मुद्दा

कब तक चलेगी जहर की खेती

 

पटना के महावीर कैंसर इंस्टीट्यूट में आने वाले मरीजों में ज्यादातर समस्तीपुर, भागलपुर, नालंदा और पटना जिले के होते हैं। ये ऐसे जिले हैं जहाँ खेतों में रासायनिक खादों एवं जहरीले कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग होता है। पंजाब के भटिंडा जिले की हालत तो और भी बदतर है। इसीलिए भटिंडा एक्सप्रेस को लोग कैंसर एक्सप्रेस कहते हैं। इसी ट्रेन से लोग इलाज के लिए राजस्थान के कैंसर अस्पताल में पहुँचते हैं। इस ट्रेन में एक तिहाई यात्री कैंसर के मरीज होते हैं और एक तिहाई उसके देखभाल करने वाले परिजन। नागपुर (महाराष्ट्र) में भी एक लेखक ने देखा है कि वहाँ कैंसर के बड़ी संख्या में मरीज हैं। नागपुर में अंगूर, संतरे तथा अन्य फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का भारी छिडकाव होता है। असम के चायबागानों में भी फर्टिलाइजर तथा जहरीले कीटनाशकों का भारी प्रयोग होता है। कैंसर तो एक उदाहरण है। महिलाओं में असमय गर्भपात तथा अन्य घातक बीमारियाँ भी इनके प्रयोग से बढ़ रही है। सब्जियों में, यहाँ तक कि दूध में तथा और तो और महिलाओं के स्तनों से शिशुओं को पिलाये जाने वाले दूध में जहर पाया जाने लगा है।

यही कारण है यूरोप तथा अमेरिका के देशों में निर्यात होने वाली चायपत्ती, अंगूर, आम, केला आदि में जहर के अंश पाए जाते हैं तो वे देश वापस लौटा देते हैं। अब उन देशों को जो खाद्य सामग्री निर्यात की जाती है उनका उत्पादन जैविक खादों तथा जैविक कीटनाशकों के द्वारा जैविक खेती से होने लगा है। हमारे देश में भी अमीर लोग जहर के अंश वाली फल-सब्जी, चाय, अनाज आदि का प्रयोग नही करते। उनको जैविक खेती के उत्पाद ही स्वीकार्य होते हैं।Organic Farming Hindi Article

जैविक खेती में पानी की खपत 40 प्रतिशत घट जाती है। इससे भूजल का स्तर बनाये रखना आसन होता है। फसल उत्पादन की लागत भी बहुत घटती है। जब रासायनिक खादों, कीटनाशकों का प्रयोग शुरू हुआ था तो उपज बढ़ी थी। लेकिन पांच-दस वर्षों में उर्वरा शक्ति क्षीण होती गयी और खेती का खर्च बढ़ता गया। पंजाब के खेतो की ऊपरी ऊसर परतों को हटाने के लिए सरकार को सब्सिडी देनी पड़ रही है। उस ऊसर मिटटी का उपयोग हाइवे आदि के निर्माण में करना पड़ रहा है। उपजाऊ मृदा का निर्माण एक लम्बी प्रक्रिया में जीवाणुओं तथा वनस्पतियों के द्वारा होता है। यह फटाफट होने वाली यांत्रिक या रासायनिक प्रक्रिया नही होती। जैविक खेती में मिटटी की गुणवत्ता बढ़ते जाने के कारण न केवल शनै-शनै उर्वरता काफी बढ़ जाती है, बल्कि पानी को मिटटी में टिकाये रखने की क्षमता भी काफी बढ़ जाती है। जिन खेतों में जैविक खादों एवं जैविक कीटनाशकों के सहारे सब्जी, फल या अनाज उगाया जा रहा है, वहाँ ये ज्यादा स्वादिष्ट, ज्यादा पौष्टिक और खुशबूदार होते हैं। बिहार का मुजफ्फरपुर लीची के लिए प्रसिद्ध है। लीची के जिन बागानों में जैविक तरीके से बागवानी हो रही है वहाँ की लीची का रंग, आकार और स्वाद बेहतर है। यही कारण है कि जैविक खेती द्वारा उपजाए गये अनाज, फल और सब्जियों के भाव ज्यादा मिलते हैं।

