
नवउदारवाद और शिक्षा का नया संकट
शिक्षा का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। इंग्लैंड के अनेक विश्वविद्यालय वित्तीय दबाव, अन्तर्राष्ट्रीय छात्रों की कमी और पाठ्यक्रमों में कटौती से जूझ रहे हैं। अमेरिका में घटती छात्र-संख्या, बढ़ती लागत और आर्थिक संकट के कारण छोटे कॉलेज बन्द या बड़े संस्थानों में विलीन हो रहे हैं। भारत में भी कुछ विश्वविद्यालयों और विषयों में सीटें खाली रहती हैं, जबकि शुल्क बढ़ाकर और प्रमाणपत्र-आधारित पाठ्यक्रमों से संसाधन जुटाने की कोशिश होती है। प्रश्न है कि विश्वविद्यालय बदलती ज्ञान-जरूरतों के अनुरूप स्वयं को बदल रहे हैं या आर्थिक संकट से बचने के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों में बदल रहे हैं?
शिक्षा के वर्तमान संकट को समझने के लिए इस सूत्र वाक्य को ध्यान में रखना चाहिए—पूँजी को कभी विश्वविद्यालय की जरूरत थी; आज बदली हुई पूँजी को विश्वविद्यालय से अधिक कौशल-प्रशिक्षण की जरूरत है, लेकिन लोकतन्त्र को विश्वविद्यालय की जरूरत पहले से कहीं अधिक है। शिक्षा के बारे में आज दुनिया भर में जो गहन चिन्तन चल रहा है, उसके केन्द्र में भी यही सूत्र है। आधुनिकता के साथ विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की जो व्यवस्था बनी थी, क्या वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, बदलते श्रम-बाजार और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के बीच अपने पुराने रूप में टिक सकती है? भारत में यह प्रश्न इसलिए अधिक गम्भीर है कि यहाँ संकट केवल संसाधनों का नहीं, शिक्षा के उद्देश्य, संस्थागत स्वायत्तता, शिक्षक की स्थिति और विश्वविद्यालय की सामाजिक भूमिका—सबका है।
आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था का विकास आधुनिक राज्य और पूँजीवाद के विकास से अलग-अलग नहीं समझा जा सकता। औद्योगिक पूँजीवाद को ऐसे लोगों की जरूरत थी जो पढ़-लिख सकें, गणना कर सकें, समय के अनुशासन में काम कर सकें, मशीनों और आधुनिक उत्पादन-व्यवस्था को समझ सकें। आधुनिक राष्ट्र-राज्य को अपने लिए प्रशासक, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और नागरिक चाहिए थे। इसीलिए विद्यालयों और विश्वविद्यालयों का विस्तार हुआ और शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को राज्य की जिम्मेदारी माना गया। शिक्षा केवल व्यक्ति के निजी उत्थान का साधन नहीं थी; वह आधुनिक समाज की आधारभूत संरचना का हिस्सा थी। जिस तरह सड़क, रेल और संचार के बिना आधुनिक अर्थव्यवस्था सम्भव नहीं थी, उसी तरह शिक्षित जनसंख्या के बिना आधुनिक राज्य और पूँजीवाद भी सम्भव नहीं थे। इसलिए शिक्षा में सार्वजनिक निवेश को बोझ नहीं, भविष्य की सामाजिक और आर्थिक क्षमता के निर्माण के रूप में देखा जाता था।
पूँजी का स्वरूप बदलता गया तो शिक्षा का स्वरूप भी उसके साथ बदलता रहा। औद्योगिक विस्तार के साथ विज्ञान और इंजीनियरिंग की शिक्षा का महत्त्व बढ़ा। बड़े निगमों के विकास के साथ प्रबन्धन संस्थानों का विस्तार हुआ। कम्प्यूटर और सूचना-प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव ने कम्प्यूटर विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार को शिक्षा के सबसे आकर्षक क्षेत्रों में बदल दिया। यह स्वाभाविक था कि समाज और अर्थव्यवस्था की नयी जरूरतों के अनुसार शिक्षा नये विषय और नयी संस्थाएँ बनाए। समस्या इस परिवर्तन में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब यह मान लिया जाता है कि शिक्षा का पूरा उद्देश्य बाजार की तत्काल जरूरतों की पूर्ति करना है। जिस ज्ञान से आज तुरन्त आर्थिक लाभ नहीं होता, वह गैर-जरूरी समझा जाने लगता है। इतिहास, दर्शन, साहित्य, समाजशास्त्र या शुद्ध विज्ञान से पूछा जाने लगता है कि उनका ‘रिटर्न’ क्या है। यहीं शिक्षा और ज्ञान की सार्वजनिक धारणा संकुचित होने लगती है।
विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक महत्त्व इस बात में था कि वह केवल पूँजी की जरूरतों को पूरा करने वाली संस्था बनकर नहीं रहा। उसने धीरे-धीरे अपनी एक स्वायत्त बौद्धिक भूमिका विकसित की। विश्वविद्यालयों ने डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासक तो तैयार किये ही, ऐसे नागरिक भी तैयार किये जो राज्य और पूँजी दोनों से प्रश्न कर सकें। साहित्य, दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति और विज्ञान ने समाज को अपने बारे में सोचने की क्षमता दी। विश्वविद्यालय वह स्थान बना जहाँ वर्तमान व्यवस्था को समझा भी जाता था और उसकी आलोचना भी की जाती थी; जहाँ समाज अपनी उपलब्धियों का उत्सव मनाता था तो अपनी विफलताओं से भी सामना करता था; जहाँ केवल यह नहीं पूछा जाता था कि रोजगार कहाँ मिलेगा, बल्कि यह भी पूछा जाता था कि न्याय क्या है, अच्छा जीवन क्या है, लोकतन्त्र किसे कहते हैं और समाज किस दिशा में जा रहा है। इस अर्थ में विश्वविद्यालय आधुनिक समाज के आत्म-चिन्तन की संस्था बन गया।
यहीं से आज का संकट शुरू होता है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के साथ राज्य की भूमिका में एक बड़ा परिवर्तन आया। पहले प्रश्न यह था कि राज्य अधिक से अधिक लोगों तक बेहतर शिक्षा कैसे पहुँचाए। धीरे-धीरे प्रश्न यह हो गया कि शिक्षा पर इतना सार्वजनिक खर्च क्यों किया जाए। फिर विश्वविद्यालयों से कहा जाने लगा कि वे अपने संसाधन स्वयं जुटाएँ, फीस बढ़ाएँ, स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाएँ, उद्योगों से साझेदारी करें, परियोजनाएँ लाएँ और अपने वित्तीय बोझ को कम करें। भारत में भी उच्च शिक्षा के वित्तपोषण में अनुदान के साथ ऋण आधारित व्यवस्थाओं और ‘आन्तरिक संसाधन सृजन’ की भाषा का महत्त्व बढ़ा है। यह कहना गलत होगा कि राज्य ने शिक्षा को पूरी तरह छोड़ दिया है, लेकिन राज्य की भूमिका धीरे-धीरे सार्वजनिक शिक्षा के पोषक से बाजारोन्मुख शिक्षा के नियामक, प्रबन्धक और कभी-कभी ऋणदाता की ओर बदलती दिखाई देती है।
अनुदान और ऋण के बीच का अन्तर केवल वित्तीय तकनीक का अन्तर नहीं है। इनके पीछे विश्वविद्यालय की दो अलग-अलग कल्पनाएँ हैं। अनुदान इस विश्वास पर आधारित है कि ज्ञान का निर्माण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है और हर ज्ञान से तत्काल आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती। किसी भाषा का संरक्षण, किसी प्राचीन पाण्डुलिपि का अध्ययन, किसी दुर्लभ बीमारी पर शोध, किसी दार्शनिक समस्या की पड़ताल या किसी दूरदराज समाज का समाजशास्त्रीय अध्ययन बाजार में तुरन्त लाभ न दे, फिर भी समाज के लिए मूल्यवान हो सकता है। ऋण की भाषा संस्था से पूछती है कि निवेश की वापसी कहाँ से होगी, संस्था स्वयं को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाएगी और उसका ‘आउटपुट’ कितना है। जैसे ही यह भाषा विश्वविद्यालय की प्रमुख भाषा बनती है, ज्ञान की प्राथमिकताएँ भी बदलने लगती हैं।
