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सभ्यता के आईने में शिक्षा 

विज्ञान और तकनीक के माध्यम से हमने इतनी शक्ति अर्जित कर ली है कि कुछ ही घंटों में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक साधन और सुविधाएँ उपलब्ध करा सकते हैं। तब भी हम नाना प्रकार की बीमारियों, भूख और अभाव से पीड़ित हैं, क्योंकि हमने अपनी उत्पादन और वितरण व्यवस्था को मुनाफे के अर्थशास्त्र के हवाले कर दिया है। जाहिर है, इस प्रक्रिया के कारण चाँद और सूर्य तक हमारी पहुँच तो बढ़ रही है, लेकिन पड़ोसी का घर दूर होता जा रहा है।

हमारी सामाजिक संरचना और शिक्षा संरचना से सभ्यता के आधिकारिक आयामों को समझने की कोशिश की जा सकती है। मुनाफे के अर्थशास्त्र का उपयोग करने वाली मौजूदा सभ्यता ऐसे शिक्षा तन्त्र-मन्त्र और यन्त्र का विकास नहीं कर सकती जो लोगों को बड़ा बनाते हों। बड़ा तो वही हो सकता है जो सचमुच में बड़ा हो—एक ऐसा मनुष्य जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यता और प्राणी जगत के लिए भी चिंता और चिंतन में व्यस्त तथा मस्त हो। यह तभी सम्भव है जब शिक्षा का स्वरूप ‘सा विद्या या विमुक्तये’ हो और मनुष्य लक्ष्मी, सरस्वती और भगवती का एक साथ उपासक हो।

जिसे हम शिक्षा कहते हैं, उसे बार-बार खारिज किया गया है। अँग्रेजों के जमाने में महात्मा फुले और महात्मा गाँधी ने शिक्षा के स्वरूप पर विचार किया। गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा का एक मॉडल रखा, जिसमें श्रम, हुनर, कौशल और ज्ञान-विज्ञान को उच्चतम स्तर तक अर्जित करने का विचार था।

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने अनेक सवाल हैं। विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम आते ही बच्चों की आत्महत्या सहित कई मुद्दों को हमारे अखबार और सूचना के माध्यम कुछ दिनों तक गम की खबर बनाकर परोसते हैं और फिर अगले साल के परिणाम का इन्तजार करते हैं। सामान्य परीक्षाओं की बात छोड़ दीजिए, प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रश्नपत्र ही बाहर हो जाते हैं। हाल के दिनों में दिल्ली और राँची के छात्र आन्दोलनों का अनुभव हमने किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बाकी देश में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के ड्रॉपआउट को भी इसी कड़ी में रखना होगा। विश्वविद्यालयों की कड़ी में विभिन्न प्रकार के डिग्री घोटाले और शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज हर साल निकलती है तथा नौकरी की तलाश में भटकती रहती है।

सरकारों की अपनी सीमा है। आश्वासनों के अलावा वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होती कि हम सबको नौकरी नहीं दे सकते। आरक्षण के तमाम वैचारिक प्रश्नों से सहमति के बाद भी यह सम्भव नहीं है कि सभी को नौकरी दी जा सके। जनमानस और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे सामाजिक न्याय और न्याय के साथ विकास के रूप में लिया है। लेकिन सच यह है कि हम सबको नौकरी नहीं दे सकते, जबकि रोजगार तो सबको चाहिए। ऐसी सूरत में शिक्षा को नौकरी, आरक्षण और डिग्री की मकड़जाल  से बाहर निकाले बगैर न तो इस संकट से बच सकते हैं और न शिक्षा के सार्वभौम सत्य—‘सा विद्या या विमुक्तये’—की तलाश तक जा सकते हैं।

सोशल मीडिया और तकनीकी तन्त्र के इस दौर में यह सवाल भी उठता है कि किस आन्दोलन की आवाज कितनी दूर तक पहुँचती है और किसकी आवाज सीमित रह जाती है। जानकारों की राय है कि सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए पोस्टिंग का खेल होता है और पैसे भी लिए जाते हैं। स्वयं मेटा ने भी इस तरह की बातों को स्वीकार किया है। इसलिए यह जाँच का विषय है कि क्या दिल्ली के छात्र आन्दोलन को इंस्टाग्राम पर अधिक बढ़ावा मिला और राँची के छात्र आन्दोलन को शिथिल किया गया।

