मानिक सरकार
शख्सियत

भारत का सबसे गरीब मुख्यमंत्री : मानिक सरकार

आजाद भारत के असली सितारे-47

त्रिपुरा में लगातार पाँच बार से जीतकर सत्ता में आने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सरकार 2018 में भाजपा से पराजित हो गई।  वहाँ 1998 से 2018 तक लगातार मुख्यमंत्री पद पर बने रहने वाले मानिक सरकार (22.1.1949) चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री का सरकारी आवास खाली करके अपनी पत्नी पंचाली सरकार के साथ सीपीएम के दफ्तर में रहने के लिए चले गए। पार्टी ने उनको रहने के लिए पार्टी ऑफिस में ही एक कमरे का इंतजाम कर दिया। उनके करीबी लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री आवास से वे चंद कपड़े और किताबें लेकर निकले और सीधे पार्टी दफ्तर पहुँच गए।

दरअसल मानिक सरकार के पास रहने के लिए अपना कोई घर नहीं है। 2018 में चुनाव के वक्त दिए गए उनके हलफनामे के अनुसार जब उनकी आर्थिक स्थिति को सार्वजनिक किया गया तो पता चला कि उनके पास सिर्फ 1520 रूपए नकदी हैं। 20 जनवरी को उनका बैंक बैलेंस 2410.16 रूपए था। उस समय वे देश के सबसे ज्यादा लम्बे समय से मुख्यमंत्री थे। माऩिक सरकार मुख्यमंत्री के नाते मिलने वाला अपना पूरा वेतन 26315 रूपए पार्टी फंड के लिए दान कर देते थे। बदले में पार्टी से उन्हें 9700 रूपए गुजारा भत्ता के रूप में मिलता था, जिससे वे अपना गुजर बसर करते थे। उन्होंने उस समय तक कभी आयकर रिटर्न तक नहीं भरा था। वे वर्षों से देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री बने हुए थे।

मानिक सरकार ने अपने हलफनामे में पैतृक संपत्ति के तौर पर अगरतला में 0.0118 एकड़ गैर कृषि भूमि का हवाला दिया था, जिसपर उनके साथ भाई-बहन का भी साझा मालिकाना हक था। उस समय तक मानिक सरकार के पास सिर्फ यही अचल संपत्ति थी। उदयपुर, जिसे त्रिपुरा की झीलों वाली नगरी कहा जाता है, में उनका अपना एक पुस्तैनी मकान था जिसे उन्होंने पार्टी फंड में पहले ही दान दे दिया था।

चौंकाने वाली बात यह थी कि पाँच बार से मुख्यमंत्री बनते आ रहे मानिक सरकार के पास अपना मोबाइल फोन तक नहीं था। उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार उनकी पत्नी पंचाली भट्टाचार्य के पास बीस हजार एक सौ इकतालीस रूपए नकद थे और उनके बैंक खाते में बारह लाख पंद्रह हजार सात सौ चौदह रूपए थे। उल्लेखनीय है कि पंचाली भट्टाचार्य केन्द्रीय सरकार की सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। जब पत्रकारों ने मानिक सरकार से पूछा कि उनका खर्च कैसे चलेगा तो उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी को मिलने वाला पेंशन उन दोनों के खर्च के लिए पर्याप्त है। अमूमन सफेद कुर्ता-पैजामा पहनने वाले मानिक सरकार और उनकी पत्नी सादा जीवन-उच्च विचार की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं।

मानिक सरकार सब्जी खरीदने अक्सर पैदल चले जाते हैं। उनकी पत्नी रिक्शे से जाती है। मानिक सरकार के पास अपनी कोई कार नहीं है। ऑफिस जाने के लिए तो सरकारी कार आ जाती थी किन्तु निजी कार्यों के लिए उन्हें बस या आटो रिक्शे से जाने में कोई झिझक नहीं होती थी। उनकी पत्नी तो अमूमन सार्वजनिक परिवहन का ही इस्तेमाल करती थीं और अपने लिए कोई सुरक्षा की सुविधा नही लेती थीं। उन्होंने अपने पति को मिलने वाले सरकारी वाहन का स्तेमाल कभी नहीं किया। यह भी उल्लेखनीय है कि मानिक सरकार के लम्बे कार्यकाल में उनके ऊपर भ्रष्टाचार के एक भी आरोप नहीं लगे। उनकी पार्टी जब चुनाव हार गई और भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में विप्लव देव के नाम की घोषणा हुई तो विधायक दल की बैठक के अगले दिन विप्लव देव सीपीएम के दफ्तर गए और मानिक सरकार का पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया।