इस परिवर्तन का एक परिणाम विश्वविद्यालयों के भीतर बढ़ता प्रशासनिक नियन्त्रण है। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ने, पढ़ाने और शोध करने से अधिक ऊर्जा फाइल, समिति, अनुमति, स्पष्टीकरण, रिपोर्ट, अनुपालन और मुकदमों में खर्च होती दिखाई देती है। विश्वविद्यालय और सचिवालय के बीच का अन्तर कम होता जा रहा है। शिक्षक पढ़ाने से पहले दर्जनों प्रशासनिक औपचारिकताएँ पूरी करता है; विभाग किसी नये बौद्धिक कार्यक्रम पर विचार करने से अधिक रिपोर्ट तैयार करने में लगा रहता है; विद्यार्थी पुस्तकालय और कक्षा से अधिक कार्यालयों के चक्कर काटता है। नियुक्ति, पदोन्नति, आरक्षण, प्रवेश, अनुशासन और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर विश्वविद्यालयों में मुकदमों की संख्या बढ़ती है। कानून और नियम आवश्यक हैं, लेकिन जब नियम संवाद का स्थान ले लें और प्रशासन बौद्धिक समुदाय पर हावी हो जाए, तब विश्वविद्यालय धीरे-धीरे विचार की संस्था से फाइल की संस्था में बदलने लगता है।
शिक्षकों की बदलती स्थिति भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है। जिस विश्वविद्यालय-व्यवस्था में स्थायी नियुक्ति को अकादमिक स्वतन्त्रता की शर्त माना जाता था, वहाँ बड़ी संख्या में शिक्षक संविदा, अतिथि, एडहॉक या अस्थायी पदों पर काम कर रहे हैं। कई जगहों पर प्रति व्याख्यान या सीमित मानदेय पर पढ़ाया जा रहा है। जिस शिक्षक को यह नहीं पता कि उसका अनुबन्ध अगले छह महीने बाद रहेगा या नहीं, वह कितनी निर्भीकता से संस्थान, सरकार, बाजार या प्रचलित विचारों की आलोचना करेगा? हम शिक्षक से विद्यार्थी को स्वतन्त्र चिन्तन सिखाने की अपेक्षा करते हैं, जबकि शिक्षक की अपनी स्वतन्त्रता असुरक्षित होती जा रही है। यह केवल रोजगार का नहीं, ज्ञान की स्वतन्त्रता का प्रश्न है।
अब इस पूरी प्रक्रिया में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने एक नया मोड़ पैदा कर दिया है। पहले शिक्षक और पुस्तकालय ज्ञान तक पहुँचने के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे। इण्टरनेट ने इस एकाधिकार को तोड़ा। ऑनलाइन पाठ्यक्रमों, डिजिटल पुस्तकालयों और वीडियो व्याख्यानों ने ज्ञान तक पहुँच को और भी आसान बनाया है। अब जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने विद्यार्थी को कुछ ही क्षणों में किसी विषय का सारांश, अनुवाद, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और प्रारम्भिक लेख तक उपलब्ध करा दिया है। इससे शिक्षक की पुरानी भूमिका पर सीधा प्रश्न खड़ा होता है। यदि शिक्षक का काम केवल सूचना देना है, तो तकनीक यह काम अधिक तेजी, अधिक विस्तार और अक्सर अधिक आकर्षक ढंग से कर सकती है। यदि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल किसी नौकरी के लिए कुछ कौशल देना है, तो छोटे ऑनलाइन कार्यक्रम, कॉरपोरेट प्रशिक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित व्यक्तिगत शिक्षण कई मामलों में चार वर्ष के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम से सस्ते और तेज साबित हो सकते हैं।
यहीं पूँजी और विश्वविद्यालय के पुराने सम्बन्ध में बुनियादी बदलाव दिखाई देता है। औद्योगिक पूँजीवाद को बड़े पैमाने पर शिक्षित श्रमिकों की आवश्यकता थी। समकालीन डिजिटल, प्लेटफॉर्म और वित्तीय पूँजीवाद का श्रम-सम्बन्ध अलग है। उसे एक ओर बहुत कम संख्या में अत्यन्त उच्च प्रशिक्षित वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रबन्धक और विशेषज्ञ चाहिए, लेकिन दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे श्रमिक चाहिए जिन्हें सीमित, विशेषीकृत और लगातार बदलते कौशल देकर काम में लगाया जा सके। बहुत से कामों में दीर्घकालिक व्यापक शिक्षा की जगह छोटे प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र पर्याप्त माने जाने लगे हैं। इसलिए बाजार की दृष्टि से विश्वविद्यालय का वह हिस्सा, जो व्यापक मानवीय, सामाजिक और आलोचनात्मक शिक्षा देता है, महँगा और धीमा दिखाई पड़ सकता है। कौशल, दक्षता, रोजगार-योग्यता, प्रमाणपत्र और नौकरी दिलाने की भाषा शिक्षा की व्यापक भाषा पर हावी होती जा रही है।