एल्गोरिदम के इस खेल की जाँच की जरूरत है, क्योंकि हमारी आज की विद्या और आधुनिक सभ्यता के विकास का ज्ञान-गौरव यही तकनीकी तन्त्र-मन्त्र और यन्त्र है, जो झूठ परोसने में भी माहिर है। इन कलाओं में जो पारंगत है, वही सफल है, वही नेतृत्व दे सकता है, नीति तय कर सकता है और समाज की नियति तय कर सकता है।

विद्या पर जिसका कब्जा है, उसके तन्त्र में जिसको निपुणता है, वही राजा है, वही सिकन्दर है। बात लोकतन्त्र की हो या तानाशाही की, बात उसी की चलती है। मौजूदा दौर में जिसे आधुनिकता और प्रगतिशीलता कहा जाता है, वह भी इसी सामर्थ्य से पैदा होता है और शिक्षा प्रदान करने का दावा करता है।

हमने विज्ञान और तकनीक के कारण इतना सामर्थ्य पैदा कर लिया है कि कुछ घंटों में एक कोने से दूसरे कोने तक सुविधाओं का अम्बार लगा सकते हैं। परन्तु हम ऐसा कर नहीं रहे या कर नहीं पाते हैं, क्योंकि हमेशा करना नहीं चाहते हैं। हमारी शिक्षा और सभ्यता हमें व्यक्ति के रूप में बहुत ऊँचाई प्रदान करती है, लेकिन समूह के रूप में हमारी हैसियत बहुत बनी हुई नहीं है।

विद्या और सभ्यता का यह संघर्ष हर दौर में चलता रहता है। जब कभी वैदिक विद्याश्रम पर रहा होगा तो निश्चय ही वैदिकों का सामाजिक आदेश चलता होगा और राजनीति, अर्थनीति, सभ्यता और संस्कृति सब कुछ उनके अनुकूल रहा होगा। इसी प्रकार अन्य विचारों, सम्प्रदायों, धर्म और आध्यात्मिक चेतना के दौर में समाज संचालन का तन्त्र-मन्त्र और यन्त्र गठित होता रहता है। आगे भी होता रहेगा।

आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह लोकतन्त्र का दौर माना जाता है, जहाँ शासक के डरने और उसे डराने का खेल चलता रहता है। हम लोकतन्त्र के जिस दौर के सहभागी हैं, वह दौड़ का दौर है। जो जितना दौड़ेगा, वह उतना बड़ा आदमी होगा। सामान्य जन समझ ही नहीं पाता कि कोई हमें दौड़ने को विवश कर रहा है।

एक न्यूज चैनल के विश्लेषण के अनुसार दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन पर 5000 से ज्यादा पोस्ट थीं, जबकि राँची में हुए विरोध प्रदर्शन पर मात्र 1000 से थोड़ी अधिक पोस्ट थीं। भारत में इंस्टाग्राम पर लगभग 48 करोड़ यूजर्स के मुकाबले यह संख्या बहुत छोटी है, फिर भी ऐसा लगा कि पूरा इंस्टाग्राम विरोध प्रदर्शन को लेकर युवाओं की प्रतिक्रिया से भर गया है। विश्लेषण से पता चला कि 5239 पोस्ट केवल 3100 अकाउंट से की गयी थीं, जिन्हें 1.8 करोड़ लोगों ने देखा और हर पोस्ट पर 3500 से ज्यादा इंगेजमेंट मिला। इसी प्रकार कीवर्ड में दिल्ली की जगह राँची करने पर पता चला कि 290 अलग-अलग अकाउंट से 262 पोस्ट की गयी थीं, जिनकी कुल पहुँच केवल 6 लाख थी।

