देश

स्वतंत्र देश में परतंत्र नागरिक

 

इस साल  देश में आज़ादी का 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया जायेगा। भारत को स्वतंत्र कराने के लिए न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने अपने जीवन का बलिदान दिया। असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों के त्याग, तपस्या, संघर्ष और बलिदान के परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को देश ने पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति प्राप्त की। यह दिन भारतीय इतिहास का एक गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय दिवस है। प्रत्येक वर्ष हम इसे अत्यंत उल्लास, उत्साह और गौरव के साथ स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं।

रूसो के अनुसार, मनुष्य पैदा तो स्वतंत्र होता है किंतु, सदैव जंजीरों में जकड़ा होता है। भारत की स्वतंत्रता को अनेक दशक बीत चुके हैं। इस दीर्घ कालखंड में देश ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। विकास की अनेक नई संभावनाएँ हमारे सामने उपस्थित हैं। इसके बावजूद वर्तमान समय में स्वतंत्रता होने के बावजूद एक अलग प्रकार की गुलामी का दृश्य दिखाई देता है। गुलामी का स्वरूप बदल गया है; उसकी जंजीरें अब लोहे की नहीं, बल्कि मानसिकता, भय, पूर्वाग्रह, स्वार्थ और संकीर्णता की है। इस नवीन पराधीनता को निम्नलिखित आयामों के माध्यम से समझा जा सकता है।

सामाजिक सोच

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रहता है। किसी भी समाज का संचालन सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और संस्कृति के माध्यम से होता है। ये सभी समाज के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। कई बार यह देखने को मिलता है कि समाज के बनाए हुए नियमों और परंपराओं के आगे कानून की अनदेखी कर दी जाती है। इससे कानून के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर होता जाता है और व्यक्ति की सोच भी सही दिशा से भटकने लगती है। इस प्रकार व्यक्ति कानून की अपेक्षा सामाजिक सोच और सामाजिक बंधनों के अधीन रहना स्वीकार कर लेता है। जब सामाजिक मान्यताएँ व्यक्ति के विवेक और संवैधानिक अधिकारों से अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं, तब व्यक्ति स्वतंत्र नागरिक होते हुए भी मानसिक रूप से पराधीन हो जाता है। मनुष्य सामाजिक परंपराओं में ही अपना हित देखने-समझने लगते हैं। महिलाएं परंपरा के नाम पर सती होना स्वीकार करती रही और पुरूष महिला विरोधी कानून बनाना अपना अधिकार। यह वही समाज है जो मनुष्य को अछूत और जानवर समझकर उन्हें परतंत्र बनाकर रखा।

राजनीतिक सोच

कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी न किसी विचारधारा से प्रेरित होती है। उस विचारधारा को आगे बढ़ाने का कार्य राजनीतिक दल करते हैं। किंतु, विगत कुछ दशकों में अनेक राजनीतिक दल अपने मूल उद्देश्यों से भटकते दिखाई देते हैं। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक समीकरणों में निरंतर परिवर्तन आया है। दुर्भाग्य यह है कि सत्ता प्राप्ति की आकांक्षा ने अनेक राजनीतिक व्यक्तियों और समूहों को इतना प्रभावित कर दिया है कि सत्य, नैतिकता और जनहित कई बार गौण दिखाई देने लगते हैं। असत्य का सहारा लेना, जनभावनाओं को प्रभावित करना और राजनीतिक स्वार्थ के लिए समाज को विभाजित करना उनका मुख्य उद्देश्य हो गया है। इस तरह से विचार नगण्य हो जाता है और जनहित की जगह स्वहित सोच में बंध जाते है| इसके लिए राजनीतिक दल विभिन्न योजनाओ के माद्यम से लुभाते है जैसे – राशन और कुछ अन्य चीजें मुफ्त में दे देते हैं ताकि उनकी आधारभूत जरूरतें पूरी हो जाये और खुश होकर जनता स्वस्थ राजनीतिक विचार के अपेक्षा मुक्त संसाधन का गुलाम बनकर रह जायें।  

