हिडन
सिनेमा

खुद अपने में उलझती ‘हिडन’

 

कुछ दोस्त, मुंबई शहर, ड्रग्स, मर्डर, गालियां, आनन-फानन में कास्टिंग, उलझती, रायता फैलाती कहानी लो जी तैयार है इस तरह सीरीज।

कहानी फिर भी बता दूं मनन और समय दीक्षित दोस्त हैं। समय ने मनन दीक्षित को मारा। उसकी सुपारी मिली किसी तीसरे को, सुपारी देने वाला कोई चौथा। इधर दूसरी तरफ एक और मर्डर उसकी भी किसी चौथे ने किसी तीसरे को सुपारी दी। अंत मे आते-आते ड्रग्स बेचने वाले का पता लगा, मर्डर करने वाले का पता लगा। लेकिन क्राइम ब्रांच के अधिकारी जो इतने समय से लगे हैं छानबीन करने में उनके नाक के नीचे से अपराधी खिसक लिया।

लो जी सीरीज खत्म, प्रसाद बंट गया। अब सीजन दो और सीजन तीन की तैयारी में जुटो। उसमें बताएंगे कातिल, मर्डरर, ड्रग्स बेचने वाले, सुपारी देने वाले सबके राज खोलेंगे। एक अलग ही बिजनेस मैन भी है ओ हो!

मुंबई को लेकर माफियाओं, ड्रग्स इन सब पर अब इतनी फिल्में बन चुकी हैं और अब तो सीरीज भी आईं हैं तो उन सबमें यह ‘हिडन’ अपनी कहानी और ठीक से प्रमोशन न होने के चलते हिडन ही रह गई। नया ओटीटी , कच्ची-पक्की, फैली हुई सी कहानी, मिला जुला सा अभिनय, निम्न स्तर का बैकग्राउंड स्कोर, एक गाना वो भी महक देता है अपने बोल और म्यूजिक के डायरेक्शन के चलते कॉपी किए हुए की।

पहली ही बारी में सीरीज को डायरेक्ट करने वाले विशाल सांवत को अभी डायरेक्शन की बारीकियों को सीखना, समझना होगा अगर वे इंडस्ट्री में लंबी रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं तो। सीरीज की कहानी भी डायरेक्टर ने लिखी है, स्क्रीनप्ले भी उन्हीं का है तो जैसे मर्जी फैलाओ। इधर अभिनय के मामले में इंस्पेक्टर गजरे के रूप में रोहित परशुराम का काम बेहतर रहा। हल्का के किरदार में संदीप पाठक, क्राइम ब्रांच टीम के अधिकारी प्रभाकर , दक्ष अजीत सिंह , संदीप रायकर के रूप में मनवीर चौधरी भी ठीक रहे। लेकिन मनवीर इस सीरीज में थोड़ा निराश करते हैं। पिछली बार ‘मास्साब’ फ़िल्म में उनका काम बढ़िया रहा था। होस्टल वार्डन के रूप में रजत वर्मा शुद्ध हिंदी का इस्तेमाल करते हुए जँचते हैं। संतोष जुवेकार, पंकज मिश्रा, सीमा कुलकर्णी, नाजीन पटानी आदि तमाम कलाकार भी मिला जुला असर छोड़ने में कामयाब रहे।

कैमरामैन, बैकग्राउंड स्कोर, वीएफएक्स में काफी सुधार की गुंजाइश नजर आती है। केवल इंट्रो के समय में बैकग्राउंड थोड़ा चमकता है बाकी समय लहराता, डोलता, उठता-गिरता नजर आता है। ओटीटी की भीड़ में खोई हुई यह सीरीज पिंग-पोंग नाम के नए प्लेटफॉर्म पर आई है। अपनी कहानी में उलझने के बावजूद, ओटीटी की भीड़ में खोने के बावजूद यह अब फ्री में उपलब्ध है। तो एक बार आप जरूर देख सकते हैं। तमाम कमियों के चलते हुए आपके पास मोबाइल में डाटा बचा हुआ है या इंस्टाग्राम पर रील्स देखकर टाइम पास करते हैं तो ऐसा करने वालों के लिए यह सीरीज रोचक होगी।

अपनी रेटिंग – ढाई स्टार

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x