इन आँकड़ों को सामने रखने का उद्देश्य केवल इतना है कि शिक्षा को लेकर देश और दुनिया को चलाने का दावा करने वालों के शैक्षणिक सच को समझने का सार्थक प्रयास किया जाए। शिक्षा और ज्ञान के अभ्यासी लोगों ने पूर्व में ऐसा किया है। तभी तो हम वेद तक ही नहीं रुके, आगे बढ़ते गये, प्रयोग करते गये। सनातन, वैदिक, श्रमण, उपनिषद, बौद्ध, जैन, सिख सहित अनेक प्रयोगों को सजाते रहे। समय-समय पर अपनी ही शिक्षा को खारिज भी करते रहे और नवाचार को लेकर प्रयासशील तथा उत्तेजित भी होते रहे।

आधुनिक सभ्यता के वर्तमान दौर में, खासकर स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर आज तक की यात्रा को देखें तो महात्मा फुले, महात्मा गाँधी और एम.एन. रॉय आदि ने वैकल्पिक शिक्षा को लेकर काफी कुछ कहा। आजादी के बाद शिक्षा को लेकर कई आयोग बने। कई आयोगों की रिपोर्टों को आज तक किसी सरकार ने न तो स्वीकार किया, न लागू किया। विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय आचार्य राममूर्ति कमेटी बनाई गयी। उन्होंने समय से काम पूरा किया और भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट समर्पित की। एक और कमेटी बनी, जिसका नाम बिरला-अंबानी कमेटी ऑन एजुकेशन था। उसने भी अनुशंसाएँ कीं, लेकिन सरकार ने न तो इंकार किया, न स्वीकार किया।

आजादी के पहले भी, आजादी के दौर में भी और आजादी के बाद भी शिक्षा में सुधार को लेकर काफी कुछ हुआ है। 1974 के जन आन्दोलन में वर्तमान शिक्षा को खारिज करने की बात कही गयी। महात्मा गाँधी ने बुनियादी शिक्षा का एक मॉडल देश और दुनिया के सामने रखा था, जो मनुष्य निर्माण, रोजगार सृजन, भौतिक आवश्यकता और नैतिक उन्नयन को केन्द्र में रखकर बनाया गया था। देश आजाद हुआ और तत्कालीन गाँधी के कथित वारिसों ने ही गाँधी के बुनियादी मॉडल को कूड़ेदान में डाल दिया। इसी कड़ी में पंचायती राज को भी खारिज किया गया, जो एक तरह से राजनीतिक शिक्षा थी।

आजादी के बाद भारत सरकार के स्तर पर देशभर में शिक्षण संस्थान खड़े किए गये—विश्वविद्यालयों से लेकर माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा संस्थानों तक। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बनाया गया। लेकिन किसी भी स्तर पर संचालन का कोई एक स्वतन्त्र ढाँचा नहीं है। संसाधनों के स्तर पर भी विचित्रताएँ हैं। उच्च शिक्षा के नियमन में केन्द्रीय, राज्य, निजी और अन्य प्रकार के विश्वविद्यालयों के साथ शोध संस्थानों, सीएसआईआर, एनसीईआरटी, राज्य विद्यालय बोर्ड, मदरसा बोर्ड, संस्कृत बोर्ड आदि अनेक संस्थाएँ हैं। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद जैसे संस्थानों के निर्माण के पीछे हिन्दी और उर्दू को स्थापित करने का उद्देश्य था। यह सवाल अलग है कि इस उद्देश्य की पूर्ति कितनी हुई।

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है। आज सरकारी स्कूलों की स्थिति ऐसी है कि यहाँ वही बच्चे अधिक संख्या में नामांकित होते हैं जिनके लिए निजी विद्यालयों के दरवाजे बन्द हैं। शिक्षक, शिक्षा विभाग, अभिभावक और समाज—किसी भी स्तर पर जाँच कर लें, पाएँगे कि कोई भी पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है। सब कुछ बस चल रहा है। इसके बावजूद सरकारी शिक्षा संस्थानों में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे दाखिल होते हैं, पढ़ते हैं, पास होते हैं, फेल होते हैं और ड्रॉपआउट भी होते हैं।

शिक्षण, अध्ययन और अध्यापन के अलावा शिक्षकों के पास ढेर सारे काम होते हैं। अभिभावक की अलग स्थिति है और विद्यार्थी पढ़ने से कतरा रहा है। आधुनिक शिक्षा के बिना छात्रों के पास निजी शिक्षण संस्थान ही विकल्प के रूप में दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर शिक्षा का पूरा तन्त्र ही बीमार हो गया है।

