाद, उन्होंने कहा-“शहतूत में मिलनेवाला ‘रेजवर्टेरोल’ शरीर में फैले प्रदूषण को साफ करता है। और मैं देख रहा हूँ, अभी पूरे देश को ‘रेजवर्टेरोल की जरूरत है। लेकिन लोग उछलते ही नहीं।’” ‘डाल-डाल और पात पात’ की इस स्वाद भरी, नर्म और नाजुक कहानी में मुझे संवाद की संभावनाएं शेष दिखीं।

मैंने कहा, “फिर भी आपको इस उम्र में उछलने की कोई जरूरत नहीं है।”

“जरूरत है, बार-बार जरूरत है। मैं धरती और देश का बोझ हल्का करना चाहता हूँ।”

“कौन सा बोझ?”

 “रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हूँ। घरवाले मुझे घरती पर बोझ समझने लगे हैं।”

“आपको पेंशन तो मिलती होगी?”

“साल में 12 दिन पेंशन के होते हैं, बाकी 353 दिन बोझ ही हूँ।”

“…तो उछलने से यह बोझ कैसे हल्का होगा?”

“उछलने से कुछ पल के लिए ही सही मेरा पैर धरती पर नहीं रहता। इससे बोझ हल्का होता है। उस पल के लिए आप धरती पर बोझ नहीं होते।”

“ये तरीका आपने खुद इजाद किया है?”

“बरसों पुराना मेरा बनाया नुस्खा है। आजमाया हुआ। देश में सबको आजमाना चाहिए। देश में सबको ‘रेजवर्टेरोल’ चाहिए।”

“देश में हर जगह शहतूत के पेड़ तो नहीं होते, फिर…?”

सुनते ही उनके चेहरे पर ‘घोर कलियुग आ गया है…’ वाला भाव आ गया।

बोले-“शहतूत नहीं है तो उछलकर कुछ और तोड़िए। उस कुछ में ‘रेजवर्टेरोल’ न सही, कुछ तो होगा। अब देखिए तारे तो आप तोड़ नहीं सकते और आम टाइप के रसीले फलों पर पहरा बहुत है। तो शहतूत ही तो बचता है न। वैसे भी इस देश में एक सरकारी रिटायर्ड बाल-बच्चेदार आदमी शहतूत तक ही उछल सकता है।” कहते-कहते उनके चेहरे का ‘घोर कलियुग आ गया है…’ वाला भाव सर्वोदयी और स्वर भूदानी हो गया-“40 साल नौकरी की। जब वेतन मिलता था तो धरती को धकेल कर चलता था। अब मुझे पेंशन मिलती है। फिर भी मैं घरवाले की नजर में देश और धरती पर भार हूँ। 15 साल से उछल रहा हूँ। खैर… मेरी तो कट गई। लेकिन अब क्या सरकारी और क्या प्राइवेट.! कहीं किसी को पेंशन नहीं मिलने वाली। रिटायर्ड होने के बाद सब भार माने जाएंगे। आने वाले समय में तो सबको उछलना पड़ेगा। यह देश की जरूरत है। आप बिना उछले देश का भार हल्का नहीं कर सकते। बोझ नहीं बने रहना है तो उछलना सीखना होगा। सरकार पेशन नहीं दे सकती तो सड़क के किनारे शहतूत तो लगा सकती है। आप लगाकर तो देखें, आप देखेंगे कि पूरा देश उछल रहा है।” इतना कहने के बाद एक बार फिर वे जोर से उछले। इस बार हाथ में तीन शहतूत आए।

देश के भार को हल्का करने में शहतूत और शहतूत में छिपे पड़े ‘रेजवर्टेरोल’ के योगदान पर सोचता हुआ उस समय तो मैं वहाँ से निकल जरूर गया, लेकिन दो दिन के बाद, अब इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि उछलना शुरु कर देना चाहिए। पहले पड़ोस के एक बेर के पेड़ का ध्यान आया, लेकिन कांटों की वजह से मन फिर से शहतूत पर अटका। देश का बोझ हल्का करने के लिए शहतूत के तले उछलना तो बनता है।

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार एवं कलाकार हैं। सम्पर्क choudharydeoprakash@gmail.com

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