लेकिन ठीक यहीं वह सूत्र सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिससे हमने शुरुआत की थी—पूँजी को विश्वविद्यालय की जरूरत कम हो सकती है, लेकिन लोकतन्त्र को उसकी जरूरत और बढ़ गयी है। बाजार को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो निर्धारित काम दक्षता से कर सके; लोकतन्त्र को ऐसा नागरिक चाहिए जो यह पूछ सके कि वह काम क्यों कर रहा है, किसके लिए कर रहा है और उसके सामाजिक परिणाम क्या हैं। बाजार को तकनीकी कौशल चाहिए; लोकतन्त्र को विवेक चाहिए। बाजार को अनुकूलन करने वाला श्रमिक चाहिए; लोकतन्त्र को जरूरत पड़ने पर असहमति व्यक्त करने वाला नागरिक चाहिए। बाजार तत्काल उपयोगी सूचना को महत्त्व देता है; लोकतन्त्र को इतिहास की स्मृति, नैतिक निर्णय, आलोचनात्मक बुद्धि और भविष्य की कल्पना की आवश्यकता होती है। इन क्षमताओं को किसी तीन महीने के कौशल पाठ्यक्रम से हासिल नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि मानविकी और समाज विज्ञान का संकट वास्तव में लोकतन्त्र के संकट से जुड़ा है। कोई पूछ सकता है कि दर्शन, इतिहास, साहित्य, राजनीति विज्ञान या समाजशास्त्र पढ़ने का आर्थिक लाभ क्या है। प्रश्न उचित है, लेकिन उसका उत्तर केवल रोजगार की भाषा में नहीं दिया जा सकता। इतिहास समाज को स्मृति देता है; दर्शन उसे अपने मूल्यों की आलोचना करना सिखाता है; साहित्य दूसरे मनुष्य के अनुभव में प्रवेश करने की क्षमता विकसित करता है; समाजशास्त्र सामाजिक संरचनाओं को समझने का साधन देता है; राजनीति विज्ञान सत्ता की प्रकृति और नागरिकता के अर्थ पर विचार करना सिखाता है। इनके बिना बाजार शायद चल सकता है, लेकिन एक जीवन्त लोकतन्त्र नहीं। लोकतन्त्र केवल मतदान की व्यवस्था नहीं है; वह विचार करने, असहमति रखने, तर्क देने और दूसरे की बात सुनने की सामाजिक क्षमता भी है।
इसलिए सार्वजनिक विश्वविद्यालय का महत्त्व आज शायद पहले से अधिक है। निजी विश्वविद्यालय भी उत्कृष्ट हो सकते हैं और निजी पूँजी शिक्षा में उपयोगी योगदान कर सकती है। मुद्दा सार्वजनिक और निजी के किसी सरल द्वन्द्व का नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि क्या समाज में ऐसी ज्ञान-संस्थाएँ रहेंगी जो अपने अस्तित्व के लिए तत्काल बाजार की स्वीकृति पर निर्भर न हों। कोई निजी निवेशक स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों में निवेश करेगा जहाँ माँग, प्रतिष्ठा या प्रतिफल हो। लेकिन कौन उस भाषा पर शोध करेगा जिसे कुछ हजार लोग बोलते हैं? कौन ऐसे सामाजिक प्रश्नों पर लम्बे समय तक काम करेगा जिनसे आर्थिक लाभ नहीं है? कौन सत्ता और पूँजी दोनों की आलोचना को संस्थागत संरक्षण देगा? सार्वजनिक विश्वविद्यालय का औचित्य ठीक इसी जगह से आता है।
नयी विश्वविद्यालय-व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका भी बदलनी होगी। सूचना देने वाले शिक्षक का युग लगभग समाप्त हो रहा है। विद्यार्थी के पास सूचना की कमी नहीं है; समस्या यह है कि वह सूचना के महासागर में सत्य और असत्य, महत्त्वपूर्ण और तुच्छ, ज्ञान और प्रचार के बीच अन्तर कैसे करे। इसलिए शिक्षक का काम उत्तर देना कम और प्रश्न बनाना अधिक होगा। उसे विद्यार्थी को यह सिखाना होगा कि किसी दावे की जाँच कैसे करें, दो विरोधी तर्कों को कैसे पढ़ें, किसी विचार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कैसे समझें और अपने पूर्वाग्रहों की पहचान कैसे करें। तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, विवेक की जरूरत उतनी ही बढ़ेगी। एआई उत्तर दे सकती है, लेकिन कौन-सा प्रश्न पूछना चाहिए यह मनुष्य को सीखना होगा।