मानिक सरकार का जन्म 22 जनवरी 1948 को त्रिपुरा के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता, अमूल्य सरकार, एक दर्जी के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी माँ, अंजलि सरकार, पहले राज्य और बाद में केंद्र सरकार में कर्मचारी थीं।

मानिक सरकार को अपने विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में गहरी रुचि थी और छात्र- आन्दोलनों में बढ़- चढ़ कर हिस्सा लेते थे।  वे महाराजा वीर विक्रम कॉलेज, अगरतला में अपने शैक्षणिक जीवन के दौरान छात्र संघ के उम्मीदवार थे, जहाँ से उन्होंने बी.कॉम.की डिग्री हासिल की। कॉलेज में 1967 में त्रिपुरा की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नीति के खिलाफ भोजन आन्दोलन हुआ था। उस वर्ष मानिक सरकार बी.कॉम. प्रथम वर्ष के छात्र थे किन्तु इस जन आन्दोलन में उनकी जोरदार और नेतृत्वकारी भूमिका थी। इसी दौरान मार्क्सवाद के प्रति उनका लगाव भी बढ़ा। 1968 में, जब वे मात्र 19 वर्ष के थे तभी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य बन गए। अपने शुरुआती राजनीतिक प्रदर्शन के कारण वे एमबीबी कॉलेज के छात्र संघ के महासचिव भी बने थे और उसके बाद उन्हें एस.एफ.आई. का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बना दिया गया था। 1972 में, मात्र 23 वर्ष की उम्र में, उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी) की राज्य समिति में शामिल कर लिया गया।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की राज्य समिति में चुने जाने के छह साल बाद, अर्थात 1978 में मानिक सरकार को पार्टी के राज्य सचिवालय में शामिल किया गया। यही वह वर्ष भी था, जब त्रिपुरा में पहली वामपंथी सरकार ने सत्ता संभाला। 1980 में, 31 साल की उम्र में, उन्हें अगरतला निर्वाचन क्षेत्र से विधान सभा के सदस्य के रूप में चुना गया। यह त्रिपुरा में मानिक सरकार के नेतृत्व की शुरुआत थी। लगभग उसी समय, उन्हें सीपीआई (एम) के मुख्य सचेतक के रूप में नियुक्त किया गया था। 1983 में वे कृष्णानगर (अगरतला) से विधानसभा के सदस्य के रूप में पहली बार चुने गए। 1993 में जब वाम मोर्चा सरकार ने सत्ता संभाला तो मानिक सरकार को माकपा के पोलित ब्यूरो ने राज्य सचिव नियुक्त किया।

1998 में मानिक सरकार को सबसे बड़ी सफलता मिली जबवे माकपा के पोलित ब्यूरो के सदस्य बन गए, जो कम्युनिस्ट पार्टी में प्रमुख नीति-निर्माण और कार्यकारिणी समिति है। उसी वर्ष वे त्रिपुरा राज्य के मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र 49 वर्ष थी। तब से लेकर वे अगले 20 वर्ष तक लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री चुने गए। वे भारत के उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में एक हैं जो इतने लम्बे समय तक इस पद पर रह चुके हैं। उनकी पार्टी ने 2018 के चुनावों में बहुमत खो दिया और परिणामस्वरूप उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

      मानिक सरकार की शादी पंचाली भट्टाचार्य से हुई है जो केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड में कार्यरत थीं और 2011 में सेवानिवृत्त हुईं। दोनो का सादा जीवन समाज के लिए एक मिशाल है। इस समय वे माकपा के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं और त्रिपुरा विधान सभा में विपक्ष के नेता हैं।

