कैलाश सत्यार्थी
शख्सियत

बचपन बचाने की जिद में जीवन : कैलाश सत्यार्थी

आजाद भारत के असली सितारे-46

इस दुनिया में लाखों क्या करोड़ों ऐसे बच्चे हैं जिनका बचपन हमारा समाज छीन लेता है। उनका बचपन मशीनों पर खटते हुए, दूसरों की गुलामी करते हुए और तरह-तरह की हिंसा का शिकार होते हुए बीत जाता है। वे न केवल हँसते-खेलते बचपन से दूर रहते हैं, बल्कि किताबों की रंग-बिरंगी दुनिया से भी वे अपरिचित ही रह जाते हैं।

कैलाश सत्यार्थी (जन्म-11.1.1954) एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जिसने दुनिया भर के दबे-कुचले ऐसे ही बच्चों का बचपन उन्हें वापस करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। उन्होंने 1980 में बचपन बचाओ आन्दोलन’ की स्थापना की। बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए और उनका नेतृत्व किया। दुनियाभर के वंचित, ग़रीब और हाशिए के बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और आजादी के लिए उन्होंने दुनिया भर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व नेताओं को एकजुट करके लॉरिएट्स एंडलीडर्स फॉर चिल्ड्रेन’ की स्थापना की।

उन्होंने पूरी दुनिया में बच्चों के प्रति हिंसा को ख़त्म करने के उद्देश्य से 100 मिलियन फॉर 100 मिलियन’ नामक एक विश्वव्यापी आन्दोलन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य है दुनिया भर के 100 मिलियन दबे-कुचले बच्चों को बालश्रम, गुलामी और हिंसा से मुक्त करने के लिए 100 मिलियन युवाओं को तैयार करना। उन्होंने वर्ष 2004 में ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन’ का गठन किया और उसके माध्यम से बच्चों के अधिकारों की वकालत की। अपने इस संगठन की ओर वर्ष 2017 में उन्होंने 35 दिन की ऐतिहासिक ‘भारत यात्रा’ का आयोजन किया।

बाल-यौन-शोषण और बाल-ट्रैफिकिंग के ख़िलाफ कन्याकुमारी से 11 सितंबर 2017 को आरम्भ होने वाली यह यात्रा भारत के 22 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से होती हुई 12000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। इसमें लगभग 5000 नागरिक संगठनों और 25000 शैक्षणिक संस्थाओं सहित देश के बड़ी संख्या में प्रतिष्ठित नागरिकों ने हिस्सा लिया था। 2018 में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग बिल जो पास हुआ उसमें इस यात्रा की भी भूमिका है।

इसी तरह उन्होंने 1998 में 103 देशों की 80 हजार किलोमीटर की यात्रा की थी जिसमें 140 देशों के सदस्य शामिल थे। इसके परिणामस्वरूप 1999 में होने वाले आईएलओ (इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन) कन्वेंसन नं. 182 वजूद में आया जो बाल-श्रम की समस्या (वर्स्ट फार्म्स ऑफ चाइल्ड लेबर) पर केन्द्रित था।

कैलाश सत्यार्थी ने ‘गुडवीभ इंटरनेशनल’ (इसे पहले ‘रगमार्क’ (Rugmark) कहा जाता था) की शुरुआत की, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि तैयार कारपेट (कालीनों) तथा अन्य कपड़ों के निर्माण में बच्चों से काम नहीं लिया गया है। दरअसल कारपेट की बुनाई में बच्चों से ही अधिक काम लिया जाता रहा है। कैलाश सत्यार्थी की इस पहल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल-अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने में काफ़ी सफलता मिली। वे आगाह करते हैं कि अगर आप इन परिस्थितियों में गुलाम बच्चों द्वारा बनायीं गयी चीजें खरीदते रहेंगे तो आप गुलामी के स्थायीकरण के लिए बराबर के जिम्मेदार होंगे।

कैलाश सत्यार्थी ने बाल-श्रम को मानवाधिकार का मुद्दा बनाया और इसे सर्वशिक्षा अभियान से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वे ‘ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजूकेशन’, ‘सेन्टर फॉर विक्टम्स ऑफ टार्चर (यूएसए)’, ‘इंटरनेशनल लेबर राइट्स फंड (यूएसए)’ आदि अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बाल-तस्करी एवं बाल-मज़दूरी के ख़िलाफ़ कड़े कानून बनाने की वकालत की है, हालांकि उन्हें अभी तक इस क्षेत्र में आँशिक सफलता ही मिली है।

