
पूँजीवाद, साम्राज्यवाद और युद्ध की संरचना
जब भी दुनिया में कोई बड़ा युद्ध छिड़ता है, तो सत्ताधारी वर्ग इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’, ‘लोकतन्त्र की रक्षा’ या ‘शान्ति की स्थापना’ जैसे आदर्शवादी नारों की आड़ में पेश करते हैं। इतिहास में पूँजीवाद की सबसे प्रामाणिक व्याख्याएँ करने वाले, उसके दुष्प्रभावों की गम्भीरता पर ध्यान दिलाने वाले मार्क्सवादी विचारकों-चिन्तकों ने तथ्यों, तर्कों द्वारा ‘आदर्शवादी नारों की आड़’ में छिपे ‘खूनी पूँजीवादी आर्थिक हितों’ को सामने ला दिया है, जो इस तरह के हर बड़े सशस्त्र संघर्ष के पीछे की छिपी सच्चाई है। कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, व्लादिमीर लेनिन और उनके बाद के नव-मार्क्सवादी विचारकों ने यह सुसंगत व अकादमिक तरीके से स्थापित किया कि युद्ध अनजाने में हुई कोई मानवीय गलती नहीं, बल्कि एक सुसंगत, सुनियोजित मानवीय बदमाशी है और यह भी कि सशस्त्र संघर्ष पूँजीवादी व्यवस्था का एक स्वाभाविक और बार-बार लौटने वाला उपोत्पाद (बाई-प्रोडक्ट) है।
कार्ल मार्क्स ने पूँजीवाद को एक ऐसी गतिशील, परन्तु आत्म-विनाशकारी व्यवस्था के रूप में देखा, जो लगातार अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाती है, साथ ही भीतरी अन्तर्विरोधों से भरी रहती है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848) में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा कि ‘पूँजीपति वर्ग पिछली सभी पीढ़ियों की तुलना में कहीं अधिक विशाल उत्पादक शक्तियाँ उत्पन्न करता है, फिर भी ये शक्तियाँ समय-समय पर निजी सम्पत्ति और बाजार की सीमाओं से टकराती हैं और समाज ‘अति-उत्पादन की महामारी’ का सामना करता है, यानी एक ऐसी स्थिति आती है जब बाजार में इतनी अधिक वस्तुएँ होती हैं कि उन्हें लाभकारी रूप से बेचा ही नहीं जा सकता।’
ऐसे में इस संकट से निपटने के दो ही रास्ते होते हैं- या तो ‘अधिशेष पूँजी’ और वस्तुओं को नष्ट किया जाए, या फिर नये बाजार और कच्चे माल के स्रोत खोजे जाएँ। उन्होंने लिखा, “अपने माल के लिए बराबर फैलते हुए बाजार की जरूरत के कारण बुर्जुआ वर्ग दुनिया के कोने-कोने की खाक छानता है। वह हर जगह घुसने को, हर जगह पैर जमाने को, हर जगह सम्पर्क कायम करने को बाध्य होता है।”
युद्ध ‘पूँजीवादी संकट’ से निपटने के दोनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करता है। यह संचय को पुनः आरम्भ करता है और विजय के माध्यम से नये क्षेत्रों पर कब्जा भी दिलाता है। मार्क्स ने कैपिटल (खण्ड-1) में औपनिवेशिक हिंसा को ‘आदिम संचय’ के एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में वर्णित किया है। मार्क्स के अनुसार अमेरिका की ‘खोज’, दासता, अफ्रीकी दास व्यापार और पूर्वी इंडीज की लूट आदि आकस्मिक नहीं थे, बल्कि पूँजी के जन्म और विकास को गति देने वाले आवश्यक तत्त्व थे। इन सभी के पीछे यूरोपीय शक्तियों के बीच ‘व्यापारिक युद्ध’ थे, जो व्यापार और विस्तार की प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न हुए थे।
मार्क्स का केन्द्रीय तर्क था, ‘अब तक विद्यमान सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।’ इस दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध घरेलू वर्ग संघर्षों का विस्तार मात्र हैं। पूँजीपति वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए राज्य और सेनाओं का लगातार उपयोग करता है और कभी-कभी ‘व्यापार युद्धों’ को ‘सशस्त्र संघर्षों’ में बदल देता है।