आधुनिक शिक्षा, जिसका कुल जमाना ही कठिन है, सरकार की अनुपस्थिति में अनुरूप कामगार, बाबू और साहब मात्र पैदा करना रह गया है। उससे मुक्ति और मनुष्य निर्माण की आशा करना एक प्रकार की मृगतृष्णा है। हमारी विकास रीति, राजकार्य, समाज और संस्कृति जिस दिशा में बढ़ चली है, उसका समग्र मूल्यांकन किए बिना इस शिक्षा से यह आशा करना कि इसे ग्रहण कर लोग स्वतन्त्रता के वाहक बनेंगे, समता का समाज बनाएँगे और भाईचारे की संवेदना से काम करेंगे, एक प्रकार का छलावा है।

सरकारी संस्थान कुशल बेरोजगारों की ऐसी फौज पैदा कर रहे हैं जो नौकरी से आगे सोचती नहीं है। स्वार्थ-केन्द्रित और खाओ-पियो-मौज करो को जीवन का सार मानने वाली जमात वर्तमान शिक्षा संस्थानों से निकल रही है। एक ऐसा कारखाना बन गया है जहाँ जाति, सम्प्रदाय और लिंग भेद के खिलाफ उपदेश तो है, लेकिन आचरण बिल्कुल उल्टा है। हमारी शिक्षा आज सरकार की मोहताज पर खड़ी है। नीति, नियति, दृष्टि, दिशा और अनुशासन के लिए मोहताज संस्थान लोकतन्त्र, समता, स्वतन्त्रता और बन्धुता का भाव पैदा कर सकते हैं या नहीं, इस पर विचार करना चाहिए।

सवाल यह है कि संसद, सरकार और समाज क्या ऐसा रास्ता निकाल सकते हैं जिसमें अभिभावक भी जुड़े हों और व्यापक रूप में हमारी संस्था स्वयं शिक्षा को जीवन निर्माण का तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र प्रदान कर सके। हम पश्चिम की नकल तो करते हैं, लेकिन तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र के मामले में बेईमानी करते हैं। हमारे शिक्षा तन्त्र का सन्देश अभी भी यही है—पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब। प्रतियोगिता और प्रतिद्वंद्विता में आगे निकलने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का अनुसरण लोग करेंगे ही।

श्रमविहीन शिक्षा का परिणाम है कि पढ़ाई-लिखाई के बाद हमारे बच्चे मेहनत करने के लायक भी नहीं बचते। नौकरी के अलावा उनके पास कोई रास्ता बचता ही नहीं है, जबकि रोजगार के क्षेत्र में खेती, किसान, कारीगरी, उद्योग, व्यापार और नौकरी सभी का स्थान है। हमारे बच्चे केवल नौकरी और डिग्री पर केन्द्रित हैं। यही कारण है कि निजी शिक्षा संस्थानों की वृद्धि हो रही है और उन्होंने शिक्षा को बाजार और व्यापार में ढाल दिया है।

हमारी शिक्षा में भाषा का खेल भी निराला है। सरकारी स्तर पर मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को लेकर जितना भी शोर हो, व्यवहार में लोग मानकर चलते हैं कि नौकरी पानी है तो अँग्रेजी जरूरी है और निजी संस्थान मदद कर सकते हैं। हमारा इरादा कोई भाषा विवाद खड़ा करना नहीं है। आवश्यकता के अनुसार हमें अँग्रेजी और अनेक भाषाएँ सीखनी चाहिए, लेकिन शिक्षा के माध्यम की भाषा पर विचार करना ही पड़ेगा। हमारे बच्चों को अँग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी, संस्कृत और अपनी मातृभाषा के स्तर पर भी पारंगत कैसे बनाया जाए, इस पर विचार जरूरी है।

इसी प्रकार परम्परा और आधुनिकता के प्रश्न को भी समझना होगा। प्राचीन ज्ञान को केवल इसलिए नकारना कि वह प्राचीन है और आधुनिकता के विरोध के नाम पर अन्धविश्वास पर लौट जाना—दोनों ही गलत हैं। ज्ञान का मतलब यह होना चाहिए कि हम परम्परा के साथ आधुनिकता की अच्छी चीजों से बच्चों का परिचय कराएँ और परम्परा तथा आधुनिकता दोनों की बुराइयों से बचने के लिए तर्कसंगत आयाम तैयार करें।

