
मिलती नहीं मजूरी
हर नयी पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज्यादा तेज होती है, हर नयी पीढ़ी के समक्ष पिछली पीढ़ी से ज्यादा चुनौतियाँ होती हैं। कोई साठ साल पहले साहिर के लिखे एक गीत की पंक्ति है—‘तालीम है अधूरी, मिलती नहीं मजूरी।’ इसी मजूरी यानी रोजगार के इर्द-गिर्द तो जीवन नाच रहा है। भारत की युवा-जनसंख्या (15-29 वर्ष वाले) विश्व में सबसे ज्यादा है। भारत के करीब 36.7 करोड़ लोग इस दायरे में आते हैं और यह देश के ‘वर्किंग एज पॉपुलेशन’ का लगभग एक तिहाई है। बेरोजगारी का हाल सबके सामने है। हर साल मिलने वाली नौकरियों में 4.6 प्रतिशत ही स्थायी होती हैं। शिक्षा और रोजगार के अपर्याप्त, असंगत और अनियमित अवसर तथा उपलब्ध अवसरों में भ्रष्टाचार की सेंध नयी पीढ़ी के भविष्य को अन्धकारमय बनाने के लिए काफी है। दूसरी बात यह है कि हमारी सामाजिक संरचना में ‘व्हाइट कॉलर’ और सरकारी नौकरियों को लेकर अनावश्यक आकर्षण है। इन दोनों ही कैटेगरी में अवसर सीमित हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में पुलिस में सिपाही के 32000 पदों के लिए 28 लाख लोगों ने आवेदन भरा। इनमें बी.ए., बी.एड., इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई किये हुए लोग बहुसंख्यक हैं। यह बात ‘पढ़े फारसी बेचे तेल’ वाली ही है। अभी विभिन्न राज्यों में होने वाले जेन जी के आन्दोलन इस बात को रेखांकित कर रहे हैं कि यह पूरी व्यवस्था बहुत गड़बड़ हो चुकी है।
हमारे देश में काम खोजना भी एक काम बना हुआ है। यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा के लिए अधिकतम आयु 32 से 37 वर्ष है। राज्यों की सिविल सर्विस परीक्षा के लिए यह 35-40 वर्ष तक है। यह युवा शक्ति को उलझाए रखने का मामला है। बात शिक्षा की गुणवत्ता की भी है। बीए, एमए, पीएचडी डिग्रीधारियों का स्तर किसी से छुपा नहीं है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों में भारी मिसमैच है।
नौकरियों के प्रति गहरा आकर्षण युवाओं को उद्यमिता या स्व-रोजगार की ओर जाने से रोकता है। इसका एक कारण देश के लोगों के बीच आर्थिक असमानता भी है। देश की नीतियों का भी इसमें हाथ है। आर्थिक विकास के क्रम में मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा योगदान होता है, लेकिन भारत में इसका समुचित विकास नहीं हो पाया। चीन इसका सफल उदाहरण है। देश में नीतियों के स्तर पर चीजों को रखा तो गया है, लेकिन ‘चलता है’ वाली मानसिकता ने उन्हें कभी ढंग से लागू नहीं होने दिया।
आइटीआइ (इण्डस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट), पीएमईजीपी (प्रधानमन्त्री इम्प्लॉयमेण्ट जेनेरेशन प्रोग्राम) और आरसेटी (रूरल सेल्फ इम्प्लॉयमेण्ट ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट्स) के उदाहरणों से भी इसे समझा जा सकता है। ‘क्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम’ के रूप में 1950 से आइटीआइ की, 2008 में पीएमईजीपी (पूर्ववर्ती रूप पीएमआरवाय 1993 से) और 2009 से आरसेटी की शुरुआत हुई। आइटीआइ अलग-अलग ट्रेड्स में छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं। इलेक्ट्रिशियन, फिटर, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, वेल्डर आदि इनके कुछ उदाहरण हैं। प्रशिक्षण के बाद वे सम्बद्ध उद्योगों-कारखानों में काम करने योग्य हो जाते हैं। आइटीआइ कौशल विकास की दृढ़ और भरोसेमन्द संरचना हो सकती है।
