
हिन्दी में न्याय और न्याय में हिन्दी
लोकतन्त्र, संविधान और नागरिक गरिमा के सन्दर्भ में भाषायी न्याय का प्रश्न
भारत में भाषा का प्रश्न कभी केवल भाषा का प्रश्न नहीं रहा। भाषा व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, शिक्षा, अवसर और सार्वजनिक जीवन में उसकी भागीदारी से जुड़ती है। न्याय के क्षेत्र में इसका महत्त्व इसलिए और बढ़ जाता है कि कानून और न्यायिक संस्थाएँ नागरिक के अधिकारों के संरक्षण का प्रमुख माध्यम हैं। यदि नागरिक कानून की भाषा से ही पर्याप्त रूप से परिचित न हो सके, तो उसके और न्याय-व्यवस्था के बीच एक ऐसी दूरी बन जाती है जिसे केवल न्यायालयीन प्रक्रिया की दक्षता से समाप्त नहीं किया जा सकता। इस अर्थ में “हिन्दी में न्याय और न्याय में हिन्दी” का प्रश्न केवल न्यायालयों में हिन्दी के प्रयोग का प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिक और न्याय के बीच भाषायी दूरी को कम करने का प्रश्न है।
हाल में न्याय को भाषायी आजादी जैसे प्रयासों के सन्दर्भ में एक मित्र से हुए संवाद ने इस प्रश्न को मेरे सामने एक दूसरे कोण से रखा। उनका विचार था कि ऐसे प्रयासों का उद्देश्य न्यायालयों और विधि-क्षेत्र में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग तक सीमित रहना चाहिए और राजनीतिक विषयों को उनसे अलग रखना चाहिए। इस विचार में संगठनात्मक स्पष्टता का अपना महत्त्व है, लेकिन इससे यह बुनियादी प्रश्न भी उठता है कि क्या न्याय को उसके सामाजिक और संवैधानिक सन्दर्भ से पूरी तरह अलग करके केवल न्यायालय की भाषा का प्रश्न बनाया जा सकता है। यदि उद्देश्य यह है कि विधि-छात्र, अधिवक्ता और सामान्य नागरिक भारतीय भाषाओं में भी न्याय-व्यवस्था को समझ सकें और उसका प्रभावी उपयोग कर सकें, तो भाषा का प्रश्न स्वाभाविक रूप से नागरिक अधिकारों और लोकतान्त्रिक भागीदारी से जुड़ता है।
न्याय तक पहुँच केवल न्यायालय के दरवाजे तक पहुँच जाने का नाम नहीं है। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति उस व्यवस्था को समझ सके जिसके सामने वह अपनी समस्या लेकर जा रहा है। सामान्य नागरिक कानून का विशेषज्ञ नहीं होता। वह विधिक शब्दावली, न्यायिक प्रक्रियाओं और संवैधानिक प्रावधानों की तकनीकी बारीकियों से परिचित नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके जीवन में कानून का महत्त्व कम है। जमीन, रोजगार, शिक्षा, साम्पत्ति, स्वतन्त्रता, सम्मान और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न उसके जीवन का हिस्सा हैं। जब वह इन प्रश्नों के समाधान के लिए न्याय-व्यवस्था की ओर देखता है, तब भाषा उसकी पहुँच को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण तत्त्व बन जाती है।
इसीलिए न्याय की भाषा का प्रश्न केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है। कानून को समझना और कानून के संरक्षण का प्रभावी उपयोग कर पाना नागरिक अधिकार का हिस्सा है। यदि किसी न्यायिक आदेश की भाषा इतनी जटिल हो कि सम्बन्धित व्यक्ति उसके परिणाम को समझने के लिए पूरी तरह किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहे, तो न्याय की औपचारिक उपलब्धता और उसकी वास्तविक पहुँच के बीच अन्तर बना रहता है। इसी तरह यदि किसी अधिवक्ता की विधिक योग्यता का मूल्यांकन उसकी अँग्रेजी की अभिव्यक्ति से अधिक होने लगे, तो भाषा और विधिक दक्षता के बीच अनावश्यक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
इस सन्दर्भ में अँग्रेजी को समस्या मान लेना उचित नहीं होगा। अँग्रेजी ने भारतीय विधि-व्यवस्था, उच्च शिक्षा और विधिक शोध के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है और वर्तमान में भी वह ज्ञान के अनेक वैश्विक स्रोतों तक पहुँच का प्रमुख माध्यम है। समस्या अँग्रेजी की मौजूदगी नहीं, बल्कि उसका ऐसा सामाजिक और संस्थागत वर्चस्व है जिसमें अँग्रेजी को योग्यता और आधुनिकता का स्वाभाविक प्रमाण तथा भारतीय भाषाओं को अपेक्षाकृत कमतर समझ लिया जाता है। जब भाषा सामाजिक प्रतिष्ठा और पेशेवर अवसरों का निर्धारक बनने लगे, तब वह संचार के माध्यम से आगे बढ़कर सामाजिक संरचना का हिस्सा बन जाती है।