धार्मिक सोच

धर्म मनुष्य को सत्य, करुणा, सहिष्णुता, सद्भाव और मानवता का मार्ग दिखाता है। सभी धर्मों की मूल भावना मानव कल्याण और नैतिक जीवन की स्थापना से जुड़ी हुई है। किंतु, जब धार्मिक आस्था पर विवेक का नियंत्रण समाप्त हो जाता है और आस्था अंधविश्वास का रूप धारण कर लेती है, तब धर्म का नकारात्मक पक्ष सामने आता है। इसका प्रमुख कारण बचपन से मिले संस्कार से है। हम धर्मं को धारण कर लेते हैं और उसके कारण हम न चाहते हुए भी कई-कई दिनों तक भूखे रहते हैं, पति, भाई के लिए व्रत रखते हैं, मीलों पैदल चलकर मंदिरों में दर्शन करते हैं और धीरे-धीरे हम इसके आदी हो जाते हैं जिसके जकड़न से आजीवन मुक्त नही हो पाते हैं। जिस धर्म में पैदा होते हैं, उसे ही सर्वश्रेष्ठ बताया जाता है| इसलिए दूसरे धर्मों के प्रति हमारी सोच नकारात्मक हो जाती है, जिसकी वजह से धार्मिक सोच संकुचित और संकीर्ण हो जाती है। अतः स्वस्थ धार्मिक चेतना वही है, जिसमें आस्था के साथ विवेक, सहिष्णुता, करुणा और मानवता का समुचित समावेश हो और उसे धारण करने की स्वतंत्रता हो न की बाध्यता।

जातीय सोच

भारतीय समाज में जाति का प्रभाव आज भी अनेक स्तरों पर दिखाई देता है। जातिगत सोच की गुलामी से देश आज भी आज़ाद नहीं हो पाया है। जातिगत सोच के कारण उच्च-नीच की भावना से ग्रसित होकर तथाकथित उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों को गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। इस वजह से व्यक्ति की योग्यता से नहीं, बल्कि जाति देखी जाती है। यह संकीर्ण सोच आज भी जाति व्यवस्था का दंश झेल रही है| यह जातीय सोच गुलाम मानसिकता की परिचायक है| इसलिय आज भी जातीय श्रेष्ठताबोध, भेदभाव, सामाजिक विभाजन, पूर्वाग्रह, योग्यता की उपेक्षा, राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा सामाजिक गतिशीलता में अवरोध जैसी प्रवृत्तियाँ समाज में विद्यमान हैं।  

क्षेत्रीय सोच

जिस स्थान पर मनुष्य जन्म लेता और जीवन व्यतीत करता है, उसके प्रति आत्मीय लगाव स्वाभाविक है। अपनी भूमि, अपनी संस्कृति और अपने क्षेत्र के प्रति प्रेम सकारात्मक भावना है। किंतु, जब यही क्षेत्रीय चेतना संकीर्णता, श्रेष्ठताबोध अथवा अन्य क्षेत्रों के प्रति विरोध में परिवर्तित हो जाती है, तब उसका नकारात्मक स्वरूप सामने आता है, जो असमानता की भावना को जन्म दे सकती है। जब ‘मेरा क्षेत्र’ की भावना ‘दूसरे क्षेत्र’ के प्रति घृणा, उपेक्षा अथवा अस्वीकार्यता में परिवर्तित हो जाती है, तब क्षेत्रीय चेतना समाज को जोड़ने के स्थान पर विभाजित करने लगती है। इसका उदाहरण अहिन्दी भाषा क्षेत्र में विशेषतौर पर देखने को मिलता है। ऐसे लोग व्यापक न होकर सीमित हो जाते हैं। इसलिए स्वस्थ क्षेत्रीय चेतना वही है, जो स्थानीय अस्मिता और सांस्कृतिक विशिष्टता का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता, अखंडता और मानवता को सर्वोच्च महत्व प्रदान करे।