रासायनिक कृषि से फसल चक्र भी बिगड़ गया है। एक ही प्रकार की फसल बार-बार लगाने से मिटटी की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है। दाल और अनाज वाली फसलों को अदल-बदल कर बोने या मिश्रित रूप से बोने पर खेत उर्वर बने रहते हैं। एक और खास बात है कि रासायनिक कृषि से पौधों के लिए आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व समाप्त हो गये हैं। मिटटी की जाँच का संकट सामने आता है और सूक्ष्म पोषक तत्वों को महंगे दामों में खरीदकर खेतों में छिड़कना पड़ता है। जबकि, जैविक खाद में ये पोषक तत्व पर्याप्त मात्र में मौजूद रहते हैं। नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटेशियम के साथ-साथ पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम, कोबाल्ट, मोलिब्डेनम, बोरोन, सल्फर, लोहा, ताम्बा, जस्ता, मैंगनीज, जिब्रैलिन, साईटोकाईनीन तथा पर्याप्त मात्र में ऑक्सीजन होता है। इसके अलावा बहुत सारे बायोएक्टिव कम्पाउंड, विटामिन तथा एमिनो एसिड होते हैं।दुनिया से कीड़े ख़त्म हो जाएं तो क्या होगा? - BBC News हिंदी

मधुमक्खियाँ तथा अनेक कीट-पतंग फसलों के परागन में काफी मददगार होते हैं। फसलों के आसपास मधुमक्खियों के बक्सों को रखने पर 20 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। लेकिन जहरीले कीटनाशकों के कारण खेती के मददगार कीट-पतंगें और मधुमक्खियाँ बड़ी संख्या में मर जाती है। मेंढक ऐसा जीव है जो प्रतिदिन अपने वजन के बराबर खेती को नुक्सान पहुँचाने वाले जीवों को खा जाता है। खेती के मित्र जीवों, पक्षियों को ये जहरीले रसायन समाप्त करते जा रहे हैं। कौवे, गोरैये, कोयल एवं अन्य चिड़ियों की चहचहाहट तथ कबूतरों की गुंटर-गूं भी अब कम सुनाई पड़ती है। मोर भी मर रहे हैं, चील भी अब कम दिखाई पड़ते हैं और गिद्ध तो नही मिलते। लेकिन जिन गाँव में जैविक कृषि और बागवानी होने लगी है, वही मित्र जीव-जंतुओं की सुरसुराहट, चिड़ियों की चहचहाहट और हलचल का मधुर संगीत फिर से सुनाई पड़ने लगा है।

अभी देश की लगभग 40 प्रतिशत भूमि पर सिंचाई भूमि का प्रबन्ध है। वहाँ कीटनाशकों और रासायनिक फर्टिलाइजर का सर्वाधिक प्रयोग होता है। खेतों से बहकर इनका 75 प्रतिशत हिस्सा तालाबों तथा नदियों में पहुँचता है और जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों को नष्ट करके नदी की पारिस्थिकी को तहस-नहस कर देता है। गंगा के प्रदुषण का भी यह एक बड़ा कारण है जो ऊपर से दिखाई नही देता। यदि मनुष्य को तथा अपने तालाबों, झीलों, नदियों को स्वस्थ रखना है तो हमें रासायनिक खादों तथा जहरीले रसायनों पर रोक लगाकर जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए जरूरी है कि फर्टिलाइजर जहरीले रसायनों के लिए हर साल दी जाने वाली भारी सब्सिडी को रोक कर उस राशि को जैविक कृषि करने वाले किसानों को सीधे दे दिया जाय। यह काम आसान नही है। लेकिन खेती को बचाने के लिए तथा आमलोगों के स्वास्थ्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है। ध्यान देने की बात है कि 1993 में भी केन्द्र सरकार ने मनुष्य के लिए घातक 12 कीटनाशकों को प्रतिबन्धित करने तथा 16 कीटनाशकों के प्रयोग को प्रतिबन्धित करने का फैसला किया था। इसके अतिरिक्त अन्य कीटनाशकों को समीक्षा सूची में रखा गया है। अबतक उस फैसले पर अमल टलता रहा है। दुनिया के अनेक देश – अमेरिका, यूरोप आदि ऐसे जहरीले रसायनों को प्रतिबन्धित कर चुके हैं। हमें फैसला लेने और उसे सख्ती से लागू करने में देर नही करना चाहिये।

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अनिल प्रकाश

लेखक गंगा मुक्ति आन्दोलन के संस्थापक और प्रखर विचारक हैं। सम्पर्क +919304549662, anilprakashganga@gmail.com
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