
रंगमंच का बदलता चेहरा
सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी बदलने की प्रवृत्तियाँ केवल राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं, संस्कृति की दुनिया में भी दिखाई देती हैं। इन दिनों इस प्रवृत्ति के लिए एक शब्द ईजाद किया गया है—पल्टूराम। इस शब्द का उच्चारण मात्र करते ही भले ही सबसे पहले आपके सामने बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार का चेहरा आए, लेकिन इसके पीछे केवल एक ही चेहरा नहीं है। वे सारे चेहरे हैं जो सत्ता बदलने के बाद अपना चेहरा भी बदल लेते हैं।
यह आज से नहीं हो रहा है। जब से संसदीय चुनावों का यह खेल चल रहा है, तब से पार्टी बदलने का खेल भी चल रहा है। इस खेल में एक से एक नाटकीय दृश्य देखने को मिलते हैं। रातों-रात कोई नेता एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में चला जाता है। ऐसा भी देखने को मिलता है कि रात को कोई किसी राजनीतिक दल के साथ होता है और सुबह किसी दूसरे के साथ।
इस प्रवृत्ति का रंगकर्म पर कितना प्रभाव पड़ा है, इसे गम्भीरता से देखने की जरूरत है। लगातार तीसरी बार केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने और राज्यों में उसके बढ़ते आधिपत्य के कारण आम लोगों के बीच एक पक्की-सी अवधारणा बन गयी है कि अब यह सरकार जाने वाली नहीं है। जिस तरह राज्यों में सरकार बनाने के साथ-साथ विपक्ष को खण्ड-खण्ड कर देने के मंसूबों में वह सफल होती दिखाई दे रही है, उसे देखकर राजनीति के अलावा संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वालों के भीतर भी आतंक और दहशत का वातावरण बन गया है।
अगर हम रंगमंच की दुनिया की बात करें, तो वहाँ एक ठण्डा आतंक व्याप्त है। एक अघोषित आपातकाल-सा हर तरफ दिखाई देता है। रंगकर्मियों के भीतर एक तरह की सेल्फ-सेंसरशिप पैदा हो गयी है। भले ही कोई तन्त्र उन पर दबाव न डाल रहा हो, अभिनेता स्वयं अपने को नियन्त्रित करने लगता है। वह खुद तय करने लगता है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है। सरकार की ओर से किसी रोक-टोक से पहले ही वह ऐसे नाटकों से अपने को दूर करने लगता है। उसे लगता है कि कहीं इससे सरकार नाराज न हो जाए।
रंगमंच में अमूमन तीन तरह के रंगकर्मी होते हैं। आजादी से पहले से इप्टा के अन्तर्गत काम करने वाले रंगकर्मियों की एक बड़ी जमात है, जो देशभर में घोषित रूप से व्यवस्था के प्रतिरोध में सांस्कृतिक कर्म करती है। इन्हीं में जन नाट्य मंच, जन संस्कृति मंच जैसे दूसरे वामपन्थी सांस्कृतिक संगठन भी हैं। ये भले ही यह न कहते हों कि उनका सम्बन्ध किसी राजनीतिक दल से है, लेकिन वैचारिक रूप से वे किसी-न-किसी वाम दल से जुड़े होते हैं। यदि वे स्वयं ऐसा न भी कहें, तो उनके नाटकों की स्थापनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है। कुल मिलाकर सारे जनवादी-प्रगतिशील रंगकर्मियों को एक ही श्रेणी में रखा जा सकता है।