इसी तरह शिक्षा को रोजगार और जीवन के बीच नया सन्तुलन बनाना होगा। रोजगार शिक्षा का आवश्यक उद्देश्य है, विशेषकर भारत जैसे समाज में जहाँ करोड़ों परिवार शिक्षा को सामाजिक गतिशीलता का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन मानते हैं। किसी गरीब विद्यार्थी से यह कहना कि शिक्षा केवल आत्म-विकास के लिए है, क्रूर रोमानी विचार होगा। लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा को रोजगार तक सीमित करना भी उतना ही खतरनाक है। मनुष्य केवल श्रमिक नहीं है; वह नागरिक, नैतिक प्राणी, परिवार और समुदाय का सदस्य तथा सृजनशील व्यक्तित्व भी है। उसे जीविका के लिए कौशल चाहिए, लेकिन साथ ही यह क्षमता भी चाहिए कि वह अपने जीवन और समाज के बारे में सोच सके। इसलिए शिक्षा के कम से कम चार उद्देश्य होने चाहिए—जीविका की क्षमता, आलोचनात्मक बुद्धि, सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मबोध और बेहतर भविष्य की कल्पना करने की शक्ति।
अन्ततः भारतीय शिक्षा का संकट पैसे से बड़ा है। यह हमारी कल्पना का संकट है। हम विश्वविद्यालय से रोजगार चाहते हैं, सरकार उससे रैंकिंग चाहती है, अभिभावक अच्छा पैकेज चाहते हैं, कॉरपोरेट को कौशल चाहिए, प्रशासन को अनुशासन चाहिए, शिक्षक को पदोन्नति चाहिए और विद्यार्थी को डिग्री चाहिए। इन सबकी अपनी वैधता है, लेकिन इनके बीच वह मूल प्रश्न गायब हो गया है कि विद्या किसे कहते हैं। क्या शिक्षा केवल व्यक्ति को वर्तमान व्यवस्था में समायोजित करने की प्रक्रिया है, या उसे यह क्षमता भी देनी है कि वह उस व्यवस्था को समझे, उसका मूल्यांकन करे और जरूरत पड़ने पर उसके विकल्प की कल्पना कर सके? विश्वविद्यालय का भविष्य इसी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करेगा।
इसलिए हमें विश्वविद्यालय को केवल बचाना नहीं, बल्कि उसे पुनः आविष्कृत करना है। ऐसा विश्वविद्यालय चाहिए जो तकनीक से डरे नहीं, लेकिन तकनीक का गुलाम भी न बने; जो रोजगार की तैयारी करे, लेकिन शिक्षा को रोजगार में सीमित न करे; जो कौशल दे, लेकिन विवेक भी पैदा करे; जो वैश्विक ज्ञान से जुड़े, लेकिन अपने समाज और बौद्धिक परम्पराओं का आत्मबोध भी विकसित करे; जो प्रशासनिक रूप से जवाबदेह हो, लेकिन प्रशासनिक नियन्त्रण में बौद्धिक स्वतन्त्रता न खो दे। सबसे बढ़कर ऐसा विश्वविद्यालय चाहिए जहाँ समाज स्वयं अपने ऊपर विचार कर सके।
इसीलिए सार्वजनिक विश्वविद्यालय की रक्षा किसी पुरानी संस्था के प्रति भावुक लगाव का प्रश्न नहीं है; यह लोकतन्त्र के बौद्धिक आधार का प्रश्न है। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल बदलती पूँजी के लिए उपयुक्त श्रमिक तैयार करना है, तो छोटे प्रशिक्षण केन्द्र, ऑनलाइन प्रमाणपत्र, एआई आधारित शिक्षण और कॉरपोरेट अकादमियाँ बहुत-सा काम कर सकती हैं। लेकिन यदि लोकतन्त्र को स्वतन्त्र नागरिक, आलोचनात्मक बुद्धि, सामाजिक स्मृति, नैतिक विवेक और वैकल्पिक भविष्य की कल्पना चाहिए, तो विश्वविद्यालय अपरिहार्य है। बदली हुई पूँजी विश्वविद्यालय के बिना शायद अपना काम चला लेगी; लोकतन्त्र नहीं चला पाएगा। विश्वविद्यालय भवन का नाम नहीं है; वह उस जगह का नाम है जहाँ समाज स्वयं को समझता है, स्वयं से असहमति करता है और अपने भविष्य की नयी कल्पना करने का साहस पैदा करता है।










