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वैक्सीन के निर्माण में जरूरी है आत्म-निर्भरता

 

  •  भारत डोगरा

 

 ‘कोविड-19’ के इलाज के लिए वैक्‍सीन यानि ‘टीका’ की अहमियत उजागर हुई है, लेकिन क्‍या विशाल पैमाने पर इसका निर्माण आसान होगा? वे कम्पनियाँ जो धंधे की खातिर झूठे आँकड़ों से बीमारी की गम्भीरता स्‍थापित करने से लगाकर खुद बीमारी को ही खडा कर देती हैं, कैसे भारी-भरकम मुनाफे के साथ ‘टीका’ बना पाएँगी? ऐसे में हाल में फिर से चर्चित हुई आत्‍मनिर्भरता काम आ सकती है। प्रस्‍तुत है, इस विषय की पडताल करता भारत डोगरा का यह लेख।

हाल की सरकारी घोषणाओं में एक ओर तो आत्म-निर्भरता पर जोर दिया जा रहा है और दूसरी ओर महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में पब्लिक सैक्टर या सार्वजनिक उद्यमों की उपस्थिति सुनिश्चित की जा रही है। इन दोनों नीतिनिर्णयों के सम्बन्ध में वैक्सीन या टीकाकरण क्षेत्र को जुड़ना चाहिए। हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र में वैक्सीन सदा महत्त्वपूर्ण रहा है, ‘कोविड-19’ के इस दौर में तो इसका महत्‍व और भी बढ़ गया है। आज हमारे सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि क्या हम वैक्सीन क्षेत्र में आत्म-निर्भरता को शीघ्र ही बढ़ा सकते हैं। ऐसा करने के लिए सार्वजनिक उद्यमों को महत्‍वपूर्ण स्थान देना होगा। वैक्सीन क्षेत्र में सफलता से आगे बढ़ने के लिए वैक्सीन का सुरक्षित होना बहुत जरूरी है। यदि हम आत्म-निर्भर हैं और इस आत्म-निर्भरता में सार्वजनिक उद्यम का महत्त्वपूर्ण स्थान है तो यह स्थिति वैक्सीन की सुरक्षा (सेफ्टी) सुनिश्चित करने और वैक्सीन क्षेत्र में प्रगति के लिए बहुत अनुकूल होगी।

जहाँ एक ओर देश के टीकाकरण कार्यक्रम के लिए वैक्सीन उत्पादन क्षमता को मजबूत करना जरूरी है, वहीं कड़वी सच्चाई यह भी है कि कुछ साल पहले देश में सार्वजनिक क्षेत्र की वैक्सीन उत्पादक कंपनियों की उत्पादन क्षमता को बहुत नुकसान पहुँचा था। टीकाकरण कार्यक्रम के विशेष महत्त्व को देखते हुए प्रायः यह माना जाता है कि टीकों या वैक्सीन के उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए व अधिकांश टीकों का उत्पादन इन सार्वजनिक उद्यमों में ही होना चाहिए। पर एक समय हालत यह हो गई थी कि देश की आत्मनिर्भरता के प्रतीक बने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम बुरी तरह बदहाल हो गए थे।

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यह स्थिति ऐसे ही उत्पन्न नहीं हुई थी, बल्कि हकीकत तो यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों व बड़े बिजनेस के स्वार्थों ने अन्तराष्ट्रीय संगठनों व गठबन्धनों के साथ जुड़कर बाकायदा एक साजिश रची जिसके तहत अनेक वर्षों से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों को चोट पहुँचाई गयी। वैक्सीन क्षेत्र में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे इन इकाईयों को वैक्सीन उत्पादन के अवसर कम मिलें या न मिलें। वैक्सीन के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर सबसे बड़ा हमला वर्ष 2007-08 में हुआ और उस क्षति से हम अब तक पूरी तरह उबर नहीं सके हैं।

भारत का टीकाकरण कार्यक्रम कठिन दौर से गुजर रहा है। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’  व ‘तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ के आंकड़ों से पता चला है कि भारत में जरूरी टीकाकरण प्राप्त करने वाले बच्चों का प्रतिशत कम हुआ है, जबकि विश्व स्तर पर यह बढ़ा है।

‘स्वास्थ्य के राष्ट्रीय आयोग’ के एक मान्यता प्राप्त प्रकाशन ‘भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धि व वित्तीय व्यवस्था’ के अनुसार, ‘वर्ष 1998 और 2003 में हुए एक परिवार सर्वेक्षण में 220 जिलों से उपलब्ध आंकड़ों से पता चला है कि आधे-से-अधिक जिलों में ‘सम्‍पूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम’ में या तो कोई प्रगति नहीं हो रही थी या फिर उपलब्धि पहले से गिर रही थी।

