सिनेमा

स्त्री अस्मिता से मुठभेड़ करती ‘कागज की चिंदियाँ’

 

निर्देशक – सतीश चित्रवंशी
कलाकार – उर्वशी, नयनीश मिश्रा, सफलता श्री वास्तव, विजय कुमार, वर्तिका चित्रवंशी आदि।
अपनी रेटिंग – 4.5 स्टार

साल 2015 में एक फ़िल्म आई ‘कागज की चिंदियाँ’ जो कई फ़िल्म फेस्टिवल्स मसलन दिल्ली इंटरनेशनल फ़िल्म  तथा कई अन्य राज्यों में भी दिखाई गयी। यह फ़िल्म मूल रूप से साल 1980 में कहानी के रुप में लिखी गयी थी और उसके बाद रेडियो पर भी उस समय आई थी। कहानी की विधा में लिखी गयी यह फ़िल्म नाटक का आभास भी कराती है। इसे देखते हुए ऐसे लगता है जैसे कोई नाटक देख रहे हों।

 फ़िल्म की कहानी है जाह्नवी नाम की लड़की की। जिसे अपने साथ पढ़ रहे लड़के विजय से प्यार है। लेकिन वह अपने दूर के मुंह बोले भाई से भी कुछ समय के लिए प्रेम करती है। और वह भाई अभिनव उसके प्यार को गम्भीर प्यार या कहें सीरियस तौर पर ले लेता है। दो साल के लिए वह बाहर चला जाता है उसके बाद जब जाह्नवी और अभिनव मिलते हैं तो वे इस बात पर बहस भी करते हैं। और  जाह्नवी उसे समझाती है कि वह उसका सिर्फ भाई ही हो सकता है। इसके बाद परिस्थिति बदलती है और जाह्नवी की शादी उसके असल प्रेमी यानी विजय से हो जाती है। विजय के बारे में उसे शादी के बाद पता चलता है कि वह स्त्री को मात्र भोग की वस्तु समझता है। जाह्नवी जब उससे शादी कर लेती है तो अभिनव कहता है कि वह गरीब है इसलिए जाह्नवी उसे छोड़कर विजय के रुपए, पैसे, दौलत-शोहरत को ही देख रही है। अब जब विजय का असली चेहरा जाह्नवी के सामने आता है तो उसे पछतावा भी होता है और वह एक बड़ा कदम उठाती है सब छोड़ कर स्कूल में पढ़ाने के लिए चली जाती है। फ़िल्म की कहानी यही है।

लेकिन फ़िल्म मुखर रूप से स्त्री मुक्ति, स्त्री सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को भी छूती नजर आती है। वर्तमान समय के स्त्री मुक्ति के प्रश्नों और उनपर सिनेमाई छूट लेकर भाषण पेलती फिल्मों और कहानियों से यह फ़िल्म कहीं ऊपर उठकर स्त्री की आवाज को मुखर करती है। फ़िल्म संवाद एवं स्क्रिप्ट के तौर पर काफी गम्भीर फ़िल्म है और काफी गम्भीर चर्चा भी करती दिखाई देती है।

सारी आधुनिकता और पढ़ाई, लिखाई के बावजूद औरत होने की कुछ निर्धारित मर्यादाएँ होती हैं। और ये मर्यादाएँ उसी समाज ने तय की हैं जिसमें हम-तुम, हमारे-तुम्हारे रिश्तेदार, दोस्त-यार सब रहते हैं। ये मर्यादाएँ और संस्कार किसी पोखर या तालाब का ठहरा हुआ पानी नहीं। ये तो समय और समाज के सापेक्ष चलने वाली बहती हुई खुली नदियाँ हैं। जिनका स्वरूप और जिनकी दिशा जरूरत के अनुसार बदली जा सकती हैं। मर्द और उसकी जात को समझने में हमेशा औरत ही तो भूल करती आई है। जबकि मर्द ने औरत को हमेशा उसकी ओकात के मुताबिक़ ही आकां है। है न!

आदमी को किसने हक दिया औरत का नियामक होने का। औरत हमेशा से मर्द की मर्यादा, समाज की मर्यादा और आदर्शों का मर्यादा में ही तो रही है। मर्द ने हमेशा से औरत को मां, बेटी, बहन के रिश्तों में बांधे रखा। और खुद को आजाद रखा। क्योंकि मर्द कमजोर है। औरत से कहीं ज्यादा कमजोर। क्योंकि वो प्रकृति से बुनियादी तौर पर बेईमान है और कमीना है। वो जन्म से ही औरत के इन रूपों माँ , बेटी, बहन, बीवी के आश्रित रहा है और इन्हीं रिश्तों में उसने अपनी सुरक्षा ढूंढी है। फिर भी अपनी खुदगर्जी के चलते उसने सबसे ज्यादा इन्हीं रिश्तों पर आंखें तरेरी हैं, जुल्म करता आया है।