बचपन हिंसा, अत्याचार और त्रासदी से मुक्त होना चाहिए, इसके लिए उन्होंने ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन की स्थापना की है। साथ ही बाल-मित्र समाज बनाने के लिए उन्होंने ग्राणीण इलाके में बाल-मित्र ग्राम’ और शहरी स्लम इलाके में ‘बाल-मित्र मंडल’ के निर्माण का अनोखा प्रयास किया है। कोविड-19 की महामारी से उबरने के लिए अमीर देशों ने जो अनुदान दिया है, उसका उचित हिस्सा (जनसंख्या अनुपात के हिसाब से 20 फ़ीसदी) वंचित और हाशिए के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा आदि पर खर्च करने के लिए वे फेयर शेयर फॉर चिल्ड्रेन’ नाम से विश्वव्यापी अभियान भी चला रहे हैं। वे अबतक दुनिया भर के लगभग डेढ़ सौ देशों के लाखों बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिये काम कर चुके हैं।

मध्य प्रदेश के विदिशा में एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए कैलाश सत्यार्थी के बचपन का नाम कैलाश शर्मा था। उनके पिता रामप्रसाद शर्मा पुलिस में हेड कांस्टेबिल थे और उनकी माँ चिरौंजी देवी एक अशिक्षित किन्तु उच्चादर्शों वाली गृहिणी थीं। कैलाश अपने चार भाई और एक बहन में सबसे छोटे हैं। अपनी माँ की परोपकार की भावना और उनके आदर्श विचारों का कैलाश पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके मुहल्ले में हिन्दू और मुसलमान दोनो ही बड़ी संख्या में साथ-साथ मिलजुलकर रहते थे।

बचपन में पड़ोस की मस्जिद के एक मौलवी से उन्होंने उर्दू की शिक्षा ग्रहण की और सरकारी स्कूल से हिन्दी और अंग्रेजी की। गवर्नमेंट ब्वायज हायर सेकेंडरी स्कूल विदिशा से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। बचपन से ही उन्होंने देखा कि गरीबी तथा अन्य दूसरे कारणों से बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। ऐसे गरीब बच्चों की सहायता के लिए उन्होंने अपने विद्यालय में ही फुटबाल मैच का आयोजन किया था और उनकी पुस्तकीय सहायता के लिए टेक्स्ट बुक बैंक भी बनाया था।

स्कूली शिक्षा के बाद बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से संबद्ध सम्राट अशोक टेक्नॉलॉजिकल इंस्टीट्यूट, विदिशा से उन्होंने 1974 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री और फिर हाई-वोल्टेज इंजीनियरिंग में पीजी किया। जीविका के लिए उन्होंने एक कॉलेज में दो वर्ष तक अध्यापन भी किया। किन्तु उनका मन अधिक दिन तक वहाँ नहीं टिका। समाज सेवा उनके रग-रग में बसा हुआ था। 1977 में वे दिल्ली आ गए और आर्य समाज से संबंधित साहित्य के एक प्रकाशन में काम करने लगे।

इन्हीं दिनों उन्होंने अपने नाम के साथ जुड़ा ‘शर्मा’ सरनेम हटाकर ‘सत्यार्थी’ लगा लिया जो स्वामी दयानंद सरस्वती की मशहूर कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के पूर्वार्ध का किंचित परिवर्तित रूप है। इसका अर्थ होता है ‘सत्य का आकाँक्षी’। इसके पीछे उनका उद्देश्य अपने नाम के साथ जुड़े हुए जातिबोधक शब्द से मुक्ति भी था।

उन्होंने ‘संघर्ष जारी रहेगा’ नाम से एक पत्रिका का भी प्रकाशन शुरू किया जिसमें दबे-कुचले लोगों की समस्याओं को खास तौर पर वाणी दी जाती थी। इसमें उन्होंने ऐसे बँधुआ बच्चों की समस्याओं को खास तौर पर उजागर किया जो अपने माता-पिता के कर्ज की भरपाई के एवज में कर्जदाताओं के यहाँ बंधक रहते थे। कैलाश सत्यार्थी इन दिनों प्रख्यात आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश के संरक्षण में काम करने लगे। बाद में कुछ मुद्दों पर उनसे असहमति के कारण वे अलग हो गए और 1980 में ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ का गठन किया। उस समय उनकी उम्र 26 वर्ष थी। इसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन बच्चों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।

‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ बच्चों के शोषण के खिलाफ भारत का पहला विश्वव्यापी संगठन है। इसका काम दुनिया भर के बँधुआ मजदूरी और तस्करी की चक्की में पिस रहे बच्चों को मुक्त कराना, उनका बचपन वापस करना और उन्हें स्कूल भेजना है। इस संस्था के माध्यम से कैलाश सत्यार्थी ने अब तक एक लाख से अधिक बच्चों की जिंदगी बचाई है।

‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ द्वारा सामान्य तरीकों से भी बच्चों को मुक्त कराया जाता है और आवश्यक होने पर कानूनी प्रक्रिया का भी सहारा लिया जाता है। मुक्त हुए बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था तथा दोषियों को सजा दिलाने का काम भी संस्था करती है। जिन बच्चों के माता-पिता नहीं होते उन्हें इस संस्था द्वारा चलाए जाने वाले आश्रम में भेज दिया जाता है। कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि किसी भी देश में बाल-मज़दूरी के प्रमुख कारण हैं-गरीबी, अशिक्षा, सरकारी उदासीनता और क्षेत्रीय असंतुलन।

आरम्भ में अपने अभियान के दौरान उन्हें तरह-तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। फैक्टरियों में छापेमारी के दौरान फैक्टरी मालिकों ने उनका कड़ा विरोध किया था और कई बार पुलिस ने भी उनका साथ नहीं दिया। संगठन की वेबसाइट के अनुसार बाल-श्रमिकों को छुड़ाने के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमले भी हुए हैं। 17 मार्च 2011 को दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान उन पर हमला किया गया। इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान उन पर हमला हुआ था। इसके बावजूद उन्होंने गैर-सरकारी संगठनों तथा कार्यकर्ताओं की सहायता से सैकड़ों ऐसी फैक्ट्रियों तथा गोदामों पर छापे डलवाए, जिनमें बच्चों से काम करवाया जाता था।

धीरे-धीरे उनके काम के महत्व को वैश्विक स्वीकृति मिलने लगी। उन्होंने बच्चों के लिए आवश्यक शिक्षा को लेकर शिक्षा के अधिकार का आन्दोलन चलाया। उनकी संस्था की एक प्रमुख पहल ‘बाल-मित्र ग्राम’ कार्यक्रम है। दरअसल कैलाश सत्यार्थी को इस क्षेत्र में काम करने के दौरान पता चला कि बाल मजदूरी और शोषण के लगभग 70 फीसदी मामले गाँवों में होते हैं। इसलिए उन्होंने बच्चों को मुक्त कराए जाने के बाद प्रशासन द्वारा उन्हें उचित शिक्षा मुहैया कराने की व्यवस्था पर जोर देना शुरू किया।

‘बाल-मित्र ग्राम’ वह मॉडल गाँव है जो बाल-शोषण से पूरी तरह मुक्त है। यहाँ बाल-अधिकार को तरजीह दी जाती है। 2001 में इस मॉडल को अपनाए जाने के बाद से देश के अधिकांश राज्यों के सैकड़ों गाँव अब तक ‘बाल-मित्र ग्राम’ घोषित किए जा चुके हैं। ऐसे गाँवों के सभी बच्चे स्कूल जाते हैं, वे बाल-पंचायत, युवा-मंडल और महिला-मंडल में शामिल होते हैं तथा समय-समय पर ग्राम-पंचायतों में बाल-समस्याओं को लेकर बातें होती हैं। बाल-मित्र ग्राम में 14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त, व्यापक और स्तरीय शिक्षा दी जाती है, साथ ही इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि लड़कियाँ स्कूल न छोड़ें। इसीलिए स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है।

कैलाश सत्यार्थी के अनुसार बाल-मज़दूरी महज एक बीमारी नहीं है, बल्कि कई बीमारियों की जड़ है। इसके कारण कई जिंदगियाँ तबाह होती हैं। उनका उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना है जहाँ बच्चे खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें। साथ ही बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और समाज में उनकी भागीदारी बढ़े। ताकि वे एक बेहतर भविष्य के निर्माण के सहभागी हों।

कैलाश सत्यार्थी को पाकिस्तान की नारी-शिक्षा कार्यकर्ता मलाला युसुफजई के साथ सम्मिलित रूप से 2014 का नोबेल शान्ति पुरस्कार से नवाजा गया है।

