मुद्दा

थोड़ा डिजिटल हो जाएँ 

 

    कोरोना काल ने सही मायने में भारत को डिजिटल इण्डिया बना दिया है। पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में इसका व्यापक असर हुआ है। प्राइमरी से लेकर उच्चशिक्षा संस्थानों ने ऑनलाईन कक्षाओं का सहारा लेकर नये प्रतिमान रचे हैं। आने वाले समय में यह चलन कितना प्रभावी होगा यह तो नहीं कहा जा सकता, किन्तु संकट काल में संवाद, शिक्षा और सहकार्य के तमाम अवसर इस माध्यम से प्रकट हुए हैं।

  यह कहा जा रहा कि ऑनलाइन कक्षाएँ वास्तविक कक्षाओं का विकल्प नहीं हो सकतीं क्योंकि एक शिक्षक की उपस्थिति में कुछ सीखना और उसकी वर्चुअल उपस्थिति में कुछ सीखना दोनों दो अलग-अलग परिस्थितियाँ हैं। सम्भव है कि हमारा अभ्यास वास्तविक कक्षाओं का है और हमारा मन और दिमाग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि ऑनलाइन कक्षाएँ भी सफल हो सकती हैं। दिमाग की कंडीशनिंग (अनुकूलन) कुछ ऐसी हुई है कि हम वर्चुअल कक्षाओं को वह महत्ता देने के लिए तैयार नहीं है जो वास्तविक कक्षाओं के देते हैं। फिर भी यह मानना होगा कि आभासी दुनिया आज तमाम क्षेत्रों में वास्तविक दुनिया को मात दे रही है।

हमारे निजी जीवन में हम जिस तरह डिजिटल हुए हैं, क्या वह पहले सम्भव दिखता था। हमारी बैंकिग, हमारे बाजार, हमारा खानपान, तमाम तरह के बिल भरने की प्रक्रिया, टिकिटिंग और ट्रैवलिंग के इन्तजाम क्या कभी ऑनलाइन थे। पर समय ने सब सम्भव किया है। आज एटीएम जरूरत है तथा ऑनलाइन टिकट वास्तविकता। हमारी तमाम जरूरतें आज ऑनलाईन ही चल रही हैं। ऐसे में यह कहना बहुत गैरजरुरी नहीं है कि ऑनलाइन माध्यम ने सम्भावनाओं के नये द्वार खोल दिए हैं। ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम को इस कोरोना संकट ने मजबूत कर दिया है।

   ऑनलाइन कक्षाओं ने संसाधनों का एक नया आकाश रच दिया है। जो व्यक्ति आपकी किसी क्लास, किसी आयोजन, कार्यशाला के लिए दो घन्टे का समय लेकर नहीं आ सकता,यात्रा में लगने वाला वक्त नहीं दे सकता। वही व्यक्ति हमें आसानी से उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि उसे पता है कि उसे अपने घर या आफिस से ही यह संवाद करना है और इसके लिए उसे कुछ अतिरिक्त करने की जरुरत नहीं है। यह अपने आप में बहुत गजब समय है। जब मानव संसाधन के स्मार्ट इस्तेमाल के तरीके हमें मिले हैं। आप दिल्ली, चेन्नई या भोपाल में होते हुए भी विदेश के किसी देश में बैठे व्यक्ति को अपनी ऑनलाईन कक्षा में उपलब्ध करा सकते हैं। इससे शिक्षण में विविधता और नये अनुभवों का सामंजस्य भी सम्भव हुआ है। इस शिक्षा का ना तो भूगोल है, न ही समय सीमा।

इन लाकडाउन के दिनों में अनेक मित्रों ने कई विषयों में ऑनलाइन कोर्स कर अपने को ज्ञानसमृद्ध किया है। भोपाल का एक विश्वविद्यालय सूदूर अरुणाचल विश्वविद्यालय के विद्वान मित्रों के साथ एक साझा संगोष्ठी ऑनलाइन आयोजित कर लेता है। यह किसी विदेशी विश्वविद्यालय के साथ भी सम्भव है। यात्राओं में होने वाले खर्च, आयोजनों में होने वाले खर्च, खानपान के खर्च जोड़ें तो ऐसी संगोष्ठियाँ कितनी महंगी हैं। बावजूद इसके किसी व्यक्ति को साक्षात सुनना और देखना।