सच तो यह है कि आज न तो शिक्षा की अपनी नीति है, न नियति और न ही दिशा। एक बेहाल व्यवस्था और ज्ञान तन्त्र कभी भी शिक्षा का गुणात्मक पक्ष बच्चों तक नहीं पहुँचा सकता। शिक्षकों की बहाली तक के लिए हमारे पास कोई प्रभावी आयोग नहीं है। शिक्षा के नियमन का भी कोई एक समुचित तन्त्र नहीं है। सरकार और बाजार के प्रमुख वर्ग के बीच शिक्षा को लेकर सरकार, समाज और अभिभावक को जोड़ने वाला कोई व्यापक तन्त्र बनना चाहिए।

इसी प्रकार प्रयोगधर्मी और रचनाधर्मी शिक्षा के लिए विभिन्न स्तरों पर ढाँचा खड़ा किया जा सकता है। दरअसल हमारे पास सार्वभौमिक और लोकतान्त्रिक तन्त्र नहीं है। परिणाम है कि अध्ययन, अध्यापन, शिक्षण और प्रशिक्षण के स्तर पर घोर अराजकता है। ज्ञान के लिए आवश्यक होता है एक प्रयोगधर्मी और रचनाधर्मी यन्त्र। सदियों से चले आ रहे क्लासरूम शिक्षा से हम बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं, जो उपदेशात्मक और निर्देशात्मक ज्यादा है।

एक विश्वविद्यालय शिक्षक होने के नाते पूरी गम्भीरता से यह बात कहना चाहता हूँ कि विश्वविद्यालय आते-आते शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते और छात्र-छात्राएँ पढ़ना नहीं चाहते। अभिभावक ऐसी पढ़ाई तलाशते रहते हैं जो नौकरी की गारण्टी दे। कोचिंग और ट्यूशन जैसी बीमारियाँ हर स्तर पर व्याप्त हैं। शोध का हाल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित हो गया है। मौलिकता का संकट चरम पर है। माध्यमिक और प्राथमिक स्तर पर भी शिक्षा आयोग और नवाचारी विचार सरकारी आदेश तक सीमित हैं। निजी संस्थानों का अलग हाल है। फर्राटे से अँग्रेजी बोलने वाले भी अपनी भाषा और व्याकरण में फिसड्डी मिलेंगे।

अतः यह अवसर है कि हमें भी बुनियादी स्तर पर शिक्षा हेतु ऐसा यन्त्र बनाना चाहिए जो शक्ति, हुनर, प्रश्न और कौशल विकास के लिए नवाचार और प्रयोगधर्मिता का केन्द्र बने और जिसके प्रयोगों को ज्ञान के सभी स्तरों पर फैलाया जाए।

हम किसी गुरुकुल, आश्रम या अवैदिक शिक्षा की बात नहीं करना चाहते। हमारी राय में शिक्षा को अगर लोकतन्त्र, समता, स्वतन्त्रता, न्याय और बन्धुता का वाहक बनाना है तो इसे श्रम, प्रयोग और नवाचार के रास्ते पर ही जाना पड़ेगा। विकास के कठोर विमर्श से बाहर निकलकर बाजार और सरकार के कब्जे से बाहर निकलना ही पड़ेगा। तभी ज्ञान का लौकिक और प्रतिलौकिक क्षितिज स्पष्ट होगा।

तभी हम शिक्षा का असली आनन्द प्राप्त कर पाएँगे। अपनी अस्मिता, सह-अस्तित्व और संस्कृति के साथ वसुधैव कुटुम्बकम तक की यात्रा कर पाएँगे। ज्ञान का सार्वभौमिक और नैसर्गिक सुख प्राप्त कर पाएँगे।

 

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विजय कुमार

लेखक टीएमबीयू के गाँधी विचार विभाग के पूर्व प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष तथा बिहार प्रदेश किसान कॉंग्रेस के अध्यक्ष हैं। vijaygthought@gmail.com +917667879536
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