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अगस्त में जून को याद करते हुए 

24 जून। इतिहास की मोटी किताब में यह एक साधारण तारीख है। लेकिन कला के इतिहास में यह एक युवा उम्र की धडकन है। उन्नीस वर्ष की धड़कन, जब दुख पहली बार अपना असली चेहरा दिखाता है और उम्मीद अभी घर छोड़कर नहीं गई होती। उन्नीस साल का एक दुबला पतला युवक पेरिस की ठंडी सड़कों पर अकेला चल रहा था। शहर उसके लिए नया था। भाषा नयी थी। चेहरे अनजान थे। जेब में मुट्ठी भर सिक्के थे और मन में इतना अकेलापन कि उसे किसी से कह भी नहीं सकता था। कई बार लगता है, दुनिया के सबसे बडे शहर भी अकेले आदमी के लिए बहुत छोटे हो जाते हैं।

उसका देश स्पेन बहुत पीछे छूट गया था। लेकिन उससे भी ज्यादा पीछे छूट गयी थी वह निश्चित उम्र, जिसमें दोस्त साथ चलते हैं और भविष्य पर भरोसा होता है।

कुछ ही समय पहले उसके सबसे प्रिय मित्र कार्लोस कासा गेमस ने प्रेम में असफल होकर अपनी जान दे दी थी। एक युवा कवि चला गया था। किसी युवा की मृत्यु केवल एक जीवन का अन्त नहीं होती। उसके साथ भविष्य के असंख्य रंग भी बुझ जाते हैं। कुछ सपने बिना जन्म लिए ही चले जाते हैं। कुछ कविताएँ  हमेशा के लिए अधूरी रह जाती हैं। और जो मित्र पीछे रह जाता है, उसके भीतर एक ऐसी खामोशी बस जाती है, जिसे कोई भाषा पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती।

उस युवक के भीतर भी वही खामोशी उतर आयी थी।

लेकिन उसने चित्र बनाना नहीं छोडा।

वह लगातार चित्र बनाता रहा। जैसे कोई तेज हवा में अपने हाथों से दीपक की लौ बचा रहा हो। जैसे कोई नदी पत्थरों के बीच भी अपना रास्ता खोज लेती है। उसके लिए चित्र बनाना कला भर नहीं था। वही उसकी साँस थी। वही उसका साहस था। वही उसके जीवित होने का सबसे सच्चा प्रमाण था।

तारपीन की गन्ध से भरे उसके छोटे से कमरे में अधूरे कैनवास टिके रहते। रंग सूखते रहते। रातें लम्बी होतीं। कई बार रोटी कम होती, लेकिन रंग कम नहीं पड़ते। मन में दुख था, अभाव था, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था, फिर भी उसकी कूची रुकती नहीं थी।

आज पीछे मुडकर देखता हूँ,  तो लगता है वह उन दिनों चित्र नहीं बना रहा था। वह अपने अकेलेपन के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड रहा था। वह मृत्यु के सामने रंग रख रहा था। वह यह साबित कर रहा था कि दुख कितना भी गहरा हो, मनुष्य की रचना उससे एक कदम आगे चल सकती है।

दुनिया के लाखों युवाओं की तरह वह भी अनिश्चितताओं से घिरा था। आर्थिक कठिनाइयाँ थीं। भावनात्मक टूटन थी। लेकिन उसके पास एक खाली कैनवास था और शायद मनुष्य के पास आखिर में यही सबसे बडी पूँजी होती है – एक खाली जगह, जहाँ  वह अपने भविष्य का पहला रंग रख सके।

उसे यह नहीं मालूम था कि आने वाले समय में पूरी दुनिया उसे बीसवीं सदी का सबसे प्रभावशाली चित्रकार कहेगी। उसे केवल इतना पता था कि दुख के सामने हाथ नहीं रोकने हैं। रंग सूखने नहीं देने हैं।

24 जून 1901 को पेरिस की प्रसिद्ध एम्ब्रोस वोलाई गैलरी में उसकी पहली महत्त्वपूर्ण प्रदर्शनी लगी। उस दिन वहाँ केवल चित्र नहीं टंगे थे।वहाँ एक उन्नीस वर्षीय युवक का भरोसा टंगा था। वह भरोसा, जो अभाव से बड़ा था। शोक से बड़ा था। और भविष्य की अनिश्चितता से भी बड़ा।

महान कलाकृतियाँ अक्सर उन जगहों पर जन्म लेती हैं, जहाँ कोई युवा हार मानने से इनकार कर देता है। जहाँ जेब खाली होती है, लेकिन आँखों में रंग बचे रहते हैं। जहाँ दुनिया उम्मीद छीन लेना चाहती है और कलाकार उसे फिर से कैनवास पर रख देता है।

कला आखिरकार मनुष्य के भीतर बची हुई उम्मीद का दूसरा नाम है। जब तक इस पृथ्वी पर ऐसे जिद्दी, संवेदनशील और स्वप्न देखने वाले युवक और युवतियाँ रहेंगे, चित्र बनते रहेंगे। कविताएँ लिखी जाती रहेंगी। मिट्टी से नयी आकृतियाँ  निकलती रहेंगी और तब तक यह दुनिया पूरी तरह उजाड़ नहीं होगी।

उस उन्नीस वर्षीय युवक का नाम था – पाब्लो पिकासो।

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देव प्रकाश चौधरी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार एवं कलाकार हैं। सम्पर्क choudharydeoprakash@gmail.com
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