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कर्बला की कहानी

 

  • अब्दुल ग़फ़्फ़ार

 

इस वक़्त ‘कर्बला’ इराक़ का एक प्रमुख शहर है, जहां सन् 60 हिजरी में ‘यज़ीद’ मुसलमानों का स्वघोषित और स्वयंभू ख़लीफ़ा बन बैठा और इस्लामी सिद्धांतों के विरूद्ध आचरण और शासन करने लगा। वह अपने वर्चस्व को पूरे अरब में फैलाना चाहता था। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़े थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के ख़ानदान के इकलौते चराग़ और उनके नाती इमाम हुसैन (रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु), जो किसी भी हालत में यज़ीद के सामने झुकने को तैयार नहीं थे।
सन् 61 हिजरी से यज़ीद के अत्याचार बढ़ने लगा। ऐसे में इमाम हुसैन (रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु) अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक़ के शहर कुफ़ा जाने के लिए निकल पड़े लेकिन रास्ते में यज़ीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान में उनके क़ाफ़िले को रोक दिया।


वह 2 मुहर्रम का दिन था, जब हुसैन (रज़ी) का क़ाफ़िला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका। वहां पानी का एकमात्र स्रोत फ़रात नदी थी, जिस पर यज़ीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन (रज़ी) के क़ाफ़िले पर रोक लगा दी। बावजूद इसके, इमाम हुसैन (रज़ी) नही झुके। यज़ीद के प्रतिनिधियों की इमाम हुसैन (रज़ी) को झुकाने की हर कोशिश नाकाम होती रही और आख़िर में युद्ध का ऐलान हो गया। हुसैन (रज़ी) ने अपने साथियों और जांनिसारों से कहा कि हमारे साथ तुम लोग अपनी जानों को नुक़सान मत पहुंचाओ और वापस लौट जाओ। जवाब में हुसैन (रज़ी) के जांनिसारों ने कहा कि नबी के नवासे पर ऐसी हज़ारों जानें क़ुर्बान हो जाएं फिर भी ज़ुबान से उफ़्फ़ तक नहीं निकलेगा। आप आगे बढ़ें हम सब आप के साथ हैं।
10 मुहर्रम की सुबह हुसैन (रज़ी) ने फजर की नमाज़ पढ़ाई उसके बाद लड़ाई की इब्तेदा हो गई। दिन ढलने तक हुसैन (रज़ी) के 72 लोग शहीद हो गए, जिनमें उनके छह महीने के शीरख़ार बेटे अली असग़र, दो साल के मासूम बेटे अब्दुल्लाह और 18 साल के बेटे अली अकबर के साथ बड़े भाई इमाम हसन (रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु) के बेटे क़ासिम जो अह्ले बैत में सबस हसीन थे, शामिल थे। फ़रिश्ते कराह उठे होंगे, ज़मीं कांप उठी होगी और आसमान थर्रा गया होगा जब इन मासूमों की शहादत हुई होगी।

सैन (रज़ी) के बेटे जैनुअल आबेदीन को छोड़कर उनका 16 लोगों का पूरा परिवार शहीद हो गया। जैनुअल आबेदीन इसलिए बच गए क्‍योंकि वह बीमार थे और जंग में शरीक नहीं हो पाए थे।
इतिहास कहता है कि यज़ीद की 80,000 की फौज के सामने हुसैन (रज़ी) के 72 बहादुरों ने जिस तरह की जंग लड़ी, उसकी मिसाल ख़ुद दुश्मन फौज के सिपाही भी एक-दूसरे को देने लगे।
इमाम हुसैन ((रज़ी) ने अपने नाना हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और पिता हज़रत अली (रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु) के सिखाए सदाचार, उच्च विचार, अध्यात्म और अल्लाह से बेपनाह मुहब्बत पर अमल करते हुए भूख, प्यास, दर्द, और पीड़ा सब पर विजय प्राप्त कर लिया।
10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन (रज़ी) अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफ़नाते रहे और आख़िर में अकेले युद्ध लड़ा।


अस्र की नमाज़ के वक़्त जब इमाम हुसैन (रज़ी) ख़ुदा का सजदा कर रहे थे, तब एक यजीदी को लगा कि यही सही मौक़ा है हुसैन को मारने का। फिर, उसने धोखे से नमाज़ में हज़रत हुसैन (रज़ी) को शहीद कर दिया। हुसैन (रज़ी) का सर भी गिरा तो सजदे की हालत में गिरा ताकि जामे शहादत नौश करते हुए भी ख़ुदा राज़ी रहे। इस तरह हुसैन इब्ने हैदर हमें मुहम्मद का उम्मती होने का मतलब समझाते गए।
जिस उम्मत के पास ऐसी दास्तान मौजूद हो वो नमाज़ से ग़ाफ़िल रहे, झूठ पे बिक जाए, चंद सिक्कों पे बहक जाए, नशे में कमर मटकाए और शहादत का मातम मनाए, तो उस उम्मत का ख़ुदा ही हाफ़िज़ है।

लेखक कहानीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं|
सम्पर्क-+919122437788, gaffar607@gmail.com
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