भारतीय भाषाओं में न्याय की चर्चा का उद्देश्य इसलिए अँग्रेजी को हटाना नहीं, बल्कि भाषायी अवसरों को अधिक समान बनाना होना चाहिए। एक व्यक्ति अँग्रेजी में बेहतर अभिव्यक्ति कर सकता है, दूसरा हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा में। दोनों की विधिक समझ और पेशेवर क्षमता का मूल्यांकन भाषा के बजाय उनके ज्ञान, तर्क और विधिक दक्षता के आधार पर होना अधिक न्यायसंगत होगा। इसी तरह सामान्य नागरिक को भी यह अवसर मिलना चाहिए कि वह अपने अधिकारों और कानूनी दायित्वों को ऐसी भाषा में समझ सके जिसमें वह सहज हो।
यहाँ “हिन्दी में न्याय” और “न्याय में हिन्दी” के बीच का अन्तर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। हिन्दी में न्याय का पहला आशय न्यायिक प्रक्रिया में हिन्दी की उपलब्धता से है, लेकिन न्याय में हिन्दी का अर्थ इससे व्यापक है। इसका आशय है कि हिन्दी न्याय, संविधान, अधिकार, विधिक शिक्षा और नागरिक चेतना के विमर्श की एक सक्षम भाषा बने। इसके लिए केवल न्यायिक निर्णयों का अनुवाद पर्याप्त नहीं होगा। विधि की उच्च गुणवत्ता वाली पाठ्य-पुस्तकें, प्रामाणिक विधिक शब्दकोश, न्यायिक निर्णयों के विश्वसनीय अनुवाद, शोध-सामग्री और डिजिटल विधिक संसाधन भारतीय भाषाओं में विकसित करने होंगे। भाषा तभी न्याय की प्रभावी भाषा बन सकती है जब उसके पीछे ज्ञान और संस्थागत संसाधनों की पूरी संरचना उपलब्ध हो।
इस प्रश्न का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष शायद विधि-शिक्षा है। यदि विद्यार्थी कानून को मुख्यतः अँग्रेजी में पढ़ता है, विधिक शोध के लिए अँग्रेजी स्रोतों पर निर्भर रहता है और महत्त्वपूर्ण निर्णयों की समझ भी उसी भाषा से प्राप्त करता है, तो केवल न्यायालय में हिन्दी के प्रयोग की अपेक्षा व्यवहार में सीमित परिणाम देगी। भारतीय भाषाओं में विधि-शिक्षा का अर्थ अँग्रेजी को समाप्त करना नहीं, बल्कि ज्ञान के अतिरिक्त रास्ते खोलना है। द्विभाषी विधिक शिक्षा इस दिशा में एक व्यावहारिक मॉडल हो सकती है, जिसमें विद्यार्थी मूल अँग्रेजी स्रोतों तक भी पहुँच बनाए रखे और अपनी भाषा में विधिक अवधारणाओं को समझने की पर्याप्त क्षमता भी विकसित करे।
न्यायिक भाषा की प्रकृति पर भी इसी दृष्टि से विचार होना चाहिए। विधि में शब्दों की सटीकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, लेकिन सटीकता का अर्थ अनिवार्य रूप से जटिलता नहीं है। ऐसी हिन्दी जो अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ, कृत्रिम या अँग्रेजी का शब्दशः अनुवाद हो जाए, वह नागरिक के लिए सहज नहीं होगी। आवश्यकता ऐसी आधुनिक और जीवन्त विधिक हिन्दी की है जिसमें तकनीकी अर्थ सुरक्षित रहें और सामान्य पाठक भी मूल आशय को समझ सके। भाषा को सरल बनाने का अर्थ कानून को सरल या कमजोर बनाना नहीं है; बल्कि कई स्थितियों में स्पष्ट भाषा कानून के प्रभाव को अधिक व्यापक बनाती है।
भाषायी न्याय का प्रश्न सामाजिक न्याय से भी जुड़ता है, लेकिन इस सम्बन्ध को सावधानी से समझने की जरूरत है। भारत में अँग्रेजी तक गुणवत्तापूर्ण पहुँच शिक्षा और रोजगार के अनेक अवसरों से जुड़ी रही है। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए अँग्रेजी की सीमित पहुँच कई बार उनकी वास्तविक क्षमता और उपलब्ध अवसरों के बीच अन्तर पैदा करती है। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा और विधि-शिक्षा का विस्तार इस असमानता को कम करने में सहायक हो सकता है। इसका उद्देश्य किसी भाषा को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि भाषा के कारण पैदा होने वाली अतिरिक्त बाधाओं को कम करना होना चाहिए।
यही बात भारतीय भाषाओं की विविधता पर भी लागू होती है। हिन्दी को भारतीय भाषाओं के व्यापक परिदृश्य से अलग करके देखना उचित नहीं होगा। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बंगाली, असमिया, पंजाबी, उर्दू, मैथिली, भोजपुरी और अनेक अन्य भाषाएँ भारतीय समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अभिव्यक्ति हैं। इसलिए हिन्दी के पक्ष में तर्क तभी अधिक लोकतान्त्रिक होगा जब वह अन्य भारतीय भाषाओं के समान सम्मान और अवसर की माँग के साथ जुड़ा हो। प्रश्न अँग्रेजी बनाम हिन्दी का नहीं, बल्कि एकभाषी वर्चस्व बनाम बहुभाषी लोकतन्त्र का होना चाहिए।