      त्रिपुरा की उनकी सरकार जनता की सरकार कही जाती थी और उन्हें हार जाने की उम्मीद नहीं थी। किन्तु चुनाव के पूर्व उन्हें संदेह हो गया था कि उनकी पार्टी पराजित हो सकती है। इसके कारणों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने 2 फरवरी 2018 को कहा था कि, “भाजपा और इंडीजेनस (पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन एक ‘अपवित्र गठबंधन’ है जो इस पूर्वोत्तर राज्य में वाम मोर्चे से सत्ता हड़पने की साजिश कर रहा है।” इस तरह उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सत्ता के लिए “भाजपा अलगाववादी तत्वों से हाथ मिला रही है और धार्मिक एवं जातीय आधार पर राज्य के लोगों को बाँटने की कोशिश कर रही है।”

जीत के बाद भाजपा के नए मुख्यमंत्री विप्लव देव ने कहा कि “मैं इसे लोगों का बदलाव के लिए फैसला कहूँगा।” उन्होंने कहा कि “हमें जिन मुद्दों ने क्लिक किया उसमे शामिल है सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना और नौकरियाँ पैदा करना।”

इस प्रकरण पर विचार करते हुए प्रख्यात पत्रकार सुनील शर्मा ने लिखा है कि, “त्रिपुरा में मानिक सरकार की पराजय के कारणों का विश्लेषण करते हुए त्रिपुरा में पुलिस महानिदेशक रह चुके बी.एल.बोहरा ने अपनी पुस्तक ‘त्रिपुराज ब्रेवहाट्स’ में लिखा है, “मानिक सरकार वाकई अन्य सभी मुख्यमंत्रियों से अलग रहे हैं, जिनसे मैं मिला या जिनके साथ काम किया है या उनके बारे में जो सुना है, वह शानदार है और सरकार के हर वर्ग को इसकी जानकारी रही है। अफसोस है कि देश में ऐसे मुख्यमंत्री कम ही देखने को मिलते हैं।” दरअसल, त्रिपुरा के मतदाताओं ने मूर्तियाँ गिराने वाली भीड़ के साथ मानिक सरकार की शालीनता का सौदा कर लिया।

मानिक सरकार

मानिक ऐसे राजनेता हैं जिनकी प्रशंसा विपक्ष भी करता है। वे स्वयं तो सज्जन हैं ही, साथ ही उन्होंने अपने कैबिनेट के सदस्यों व प्रशासनिक अमले में भी इसी तरह के मूल्यों को समाहित करने की कोशिश की है। उनके पूर्ववर्ती व गुरु नृपेन चक्रवर्ती हर मायने में उनसे भी सराहनीय थे। मुख्यमंत्री आवास पर तैनात स्टाफ ने कभी नहीं सोचा होगा कि मुख्यमंत्री के घर का सामान राशन कार्ड से खरीदा जाएगा और उनकी इतनी भी बचत नहीं होगी कि बैंक में एक खाता भी खोल सकें। भौतिकवादी जगत में भले ही यह बात गले ना उतरे लेकिन सच यही है कि अनैतिकता के इस जमाने में चक्रवर्ती–मानिक की जोड़ी अपवाद कही जा सकती है।

आर्थिक संकट के बावजूद अगरतला में राज्य सरकार ने केन्द्र की हर योजना को किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले बड़ी कुशलता से लागू किया था। त्रिपुरा में 96 प्रतिशत साक्षरता है। लिंगानुपात भी रिकॉर्ड है।……किन्तु सरकार अर्थ-व्यवस्था को उस मुकाम तक नहीं ला पाई कि शिक्षित बेरोजगारों को जीविका दिला सके या दुपहिया वाहन वाले चौपहिया खरीद सकें।

अगरतला पहुँचने पर मुझे सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरना पड़ा। जब मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री से पूछा कि राज्य में सस्ते होटल ना होना क्या सरकारी नीति है? तो उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा कि पाँच सितारा होटलों, बार व रेस्तराँ खुलने से सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वे इस असंतुलन को लेकर नहीं चल सकते।

सुनने में भले ही अटपटा लगे लेकिन त्रिपुरा में सीपीएम की हार के कारण कुछ-कुछ वैसे ही हैं जो वेस्ट इंडीज, क्रिकेट के पतन के लिए जिम्मेदार है। विश्व क्रिकेट में अब वीक्स, साबर्स, विव रिचर्ड्स और ब्रायन लारा जैसे क्रिकेटरों का जलवा कभी देखने को नहीं मिलेगा।

