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हनुमान होना
मुद्दा

हनुमान होना क्या होना है

 

हनुमान वह हैं जिन्होंने राम का मन्दिर मन में बनाने का सन्देश दिया था। हनुमान वह हैं जिनसे तीनों लोक उजागर हुआ है। हनुमान वह हैं जो संकट मोचन हैं। ऐसा इसलिए कि हनुमान ज्ञान गुण के सागर हैं। ज्ञान गुण सागर हैं यानी प्राणवायु हैं, आक्सीजन हैं। इसीलिए वे वायु-पुत्र हैं।

हनुमान प्राणवायु हैं इसीलिए वे हर भारतीय के हृदय में वास करते हैं साँस की तरह। हनुमान जब जिसके मन-मानस से निकल जाते हैं, वह भारतीय ज्ञान-गुण से रहित ही नहीं हो जाता, निस्तेज हो जाता है। हनुमान के बगैर राम दरबार भी नहीं सजता। इसलिए नहीं कि वे राम के सेवक या दूत हैं, बल्कि इसलिए कि वे ज्ञान गुण के सागर हैं।

रामराज वह राज है जिसमें ज्ञान और गुणियों के लिए सागर जितनी जगह हो। धरती के सत्तर प्रतिशत हिस्से पर सागर है। जब तक सागर का यह आकार बचा हुआ है, हर प्राणी के लिए यह धरती हो या पाताल, स्वर्ग हो या नर्क, सभी जगह मंगल है।

हनुमान अकेले ऐसे महावीर हैं जिनसे बल, विद्या और बुद्धि तीनों के लिए प्रार्थना की जाती है। बल एक तिहाई ही चाहिए। बल चाहिए मगर विद्या और बुद्धि के साथ चाहिए। एक तिहाई बल से ही हनुमान ‘अतुलित बलधामा’ हो जाते हैं, क्योंकि विद्या और बुद्धि का साथ है। हनुमान वह हैं जो ‘अतुलित बलधामा’ होने के बावजूद अपने बल का उपयोग डराने या सताने के लिए कभी नहीं करते हैं। न ही अपनी धाक जमाने या महत्व दिखाने के लिए करते हैं, क्योंकि वे विद्यावान हैं।

हनुमान वह हैं जो अपने बल का अकेला उपयोग नहीं करते, वे बुद्धि या विद्या का साथ अवश्य लेते हैं। प्रसंग संजीवनी बूटी लाने का लें। संजीवनी वाले पहाड़ पर पहुँच कर जब संजीवनी बूटी पहचानने की उनकी विद्या भरमा दी जाती है, हनुमान बुद्धि और बल का उपयोग एक साथ करते हैं। हनुमान संजीवनी बूटी की जगह पूरा पहाड़ ही उठा कर ले आते हैं। यह उनकी बुद्धि का ही कमाल था कि उन्होंने निर्णय लिया कि वे खाली हाथ नहीं जाएँगे, संजीवनी बूटी वाला पहाड़ ही उठा कर ले जाएँगे। लेकिन पहाड़ उठाने के लिए बल चाहिए था, सो हनुमान ने अपने बल का उपयोग किया। यह बल का जीवनदायी उपयोग था।

बुद्धि और बल जब दोनों एक दूसरे के अभिन्न बनते हैं तभी किसी पहाड़ को उठाना सम्भव हो पाता है। हनुमान कभी भी बुद्धि का साथ नहीं छोड़ते, वे कभी बुद्धि के साथ विद्या को लेते हैं तो कभी बल को लेते हैं। चूंकि हनुमान बुद्धि और विद्या का साथ नहीं छोड़ते हैं, उन्हें किसी और का साथ नहीं चाहिए होता है और न उन्हें किसी और की शक्ति की जरूरत ही पड़ती है। हनुमान हर काम अकेले करते हैं, अपने सामर्थ्य से करते हैं। अपने सामर्थ्य भर करते हैं।

हनुमान ‘अतुलित बलधामा’ हैं मगर रावण ने जब उन्हें यथोचित सम्मान नहीं दिया, उन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग नहीं किया। यहाँ भी उन्होंने बुद्धि और विद्या का सहारा लिया। अपने अपमान से रावण को सबक सिखाने के लिए अपनी पूँछ का इस्तेमाल किया। अपनी पूँछ से वह आसन तैयार किया जिस पर बैठ कर वह अपने को रावण से छोटा नहीं महसूस कर सकते थे और न ही रावण उन्हें अपने से छोटा समझ सकता था।

हनुमान का यह उपक्रम उनकी बुद्धि और विद्या के बल पर था और अहिंसा के माध्यम से रावण को सबक सिखाना था। जहाँ बुद्धि और विद्या का बल होता है, वहाँ सहज और स्वाभाविक रूप से अहिंसा का रास्ता बनता है। बुद्ध से बहुत पहले हनुमान ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया है। हनुमान और रावण के इस प्रसंग से सहज ही उस महात्मा की याद आ जाती है जिसे दुनिया गांधी के नाम से याद करती है।