नीति आयोग की 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 11595 आइटीआइ हैं, जिनमें सीटों की संख्या 25 लाख के करीब है। दिक्कत यह है कि आधे से ज्यादा सीटें खाली रह जाती हैं। ऐसा इसलिए है कि आइटीआइ किसी की प्राथमिकताओं में नहीं हैं। ओडिशा में सुब्रतो बागची के नेतृत्व में आइटीआइ के स्तर पर सुधार लाकर कौशल-विकास को विश्वस्तरीय बनाने का सफल उदाहरण हमारे सामने है। समाज की मानसिकता और सरकारों की उदासीनता के कारण आइटीआइ युवाओं की प्राथमिकता में नहीं आ पा रहे हैं।
रोजगार की ही बात करें तो पीएमईजीपी योजना का सुनियोजित, रचनात्मक और समुचित क्रियान्वयन बड़ी संख्या में अवसर उपलब्ध करा सकता है। हर जिले में एक जिला स्तरीय सलाहकार समिति होती है, जो पीएमईजीपी की प्रगति की समीक्षा करती है। इसकी प्रगति में जिला उद्योग केन्द्र और बैंकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। साथ ही आरसेटी आवेदकों को प्रशिक्षण देने का काम करती है। आरसेटी द्वारा प्रशिक्षित लोगों के क्रेडिट-लिंकेज, यानी बैंक से ऋण के रूप में वित्तीय सहायता की मॉनिटरिंग राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति के स्तर से भी होती है।
हम जानते हैं कि स्व-रोजगार या उद्यमिता के लिए पूँजी की व्यवस्था आवश्यक है। वर्ष 2021-22 से मई 2026 तक पीएमईजीपी के अन्तर्गत लगभग 6 लाख प्रोजेक्ट में 60 हजार करोड़ रुपए के ऋण स्वीकृत किये गये हैं। देखा जाय तो यह एक लाख प्रतिवर्ष की दर से रोजगार के अवसर मुहैया करा रहा है। अगर जिले की भौगोलिक स्थिति, वहाँ के लोगों की शैक्षणिक या कौशलगत पात्रताओं, उत्पादों और सेवाओं की माँग को ध्यान में रखते हुए इस योजना के तहत प्रोजेक्ट बनाये और स्वीकृत किये जाएँ तो यह गेम चेंजर साबित हो सकता है।
आवेदक एवं इस योजना से जुड़ा हुआ हर पक्ष ज्यादातर इसे अनमने ढंग से ही लेता है। जबकि पीएमईजीपी के अन्तर्गत मैन्युफैक्चरिंग के प्रोजेक्ट 50 लाख तथा बिजनेस/सर्विसेज के प्रोजेक्ट 20 लाख रुपए तक के हो सकते हैं। आवेदक को अपना अंशदान (5 या 10 प्रतिशत) लगाना होता है। पात्रतानुसार सब्सिडी भी दी जाती है।
इसी तरह देश में 619 जिलों में 632 आरसेटी कार्यरत हैं। इनमें अब तक 60 लाख से ज्यादा लोग ट्रेनिंग प्राप्त कर चुके हैं। 43 लाख से ज्यादा लोगों ने स्वयं अपना काम शुरू किया और 22 लाख से ज्यादा लोगों ने बैंक ऋण की मदद से।
‘पीपल रिसर्च ऑन इण्डियाज कन्ज्यूमर इकॉनमी(प्राइस)’ संस्था ने 2023 में एक सर्वे किया। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने 2020-21 के मूल्यों पर भारत में सालाना पाँच लाख से तीस लाख रुपये की आय वाले लोगों को मध्य वर्ग कहा है। वार्षिक आय के आधार पर ‘विपन्न’ श्रेणी में उनको रखा गया है, जिनकी वार्षिक आय एक लाख पच्चीस हजार रुपये से कम है। इनकी संख्या 19.6 करोड़ है। ‘महत्त्वाकांक्षी’ श्रेणी में वे लोग हैं, जिनकी वार्षिक आय सवा लाख से पाँच लाख रुपये तक है। इसमें 73.2 करोड़ लोग हैं। यानी 90 करोड़ से ज्यादा लोग 5 लाख तक सालाना आय वाले हैं।