‘आजतक’, (नई दिल्ली) में 10 अक्टूबर 2014 को छपी रपट के अनुसार नोबेल कमेटी ने अपने बयान में कहा, ‘’साल 2014 का शांति के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को बच्चों एवं युवाओं के दमन के खिलाफ और बच्चों की शिक्षा की दिशा में काम करने के लिए दिया गया है।’’

कैलाश सत्यार्थी ने नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, ‘‘मैं काफी खुश हूँ। यह बाल-अधिकारों के लिए हमारी लड़ाई को मान्यता है। मैं इस आधुनिक युग में पीड़ा से गुजर रहे लाखों बच्चों की दुर्दशा पर काम को मान्यता देने के लिए नोबेल समिति का शुक्रगुजार हूँ।”

कैलाश सत्यार्थी के अनुसार भारत को बच्चों के शोषण के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करने की जरूरत है। यदि ऐसे कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में भारत में बाल मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा होगी। उल्लेखनीय है कि पिछली 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 वर्ष की उम्र वाले बच्चों की आबादी लगभग 25 करोड़ 96 लाख हैं, जिसमें बाल-श्रमिकों की संख्या करीब 1 करोड़ 1 लाख हैं।

कैलाश सत्यार्थी

कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि,“हम भाग्यशाली हैं कि हमने अपना बचपन जिया है पर दुनिया भर में ऐसे करोड़ों बच्चे हैं जो कहने के लिए तो बच्चे होते हैं लेकिन वे कभी अपना बचपन देख ही नहीं पाते।” उन्होंने कहा कि, “मैं ऐसी दुनिया का ख्वाब देखता हूँ जहाँ बाल-श्रम न हो, एक ऐसी दुनिया जिसमें हर बच्चा स्कूल जाता हो, एक दुनिया जहाँ हर बच्चे को उसका अधिकार मिले।” उनके अनुसार आर्थिक-विकास और मानव-विकास साथ-साथ होना चाहिए।

वे कहते हैं कि बाल-श्रम गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि और अन्य सामाजिक समस्याओं को बढाता है। बचपन छीन लेना और स्वतंत्रता न देना सबसे बड़े पाप हैं जो मनुष्य सदियों से करता आ रहा है। गरीबी, बाल-श्रम और अशिक्षा के बीच एक त्रिकोणीय संबंध है जिनमें कारण और परिणाम का नाता है। हमें इस दुष्चक्र को तोडना होगा। वे कहते हैं कि, “मैं ये मानने से इनकार करता हूँ कि दुनिया इतनी गरीब है, जबकि सेनाओं पर होने वाला सिर्फ एक हफ्ते का वैश्विक खर्च हमारे सभी बच्चों को क्लासरूम में ला सकता है।”

कैलाश सत्यार्थी सवाल करते हैं कि वे किसके बच्चे हैं जो फुटबाल सिलते हैं, फिर भी कभी फुटबाल से खेला नहीं? वे हमारे बच्चे हैं। वे किसके बच्चे हैं जो पत्थरों और खनिजों की खान में काम करते हैं? वे हमारे बच्चे हैं। वे किसके बच्चे हैं जो कोको की पैदावार करते हैं, फिर भी चॉकलेट का टेस्ट नहीं जानते? वे सभी हमारे बच्चे हैं। वे कहते हैं कि, “मैं ये मानने से इनकार करता हूँ कि गुलामी की बेड़ियाँ कभी भी आज़ादी की खोज से मजबूत हो सकती हैं।”

कैलाश सत्यार्थी घोषित करते हैं कि

मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हर बच्चा
एक बच्चा होने के लिए आज़ाद हो,
आगे बढ़ने और खुद का विकास करने के लिए आज़ाद हो,
खाने, सोने, और दिन के उजाले को देखने के लिए आज़ाद हो,
हँसने और रोने के लिए आज़ाद हो,
खेलने के लिए आज़ाद हो,
सीखने, स्कूल जाने और सबसे ऊँचा सपने देखने के लिए आज़ाद हो।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने मुख्यालय नागपुर में 93वाँ स्थापना दिवस व विजयादशमी समारोह मनाया था जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में कैलाश सत्यार्थी शामिल हुए थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा था कि,“पिछले सालों में ही दुनिया में बाल मजदूरों की संख्या 26 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह गई है। लेकिन मुझे अफसोस है कि आज भी भारत में हमारी बेटियों को जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदा-बेचा जा रहा है। मैंने ऐसी कई बेटियों को गुलामी से मुक्त कराया है, जो छूटने के बाद भी अपने माता-पिता के गले से लिपटकर रोने का साहस नहीं जुटा पाती हैं। उन्हें लगता है कि बलात्कार और यौन-शोषण से उनका शरीर और आत्मा मैले हो गए हैं।”