यहीं भाषा, लोकतन्त्र और नागरिक अधिकारों के सम्बन्ध को समझना उपयोगी है। नागरिक को अपने अधिकारों के बारे में जानना, राज्य की कार्रवाई पर प्रश्न करना और न्याय की माँग करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। यह जरूरी नहीं कि हर ऐसा प्रश्न दलगत राजनीति का प्रश्न हो। सरकार की किसी नीति की आलोचना और किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध एक ही बात नहीं है। इसलिए नागरिक अधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों पर चर्चा को केवल “राजनीतिक” कहकर न्याय के प्रश्न से अलग करना उचित नहीं होगा। फिर भी भाषायी न्याय के विमर्श में इन व्यापक प्रश्नों का स्थान तभी सार्थक है जब वे मूल विषय—नागरिक की न्याय तक पहुँच—से सीधे जुड़े रहें।
इस दृष्टि से लोकतन्त्र की वास्तविक कसौटी यह नहीं कि नागरिक केवल चुनाव में भाग लेता है या नहीं, बल्कि यह भी है कि वह अपने अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों को कितनी स्पष्टता से समझ सकता है। यदि संविधान नागरिक के लिए एक दूरस्थ और कठिन पाठ बना रहता है, तो संवैधानिक लोकतन्त्र की सामाजिक जड़ें कमजोर रह सकती हैं। भारतीय भाषाओं में संविधान और कानून की व्याख्या इस दूरी को कम कर सकती है। यह केवल भाषा-परिवर्तन नहीं, संवैधानिक ज्ञान के लोकतन्त्रीकरण की प्रक्रिया है।
हालाँकि इस दिशा में कई व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं। विधिक शब्दावली में एकरूपता, प्रामाणिक अनुवाद, न्यायिक प्रशिक्षण, विभिन्न न्यायालयों के बीच भाषायी समन्वय और गुणवत्तापूर्ण विधिक सामग्री का निर्माण आसान काम नहीं है। लेकिन इन्हें भावनात्मक आग्रहों के बजाय संस्थागत और तकनीकी प्रश्नों के रूप में देखना अधिक उपयोगी होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक बहुभाषी विधिक सामग्री तथा अनुवाद को व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन विधिक प्रामाणिकता और उत्तरदायित्व के लिए विशेषज्ञ मानवीय समीक्षा आवश्यक रहेगी।
अन्ततः “हिन्दी में न्याय और न्याय में हिन्दी” को हिन्दी बनाम अँग्रेजी के विवाद में सीमित करना इस विचार की संभावनाओं को छोटा कर देता है। मूल प्रश्न यह है कि भाषा नागरिक और न्याय के बीच किस प्रकार का सम्बन्ध बनाती है। यदि भाषा नागरिक को अपने अधिकारों को समझने, अपनी बात कहने और न्यायिक व्यवस्था में प्रभावी भागीदारी करने में सक्षम बनाती है, तो वह लोकतन्त्र का माध्यम बनती है। यदि भाषा उसकी विधिक समझ या पेशेवर अवसरों के रास्ते में अनावश्यक बाधा बनती है, तो वह सामाजिक असमानता को भी पुनरुत्पादित कर सकती है।
इसलिए भाषायी न्याय का अर्थ किसी एक भाषा को दूसरी भाषा का स्थान देना भर नहीं है। इसका अधिक व्यापक अर्थ यह है कि नागरिक की भाषा उसकी न्याय तक पहुँच को सीमित न करे। हिन्दी को न्याय की सक्षम भाषा बनाने का प्रयास इसी व्यापक बहुभाषी दृष्टि का हिस्सा हो सकता है। अदालत में हिन्दी की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि कानून, संविधान और नागरिक अधिकारों का बोध समाज के उस बड़े हिस्से तक पहुँचे जिसकी पहली भाषा अँग्रेजी नहीं है।
न्याय की भाषा अन्ततः वही हो सकती है जिसमें नागरिक अपने अधिकार को समझ सके, अपने प्रश्न को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सके और राज्य तथा न्याय-व्यवस्था के सामने अपनी गरिमा बनाए रखते हुए उपस्थित हो सके। इस अर्थ में “हिन्दी में न्याय” केवल न्यायालय की भाषा का प्रश्न नहीं रह जाता और “न्याय में हिन्दी” केवल हिन्दी की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं रह जाता। दोनों मिलकर उस व्यापक प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं जिसमें भाषा, विधि और लोकतन्त्र के बीच की दूरी कम होती है और न्याय नागरिक के लिए अधिक बोधगम्य, सुलभ और सहभागी व्यवस्था बनता है।