फ्रेडरिक एंगेल्स, जिन्हें उनकी सैन्य विशेषज्ञता के कारण ‘जनरल’ उपनाम दिया गया था, ने युद्ध और अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध का और गहरा विश्लेषण किया है। एंटी-ड्यूहरिंग (1878) में उन्होंने स्पष्ट किया कि सेनाओं की संरचना, रणनीति और युद्धनीति मुख्यतः उत्पादन की परिस्थितियों और संचार के साधनों पर निर्भर करती है। पूँजीवाद ने युद्ध को वैसे ही बदला, जैसे उसने उत्पादन को बदला है- छोटी सेनाओं की जगह औद्योगिक उत्पादन, रेलवे और आधुनिक रसद आधारित आधुनिक विशाल सेनाएँ।
एंगेल्स की सबसे उल्लेखनीय भविष्यवाणी 1887 में की गयी थी। उन्होंने कहा था कि यूरोपीय शक्तियों के बीच अनसुलझे पूँजीवादी विरोधाभास एक विनाशकारी “विश्व युद्ध” को जन्म देंगे, जिसमें आठ से दस मिलियन सैनिक एक-दूसरे का नरसंहार करेंगे और पूरे यूरोप को उजाड़ देंगे। आगे चलकर 1914-1918 के प्रथम विश्व युद्ध ने इस भविष्यवाणी को लगभग अक्षरशः सच साबित कर दिया।
लेनिन ने मार्क्स-एंगेल्स के विश्लेषण को 20वीं सदी के सन्दर्भ में अद्यतन किया। अपनी 1916 की रचना ‘साम्राज्यवाद: पूँजीवाद की उच्चतम अवस्था’ में दिखाया कि मुक्त बाजार की प्रतिस्पर्धा ने किस प्रकार एकाधिकारों को जन्म दिया है, बैंकिंग और औद्योगिक पूँजी विलय होकर ‘वित्त पूँजी’ बनी है, और उपनिवेशों में पूँजी का निर्यात होने लगा है।
लेनिन के अनुसार, साम्राज्यवाद पूँजीवाद के विकास का वह चरण है, जिसमें एकाधिकार और वित्त पूँजी का प्रभुत्व स्थापित हो चुका है; जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय ट्रस्टों के बीच विश्व का विभाजन शुरू हो चुका है। इस अवस्था में विश्व मुट्ठी भर महाशक्तियों के बीच बँट गया है। लेकिन जैसा कि पूँजीवाद की प्रवृत्ति है; पूँजीवादी विकास अनिवार्यतः असमान होता है; देशों की सापेक्ष आर्थिक शक्ति बदलती रहती है। जब मौजूदा क्षेत्रीय विभाजन इस बदली हुई शक्ति के अनुरूप नहीं रहता, तो ‘लूट’ के पुनर्वितरण का एकमात्र रास्ता ‘युद्ध’ ही बचता है।
इसीलिए लेनिन ने प्रथम विश्व युद्ध को ‘अधिग्रहणवादी, हिंसक और लूटपाट वाला युद्ध’ कहा; जो यह तय करने के लिए लड़ा गया था कि वित्तीय लुटेरों के किस समूह को सबसे बड़ा हिस्सा मिलेगा।
मार्क्सवादी चिन्तन परम्परा को आगे बढ़ाते हुए नव-मार्क्सवादी चिन्तकों ने अधिशेष, आधिपत्य और बेदखली के नवीन सन्दर्भों में पूँजीवाद और युद्ध के रिश्ते को नये तरह से परिभाषित किया। पॉल बारन और पॉल एम स्वीजी ने अपनी रचना ‘मोनोपॉली कैपिटल’ (1966) में तर्क दिया कि उन्नत पूँजीवाद में एकाधिकार की प्रवृत्ति एक विशाल आर्थिक अधिशेष (अधिशेष) उत्पन्न करती है, जिसे सामान्य उपभोग या निवेश के माध्यम से अवशोषित नहीं किया जा सकता।
‘सैन्यवाद’ और ‘युद्ध’ इस अधिशेष को अवशोषित करने के प्रमुख तन्त्र बन जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का अमेरिकी ‘सैन्य-औद्योगिक परिसर’ (मिलिटरी–इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स) इसका सबसे प्रबल उदाहरण है। स्थायी हथियार उत्पादन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को स्थिर करते हैं, लेकिन परजीवीवाद और सामाजिक जरूरतों से संसाधनों को हटाने की कीमत पर।
