पर्यावरण

गाँवों की कालगत मध्यवर्तिता: विकास, संस्कृति और प्रकृति के बीच एक समग्र दृष्टि

 

विकास के वर्तमान विमर्श में गांवों को अक्सर पिछड़ेपन की निशानी मानते हुए उन्हें शहरी जीवन की ओर धकेला जा रहा है। लेकिन क्या यह दृष्टिकोण सही है? ग़ौर करने पर पाएंगे कि यह नज़रिया न केवल एक सांस्कृतिक भूल है, बल्कि यह ग्रामीण समय और चेतना को न समझने की भूल भी है। इस लेख में मैं यह तर्क प्रस्तुत करूंगी कि भारतीय गांव न तो परंपरागत हैं और न ही आधुनिक, बल्कि वे उस ‘टेम्पोरल इन -बिटवीननेस’ में स्थित हैं जिसका ज़िक्र मौलिका दस्तिदार अपने एक लेख “मार्जिनलाइज्ड एज़ माइनॉरिटी : ट्राइबल सिटीजन एंड बॉर्डर थिंकिंग इन इंडिया” में करती हैं, जहां समकालीनता, स्मृति और सांस्कृतिक उत्तरजीविता साथ-साथ चलती हैं। उनका तर्क यह है कि जब राज्य एक जनजातीय समुदाय को नागरिकता की कसौटी पर परखने की कोशिश करता है, तो वह समुदाय किसी निश्चित समय में नहीं रहता, न पूरी तरह पारंपरिक, न पूरी तरह आधुनिक, बल्कि वह एक ऐसे मध्यवर्ती समय में स्थित होता है, जिसे राज्य न तो पूरी तरह स्वीकार करता है और न ही पूरी तरह नकारता है। राज्य का काम कुछ और नहीं बल्कि “कालगत मध्यवर्तिता” के लय को बिगाड़ बाहर से समय को ‘थोपना’ है, जहां तथाकथित विकास की घड़ी जनजातीय जीवन की लय से मेल नहीं खाती।

अब सवाल यह है कि क्या यह विचार सिर्फ जनजातीय समुदायों तक सीमित है, या इसमें गांवों को भी शामिल किया जा सकत है? यदि हम सतही तौर पर देखें, तो गांव और जनजातीय समाज में इतिहास, सामाजिक संरचना, राजनीतिक स्थिति आदि का अंतर है। लेकिन जब हम राज्य और पूंजी के दखल को समझते हैं, तो हमें दिखता है कि दोनों ही संदर्भों में राज्य एक ‘मॉनोलिथिक टाइम’ (एकरेखीय समय) को लागू करना चाहता है। गांवों के संदर्भ में यह स्मार्ट विलेज, डिजिटल इंडिया, और इंफ्रास्ट्रक्चर-ड्रिवन डेवलपमेंट के रूप में नज़र आता है, जबकि जनजातीय समाज में यह सभ्यता, नागरिकता, लॉ एंड ऑर्डर, या संसाधन निष्कर्षण के नाम पर होता है। विकास का वैकल्पिक मॉडल, जो आत्मीयता, सामूहिकता और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है, वह इस ‘बीच के समय’ को पहचानता है और उसे ख़त्म करने के बजाय सहेजने की कोशिश करता है।

पूँजीवाद एक ऐसा समय पैदा करता है जो “रिलेशनल टाइम” के विचार को ही ख़त्म कर देता है। गाँव का समय रिलेशनल होता है, प्रकृति से, मौसम से और फसल से। राज्य और पूँजीवाद इस बीच की स्थिति को भ्रम की स्थिति मानते हैं। लेकिन गाँव तो अपने तरीक़े से आधुनिकता को गढ़ रहा है। आधुनिक विज्ञान द्वैत पर आधारित और यही वज़ह है कि वह समय को भी द्वैत में देखता है। यहाँ बड़ा प्रश्न गाँव की एजेंसी का भी है कि क्या उसके पास वह एजेंसी है जो विकास की शर्तों को उसे ख़ुद तय करने दे? आख़िर क्यों राज्य उस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा जहाँ गाँव अपनी शर्त पर आधुनिकता को आत्मसात कर सके? शहरीकरण “टेम्पोरल इम्पोजिशन” की तरह है, जहाँ हम यह मान लेते हैं कि गाँव पिछड़ा हुआ है और इसे विकास की सख़्त ज़रूरत है। एक बात यहाँ पूर्णतः स्पष्ट है कि गाँव ज़रूरतों के अनुरूप ख़ुद को बदलने को तैयार है जैसे डिजिटल मीडिया के साथ सामूहिक गीत-नाद।