भाषिक सोच

अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम स्वाभाविक है और होना भी चाहिए। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, साहित्य और सामूहिक स्मृति की संवाहिका भी है। किंतु, जब अपनी भाषा के प्रति प्रेम दूसरी भाषाओं के प्रति घृणा अथवा श्रेष्ठताबोध में परिवर्तित हो जाता है, तब भाषिक संकीर्णता जन्म लेती है। भाषाई श्रेष्ठताबोध, भाषाई भेदभाव, असहिष्णुता, क्षेत्रीय तनाव, अवसरों में असमानता, सांस्कृतिक संकीर्णता और राजनीतिक स्वार्थ के लिए भाषा का उपयोग सामाजिक समरसता को प्रभावित करता है। अपनी भाषा से प्रेम करना सांस्कृतिक गौरव है, किंतु दूसरी भाषा के प्रति घृणा भाषिक संकीर्णता और भाषिक गुलामी है। स्वस्थ भाषिक चेतना वही है, जो अपनी भाषा का सम्मान करें और साथ ही अन्य भाषाओं, उनके साहित्य, संस्कृति और अस्तित्व के प्रति भी समान आदर की भावना रखे।

इस प्रकार राजनीतिक, धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय और भाषिक संकीर्णताएँ उस मानसिक अवस्था को जन्म देती हैं, जिसमें मनुष्य अपनी स्वतंत्र बुद्धि और विवेक का उपयोग करने के स्थान पर दूसरों के विचारों, मान्यताओं और धारणाओं का अनुकरण करने लगता है। ऐसी मानसिकता में मनुष्य सत्य और तर्क की अपेक्षा सत्ता, भय, सुविधा, पूर्वाग्रह और परंपरा को अधिक महत्व देने लगता है। यही मानसिक गुलामी स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने लगता है। शरीर स्वतंत्र हो सकता है किंतु, विचार स्वतंत्र नहीं हैं, तो उस स्वतंत्रता की पूर्णता संदिग्ध हो जाती है। समाज में हो रहे अन्याय को देखकर भी यदि कोई व्यक्ति मौन रहता है, तो वह केवल मौन नहीं रहता, बल्कि कहीं-न-कहीं उस अन्याय को स्वीकार करने वाली व्यवस्था को अप्रत्यक्ष समर्थन भी प्रदान करता है। अन्याय का प्रतिरोध करना नागरिक चेतना का आवश्यक अंग है। सत्य का साथ देने के स्थान पर यथास्थिति को स्वीकार कर लेना व्यक्ति की स्वतंत्र निर्णय-क्षमता को कमजोर करता है। हालाँकि किसी मत से सहमत अथवा असहमत होना मानसिक गुलामी का प्रमाण नहीं है। स्वतंत्र चिंतन का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति सदैव दूसरों से असहमत ही रहे। वास्तविक में स्वतंत्र चिंतन वह है, जिसमें व्यक्ति तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर अपने विचार निर्मित करे तथा आवश्यकता पड़ने पर नए तथ्यों के प्रकाश में उन्हें परिवर्तित करने का साहस भी रखे।

    आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव के रूप में न मनाएँ, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी बनाएँ। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? क्या हम निर्भय होकर प्रश्न पूछ सकते हैं? क्या हम अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेते हैं? क्या हम जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकार कर पाते हैं? अतः स्वतंत्र भारत का अगला लक्ष्य केवल आर्थिक और तकनीकी विकास नहीं, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता और मनुष्य की गरिमा की रक्षा होना चाहिए। जिस दिन प्रत्येक भारतीय बिना भय के सोच सकेगा, प्रश्न कर सकेगा, असहमति व्यक्त कर सकेगा और सत्य के पक्ष में खड़ा हो सकेगा, उसी दिन हमारी स्वतंत्रता अपने वास्तविक अर्थ में पूर्ण होगी।

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संतोष बघेल

लेखक शिक्षाविद् एवं स्‍वतन्त्र लेखक हैं| सम्पर्क- +919479273685, santosh.baghel@gmail.com
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