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लोकतन्त्र, विचारधारा और साहित्य

लोकतन्त्र का वास्तविक आधार केवल चुनाव, बहुमत और संवैधानिक संस्थाएँ नहीं होतीं, बल्कि नागरिकों की वह क्षमता भी होती है जिसके सहारे वे असहमति का सम्मान कर सकें, दूसरों के दुख को समझ सकें। लोकतन्त्र वह जगह है जहाँ अलग-अलग विचारधाराओं की आपसी भिड़ंत, संवाद और सहअस्तित्व मुमकिन है। हालाँकि यह जगह तब तक रहती है कि जब तक प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं में से कोई एक कब्जा कर मुकाबले के इस खेल को ही खत्म न कर दे। अति-दक्षिण व अति-वाम दोनों विचार ध्रुवों से इस अर्थ में लोकतन्त्र को खतरा रहा आया है। मगर आज के दौर की अजीब बात यह है कि लोकतन्त्र को सबसे बड़ा खतरा एक समय लोकतंत्र को संभव करने वाली उदारवाद की धारा से भी है, जो आज व्यावहारिक रूप से नवउदारवाद में तब्दील हो कर अति–दक्षिण को पाल-पोस रही है। पिछले चार दशकों में बाजार को सर्वोच्च मानने वाली नीतियों ने सामाजिक असमानता बढ़ायी, सार्वजनिक संस्थाओं को कमजोर किया और राजनीतिक शक्ति पर बड़ी पूँजी का प्रभाव गहरा किया। आर्थिक असुरक्षा और बढ़ती विषमता ने अनेक देशों में असन्तोष को जन्म दिया, जिसका लाभ बहुसंख्यकवादी और अति-दक्षिणपन्थी राजनीति ने उठाया।

बहुत से देशों में लोकतन्त्र को नवउदारवाद और वित्तीय अल्पतन्त्र की शर्तों के अनुरूप काट-छांट दिया गया है। हालाँकि उदारवाद अब तक एक नेक ख्याल है। मगर उसकी उम्र कितनी बची है, यह लोकतन्त्र के रस्मो-रिवाज में हिस्सा लेने वालों को भी ठीक पता नहीं है। लोकतन्त्र जिन मूल्यों पर टिका है और जिनसे उसके सार्वजनिक संस्थान वैधता जुटाते हैं, उनमें नवउदारवादी घुन लग गया है। लोकतन्त्र के तमाम खम्भे जैसे कि संवैधानिक नैतिकता, कानून का राज्य, नागरिक अधिकार, निष्पक्ष सार्वजनिक संस्थाएँ आदि इस तूफान में हिल रहे हैं।

संसदीय लोकतन्त्र के बहुमत के राज के बहुसंख्यक के राज में बदलते जाने के साथ ही न्याय के शास्त्रीय विमर्श की धमक कम हो रही है। गजब यह है कि आज हर कोई न्याय माँग रहा है, भले ही उनकी दिलचस्पी न्याय और अधिकारों के मानदण्ड को व्याख्यायित करने में न हो। महिला, अश्वेत, दलित, आदिवासी, गरीब संवैधानिक उदारवाद के उत्कर्ष के दौर न्याय के स्वाभाविक मुन्तजिर थे। अब पुरुष, श्वेत, सवर्ण, उच्च मध्यवर्गीय हर किसी के पास अपने प्रति हुए अन्याय की कहानी और रोना है। अन्याय की भावनात्मक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ वास्तविक अन्याय के दावों को नेपथ्य में डाल रही हैं। इस कोलाहल और धूल-धक्कड़ के बीचोंबीच वित्तीय अल्पतन्त्र व अन्य सामाजिक-आर्थिक दबंग संसाधनों, ज्ञान और संस्कृति पर अपनी पकड़ को और मजबूत कर रहे हैं।

न्याय की चाहे कोई भी परिकल्पना हो, उसे आखिरकार करुणा और विवेक के दो पैरों पर अपना भार टिकाना होता है। लेकिन आज के भँवर में यह दोनों निशाने पर हैं। पूर्वाग्रहों और नफरती उन्माद की राजनीति मानवीय करुणा और विवेक दोनों को कमजोर कर रही है। उपभोग व सम्पत्ति के लालच, प्रतिशोध की माँग, और व्यक्तिगत व सामुदायिक अहं से पैदा होने वाली नकारात्मक भावनाओं के चलते नैतिक अन्त:करण को या तो लोग महसूस नहीं कर पाते या अनसुना करते हैं।