विकास की जो मुख्यधारा में व्याख्या की जाती है, वह दरअसल कई प्रकार की समस्याओं और अपूर्णताओं को अपने भीतर समेटे हुए है। आमतौर पर विकास को भौतिक उन्नति, बुनियादी ढाँचे के विस्तार, तकनीकी प्रगति और आर्थिक वृद्धि के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह दृष्टिकोण एक खास प्रकार के समयबोध और जीवन-दृष्टि पर आधारित है, जो पश्चिम से आयातित है और जिसे ‘एकरेखीय विकास’ कहा जा सकता है। इसमें यह मान लिया जाता है कि विकास की एक ही मंज़िल है, और सभी समाजों को उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

लेकिन यह सोच न केवल समय की बहुलता व विविधताओं को नज़रअंदाज़ करती है, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक जीवन के साथ गहरे द्वन्द्व भी उत्पन्न करती है। जो विकास दिखाई दे रहा है यानि ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, स्मार्ट टेक्नोलॉजी, वह दरअसल उस द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का परिणाम है जहाँ संस्कृति और प्रकृति को या तो पिछड़ा कहा गया है या फिर केवल संसाधन के रूप में देखा गया है। आधुनिक विकास का मॉडल प्रकृति को जीतने या उसे वश में करने की कोशिश करता है, जबकि सांस्कृतिक चेतना में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का भाव रहा है। प्रकृति और संस्कृति कमोबेश एक ही हैं। दरअसल, परंपरागत भारतीय दृष्टि में प्रकृति केवल बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का अंग है। यहाँ नदियाँ माता हैं, धरती माँ है, वृक्ष देवता हैं। संस्कृति कोई अमूर्त वस्तु नहीं, बल्कि यह प्रकृति के साथ सम्बन्धों की निरंतर अभिव्यक्ति है, त्योहारों, रीति-रिवाजों, खेती के तरीकों और लोककथाओं में।

लेकिन जब हम विषयों का आधुनिक विभाजन देखते हैं जैसे कि समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, पर्यावरण विज्ञान आदि, तो वह हमें विकास को टुकड़ों में देखने की दलदल में डाल देता है। जेसन डब्ल्यू. मूर का तर्क है कि विभिन्न शैक्षणिक अनुशासन को ‘डिसिप्लिन’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये बौद्धिकों को अनुशासित करते हैं, यानी उनके दृष्टिकोणों को सीमित कर देते हैं। यह विभाजन एक ऐसी स्थिति उत्पन्न करता है जो उस कहानी की तरह है जिसमें कुछ अंधे लोग एक हाथी को छूकर उसका वर्णन करते हैं, और हर कोई केवल हाथी के किसी एक हिस्से को पहचान पाता है। उसी तरह, प्रत्येक विद्वान केवल एक बड़े यथार्थ के छोटे से टुकड़े को ही देख पाता है। इस विभाजन के कारण हम समग्र दृष्टि खो बैठते हैं।

विकास को या तो अर्थशास्त्र के चश्मे से देखा जाता है, या पर्यावरणीय आपदा के रूप में, या सांस्कृतिक पतन के रूप में, परन्तु यह सब एक साथ होते हुए भी हमें उनके बीच का सम्बन्ध नहीं समझने दिया जाता। यह विषयगत विभाजन केवल बौद्धिक भूल नहीं, बल्कि सत्ता का उपकरण भी है। जब ज्ञान के क्षेत्र अलग-अलग कर दिए जाते हैं, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया से सामुदायिक समझ, लोकज्ञान और सम्बन्धों की व्याख्या को बाहर कर दिया जाता है। यही कारण है कि ‘विकास’ एक ऐसे यंत्र की तरह हो गया है, जो समाजों पर थोप दिया जाता है, बिना यह पूछे कि वे क्या खो रहे हैं और क्या पाना चाहते हैं। गाँधी ने इस विभाजन को काफ़ी पहले ही पहचाना था। उनके लिए विकास का अर्थ स्वावलंबन था। ऐसा जीवन जो नैतिक हो, प्रकृति के साथ सामंजस्य में हो, और जिसमें समुदाय की भागीदारी हो। वह मानते थे कि पश्चिमी विकास एक विभाजनकारी चेतना से उपजता है, जो मनुष्य और प्रकृति को अलग करता है, श्रम और बौद्धिकता को अलग करता है, और अंततः आत्मा और शरीर को भी बाँट देता है।