इस गांधी का अपमान ब्रिटिश सरकार के एक मुलाजिम ने रेल के फर्स्ट क्लास के डब्बे से उन्हें जबरन उतार कर किया था। इसी गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य के एक न्यायाधीश को अपने सम्मान में खड़े होने के लिए विवश कर दिया। गांधी ने भी हनुमान की तरह यह अपनी बुद्धि और विद्या के बल पर किया था। अहिंसात्मक सबक तो था ही। हनुमान और यह महात्मा दोनों यहाँ गले मिलते हैं। इस महात्मा ने भी हनुमान की तरह ही राम का मन्दिर मन में ही बनाया था। राम का मन्दिर जब मन में बनता है तो वह भूख और भय दोनों से मुक्त करता है उसे, जिसके मन मेंं बनता है। हनुमान और महात्मा दोनों ही लोभ से मुक्त थे और निर्भय थे। आज हनुमान और महात्मा दोनों ही मनुष्य और मानवता के लिए अनिवार्य हैं। आज जब पूरी दुनिया में भयभीत करने का दौर चल रहा है, भयमुक्त होने के लिए हनुमान को याद किया जाना चाहिए।

भारतीयों की स्मृति में वीर बहुत हैं, महावीर केवल एक हैं। वे हैं हनुमान। भीम भी वीर हैं और वीर सावरकर भी वीर हैं। वीर भीम और महावीर हनुमान की एक मुलाकात हुई है। उस मुलाकात में हनुमान वीर भीम को यह समझा सके थे कि महावीर और वीर में क्या अन्तर होता है। हनुमान ने अपनी पूँछ का इस्तेमाल कर भीम को जैसे समझाया था उसमें हिंसा नहीं थी, पूरी तरह से वह अहिंसात्मक प्रयास था। वीर हिंसा के आगे नहीं सोच पाते हैं। वे जो हिंसा के आगे भी सोच सकते हैं और उस सोच को अमल में लाते हैं, वे महावीर कहलाते हैं। हनुमान ऐसे ही महावीर बने हैं।

तुलसीदास ने बहुत विचार कर ही ‘ज्ञान गुण सागर’, ‘अतुलित बलधामा’ और ‘महावीर’ क्रमशः लिखा है। यह सामान्य से महावीर बनने की यात्रा है। हनुमान चालीसा की प्रथम तीन चौपाइयाँ बताती हैं। गांधी की भी महात्मा बनने की कहानी इसी क्रम में है। गांधी भी ज्ञानी-गुणी हैं पहले, फिर अतुलित बलधामा और आगे महात्मा कहलाते हैं।

गांधी ने अहिंसा की ताकत से अपने को अतुलित बलधामा बनाया था। इस महात्मा ने इसे ऐसा बरता कि अंगरेजी साम्राज्य उनसे वैसे ही थर्राया था जैसे महावीर से रावणराज्य या फिर कहें कि हनुमान की ताकत का अहसास होते ही जैसी दशा राजा बालि की हुई थी। महावीर अपनी पूँछ का इस्तेमाल खूब किया करते हैं लेकिन पूँछ हिलाने के अर्थ में अपनी पूँछ का उपयोग उन्होंने कभी नहीं किया। पूँछ हिला कर सोना हासिल करना हर युग में आम आचरण रहा है, लेकिन वह ऐसे अकेले महावीर हैं, जो अपनी पूँछ से सोने की लंका स्वाहा कर देते हैं।

गांधी भी वह महात्मा थे जिन्होंने अपने ज्ञान-गुण से सोने की अशर्फियां बटोरने के बजाय अधनंगे होकर ब्रिटिश लंका के साम्राज्य को स्वाहा किया। अंग्रेजी साम्राज्य के एक न्यायाधीश ने गांधी से कहा था कि आप अगर लिखित में कानून तोड़ने का अपराध स्वीकार कर लें तो आपको जेल नहीं भेजा जाएगा। गांधी ने जेल जाना ही स्वीकार किया था। उन्हें माफी माँगना स्वीकार नहीं था। महावीर और महात्मा की देह और काल अलग हैं, मगर दोनों की आत्मा और सोच समान है। हनुमान और गांधी दोनों ही भारतीयों की दो आंखें हैं।

चूँकि हनुमान ने मन में राम का मन्दिर बनाया था, इसलिए वे न केवल लोभ और भय से मुक्त हो गए थे, बल्कि अपने किए कर्म और अपनी सफलता पर भी कोई दावा नहीं करते। वे कर्म करते हैं और भूल जाते हैं। चलती भाषा में कहें तो वे कर्म करते थे और दरिया में डालते जाते थे। हनुमान की यह दरियादिली भी उन्हें महावीर बनाती है।