दूसरे तरह के रंगकर्मी वे होते हैं जो अपने को प्रगतिशील रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन सरकार से भी उनके मधुर सम्बन्ध बने रहते हैं। वे हर तरह के नाटक करते हैं। सरकारी संस्थानों के सहयोग से नाटक करने को वे गलत नहीं मानते। यदि किसी सरकारी संस्थान से अनुदान मिलता है, तो उन्हें उसमें वैचारिक रूप से भी कोई समस्या नहीं दिखाई देती। यहाँ तक कि किसी अकादमी का पुरस्कार मिलता है, तो उसे भी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे रंगकर्मी कहीं एक जगह टिके नहीं होते। सत्ता परिवर्तन की तेज आँधी में यदि वे उड़कर सत्ता की गोद में जा गिरें, तो आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। वे कभी प्रतिपक्ष में खड़े नहीं हो सकते।
तीसरे तरह के रंगकर्मी वे होते हैं जो पहले से ही सत्ता के पक्ष में होते हैं। उनका रुख शुरू से ही स्पष्ट होता है। उन्हें देखकर किसी तरह का मोहभंग नहीं होता और न ही ठगे जाने का अहसास होता है।
जो लोग केवल राजनीति में ही सत्ता-लोलुपता, चरित्रहीनता और वैचारिक विचलन देखते हैं तथा साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोगों को इन दोषों से मुक्त समझते हैं, वे भ्रम के शिकार हैं। राजनीतिज्ञों की तरह संस्कृतिकर्मियों के भीतर भी ये दोष हमेशा से मौजूद रहे हैं।
आजादी के बाद जब देश की सत्ता पर कॉंग्रेस आयी, तब बहुत सारे वामपंथियों, समाजवादियों और प्रगतिशीलों को सत्ता के गलियारों में टहलते देखा गया। घर बदलने वालों में साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों की भी कोई कमी नहीं थी। रंगमंच में भी जो लोग जिन्दगी भर इप्टा जैसे संगठनों से सम्बद्ध रहे, वे सत्ता-लाभ के लिए वैचारिक बदलाव करने में नहीं हिचके।
लेकिन आज और तब के समय में एक फर्क था। पहले जो लोग पाला बदलते थे, उनके भीतर थोड़ा संकोच रहता था। इस बदलाव पर उन्हें अधिक गर्व नहीं होता था। उनमें कुछ लज्जाबोध बना रहता था। अब ऐसा कोई परदा नहीं रह गया है। पिछले दस-बारह वर्षों में जो सांस्कृतिक परिवर्तन हुआ है, उसे लेकर लोगों के भीतर किसी तरह का अफसोस नहीं दिखाई देता।
पिछले बारह वर्षों में राज्यों और केन्द्र में हुए सत्ता-परिवर्तनों के सन्दर्भ में रंगमंच में पाला बदलने की प्रवृत्तियों में जो इजाफा हुआ है, उसका सूक्ष्म विश्लेषण किया जाना चाहिए। जो अभिनेता कल तक कॉंग्रेस का गुणगान कर रहा था, वह आज अचानक भाजपा के कसीदे क्यों पढ़ने लगा? पश्चिम बंगाल में, जहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ, वहाँ के रंगकर्मी आज कहाँ खड़े हैं? तीन दशकों तक वहाँ वाम सरकार रही। उसने भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को किस तरह चुनौती दी? या फिर सैद्धान्तिक रूप से कुछ और राग अलापते हुए व्यावहारिक रूप में पारम्परिक ब्राह्मणवादी संस्कृति की जड़ों को ही मजबूत करती रही?
यदि ऐसा न हुआ होता, तो आज टीएमसी को हराने के लिए पूरा वाम धड़ा भाजपा के साथ क्यों खड़ा दिखाई देता? क्रान्तिकारी चेतना वाले भद्रजन लेनिन की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर इतना आह्लादित क्यों होते? क्या लेनिन उनके वर्ग-शत्रु थे? वे तो मजदूरों की लड़ाई के विश्वस्तरीय नेता थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके भीतर का हिन्दू मन ही लेनिन का विरोधी था, इसलिए वे लेनिन की मूर्ति को सनातन के मार्ग में रोड़ा मान रहे थे?