प्रकृति के साथ नज़दीकी से समाज अपने अंदर उन्हीं गुणों को आत्मसात कर लेता है जो गुण प्रकृति के होते हैं। जब हम सुनते हैं कि गाँव-देहात में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सो सकता या खाने को कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। यह उनके जीवन का हिस्सा कैसे बना शायद ही हम कभी इसपर प्रकृति के साथ सम्बन्ध के सन्दर्भ में समझने की कोशिश करते हो। दरअसल प्रकृति हमें देना सिखाती है और जोड़ना तो थोपी हुई विकास की धारा में है। यह देना गाँव की संस्कृति का हिस्सा है और जिसकी जड़ें सीधे प्रकृति से जाकर मिलती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण परिवेश में प्रकृति और संस्कृति दो अलग-अलग नहीं बल्कि जीवन प्रणाली का एक ही आयाम है। बल्कि पूँजीवाद ही संचय की प्रणाली पर आधारित है और अकिल बिल्ग्रामी यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि आधुनिकता के विघटन के साथ-साथ प्रकृति की धारणा भी बदल गई है।

जहाँ पहले प्रकृति को एक जीवंत, नैतिक और सांस्कृतिक रूप में देखा जाता था, वहीं अब उसे केवल ‘प्राकृतिक संसाधन’ के रूप में समझा जाने लगा है, एक ऐसी वस्तु जिसे मापा, दोहन किया और बाज़ार में बदला जा सकता है। यह परिवर्तन केवल वैचारिक नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक-आर्थिक प्रभाव हैं। इस प्रक्रिया में कृषि पर आधारित सामुदायिक जीवन शैली, जो प्रकृति के साथ सहजीविता पर आधारित थी, उसे कृषि उद्योग में बदल दिया गया,जहाँ खेती अब सिर्फ मुनाफे की दृष्टि से की जाती है। यह बदलाव ‘विकास’ के नाम पर तर्कसंगत किया जाता है, जैसे कि लोगों को यह समझाया जाता है कि मशीनों, उर्वरकों, और कॉर्पोरेट खेती से ही ‘सच्चा विकास’ संभव है। लेकिन यह विकास न केवल प्रकृति के साथ सम्बन्ध को तोड़ता है, बल्कि ग्राम्य जीवन की संवेदनशीलता, सामूहिकता और नैतिकता को भी विस्थापित करता है। अतः यह ज़रूरी है कि हम विकास की इस धारा को केवल आर्थिक दृष्टि से न देखकर, एक समग्र जीवन-दृष्टि से देखें, जहाँ संस्कृति और प्रकृति, दोनों साथ-साथ हों, और जिसमें द्वन्द्व नहीं, सह-अस्तित्व की भावना हो।

संदर्भ:

  1. दस्तिदार, मौलिका. (2016). “मार्जिनलाइज्ड एज माइनॉरिटी: ट्राइबल सिटीजन एंड बॉर्डर थिंकिंग इन इंडिया”. इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, खंड 51, अंक 25, 18 जून 2016.

https://www.epw.in/journal/2016/25/special-articles/marginalised-minority.html

  1. बिल्ग्रामी, अकील. (2020). “नेचर, वैल्यू एंड पॉलिटिक्स”. व्याख्यान, एस.बी. कॉलेज, इंग्लिश विभाग, 29 नवंबर 2020. यूट्यूब लिंक: https://www.youtube.com/live/S0aWVwWetPE?si=idf_M4ElhVoAHmbo

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श्वेता कुमारी

लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर छात्रा हैं। सम्पर्क- ShwetaJha847224@gmail.com, +919267901031
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