इमैनुएल वालरस्टीन के ‘विश्व-प्रणाली विश्लेषण’ (2004) में साम्राज्यवाद कोई गुजर जाने वाला ‘चरण’ नहीं है, बल्कि पूँजीवादी विश्व-अर्थव्यवस्था की एक स्थायी संरचनात्मक विशेषता है। उनके अनुसार विश्व ‘मुख्य भाग’ (धनी औद्योगिक राष्ट्र), ‘अर्ध-परिधि’ और ‘परिधि’ (शोषित क्षेत्र) में विभाजित है। जब किसी प्रमुख शक्ति का वर्चस्व घटता है या प्रतिद्वन्द्वी शक्तियाँ चुनौती देती हैं, तब युद्ध और संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
डेविड हार्वे ने मार्क्स के ‘आदिम संचय’ की अवधारणा को नवउदारवादी युग के लिए ‘बेदखली द्वारा संचय’ के रूप में पुनर्परिभाषित किया। इसमें साझा संसाधनों का निजीकरण, वित्तीयकरण, संकट का हेरफेर, भूमि हड़पना और परिसम्पत्तियों पर कब्जा करने के लिए साम्राज्यवादी युद्ध शामिल हैं। 1970 के दशक से नवउदारवादी नीतियों ने इसे और तेज किया है। मिडिल ईस्ट और अन्य जगहों पर युद्ध पूँजी को बेदखली के नये रास्ते तलाशने में सक्षम बनाते हैं, जब अतिसंचय का संकट गहराने लगता है।
मैक्स होर्खाइमर, थियोडोर एडोर्नो और हर्बर्ट मार्क्यूज जैसे फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों ने युद्ध को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि ‘उपकरणिक तर्क’ (इंस्ट्रूमेंटल रीजन) की उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा माना, जो ‘प्रभुत्व की वस्तु’ (ऑब्जेक्ट ऑफ डॉमिनेशन) में बदल देती है। मार्क्यूज के ‘वन-डाइमेंशनल मैन’ (1964) में उन्नत औद्योगिक समाज को भी साम्राज्यवादी अभियानों पर निर्भर दिखाया गया है।
ऐसे में युद्ध के प्रति जनता का क्या रुख होना चाहिए, इसे कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भों व विचारों से समझा जा सकता है। मार्क्स ने अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-1865) के सन्दर्भ में ब्रिटिश श्रमिकों के रुख की प्रशंसा की, जो दासता की रक्षा के लिए लड़े जा रहे युद्ध का समर्थन करने से मना कर रहे थे, भले ही इससे उनके उद्योगों को कपास की कमी का सामना करना पड़ रहा था। उनका तर्क था; यदि श्रमिक वर्ग की मुक्ति के लिए अन्तर्राष्ट्रीय एकजुटता आवश्यक है, तो वे आपराधिक मंसूबों को साधने वाली विदेश नीति का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
हम सब जानते हैं कि मार्क्स परम्परागत अर्थों में शान्तिवादी नहीं थे। उन्होंने कुछ संघर्षों, युद्धों का समर्थन किया; विशेषकर उन संघर्षों का, जो ऐतिहासिक प्रगति को आगे बढ़ाते थे या प्रतिक्रियावादी शक्तियों को कमजोर करते थे। लेकिन उनका मूल सिद्धान्त यह था कि पूँजीवादी युद्धों से श्रमिक वर्ग या आम जनता को ‘कुछ भी प्राप्त नहीं होता’।
इन युद्धों में विभिन्न राष्ट्रों के आमजन एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ते हैं, जबकि बुर्जुआ वर्ग हमेशा उससे लाभ कमाता है। इस सन्दर्भ में लेनिन का उत्तर था, ‘क्रान्तिकारी हारवाद’। एक साम्राज्यवादी युद्ध में, सर्वहारा वर्ग या जनता को अपनी ही सरकार की हार की कामना करनी चाहिए। ऊपरी तौर पर देखने से यह देशविरोधी लगता है, लेकिन है नहीं। उनका नारा था: ‘साम्राज्यवादी युद्ध को गृहयुद्ध में बदल दो।’ क्योंकि यह आन्तरिक अन्तर्विरोधों को नेपथ्य में डालने की एक रणनीति भर है।
उन्होंने सही समझ के लिए युद्धों का साम्राज्यवादी युद्ध, राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध और सर्वहारा गृहयुद्ध में स्पष्ट विभाजन किया और बताया कि क्यों ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ का विरोध किया जाना चाहिए, राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध का समर्थन किया जाना चाहिए और आन्तरिक अन्तर्विरोधों के शमन के लिए हो रहे सर्वहारा गृहयुद्ध में शामिल होना चाहिए।