फिर टैगोर और राजा राममोहन राय का क्या होगा? टैगोर तो हमेशा से राष्ट्रवाद की एकांगी वैचारिकी के विरोध में रहे हैं। उन्होंने इस विषय पर महत्त्वपूर्ण लेख लिखा और ‘गोरा’ जैसा उपन्यास रचा, जो वर्तमान सत्ता की विचारधारा से बिल्कुल विपरीत है। क्या भविष्य में टैगोर और राजा राममोहन राय को सनातन राजनीति करने वाले बर्दाश्त कर पाएँगे? उनके नाटक ‘चांडालिका’, ‘विसर्जन’ और ‘रक्तकरबी’, जो सीधे-सीधे ब्राह्मणवादी विचारधारा की जड़ों पर प्रहार करते हैं, क्या उन्हें फिर से दर्शकों के बीच लाने का साहस किया जाएगा? या उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा? या फिर गाँधी और अम्बेडकर की तरह उन्हें भी आत्मसात कर लिया जाएगा?
उनके नाटकों के साथ भी वही किया जाएगा, जो एनएसडी और सत्ता के इशारे पर चलने वाले सरकारी संस्थान ब्रेष्ट और दारियो फो जैसे फासीवाद-विरोधी नाटककारों के नाटकों के साथ करते हैं। नाटक भले ही क्रान्तिकारी और व्यवस्था-विरोधी तेवर का हो, उसके कथ्य को इतना डाइल्यूट कर दिया जाता है और उसमें लोकप्रिय मसाले इस तरह भर दिए जाते हैं कि मूल कथ्य ढूँढ़े नहीं मिलता। परिणाम यह होता है कि ऐसा कोई भी नाटक सरकार के लिए असहज नहीं रह जाता। बल्कि यहाँ की फासीवादी सत्ता उसे इस तरह हजम कर लेती है कि देखने वालों को इसका पता तक नहीं चलता।
रंगमंच में ‘पलटूवादी’ प्रवृत्तियाँ, जो पश्चिम बंगाल में हाल-फ़िलहाल दिखाई दे रही हैं, वे बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे उन प्रदेशों में, जिन्हें देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की प्रयोगशाला माना जाता है, बहुत पहले से रंगमंच की दुनिया में उपस्थित हैं। राजनीति के साथ-साथ संस्कृति के क्षेत्र में भी कई स्तरों पर काम हो रहे हैं, और यह आज से नहीं, बल्कि कई वर्षों से चल रहा है। जब से उनका शासन आया है, यह मुहिम और तीव्र हो गयी है। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में केवल उनके पार्टी दफ्तर ही नहीं खुले हैं, बल्कि ‘संस्कार भारती’ जैसे संगठनों की इकाइयाँ भी स्थापित हुई हैं।
जिस प्रकार ‘सरस्वती शिशु मन्दिर’ की आड़ में संघ परिवार बच्चों के कोमल मन में वर्षों से हिन्दुत्व की भावनाएँ भरता आ रहा है, उसी तर्ज पर ‘संस्कार भारती’ संस्कृति के क्षेत्र में उसके लिए एक सांस्कृतिक मंच है, जो उसकी राजनीतिक सत्ता प्राप्ति की दिशा में एक सीढ़ी का काम करता है। संघ परिवार इस सच को अच्छी तरह जानता है कि राजनीतिक आधार बनाने के लिए पहले सांस्कृतिक जमीन तैयार करना जरूरी है। वह सत्ता से ज्यादा व्यवस्था निर्मित करने के प्रयास में रहता है। उसे पता है कि सत्ता तो आती-जाती रहती है, लेकिन यदि एक मजबूत व्यवस्था बना ली जाए, तो उसे विस्थापित करना आसान नहीं होता।
संघ परिवार ने हिटलर और मुसोलिनी से केवल फासीवाद की बारीकियाँ ही नहीं सीखी हैं; कहीं-न-कहीं उसके ज़ेहन में रूस और चीन के सांस्कृतिक आन्दोलनों का अनुभव भी अवश्य रहा होगा। चीन की कृषि क्रान्ति के दौरान माओ गाँवों को सांस्कृतिक दलों से घेर लेने का आह्वान करते थे, ताकि जब छापामार दस्ते आएँ तो उनकी राजनीतिक लड़ाई कुछ आसान हो जाए। वहाँ से आगे बढ़ते हुए उनके पक्ष में विचार की एक जमीन तैयार हो सके। लेनिन ने भी रूस में यही किया। भारत में इस अवधारणा पर नेहरू के बाद, संघ को छोड़कर, किसी ने गम्भीरता से काम नहीं किया। प्रादेशिक पार्टियों को तो इसकी सुध भी नहीं थी।
बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में सपा, बसपा, राजद, जद(यू) और तृणमूल कॉंग्रेस ने अपने-अपने राज्यों में वर्षों तक शासन किया, लेकिन जहाँ चुनावी खेल में उन्हें हार मिली, वहाँ उनकी सत्ता ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी। उनकी विचारधारा का भी कोई ठोस अवशेष दिखाई नहीं देता। लेकिन संघ समर्थित भाजपा के साथ ऐसा नहीं है। उसने सत्ता के साथ-साथ पूरी व्यवस्था पर अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया है और आज की तारीख में इस प्रयास में काफी हद तक सफल भी दिखाई देती है। उसने सत्ता को स्थायित्व देने वाले न्यायपालिका, प्रेस, प्रशासन, शिक्षा और संस्कृति जैसे स्तम्भों को अपने ढंग से निर्मित करना शुरू कर दिया। इसका फायदा उसे तब मिलता है, जब कभी वह चुनावी गणित में मात खा जाती है। तब भी वह समाप्त नहीं होती, क्योंकि उसके कैडर चारों ओर फैले रहते हैं और संगठन को फिर से पुनर्जीवित करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
पश्चिम बंगाल में जो वाम दल चौंतीस वर्षों तक सत्ता में रहे, मार्क्स और लेनिन का नाम जपते रहे, वे आज कहाँ हैं? उन्होंने सांस्कृतिक स्तर पर ऐसा क्या किया कि आज उनका कोई स्पष्ट अवशेष भी दिखाई नहीं देता? सत्ता जाते ही उनके अनेक लोग तृणमूल कॉंग्रेस में चले गये और अब उसके विखण्डित होते ही भाजपा के समर्थक बन गये। सवाल तो लोग करेंगे, उँगलियाँ तो उठाएँगे। रंगमंच से जुड़े लोगों की पलटूवादी प्रवृत्तियों को भी सामने लाएँगे। शायद यह भी कहें—”यार, तुम भी उन्हीं की तरह निकले!” और कौन जाने, कोई नेता भी आपको टोक दे—”पार्टनर, तुम भी हमारी तरह दलबदलू निकले!”
हमारे बदलने के पीछे लोग ईडी, आईबी, आयकर विभाग के डर या करोड़ों रुपये की अटैची का तिलिस्म तलाशते हैं। क्या इसी तरह की संभावनाएँ उन रंगकर्मियों में भी खोजी जाती हैं, जो सत्ता बदलते ही अपने ठिकाने के लिए नया मकान तलाशने लगते हैं?
सत्ता बदलने के साथ रंगमंच से जुड़े लोगों की प्रवृत्तियाँ बदलने का चलन कुछ अधिक बढ़ गया है। इनमें अधिकतर वे रंगकर्मी हैं, जो पहले कॉंग्रेस या किसी वामपन्थी सांस्कृतिक संगठन से सम्बद्ध थे। गौरतलब है कि इस तरह की प्रवृत्तियों वाले रंगकर्मियों का झुकाव समाजवादी या बहुजन समाजवादी दलों की ओर अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। प्रवृत्तियों के इस विचलन का भी अपना एक समाजशास्त्र है।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की चुनावी पराजय के बाद पार्टी के भीतर जो विखण्डन देखने को मिला, उसमें भाजपा की ओर जाने वालों में बड़ी संख्या उच्च जातियों के लोगों की थी। निम्न जातियों के लोग बहुत कम थे। दूसरे राज्यों में भी भाजपा की ओर हुए पलायन में लगभग यही प्रवृत्ति दिखाई देती है।
रंगमंच में तो दलितों के लिए वैसे भी बहुत कम स्थान है। मुख्यधारा के रंगमंच पर सवर्णों का वर्चस्व है। मुख्यधारा के रंगमंच में निम्न जातियों के लोगों की उपस्थिति एक-दो प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। यदि कोई होगा भी, तो किसी कोने में दबा-सिकुड़ा हुआ मिलेगा। आश्चर्य की बात यह भी है कि संवैधानिक स्तर पर उनके लिए जितना आरक्षण निर्धारित है, वह भी पूरी तरह भरा हुआ दिखाई नहीं देता।