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‘दूसरी चिन्ताजनक बात यह है कि विश्व स्तर पर वैक्सीन बनाने के उद्योग में लगी कंपनियों में कई महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं। उनका ध्यान जन-स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सस्ते पर अच्छी गुणवत्ता के वैक्सीन बनाने पर उतना नहीं है जितना कि मोटे मुनाफे के वैक्सीन विकसित करने पर। भारत जैसे विकासशील देशों को बड़ी मात्रा में सस्ते, विश्वसनीय वैक्सीन चाहिए पर विश्व स्तर पर इस उद्योग को नियंत्रित करने वाली कंपनियों की प्राथमिकताएं कुछ अलग हैं। कम मार्जिन में काम करने में उनकी रुचि नहीं है। हां, यदि उनके द्वारा विकसित नए वैक्सीनों को भी किसी तरह टीकाकरण कार्यक्रम में प्रवेश मिल जाए व इस तरह के ‘कम्बीनेशन’ (मिश्रण) को अधिक कीमत में बेच सकें तो वे तैयार हैं।

 ‘इंडियन जर्नल आफ मेडिकल रिसर्च’ जनवरी-2008 के एक अनुमान के अनुसार ‘डिफ्थीरिया, पोलियो और टुबरकोलोसिस’ (डीपीटी) में ‘हेपाटाइटिस-बी वैक्सीनेशन’ जोड़ा जाए तो ‘डीपीटी इम्यूनाईजेशन’ का खर्चा 17 गुना बढ़ जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस तरह के ‘काम्बीनेशन’ बेचने के लिए जोर लगा रही हैं, जबकि इससे विकासशील व गरीब देशों का खर्च बिना कोई विशेष लाभ प्राप्त किए ही बहुत बढ़ जाएगा। सीमित साधनों की स्थिति में खर्च बढ़ेगा तो कम परिवारों तक टीकाकरण का लाभ पहुंच सकेगा और यही हो भी रहा है।

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अपने इन प्रयासों की सफलता के लिए वैक्सीन की विश्व स्तर की बड़ी कंपनियां कई जुगाड़ कर रही हैं। इनमें से एक तो यह है कि जिस बीमारी का वैक्सीन वे खोज रही हैं उससे होने वाली मौतों के बारे में बहुत बढा-चढाकर जानकारी फैलाई जा रही है। उदाहरण के लिए भारत में ‘हेपाटाईटिस-बी’ से होने वाली मौतों के आंकड़ों को हकीकत से कई गुना अधिक बताया गया। जब इस बारे में पूछताछ की गई तो आंकड़ों का झूठ सामने आया। इसी तरह एड्स/एच.आई.वी. के आंकड़े भी सचाई से अधिक बताए गए थे।

दूसरा हथकंडा यह अपनाया जाता है कि महंगे वैक्सीन को आरम्भ में टीकाकरण में शामिल करने के लिए कुछ अन्तर्राष्ट्रीय सहायता दे दी जाती है। यह सहायता कुछ ही समय के लिए होती है। बाद में तो यह बोझ विकासशील देश को स्वयं ही उठाना पड़ता है। धंधा बढाने के ऐसे कई गलत प्रयास कंपनियों द्वारा हों तो बहुत संदेहास्पद लगेंगे, इसलिए इसके लिए कई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों या गठबन्धनों का सहारा लिया जाता है। ऐसे एक गठबन्धन ‘वैक्सीन व इम्यूनाइजेशन के लिए भूमंडलीय गठबन्धन’ ने सम्मेलन भी किया था, जिसमें भारत के टीकाकरण कार्यक्रम में नए, महंगे टीके व ‘काम्‍बीनेशन’ जोड़ने के लिए दबाव डाला गया था।

इन सब तथ्यों को ध्यान में रखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आत्म-निर्भरता और सार्वजनिक उद्यम की मजबूती का उद्देश्य कितना महत्त्वपूर्ण है। वैक्सीन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खर्च को भी कम रखना व देश को बाहरी लूट से बचाना यदि जरूरी है, तो यह लक्ष्य आत्म-निर्भरता व सार्वजनिक उद्यम की मजबूती की राह से ही पूरा होगा।


 भारत डोगरा प्रबुद्ध एवं अध्‍ययनशील लेखक है।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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