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बहुसंख्यक मुस्लिमों
सामयिक

बहुसंख्यक मुस्लिमों को समानता का अधिकार मिले

 

लाहौर विश्वविद्यालय में एक सर्वेक्षण किया गया जिसमें छात्रों से कैमरे पर सवाल पूछा गया था कि जाति कैसे उनके प्रेम सम्बन्धों और दोस्ती के बारे में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को प्रभावित करती है। इन छात्रों में से हर एक सैयद से लेकर शेख तक, अपनी जाति जानता था। लगभग नौ मिनट के लंबे वीडियो में, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि शहरी परिवेश में विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए भी जाति एक सक्रिय और दैनिक अनुभव है। साइस्ता अब्दुल अजीज पटेल की 15 दिसम्बर 2020 को अलजजीरा में प्रकाशित एक लेख के इस अंश को पढ़ कर शायद आप चौंक गए होंगे। इसी लेख में साइस्ता अब्दुल कहतीं है कि “यहाँ तक ​​​​कि जब धार्मिक अल्पसंख्यकों के निचली जाति के लोग इस्लाम में परिवर्तित हो जाते हैं, तब भी वे उसी जाति-आधारित हिंसा का सामना करते रहते हैं। पाकिस्तान में इस्लाम धर्म अपनाना निचली जाति के लोगों को जाति से मुक्त नहीं करता है, उन्हें “अछूत” के रूप में ही माना जाता है।” विमर्श की मुख्यधारा से प्रायः वंचित ये महत्वपूर्ण समस्या हमारे भारत में तो पाकिस्तान निर्माण से भी पहले से चली आ रही है। बस विद्वानों ने पीड़ित बहुसंख्यक मुस्लिम समाज की इस समस्या की ओर बहुत ध्यान इस लिए नहीं दिया होगा कि सभी यही मन कर चलते है कि इस्लाम में जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार और राज्य सभा सदस्य अली अनवर अंसारी की पुस्तक ‘मसावात की जंग’ में वर्णित एक प्रसंगानुसार 1938 में पटना सिटी क्षेत्र की सीट के लिए उपचुनाव होने वाला था। पटना सिटी के नवाब हसन के घर पर प्रत्याशियों से इसके लिए दरखास्त ली जा रही थी। अब्दुल क़य्यूम अंसारी ने सोंचा क्यों न इस सीट से अपनी किस्मत आजमाई जाए। वे भी दरखास्त देने वहाँ गये। दरखास्त जमा कर अभी वह दरवाजे तक लौटे ही थे कि अन्दर से कहकहे के साथ आवाज आयी कि अब जोलाहे भी एमएलए बनने का ख्वाब देखने लगे। इतना सुनना था कि वे फौरन कमरे के अन्दर गये और कहा कि ‘मेरी दरखास्त लौटा दीजिए, मुझे नहीं चाहिए आपका टिकट।” बाद में मोमिन कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार के रूप में 1946 के चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की और पसमांदा समाज से आने वाले बिहार के पहले मंत्री भी बने।