इसीलिए सत्ता परिवर्तन के समय अनेक रंगकर्मियों को तत्कालीन सरकार के पक्ष में खड़ा होना अधिक सुविधाजनक लगता है। यह पल्टूराम वाली प्रवृत्ति केवल छोटे कलाकारों में ही नहीं, बल्कि बड़े कलाकारों में भी दिखाई देती है—बल्कि कहीं अधिक। यदि इसके उदाहरण खोजने निकलें, तो सैकड़ों मिल जाएँगे। बिना किसी का नाम लिए भी लोग सहज ही समझ जाते हैं कि संकेत किसकी ओर है।
चुनावों के दौरान सरकार ने जिस प्रकार लोगों के खातों में पैसा डालकर और हर महीने मुफ़्त राशन देकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की, उसी प्रकार देशभर के संस्कृतिकर्मियों के बीच प्रोडक्शन ग्रांट, फ़ेस्टिवल ग्रांट और रेपर्टरी ग्रांट के नाम पर जिस तरह धन वितरित किया गया है, उसके बाद क्या उनसे सत्ता की आलोचना की अपेक्षा की जा सकती है?
सत्ता ने केवल अनुदान के रूप में पैसे ही नहीं बाँटे, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी उन्हें इस प्रकार तैयार किया है कि समय आने पर वे गोदी मीडिया की तर्ज पर गोदी रंगमंच के रूप में, अंधभक्तों की तरह काम करने लगें। यदि कोई आह्वान करेगा, तो वे चुनावी रैलियों में भाड़े पर बुलाए गये दर्शकों की तरह पहुँच जाएँगे। और इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा कि वे ‘हेल हिटलर’ की तर्ज पर हवा में मुट्ठी उठाकर ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाने लगें। शिक्षा के क्षेत्र में पिछले दिनों गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों का जिस प्रकार इस्तेमाल किया गया, वह किसी से छिपा नहीं है; वह जगजाहिर है।
रंगकर्मियों की बदलती हुई प्रवृत्तियों का यदि समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाए, तो यह पाया जाएगा कि उनमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनके भीतर उच्चवर्णीय मानसिकता गहरे तक मौजूद है। इसलिए वर्तमान सत्ता के चरित्र को आत्मसात करने में उन्हें कोई विशेष कठिनाई नहीं होती। यदि रंगमंच में हिन्दुत्व को समाहित करना हो, तो उनके सामने कोई धर्मसंकट खड़ा नहीं होता। वे जानते हैं कि हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा में उनका हिन्दुत्व भी सुरक्षित रहेगा और वर्ण-व्यवस्था भी समाप्त होने वाली नहीं है। इसलिए उनकी वर्णीय श्रेष्ठता भी बनी रहेगी।
इसी कारण यदि कोई हिन्दी रंगमंच को भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ की ब्राह्मणवादी व्याख्या के अनुरूप संचालित करने का आह्वान करता है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। यदि कोई ‘हिन्दी रंगमंच’ को ‘सनातन रंगमंच’ कहकर सम्बोधित करता है, तो वे उसे भी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
ऐसी ही पलटूवादी प्रवृत्ति वाले रंगमंच के शिखरपुरुष—चाहे वे पटना, भोपाल, बेगूसराय, लखनऊ या दिल्ली के हों; चाहे पहले इप्टा से जुड़े रहे हों या जनम अथवा जसम से—यदि उनसे ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ पर नाटक करने के लिए कहा जाए, तो वे विचारधारा के वस्त्र उतारकर आदिम रूप में आने से भी परहेज नहीं करते। उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि लोग क्या कहेंगे। हाँ, वे इस बात के प्रति अवश्य सजग रहते हैं कि यदि कोई उनकी तस्वीर खींचे, तो उसमें उनका जनेऊ अवश्य दिखाई दे।