दुनिया में आज अन्याय और विषमता चरम पर है। विडम्बना यह है कि न्याय और बराबरी के पक्ष में लामबन्दी मुश्किल हो गई है। इसकी संरचनात्मक वजहें कई हो सकती हैं। एक तो पूँजीवाद और संसदीय लोकतन्त्र के रिश्ते में आई दरार है। एक और वजह समाजवाद जैसे परिवर्तनकारी यूटोपियाओं का संकटग्रस्त होना है। वहीं टेक्नोलॅजी से लैस छवियों, रीलों और मशीनी इबारतों के निरन्तर प्रवाह में मानवीय कर्ता के चित्त का और ज्यादा बिखरना भी शायद इसकी एक वजह या लक्षण हो।

जाहिर है ऐसे दौर में पुराने आजमाए हुए तरीके काम नहीं कर रहे हैं, तब न्याय के पक्ष में करुणा और विवेक को मजबूत करने के लिए हस्तक्षेप के नये बिन्दुओं पर विचार करना होगा। जब तक धुँध साफ नहीं होती, तब तक क्या विचारधारा, न्याय और लोकतन्त्र के रिश्तों पर राजनीति सिद्धान्त के कुछ बाहर जाकर भी सोचा जाना चाहिए? क्या साहित्य व संस्कृति सिद्धान्तों के जरिए इन अवधारणाओं की रचनात्मक सम्भावनाओं को टटोला जा सकता है?

साहित्य के सन्दर्भ में जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण लगती है, वह है उसका विचारधाराओं की गिरफ्त से बाहर जाने का सामर्थ्य। राजनीतिक विचारधाराएँ दुनिया के बारे में अलग-अलग वर्गों, तबकों और समुदायों के दावों व प्रस्तावों को सामने रखती हैं। ये मूल्यों और अर्थों का अपना-अपना महत्त्व-क्रम बनाती हैं। मगर हम जानते हैं कि विचारधाराएँ जितना बताती हैं, उतना छिपाती भी हैं।

हर विचारधारा अपना मुकाबला करती दूसरी विचारधारा की कमियों को उजागर करती है। एक विचारधारा दूसरी विचारधारा से पैदा होने वाले अन्यायों और अत्याचारों को उभारती हैं, ताकि नैतिक रूप से कमजोर बनाकर उसका मुकाबला किया जा सके। वहीं विचारधारा का एक मुख्य प्रकार्य यह होता है कि वह अपनी अतियों, अन्यायों, जुल्मों पर पर्दा डाल दे। निश्चित ही वर्चस्वी और प्रतिरोधी विचारधाराओं को एक पलड़े में नहीं रखा जा सकता। मगर अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालने का यह लक्षण हर राजनीतिक विचारधारा में पाया जाता है। (राजनीतिक सिद्धान्त कुछ हद तक इससे एक आपेक्षिक दूरी बनाता है)। यही वजह है कि मुक्तिकामी समझी जाने वाली विचारधाराओं के विचार-धारक भी अपनी हिंसाओं और दमन पर चुप्पी बनाए रखना चाहते हैं। प्रतिस्पर्धा, ध्रुवीकरण और दुश्मनी के तर्क से वे अपनी वैधता बनाए रखते हैं।

इस सन्दर्भ में साहित्य की कुछ खासियतों की तरफ ध्यान जाता है। साहित्य, खास तौर पर कहानी व उपन्यास पढ़ते हुए एक पाठक अपने सीमित अनुभव से बाहर निकल कर अपने से अलग और कई बार विरोधी अस्मिता के लोगों के दुख-दर्द को जान व पहचान पाता है, उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ पाता है। हम जानते हैं कि श्रेष्ठ साहित्य न तो कोरा प्रचार हो सकता है और न वह पात्रों के केरिकेचर बना कर सन्तुष्ट हो सकता है। साहित्य पात्रों के जीवन व कामों को सन्दर्भ-परिस्थिति, पृष्ठभूमि, विवशताओं, और उपलब्ध विकल्पों के व्यापक पटल पर रखकर समझने की कोशिश करता है। वह इसके लिए पात्रों की मानसिक स्थितियों, सनकों, भावनात्मक आवेगों आदि को भी समझने की कोशिश करता है। यह गुण श्रेष्ठ साहित्य की अनेक परम्पराओं में दिखाई देता है। प्रेमचन्द के किसानों, दलितों और वंचित पात्रों से लेकर दोस्तोयेव्स्की के अपराध-बोध से जूझते मनुष्यों तथा महाश्वेता देवी के आदिवासी चरित्रों तक, साहित्य पाठक को दूसरों के अनुभवों के भीतर ले जाता है। इस प्रक्रिया में वह न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को विचार से आगे जाकर जीवन्त मानवीय अनुभव बना देता है।