फ़िल्म बताती है कि आज नहीं तो कल औरत को एक स्वतंत्र मजबूत सत्ता के रूप में स्वीकार करना ही होगा। जो पुरुष इस रूप को, सत्ता को आकार देने में उसका सहयोगी होगा वही और सिर्फ वही सहअस्तित्त्व का हकदार होगा। फ़िल्म के संवाद उत्कृष्ट कोटि के हैं और यही वजह है कि फ़िल्म नाटक के साथ-साथ महान नाटककार ‘मोहन राकेश’ के नाटक ‘आधे-अधूरे’ को स्वाभाविक रूप से स्मरण करा देती है। हालांकि दोनों की कथावस्तु में बहुत अंतर है बावजूद इसके किसी फिल्म की कहानी का इस तरह महान कृति को स्मरण करवा जाना उसकी बेहतरीन लेखन क्षमता का परिचायक होती है। इसके अलावा फिल्म के कुछ सीन 60-70 के दशक की फिल्मों को भी जेहन में उतार देती है।स्त्री अस्मिता से मुठभेड़ करती

फ़िल्म में उर्वशी ने जाह्नवी के किरदार के रूप में अपना बेहतरीन प्रदर्शन किया है और फ़िल्म पूरी तरह से उनकी होकर रह जाती है। अभिनव के किरदार में नयनीश ने भी प्रभावी काम किया है। साथी कलाकारों के रूप में सफलता श्री वास्तव, विजय कुमार, वर्तिका चित्रवंशी आदि सभी अपने किरदारों के साथ न्याय करते नजर आते हैं। धीरेंद्र नाथ श्री वास्तव की कास्टिंग भी फ़िल्म के अनुसार बेहतर रही। इस फ़िल्म की खासियत यही है कि यह छोटे कलाकारों के द्वारा भी अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन करती है। फ़िल्म में कभी मेकअप के मामले में मैंने जिक्र नहीं किया लेकिन इस फ़िल्म में इस पहलू पर बात करूं तो मेकअप कुछ कुछ जगह ओवर हो जाता है।

फ़िल्म के गीतकार अमित केसरवानी, कामेश शुक्ल के लिखे लिरिक्स असर छोड़ते हैं। हालांकि वे याद रखने योग्य नहीं हैं और न ही उन्हें सम्भवतः गुनगुनाया जा सकता है। लेकिन फ़िल्म में वे प्रभाव अवश्य छोड़ते हैं। फ़िल्म के अनुरूप ही लिरिक्स लिखे गए हैं इसलिए वे प्रभावी बन पड़े हैं। वरुण मिश्रा, माला अग्रवाल, सुजाता सिंह की आवाज इन गीतों को प्रभावी बनाती हैं। संतोष कुमार सिंह का कैमरा एँगल सधा हुआ है लेकिन उसमें बावजूद इसके सुधार की काफी गुंजाइश नजर आती है। पुनीत श्री वास्तव का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर भी असर दिखाता है। प्रवीण कुमार, अखिलेश मिश्रा की एडिटिंग के लिए तारीफ की जानी चाहिए।

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तमाम तरह से मुक्कमल हुई यह फ़िल्म अपनी कहानी के लिए विशेष तौर पर दाद पाती है और साहित्यकार की दृष्टि इस फ़िल्म में नजर आती है पूर्णरूपेण। चूंकि इस फ़िल्म के निर्देशक स्वयं कला, साहित्य, फ़िल्म जगत से लम्बे अरसे से जुड़े हुए हैं तो उसका भी असर फ़िल्म पर पड़ता है। आम तौर पर किसी भी फ़िल्म की समीक्षा करते हुए बड़ी आसानी से उसके शीर्षक मैं बुन लिया करता हूँ लेकिन इस फ़िल्म का समीक्षा के लिए शीर्षक का चुनाव करना भी मेरे लिए बहुत कठिन रहा।

इस तरह की फिल्में सोच तो बदलती ही हैं साथ ही साथ वे मन के अंतर्द्वंद्वों से भी जूझती है आपको भी झिंझोड़ती हैं भीतर तक, स्त्री की सही मायने में वास्तविकता को जगजाहिर करती है। औऱ वर्तमान समय में चल रहे स्त्री मुक्ति के प्रश्नों की बाढ़ पर भी ताला लगाती है। ऐसी फिल्में हर व्यक्ति को देखनी चाहिए। आज से 5-6 साल पहले फ्लोर पर आई फ़िल्म को अभी तक कोई मुकम्मल स्क्रीन न मिल पाना सिनेमा दिखाने वालों पर रश्क पैदा करता है। उम्मीद करता हूँ जल्द से जल्द यह फ़िल्म अब कम से कम किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तो आए और एक अच्छी फ़िल्म जितने ज्यादा लोगों तक पहुंच सके उतना बेहतर। ऐसी फिल्में सोच बदलने पर मजबूर करती है।

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क- +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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