इस तरह हम देखते हैं कि मार्क्सवादी चिन्तन परम्परा हमें युद्धों की एक सही समझ देती है और पूँजीवादी आर्थिक हितों, युद्ध और नव-साम्राज्यवाद के रिश्ते को व्याख्यायित करती है।
ईरान युद्ध की सही समझ बनाने के लिए युद्ध को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजराइल ने तकरीबन 900 ईरानी सैन्य ठिकानों, परमाणु संयन्त्रों और नेतृत्व पर संयुक्त हवाई हमले किये। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या कर दी गयी। 7-8 अप्रैल को दो सप्ताह का युद्धविराम हुआ, लेकिन 12 अप्रैल, 2026 को पाकिस्तान में शान्ति वार्ता असफल हो गयी।
होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबन्दी की धमकियों और तेल की बढ़ती कीमतों (लगभग 50%) तथा अस्थिर शेयर बाजारों के बीच पूरी दुनिया एक नाजुक मोड़ पर है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले पेट्रोलियम परिवहन का लगभग 25% (आईईए के अनुसार) से अधिक सम्भालता है।
ईरान के तेल भण्डार, उसकी रणनीतिक स्थिति और अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था का उसका सतत प्रतिरोध—प्रतिनिधियों, परमाणु महत्वाकांक्षाओं और रूस-चीन से लगातार बेहतर हो रहे सम्बन्धों के चलते—वह ‘पेट्रोडॉलर प्रणाली’ के लिए खतरा बन चुका था।
यह जानना चाहिए, जब आर्थिक उपाय (प्रतिबन्ध) विफल हो गये, तो पूँजीवादी और नव-साम्राज्यवादी ताकतों के सरगना अमेरिका ने बल (फोर्स) के माध्यम से ‘अपने विरोधाभासों’ को हल करने का रास्ता चुना। इजराइल की भूमिका यहाँ कठपुतली की है।
यह युद्ध लेनिन के ढाँचे में ‘समान प्रतिद्वन्द्वियों के बीच अन्तर-साम्राज्यवादी युद्ध’ नहीं है, बल्कि ईरान एक अर्ध-परिधीय पूँजीवादी राज्य (सेमी-पेरिफेरल कैपिटलिस्ट स्टेट) है। इसे हम ‘कट्टर साम्राज्यवादी बनाम एक प्रतिरोधी राष्ट्र’ का युद्ध कह सकते हैं।
डेविड हार्वे के शब्दों में, युद्ध के कुछ तत्त्व ‘बेदखली द्वारा संचय’ हैं। हथियार उत्पादन और खपत के माध्यम से अधिशेष पूँजी का अवशोषण हो रहा है। युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण अनुबन्ध व तेल मार्गों का पुनर्गठन संकटग्रस्त पूँजीवाद के लिए यह बूस्टर का काम करेगा।
अमेरिकी ‘सैन्य-औद्योगिक परिसर’ इस युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो रहा है और आगे भी होगा। यह युद्ध अमेरिका को तात्कालिक तौर पर घरेलू विरोधाभासों—ट्रम्प युग की नीतियों के तहत मुद्रास्फीति (इन्फ्लेशन) और बढ़ती असमानता; सबसे महत्त्वपूर्ण ‘एप्स्टीन फाइल’ से आए भूचाल—से जनता का ध्यान हटाता है।
‘परमाणु खतरे’ और ‘शासन परिवर्तन’ की बयानबाज़ी बस ‘पूँजीवादी लूट’ को छिपाने का उपकरण है।
यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि ईरान का बुर्जुआ-धर्मतान्त्रिक शासन कोई आदर्श नहीं है। आमजन, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का दमन वहाँ भी होता है। लेकिन प्राथमिक विरोधाभास (प्राइमरी कॉन्ट्राडिक्शन) साम्राज्यवादी आक्रामकता है।
अमेरिका और इजराइल ही हमलावर हैं। दोनों देशों की जनता को इस युद्ध से कुछ नहीं मिल रहा, सच यही है कि ईरानी और अमेरिकी सैनिकों और जनता का खून बह रहा है, जबकि पूँजीपति ‘ब्लड-बाथ’ (मुनाफा) का लुत्फ उठा रहे हैं।