 

लेखक किसी भी विचारधारा का व्यक्ति हो और लेखों में उसके विचार कितने भी गुणकारी या जहरीले ही क्यों न हों, मगर गल्प के प्रति-संसार के भीतर उसे इंसानियत के बुनियादी सरोकारों- जिसमें पीड़ा, दुख और खुशियों का साझापन शामिल है- का ख्याल रखना होता है। साहित्य के शाब्दिक अर्थ में भी सहित होने का भाव है। समावेशिता के इस अव्यक्त या सुप्त पहलू के चलते साहित्य अपने दायरे के भीतर विचारधाराओं को मुलायम बना देता है। हम जानते हैं कि साहित्य, अगर वह प्रचारात्मक या भौंडा नहीं है, में विचारधारा सीधे काम करने की जगह विचारधारात्मक अवचेतन (विस्तार के लिए देखें फ्रेडरिक जेमेसन) के जरिए काम करती है।

वास्तविक संसार में भविष्य को गढ़ने में विचारधाराओं के वर्चस्वी संघर्ष की मुख्य भूमिका आगे भी बनी रहने वाली है। साहित्य व राजनीति में रिश्ता और लेन-देन तो हो सकता है, पर साहित्य राजनीति की जगह नहीं ले सकता। मगर इस लेख का सवाल राजनीति छोड़कर साहित्य करने का नहीं, बल्कि आज के दौर में करुणा व विवेक के उपचार में साहित्य की राजनीतिक भूमिका की पहचान का है।

रबींद्रनाथ टैगोर से गहरे प्रभावित चिन्तक मार्था नुसबॉम कहती हैं कि साहित्य के प्रति-संसार में एक तरह का काव्यात्मक न्याय होता है, जो अदालती गवाहियों, जिरहों और दोषी या दोषमुक्त के फैसले से कुछ अलग होता है। साहित्य एक तरफ पीड़ित के छिपे हुए मानसिक सदमे को सामने लाता है और दूसरी तरफ परपीड़क के मनोविज्ञान को भी समझना चाहता है। नुसबॉम साहित्य को अदालत के विकल्प के रूप में नहीं रखती। मगर साहित्यिक कल्पनाशीलता को नागरिकों के जनतान्त्रिक सामर्थ्य को बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया मानती हैं।

आज जब लोकतन्त्र को बहुमत की जगह बहुसंख्यकवाद के खेल में बदला जा रहा हो, नागरिकों में समानुभूति व करुणा के सामर्थ्य का विकसित हो पाना एक ज्वलन्त राजनीतिक मुद्दा है। आज के माहौल में जनशिक्षण के बहुत से नये रूप तलाशे जा रहे हैं, जो लोगों में जनतान्त्रिक सोच व न्यायशीलता को बढ़ावा दे सकें। संविधान के मूल्यों को इसी मकसद से जनशिक्षण का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है। कई लोगों का एतबार वैज्ञानिक मिजाज की शिक्षा पर है।

इसी तर्ज पर साहित्यिक कल्पनाशीलता जनतान्त्रिक शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण पहलू हो सकती है। मगर साहित्य में अन्तर्निहित खुलेपन, लोकतन्त्र और इंसानियत की भूमिका इससे कहीं बढ़कर भी हो सकती है। विचारधाराओं के बीच दावों, आरोपों, जिरह आदि के जरिए अकसर सम्प्रेषण होता है। जोर तर्कबाजी या औचित्य प्रतिपादन पर होता है, संवेदनशीलता पर नहीं। आज दुनिया में जब असहिष्णुता व कट्टरता का बोलबाला है, क्या पीड़ा व अन्याय के प्रतिस्पर्धी अहसासों के बीच संवाद के तरीके सोचे जा सकते हैं?  लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना केवल राजनीतिक मुहिमों से नहीं होगी। इसके लिए संवैधानिक मूल्यों पर आधारित जनशिक्षा, साहित्य और कला के माध्यम से समानुभूति का विस्तार तथा सार्वजनिक संवाद की लोकतान्त्रिक संस्कृति को समान रूप से सुदृढ़ करना होगा। तभी करुणा और विवेक सामाजिक-राजनीतिक शक्ति का रूप ले सकेंगे।

 

 

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ईश्वर सिंह दोस्त

लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। सम्पर्क ishwardost@gmail.com +918989842952
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