उन्हें कहाँ याद रहता था कि वे अतुलित बलधामा हैं। वे महावीर थे। महावीर का अर्थ है कामनाओं से मुक्त होते जाना। हनुमान सभी तरह की कामनाओं से मुक्त थे। ऐसा इसलिए हो सका था क्योंकि उन्होंने राम का मन्दिर मन में बनाया था और चाकर थे। ऐसे चाकर थे कि राम का काम किए उन्हें विश्राम कहाँ? हनुमान इतने ड्यूटीफुल हैं कि ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ‘।

चाकर थे इसलिए भी किसी काम का व्यक्तिगत श्रेय लेना या उसका लाभांश लेना उन्हें मंजूर नहीं था। यह उनके चाकर होने का शील भी था। हनुमान वह चाकर हैं जिन्हें जामवन्त के याद दिलाए अपनी भूमिका और क्षमता समझ में आती है। जामवन्त न केवल मन्त्री थे, बल्कि बुजुर्ग भी थे।

‘सबै चाकर राम के’ इस महावीर के जीवन का संदेश है। महात्मा के आने के पहले ही भारतेंदु ने कहा था ‘सबै भूमि गोपाल की’। ‘सबै चाकर राम के’ और ‘सबै भूमि गोपाल की’ में ही आधुनिक युग के महात्मा ने एक आर्थिक और आत्मनिर्भर भारत का रास्ता देखा। ‘सबै चाकर राम के’ और ‘सबै भूमि गोपाल की’ का दर्शन विषमताओं से मुक्ति और लोक कल्याण का दर्शन है।

यह दर्शन मनुष्य और राज्य दोनों को ही विकारों और विकारों से उत्पन्न होने वाले सभी कलेसों से दूर रखेगा। तुलसी दास ने सही ही पवनपुत्र से ‘हरहु कलेस बिकार’ की विनती की है। आज के लोभी और वर्चस्वी समय में हनुमान को याद करने का महत् उद्देश्य ऐसा ही हो यह समय की मांग है।

हनुमान को अपने बल और बुद्धि की परीक्षा भी देनी पड़ी है। तुलसीदास ने हनुमान को अपने रामचरित मानस में एक पूरा काण्ड दिया है। हनुमान को इतनी गरिमा देने के पहले तुलसीदास ने उनकी बुद्धि और बल की परीक्षा का आयोजन किया है। प्रसंग है सुरसा जब हनुमान को अपना आहार बनाने का प्रस्ताव करती है। यहाँ एक दिलचस्प बात याद रखने की जरूरत है कि राम को केवल बल की परीक्षा देनी पड़ी है। हनुमान जब बल और बुद्धि की परीक्षा में पास हो जाते हैं तभी उन्हें रामचन्द्र के काज को सँवारने योग्य पाया गया है। हनुमान चलीसा की चौपाइयाँ भी हैं :

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

हनुमान के पास कपटी को पहचानने की भी तीव्र दृष्टि है। मन की मंशा भी समझने में हनुमान को देर नहीं लगती। हनुमान ने सिन्धु के उस निशिचर की मंशा और कपट को भाँप लिया था जो आकाश में उड़ते पंछी को छल से समुद्र में गिरा कर उसे अपना ग्रास बनाया करता था। आज जब हम कपटी और छली लोगों से घिरे हैं, हमें हनुमान-दृष्टि की सख्त दरकार है। अगर हम हनुमान-दृष्टि से सम्पन्न हो पाएँगे तो बेशक हम निशिचरों से मुक्त हो पाएँगे।

सुन्दरकाण्ड में ही बाबा तुलसीदास ने हनुमान को हरिजन कहा है। नहीं मालूम कि महात्मा ने एक समुदाय विशेष के लिए यह हरिजन संज्ञा यहाँ से लिया है कि नहीं ? महात्मा ने उस समुदाय को हरिजन कहा जिस समुदाय से डॉ. अम्बेडकर आते हैं। कौन इंकार करेगा कि डॉ. अम्बेडकर विद्यावान गुणी अति चातुर नहीं थे। वे रामकाज करने को आतुर भी थे और योग्य भी थे। तभी महात्मा ने डॉ. अम्बेडकर की सिफारिश की थी और उन्होंने भारत की सम्प्रभुता को शक्तिमान बनाने वाला संविधान सम्भव किया।

हनुमान, महात्मा और अम्बेडकर के बनाए जो हिन्दुस्तान बना है उसी हिन्दुस्तान से हर हिन्दुस्तानी पहचाना जाता है। जो हिन्दुस्तान बना वह विद्यावानों, बुद्धिमानों और गुणवानों से बना है।

विनय यह है कि हनुमान होना पहलवान होना नहीं है ; कि हनुमान होना जड़ होना भी नहीं है ; कि हनुमान होना द्वेषी होना भी नहीं है, उत्पाती होना तो कतई नहीं है। हनुमान के होने मात्र से कई महारथियों का घमण्ड चूर-चूर हुआ है। हनुमान उनका घमण्ड दूर करेंगे जो आज घमण्ड कर रहे हैं।

और अब अंत में – महावीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।

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