साक्षात संवाद करना और वर्चुअल माध्यम से उपस्थित होना। इसमें अन्तर है। यह रहेगा भी। बावजूद इसके जैसे-जैसे हम इस माध्यम के साथ हम सहज होते जाएँगें,यह माध्यम भी वही सुख देगा जो किसी की भौतिक उपस्थिति देती है। भावनात्मक स्तर पर इसकी तुलना सिनेमा से की जा सकती है। यह सिनेमा सा सुख है। अच्छा सिनेमा हमें भावनात्मक स्तर पर जोड़ लेता है। इसी तरह अच्छा संवाद भी हमें जोड़ता है भले ही वह वर्चुअल क्यों न हो। जबकि बोरिंग संवाद भले ही हमारे सामने हो रहे हों, हम हाल की पहली पंक्ति में बैठकर भी सोने लगते हैं या बोरियत का अनुभव करने लगते हैं।

  शिक्षा का असल काम है विषय में रूचि पैदा करना। अच्छा शिक्षक वही है जो आपमें जानने की भूख जगा दे। इसलिए प्रेरित करने का काम ही हमारी कक्षाएँ करती हैं। पुरानी पीढ़ी शायद इतनी जल्दी यह स्वीकार न करे, किन्तु नई पीढ़ी तो वर्चुअल माध्यमों के साथ ही ज्यादा सहज है। हमें दुकान में जाकर सैकड़ों चीजें में से कुछ चीजें देखकर,छूकर, मोलभाव करके खरीदने की आदत है। नई पीढ़ी ऑनलाइन शापिंग में सहज है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें नई पीढ़ी की चपलता, सहजता देखते ही बनती है। शायद हम जैसे शिक्षकों को  इस माध्यम के साथ वह सहजता न महसूस हो रही हो, सम्भव है कि आपकी वर्चुअल कक्षा में उपस्थित छात्र या छात्रा उसके साथ ज्यादा सहज हों।

हमारा मन यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि कोई स्क्रीन हमारी भौतिक उपस्थिति से ज्यादा ताकतवर हो सकती है। किन्तु आवश्यक्ता और मजबूरियाँ हमें नये विकल्पों पर विचार के लिए बाध्य करती हैं। आज ऑनलाइन शिक्षा एक वास्तविकता है, जिसे हम माने या न मानें स्वीकारना पड़ेगा। कोरोना के संकट ने हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। जिसमें क्लासरूम टीचिंग की प्रासंगिकता, उसकी रोचकता और जरुरत बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। ज्ञान को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने और सहज संवाद की चुनौती भी सामने है। आज का विद्यार्थी नये वर्चुअल माध्यमों के साथ सहज है, उसने डिजिटल को स्वीकार कर लिया है।

इसलिए डिजिटल माध्यमों के साथ सहज संबंध बनाना शिक्षकों की भी जिम्मेदारी है। कक्षा के अलावा असाईनमेंट, नोट्स और अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए हम पहले से ही डिजिटल थे। अब कक्षाओं का डिजिटल होना भी एक सच्चाई है। संवाद, वार्तालाप, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों को डिजिटल माध्यमों पर करना सम्भव हुआ है। इसे ज्यादा सरोकारी, ज्यादा प्रभावशाली बनाने की विधियाँ निरन्तर खोजी जा रही हैं। इस दिशा में सफलता भी मिल रही है। गूगल मीट, जूम, जियो मीट, स्काइप जैसे मंच आज की डिजिटल बैठकों के सभागार हैं। जहां निरन्तर सभाएँ हो रही हैं, विमर्श निरन्तर है और संवाद 24X7  है।

कहते हैं डिजिटल मीडिया का सूरज कभी नहीं डूबता। वह सदैव है, सक्रिय है और चैतन्य भी। माध्यम की यही शक्ति इसे खास बनाती है। यह बताती है कि प्रकृति सदैव परिर्वतनशील है और कुछ भी स्थायी नहीं है। मनुष्य ने अपनी चेतना का विस्तार करते हुए नित नई चीजें विकसित की हैं। जिससे उसे सुख मिले, निरन्तर संवाद और जीवन में सहजता आए। डिजिटल मीडिया भी मनुष्य की इसी चेतना का विस्तार है। इसके आगे भी वह नये-नये रुप लेकर आता रहेगा। नया और नया और नया। न्यू मीडिया के आगे भी कोई और नया मीडिया है। उस सबसे नये की प्रतीक्षा में आइए थोड़ा डिजिटल हो जाएँ।

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लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली के महानिदेशक हैं। सम्पर्क +919893598888, 123dwivedi@gmail.com

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