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से विरासत के तौर पर वहाँ क्रिकेट संस्कृति पनपी। नब्बे के दशक के उदारीकरण के दौर ने वेस्ट इंडीज को अमरीकी मीडिया के नक्शे पर ला खड़ा किया। अमरीकी टेलीविजन ने वेस्ट इंडीज के क्रिकेटरों की बजाय अभियान चलाकर बॉस्केट बॉल और बेस बॉल के स्टार खिलाड़ियों–माइकल जॉर्डन और जोस रमिरेज पर फोकस किया। फिर क्रिकेटर पिछली पीढ़ी की पसंद बन कर रह गए। त्रिपुरा की माकपा सरकार की तुलना वेस्ट इंडीज क्रिकेट से की जा सकती है क्योंकि वेस्ट इंडीज भी क्रिकेट की जन्म भूमि से उतना ही दूर है, जितना त्रिपुरा की जनता किसी माकपा शासित राज्य से। पश्चिम बंगाल में माकपा शासन के अंत के बाद इसने कोई सबक नहीं लिया।

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संवेदनहीन युग में व्यापारियों, बिल्डरों द्वारा प्रायोजित उपभोक्तावाद के चलते आर्थिक उदारवाद के रथ पर सवार, बाजार की चाल बिगड़ गई। माकपा से जो लोग सहानुभूति रखते थे उन्होने आँखें फेर लीं, कुछ अवसर की तलाश में थे। उन्हें माकपा कार्यालयों पर हमला करने और लेनिन की मूर्ति गिराने वालों के साथ भी देखा गया। दरअसल त्रिपुरा और पूर्वोत्तर में जहाँ भी भाजपा की जीत हुई है, वह कांग्रेस ने ही भाजपा की झोली में डाली है।

यह कहा जाता है कि पैसा और ताकत वाली सोच ही नीरव मोदी जैसे लोगों को बढ़ावा देती है। शायद उसी तर्ज पर केन्द्र सरकार की नीति ने त्रिपुरा सरकार को उखाड़ फेंकने में कोई कसर नही छोड़ी।

त्रिपुरा में वाम मोर्चे के शासन की शानदार उपलब्धियाँ गिनायी जाती हैं। जब राज्य द्वारा हिंसा और अलगाववादी विद्रोह के कारण पूर्वोत्तर को ख़त्म किया जा रहा था, तो त्रिपुरा में वामपंथी सरकार ने सैन्य सुरक्षा के साथ -साथ मानव सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। लोकप्रिय ऊर्जा और सामाजिक संपत्ति का बड़ा निवेश तेजी से साक्षरता दर बढ़ाने तथा खराब स्वास्थ्य और बुढ़ापे की कमजोरियों को कम करने के लिए लगाया। राज्य में सामाजिक प्रगति का बारीकी से अध्ययन करने वाले वी.के. रामचंद्रन और मधुरा स्वामीनाथन बताते हैं, कि गाँवों की स्कूली शिक्षा में प्रगति देखी जाए तो पायेंगे कि 18 से 45 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में पूर्ण स्कूली शिक्षा मिलती है। शिशु मृत्यु दर रिकार्ड दर से घटी। यहाँ कोई भी भ्रष्टाचार नहीं हुआ। किसी भी प्रकार के घोटाले का सरकार को सामना नहीं करना पड़ा। त्रिपुरा ने भारत के अधिकांश राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया। वाम मोर्चे की सरकार के आने से पहले त्रिपुरा की जनता विभिन्न चरमपंथी हिंसक गुटों के आतंक में कराह रही थी। मानिक सरकार के नेतृत्व में वाम मोर्चे के शासन के दौरान त्रिपुरा, दक्षिण-पूर्व का सबसे शान्त राज्य बन गया।

तो सवाल उठता है कि फिर वाममोर्चा हार क्यों गया? यहाँ उल्लेख करना जरूरी है कि चुनाव आयोग के ही आंकड़ों के अनुसार वाम ने कुल वोट का 43% हिस्सा प्राप्त किया। यह करीब-करीब भाजपा द्वारा हासिल मतों के बराबर ही है। इसका मतलब यह है कि मतदान के जरिए जनता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी वामपंथियों से उम्मीदें रखता था। 2013 में, वाम ने 48 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि इसके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 36.5 प्रतिशत और 2008 में, वाम ने 48 प्रतिशत वोट हासिल किए जबकि कांग्रेस को 36 प्रतिशत वोट मिले। इस बार, दो मुख्य दलों ने वोट के लगभग बराबर प्रतिशत जीते।

यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि यह कांग्रेस पार्टी की पूर्ण समाप्ति ज्यादा है बजाय इसे भाजपा की जीत के रूप में देखना। भाजपा ने यहाँ अपनी विलय और अधिग्रहण रणनीति के साथ कॉरपोरेट की तरह काम किया। उसने कांग्रेस नेताओं को आकर्षित करने के लिए अपनी विशाल धन शक्ति का इस्तेमाल किया और त्रिपुरा के राजनीतिक विपक्ष को अपने साथ मिला लेने में सफल हो गया। इसके साथ ही उसने अपने वित्तीय और संगठनात्मक संसाधनों के साथ वामपंथ पर हमला बोल दिया। वामपंथ के पास न तो इतना पैसा था कि जिससे वह भाजपा का मुकाबला कर सके और न पैसे के बल पर चुनाव लड़ने का अनुभव ही था।

इसके अलावा भाजपा ने अलग राज्य त्रिपुरालैंड की माँग करने वाले एक अलगाववादी समूह पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आई.पी.एफ़.टी.) के साथ अपवित्र गठबंधन भी कर लिया। सशस्त्र चरमपंथी समूहों जैसे नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और त्रिपुरा नेशनल वॉलंटियर्स ने आईपीएफटी का समर्थन किया। आईपीएफटी में विलय करने वाले त्रिपुरा नेशनल वालंटियर, राज्य से बंगाली राष्ट्रीयता वाले लोगों के निष्कासन के लिए संघर्षरत है। कांग्रेस ने भी पहले आईपीएफटी के साथ तालमेल किया था, जिसने इस संकीर्ण जातीयवादी पार्टी का हौसला बढ़ा दिया था। कांग्रेस ने वामपंथ को हराने के लिए ऐसा किया था लेकिन वह सफल नहीं हो सका। बाद में वही काम भाजपा ने किया।

मानिक सरकार पार्टी के होलटाइमर हैं। वे इस समय विपक्ष के नेता का दायित्व निभा रहे हैं। उनकी ‘अतीत दिनेर स्मृति’ शीर्षक बांग्ला में आत्मकथा प्रकाशित है जिसमें उनके जीवन की संघर्षगाथा तो है ही, 1971 में बंगलादेश के मुक्ति संघर्ष में उनके द्वारा किए गए योगदान का भी लेखा जोखा है।

वामपंथियों का उद्देश्य दुनिया से पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यावस्था का अंत करके उसकी जगह समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करना है। ऐसी दशा में सोवियत संघ के विघटन के बाद, वैश्वीकरण के दौर में साम्राज्यवादियों ने अपने एक मात्र शत्रु वामपंथियों को हर तरह से बदनाम करने, उसे नेस्तनाबूद करने का बीणा उठाया है और इसमें उसे भरपूर सफलता मिली है। भारत के वामपंथी भी उनके शत्रुओं की सूची में पहले स्थान पर हैं। जो लोग आज वामपंथियों को गालियाँ देने में तनिक भी नहीं हिचकते उन्हें या तो वामपंथ की गहरी समझ नहीं है या वामपंथ पर उनके प्रहार प्रायोजित होते हैं। भारत एक धर्मप्राण देश है। यहाँ धर्म को ‘अफीम’ की तरह इस्तेमाल कराने में साम्राज्यवादियों को आसानी से सफलता मिल जाती है, जबकि किसी को वामपंथी बनने में बहुत आत्मसंघर्ष करना पड़ता है। सच्चे वामपंथी कैसे होते हैं इसका एक उदाहरण मानिक सरकार की यह जीवनी भी है।

 हमें गर्व है कि हमारे बीच मानिक सरकार जैसे सच्चे कम्युनिस्ट नेता मौजूद हैं जिन्हें कम्युनिस्ट नैतिकता के एक दृष्टांत के रूप में पेश किया जा सकता है। हम कामरेड मानिक सरकार को जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य व सतत सक्रियता की कामना करते हैं

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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