शख्सियत

प्रो. चौथीराम यादव को ‘सत्राची सम्मान’ – 2022

 

  सत्राची फाउंडेशन, पटना के द्वारा ‘सत्राची सम्मान’ की शुरुआत 2021 से की गयी है। न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन को रेखांकित करना ‘सत्राची सम्मान’ का उद्देश्य है। ‘सत्राची सम्मान’ – 2022 के लिए प्रो. वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में चयन समिति गठित की गयी थी। इस समिति के सदस्य पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. तरुण कुमार और ‘सत्राची’ के प्रधान संपादक प्रो. कमलेश वर्मा रहे।

 सत्राची फाउंडेशन के निदेशक डॉ. आनन्द बिहारी ने चयन समिति की सर्वसम्मति से प्राप्त निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि वर्ष 2022 का दूसरा ‘सत्राची सम्मान’ प्रसिद्ध लोकधर्मी आलोचक और वक्ता प्रो. चौथीराम यादव को दिया जाएगा।

 प्रो. चौथीराम यादव के लेखन और भाषणों के केंद्र में एक ऐसे समाज की परिकल्पना रही है जो न्यायपूर्ण हो। उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों में अनेक सभाओं को संबोधित किया है। अकादमिक संगोष्ठियों, जनसभाओं और आन्दोलनों में उन्होंने असंख्य भाषण किए हैं। बुद्ध-कबीर-फुले-आम्बेडकर की वैचारिक परंपरा से प्रतिबद्ध रहते हुए उन्होंने न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों को नयी पीढ़ी तक पहुँचाया है। आगामी 20 सितम्बर, 2022 को प्रो. वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में प्रो. चौथीराम यादव को सम्मान-स्वरूप इक्यावन हजार रुपये का चेक, मानपत्र, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया जाएगा।  

   29 जनवरी, 1941 को कायमगंज, जौनपुर के एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे चौथीरामजी हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक, विचारक और वक्ता हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जौनपुर जिले की शिक्षण संस्थाओं में हुई। उन्होंने स्नातक-स्नातकोत्तर एवं पी-एच।डी। की उपाधि हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की। यहीं 1971 से 2003 तक अध्यापन करते हुए वे प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष के पद से सेवामुक्त हुए।  

    प्रो. चौथीराम यादव ने हजारी प्रसाद द्विवेदी और छायावाद पर गंभीर अकादमिक काम किए हैं। उनकी पुस्तक ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन’ अपने विषय के सम्यक् मूल्यांकन में सक्षम है। उनकी पुस्तक ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और छायावादी काव्य’ शोध और आलोचना का मिश्रित रूप है।

     प्रो. चौथीराम यादव ने भारत के बहुसंख्यक समाज के हितों को ध्यान में रखकर दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और बहुजन समाज के सामाजिक-साहित्यिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट पक्षधरता को प्रकट किया है। भाषणों के अतिरिक्त इन चार पुस्तकों में उनके ऐसे विचारों को पढ़ा जा सकता है – ‘लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा’, ‘उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज’, ‘लोक और वेद आमने-सामने’, ‘आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य’। उत्पीड़ित समुदायों के प्रतिरोध को साहित्य, संस्कृति, धर्म और राजनीति में चिह्नित करती हुई ये पुस्तकें न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के प्रति अपनी आस्था को व्यक्त करती हैं। 

     प्रो. चौथीराम यादव ने बढ़ती हुई उम्र के बावजूद अपनी वैचारिकी के लिए सड़कों पर उतर कर आन्दोलनों में सक्रियता दिखायी है। वक्ता, लेखक और एक्टिविस्ट के त्रिकोण को उनका व्यक्तित्व बखूबी समेटता है। चौथीरामजी के लेख हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और वे कई पुरस्कारों से समादृत हो चुके हैं। संपूर्ण लेखकीय योगदान को ध्यान में रखकर प्रो. चौथीराम यादव को ‘सत्राची सम्मान’ – 2022 से सम्मानित किए जाने के निर्णय से सत्राची फाउंडेशन स्वयं को सम्मानित महसूस कर रहा है

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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