ये सर्वविदित सत्य है कि भारत के मुसलमान विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के द्वारा धर्मान्तरित किये गए और उन आक्रांताओं के कुछ वंशज यहाँ पर रह रहे हैं। इस प्रकार मोटे तौर पर मुसलमानों के तीन वर्ग भारत में हैं। अशराफ, अजलाफ और अरजाल!  अशराफ अरबी के शरीफ शब्द का बहुवचन है जिसका अर्थ रईस या अभिजात्य होता है। अशराफ वे मुसलमान हैं जिनका सम्बन्ध विदेशों, मूलतः अरब देशों से है। सैय्यद, शेख, पठान, मुग़ल आदि समुदाय अशराफ वर्ग में आते हैं। भारत में मुसलमानों की कुल जनसंख्या में इनकी हिस्सेदारी लगभग 15% है। अजलाफ यानि आज की शब्दावली में पिछड़ा वर्ग! ये वो लोग हैं जो हिन्दू धर्म से इस्लाम में धर्मान्तरित हुए जैसे दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, बढई-लुहार, हज्जाम, जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, कंजरा, मिरासी, मनिहार, तेली आदि। आज की प्रचलित शब्दावली में अरजाल यानि अनुसूचित जाति या जनजाति या दलित! इनमे हलालखोर, भंगी, हसनती, लाल बेगी, मेहतर, नट, गधेरी आदि शामिल हैं। हिन्दू धर्म से इस्लाम में धर्मान्तरित होने के बाद जिस जाति व्यवस्था या भेदभाव को समाप्त करने के लिए ये वर्ग अपनी सदियों की परंपरा को छोड़ गया या इनसे छुड़वाया गया वो वहाँ भी बरक़रार रही। इस विषय पर गहन शोध करने वाले अली अनवर अंसारी कहते हैं कि जो ऊँची जाति का हिन्दू इस्लाम कुबूल किया वो यहाँ भी ऊँची जाति के मुसलमानों में ही गिना जाता है! अर्थात जाति व्यवस्था में कोई विशेष अंतर नहीं आया।

इन्हीं दो वर्गों अजलाफ और अरजाल को एक साथ पसमांदा मुसलमान कहते हैं जिनकी भारत की मुस्लिम जनसंख्या में लगभग 85% की हिस्सेदारी है। इतनी बड़ी जनसंख्या अर्थात बहुसंख्यक मुसलमान होने के बाद भी इन वर्गों के साथ अशराफ वर्ग के मुसलमान भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं तथा इन्हें निम्न दर्जे का माना जाता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ‘कुफू का सिद्धांत’ बनाया है जिसमें बताया गया है कि किस मुस्लिम जाति के लोग किस मुस्लिम जाति के लोगों से निक़ाह कर सकते हैं। अभिजात्य वर्ग के अशराफ मुसलमान पसमांदाओं से बेटी-रोटी का स्वाभाविक संबंध नहीं रखते हैं और कई जगहों पर तो पसमांदा मुस्लिमों को अपनी अलग मस्जिद में नमाज पढ़ने जाना होता है। पसमांदा समाज का कब्रिस्तान भी बहुत जगह अलग होता है।

ये भेदभाव सिर्फ सामाजिक स्तर तक ही सीमित नहीं है। अशराफ मुसलमानों की भारत की राजनीति में अच्छी पकड़ है। प्रथम लोकसभा चुनाव से लेकर 14वीं लोकसभा चुनाव तक कुल 400 मुसलमान सांसदों में मात्र 60 सांसद ही बहुसंख्यक पसमांदा समाज से हुए हैं। जनसंख्या के अनुपात के अनुसार सर्वाधिक प्रतिनिधित्व तो पसमांदाओ का होना चाहिए था परन्तु सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। चूंकि सरकारी तंत्र और राजनीतिक गलियारों में अशराफ मुसलमानों की गहरी पैठ है इसलिए सरकारी योजनाओं का लाभ सर्वाधिक उस समाज को ही मिलता रहा है तथा ये लोग सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पसमांदा मुस्लिमों से बहुत आगे हैं। शिक्षा, जागरूकता और प्रतिनिधित्व के अभाव के कारण आरक्षण का सही लाभ पसमांदाओ को नहीं मिल पा रहा है और यह समाज अपेक्षित उन्नति नहीं कर पा रहा है। भारत का बहुसंख्यक मुसलमान जहाँ राजनैतिक रूप से अपने प्रतिनिधित्व में पिछड़ा हुआ है वहीं इस्लामिक संगठनों में भी इनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संस्थान जो भारत में रहने वाले मुसलमानों के प्रतिनिधि संगठन हैं उनका शीर्ष नेतृत्व अशराफ मुसलमानों के पास है।