उन्होंने अपने भाषण में कहा कि संवेदनशीलता अथवा करुणा के बगैर किसी भी सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि करुणारहित राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज बिना आत्मा के शरीर की तरह होते हैं। (‘हिन्दुस्तान’, 18.10.2018 को प्रकाशित रपट से)

नोबेल पुरस्कार ग्रहण के अवसर पर भाषण देते हुए उन्होंने मलाला को अपनी बेटी बताया था। इसके अलावा, उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़ी कई कहानियाँ सुनाईं थीं। उन्होंने पहले हिंदी और बाद में अंग्रेजी में भाषण दिया था। भाषण के दौरान उनके भाषण के कुछ पन्ने गायब हो गए थे फिर भी उन्होंने यादगार व्याख्यान दिया था।

उक्त अवसर पर अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि, “मैं आज उन बच्चों का स्मरण करता हूँ, जिनकी मुक्ति की पहली मुस्कराहट में मैंने उनके चेहरे पर ईश्वर को मुस्कुराते देखा है। मैं यह नहीं मानता हूँ कि हमारे मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों और अन्य प्रार्थना-गृहों में हमारे बच्चों के सपनों के लिए जगह नहीं है… मैं नहीं मानता कि कानून, संविधान, जज और पुलिस हमारे बच्चों को सुरक्षित नहीं कर सकते… मैं नहीं मानता कि गुलामी की बेड़ियाँ आजादी की चाहत से ज्यादा मजबूत होती हैं… मुझे सिर्फ इतना पता है कि आज एक बहादुर पाकिस्तानी लड़की अपने पिता से मिली है और एक भारतीय पिता अपने पाकिस्तानी बेटी से मिला है।”

कैलाश सत्यार्थी एक प्रतिष्ठित लेखक हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘आजाद बचपन की ओर’, ‘बदलाव के बोल’, ‘विल फॉर चिल्ड्रेन’, ‘एवरी चाइल्ड मैटर्स’, ‘बिकाज वर्ड्स मैटर’, ‘कोविड-19 : सभ्यता का संकट और समाधान’ आदि प्रमुख हैं। उनकी कुछ कृतियों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है।

कैलाश सत्यार्थी कवि हैं। अपनी जन-जागरूकता यात्राओं के गीत भी वे ख़ुद ही लिखते हैं। उनके नये कविता संग्रह ‘चलो हवाओं का रुख मोड़ें’ के आवरण का लोकार्पण 23 दिसंबर 2020 को वाणी प्रकाशन ग्रुप द्वारा किया गया। इस अवसर पर अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा,”मैं साधारण जीवन जीता हूँ और साधारण कपड़े पहनता हूँ लेकिन घड़ी विदेशी कम्पनी की पहनता हूँ। मैं वैश्वीकरण के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन चाहता हूँ कि करुणा का वैश्वीकरण हो…। यदि हमारे भीतर क्षमा का भाव है, सत्य है और पारदर्शिता है तो इसका अर्थ यह है कि एक बालक अभी भी हमारे भीतर है और हम सौभाग्यशाली हैं।” (वाणी प्रकाशन द्वारा 23 दिसंबर 2020 को जारी प्रेस-विज्ञप्ति से।)

कैलाश सत्यार्थी

‘नोबेल शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी पहले ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने अपना नोबेल पुरस्कार राष्ट्र को समर्पित कर दिया है। उनका नोबेल पदक अब ऱाष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में आम लोगों के दर्शन के लिए रखा हुआ है।

 कैलाश सत्यार्थी के परिवार में उनकी पत्नी सुमेधा, पुत्र, पुत्रवधू तथा पुत्री हैं।

अशोक कुमार शर्मा और कृतिका भारद्वाज ने उनके जीवन और संघर्ष पर केन्द्रित ‘मासूमों का मसीहा : कैलाश सत्यार्थी’ शीर्षक से एक बेहतरीन पुस्तक लिखी है।

हम कैलाश सत्यार्थी को जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य व सतत सक्रियता की कामना करते हैं।

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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