इस युद्ध को विरोधाभासों को और तीव्र करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। यह युद्ध ऊपरी तौर पर यूरोपीय पूँजीवाद को अस्थिर करता (ऊर्जा संकट के माध्यम से) और बहुध्रुवीयता को गति देता दिख रहा है। लेकिन यह पूँजीवादी व्यवस्था के अपने निहित संकट से निपटने का एक स्थायी समाधान है।
जैसा कि वालरस्टीन ने अपने ‘विश्व-प्रणाली विश्लेषण’ में दिखाया कि यह अमेरिकी वर्चस्व के पतन का प्रतीक है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है, जो 1970 के दशक के बाद से चल रही है, जहाँ अमेरिका का उत्पादन, व्यापार और वित्तीय प्रभुत्व लगातार कम हो रहा है।
ब्रिक्स-समर्थित देशों की चुनौतियों के बीच अमेरिका परिधि पर अपना मूल प्रभुत्व पुनः स्थापित करने का असफल प्रयास कर रहा है।
यह वह समय है, जब पूरी दुनिया के लोगों को मिलकर चार काम करने चाहिए। पहला—अमेरिकी जनता को अपनी सरकार के युद्ध का विरोध करना चाहिए, सैनिकों की घर वापसी और आन्तरिक अन्तर्विरोधों को खत्म करने के लिए संसाधनों की माँग करनी चाहिए। सभी देशों की जनता को मिलकर इस माँग व विरोध में अमेरिकी जनता का साथ देना चाहिए। (जैसा कि होता दिख भी रहा है।)
दूसरा—सभी देशों की जनता को मिलकर युद्ध झेल रही निर्दोष ईरानी जनता का समर्थन और आन्तरिक अन्तर्विरोधों के खात्मे के लिए स्वतन्त्र जनतन्त्र के निर्माण की कोशिश की माँग तेज करनी चाहिए।
तीसरा—अन्तर्राष्ट्रीय एकजुटता दिखानी चाहिए और राष्ट्रवाद की सीमाओं को पार करते हुए वैश्विक एकता के निर्माण की कोशिश करनी चाहिए, जिससे ‘बहुपक्षवाद’ (मल्टीलेटरलिज़्म) को पुनर्जीवित किया जा सके।
चौथा—पूरी दुनिया के संस्कृति-कर्मियों, जन-योद्धाओं और बुद्धिजीवियों को मिलकर युद्धों का ऐतिहासिक विवेचन-विश्लेषण करके जनता के सामने रखना चाहिए, जिससे एक युद्ध-विरोधी जनमत तैयार हो सके और इस बात का पर्दाफाश भी हो सके कि युद्ध ज्यादातर बार शासक वर्गों द्वारा आन्तरिक अन्तर्विरोधों से ध्यान हटाने व ‘अन्धराष्ट्रवाद’ की निर्मिति के लिए आम जनता पर थोपे जाते हैं।
मार्क्स ने लिखा था: ‘जिस अनुपात में राष्ट्र के भीतर वर्गों के बीच संघर्ष समाप्त होता है, उसी अनुपात में एक राष्ट्र की दूसरे राष्ट्र के प्रति शत्रुता समाप्त हो जाएगी।’ यह वाक्य असली वैश्विक शान्ति सिद्धान्त का सार है।
युद्ध पूँजीवाद की लाइलाज बीमारी नहीं है, बल्कि उसका स्वाभाविक लक्षण है। जब तक पूँजी के संचय की प्रवृत्ति, असमान विकास और साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता बनी रहेगी, तब तक युद्ध होते रहेंगे।
वर्तमान में जारी रूस और यूक्रेन, अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध इस विश्लेषण को एक बार फिर सही साबित करते हैं। जमींदोज घरों, अस्पतालों और स्कूलों के मलबे में; होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर छाए धुएँ में; तबाह हुई परमाणु सुविधाओं की राख में और वैश्विक तेल बाजारों की उथल-पुथल में; शेयर बाजार की अस्थिरता में; ‘लालची’ पूँजीवाद का चेहरा एक बार फिर बेनकाब हुआ है।
दुनिया में स्थायी शान्ति की एकमात्र शर्त है: पूँजीवादी विश्व-अर्थव्यवस्था और उसकी साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता का अन्त।
तेहरान से लेकर वॉशिंगटन तक, बीजिंग से लेकर बर्लिन तक; रूस से लेकर यूक्रेन तक दुनिया भर की जनता का इस लड़ाई में कतई कोई हित नहीं। उनका साझा शत्रु राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वर्गीय है। उनकी मुक्ति का एकमात्र रास्ता है—इसके खिलाफ जनसंघर्ष।