इक्कीसवीं सदी में भी मुस्लिम समाज लोकतांत्रिक देश में अपने जीवन के सभी निर्णय स्वाधीन रूप से नहीं ले पाता। कभी उसे फतवे का डर सताता है तो कभी बिरादरी से निकाले जाने का भय होता है। हमने देखा है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति किसी एक राजनीतिक दल या किसी सामाजिक संगठन का समर्थन करता है या उसके कार्यक्रमों में सहभाग करता है तो उसके विरुद्ध फतवे जारी हो जाते हैं, मस्जिद में प्रवेश रोक दिया जाता है। इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से बहुसंख्यक मुस्लिम समाज भय से अपनी समस्याओं को लेकर मुखर नहीं हो पाता है। उर्दू के तमाम अखबारों पर अशराफ मुसलमानों का वर्चस्व है जो पसमांदाओं की मूल समस्याओं पर सामाजिक रूप से विमर्श ही नहीं करते न इस्लामिक नेताओं, और मौलवियों के द्वारा इनकी सामाजिक-आर्थिक बदहाली के लिए कुछ खास कदम उठाए जाते हैं। कुछ लोगों के संघर्षों के कारण मुख्यधारा की मीडिया में यदा कदा इन विषयों पर चर्चा हो जाती है तथा उर्दू अखबार वाले भी अब इन मुद्दों को नजरंदाज नहीं कर पाते। खबरों के मुताबिक शाहीन बाग आंदोलन के समय भी पसमांदा मुसलमानों ने अपने मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया था।

पिछले 100 वर्षों से पसमांदा समाज अपने उत्थान के लिए लगातार संघर्ष  कर रहे हैं। अली अनवर द्वारा स्थापित ‘आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज’ और एजाज अली द्वारा स्थापित ‘आल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट’ के नेतृत्व में पसमांदाओ क‌ई छोटे-छोटे संगठन भी सक्रिय संघर्ष कर रहे हैं। परन्तु हर छोटी बड़ी बात पर फतवा जारी करने वाले सक्षम लोगों ने इन संगठनों को ही गैर-इस्लामिक घोषित कर दिया है। विचार करने वाली बात ये है कि अपने हुक़ूक़ के लिए संगठित होना गैर इस्लामिक कैसे हो गया? अगर इस्लाम समानता की बात करता है तो फिर भेदभाव करने वाले, उसका संरक्षण करने वाले तथा ऐसे लोगों का बचाव करने वाले गैर-इस्लामिक घोषित किए जाने चाहिए थे।

डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने क‌ई बार कहा है कि विदेशी मूल से आए मुसलमान आज भी अपनी श्रेष्ठता के दंभ से निकल नहीं सके हैं।एक अखबार के मुताबिक ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर ने कहा था कि मुसलमानों की राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी में भी पसमांदा मुसलमानों को जगह नहीं दी जाती। राजनीतिक सभाओं में हमसे झंडे उठवाते हैं, धार्मिक नारे लगवाते हैं, लेकिन कहीं भागीदारी देने को तैयार नहीं होते।

बहुसंख्यक मुस्लिमों के जीवन की समस्याओं को सहानुभूति पूर्वक समझने के लिए एक बड़े विमर्श की अनिवार्य आवश्यकता है। भारत का संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। इक्कीसवीं सदी में भी देश की इतनी बड़ी आबादी को एक संगठित और प्रभावी तंत्र के द्वारा जिस प्रकार दबा कर रखा गया है उससे मुक्ति के उनके प्रयासों को देश के आम नागरिकों का भी सहयोग मिले। बहुसंख्यक मुस्लिमों के जीवन की जो समस्या है उसे पहले समस्या के रूप में इस्लामिक संगठनों को स्वीकार करना चाहिए न कि उनके संगठित प्रयासों को ही गैर-इस्लामिक घोषित कर समस्याओं पर पर्दा डालने की कोशिश करनी चाहिए। जब हम बीमारी की पहचान कर लेते हैं, यह मान लेते हैं कि बीमारी है तब उसके सही उपचार की व्यवस्था भी करते हैं और धीरे धीरे व्यक्ति स्वस्थ भी हो जाता है

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