यहाँ से यह सवाल उठता है कि भारत की एक बड़ी आबादी के लिए उच्च या तकनीकी शिक्षा प्राप्त करना कितना कठिन है। इसका असर रोजगार के अवसरों पर भी पड़ता है। इसीलिए 36 करोड़ की युवा आबादी में करीब 6 करोड़ ही ग्रेजुएट हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जिनकी शिक्षा माध्यमिक या उच्च माध्यमिक स्तर तक की है, उनके लिए रोजगारपरक प्रशिक्षण और रोजगार के विषय में भी सोचना चाहिए। दूसरा पहलू यह है कि ग्रेजुएट लोगों में बेरोजगारी (करीब 40 प्रतिशत) ज्यादा दिखती है, क्योंकि वे एक बेहतर (परमानेंट व्हाइट कॉलर या सरकारी) अवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं।
अपने परिवार की आर्थिक रूप से सहायता करने के लिए भी बहुत से छात्र पढ़ाई छोड़कर कमाने में लग जाते हैं। तो, जो प्रोटेस्ट हमने अभी जंतर-मंतर या झारखण्ड में देखा, एक बहुत बड़ा तबका उससे बाहर था। जिनके लिए पूर्णकालिक विद्यालय या कॉलेज की पढ़ाई कर पाना सम्भव नहीं, उनके लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय (नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) और इग्नू जैसे दूरस्थ शिक्षा के माध्यम समाधान बन सकते हैं। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय के पाठ्यक्रम में कौशल विकास के कोर्स भी रखे गये हैं। दरअसल, हर व्यक्ति के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना समन्वित प्रयास से ही सम्भव है। रोजगार के समुचित अवसर उपलब्ध होने पर मजबूरीवश किया जाने वाला पलायन भी कम होगा।
देश के स्वतन्त्र होने के इतने साल बाद भी शिक्षा और स्वास्थ्य की स्तरीय बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। ऐसे में हमारे देश की नयी पीढ़ी के सामने भटकते रहने के अलावा विकल्प ही नहीं बचता। रटने-रटाने वाली शिक्षा-पद्धति और मुनाफे के पीछे भागने वाली स्वास्थ्य-व्यवस्था, इन दोनों ने जीना मुश्किल कर दिया है। इसके अलावा वर्ग, जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।आज जब समय का चक्का पैसे का हो गया है तो कम-से-कम इतना तो होना ही चाहिए कि हर व्यक्ति के पास स्वाभिमान के साथ जीने के पर्याप्त साधन मौजूद हों। जिनके पास काम नहीं है और न ही मिल पाने की उम्मीद दिखाई पड़ रही है, उसकी पीड़ा का अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। सौ – दो सौ रूपये की कमाई भी उन्हें कातर बना देती है। इसीलिए यूपीएससी जैसी परीक्षाएँ प्रत्याशियों के लिए ‘मेक ऑर ब्रेक’ का सामान हो जाती हैं।
भारत के जिस ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बात कर रहे हैं, 2030 के बाद उसमें गिरावट आने का अनुमान है। यह तो संख्या की बात हुई। अभी जो डेमोग्राफिक डिविडेंड प्राप्त है, उसका कितना सकारात्मक उपयोग हो सकता है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। क्वांटिटी हमारे पास है, क्वालिटी पर ध्यान देने की जरूरत है। ऊपर जिक्र किये गये साहिर के गीत की पंक्तियाँ समाधान भी बता रही हैं—
पतला है हाल अपना लेकिन लहू है गाढ़ा
फौलाद से बना है हर नौजवाँ हमारा
मिलजुल के इस वतन को ऐसा सजाएँगे हम
हैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा
आँकड़ों का मुख्य स्रोत अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट, 2026 है।










