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केरल में राष्ट्रीय-मानवीय आपदा…

sablog.in डेस्क – टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्टून है कि सारे कैमरे अटल जी की ओर लगे हैं और अटल जी घने बादलों के ऊपर से उँगली का इशारा केरल की धरती की तरफ कर रहे हैं जहाँ बाढ़ में हुए अनगिनत लोग पानी के ऊपर हाथ उठाए सहायता की गुहार कर रहे हैं।

केरल में क्या हालात हैं, इसका अंदाज़ तो अख़बारों की रिपोर्ट से भी हो जाता है लेकिन आज सुबह मैंने कोच्चि, त्रिवेंद्रम और कालडी के अपने कुछ मित्रों से बात की। कइयों के फोन नहीं मिले—या तो बाढ़ के कारण लैंडलाइन बंद हैं या ख़राब मौसम से मोबाइल काम नहीं कर रहे।
अब तक चार सौ से ज़्यादा लोग बलिदान चढ़ गये हैं। दो लाख से अधिक राहत शिविरों में हैं। कई लाख लोग पानी से भरे इलाक़ों में फँसे हैं। सेना मदद कर रही है। पर इतना बड़ा संकट है कि सेना अपनी सारी कोशिशों के बावजूद अपर्याप्त सिद्ध हो रही है। हर साथी की एक ही गुहार है कि जहाँ से जितनी मदद हो, कीजिए!!
समस्याएँ उन्हीं के सामने नहीं हैं जो सीधे बाढ़ में घिरे हैं। सड़कों पर पानी भरा है, यातायात ठप्-सा है, खाने-पीने की चीज़ें पहुँच ही नहीं पा रही हैं, जो पहुँचती हैं उन्हें राहत शिविरों के लिए उठा लिया जाता है, नागरिकों को ब्रेड-चावल-दूध-दालें तक मुश्किल से मिलती हैं। राहत शिविरों के लिए ही वह रसद काफी नहीं होती, बाक़ियों की क्या कहिए!!!
यह शिकायत या आलोचना नहीं, यथार्थ है। इसलिए हर आदमी और सहायता की गुहार लगा रहा है। स्थिति कितनी विषम है, इसका अंदाज़ कीजिए कि प्रधानमंत्री कोच्चि एयरपोर्ट पर तो उतर नहीं सकते थे, वह जसमग्न है; त्रिवेंद्रम के नेवी एयरपोर्ट से वे हेलिकॉप्टर पर कोचीन पहुँचे लेकिन भारी बारिश और बिजली वाले बादलों के कारण हवाई सर्वेक्षण का कार्यक्रम टालना पड़ा।
परिस्थिति का सबसे दुखद पहलू यह है कि भाजपा-शासित राज्यों से कोई सहायता नहीं मिल रही है। वहाँ की प्रांतीय भाजपा या संघ जो राजनीति कर रहे हैं, वह शर्मनाक है लेकिन अभी उसपर बात करने का समय नहीं है। गृहमंत्री ने राहत की घोषणा की है, यह स्वागत-योग्य है, हालाँकि वहाँ के हालात देखते हुए वह बहुत ही अपर्याप्त है। पर यह तो कहना ही पड़ेगा कि इस राष्ट्रीय विपदा के समय राजनीतिक संकीर्णता से काम करना देश और मानवता के प्रति अपराध है।
एक दुखद पहलू सह भी है कि मीडिया और सोशल मीडिया में केरल को लेकर कोई सरोकार नहीं दिखायी देता। क्या केरल भारत काअंग नहीं है? केरल ने कभी हिंदी-विरोधी आंदोलन नहीं किया, बल्कि वहाँ नंबूदिरीपाद की पहली कम्युनिस्ट सरकार के समय से ही कक्षा दस तक हिंदी अनिवार्य है। निजी स्कूलों मे तो उत्तर भारत में भी हिंदी बोलने पर सजा मिलती है! हालाँकि वहाँ यह हाल नहीं है, सरकार कोई भी रहे। ऐसे में क्या हम सबका यह कर्तव्य नहीं है कि हम केरल को भारत का अंग मानकर खुद आगे बढकर सहायता की पहलकदमी करें?
  • सरकार केरल की विपदा को  राष्ट्रीय आपदा घोषित करे।
  • राहत के लिए हम नागरिक-पहलकदमी करे।
  • रुपया, दवा, कपड़ा आदि एकत्रित करके स्थानीय प्रशासन के सहयोग से वहाँ भेजने का प्रयत्न करें।
संकट में ही हमारी मानवीयता, राष्ट्रीयता और क्षमता की परीक्षा होती है।
– अजय तिवारी
लेखक वरिष्ठ आलोचक हैं.
Mob- 97171 70693
Email – tiwari.ajay.du@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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