शख्सियत

भारतीयता के लेखक रेणु की प्रासंगिकता

 

बाजारवाद की आंधी में लेखक आते हैं और जाते हैं, लेकिन कुछ लिखते हैं और जन मानस की चेतना में ऐसे बस जाते हैं कि पूँजी की सम्पूर्ण शक्ति मिलकर भी उन्हें स्थगित नहीं कर पाती। रेणु ऐसे ही लेखक थे जिहोनें अपने लेखन में सम्पूर्ण भारतीयता का प्रतिनिधित्व किया इसलिए यह कहना कि रेणु आंचलिकता और ग्राम्य जीवन के लेखक हैं तो यह उनका सम्पूर्ण मूल्यांकन नहीं हो सकता, बल्कि कम से कम इतना तो कहा ही जाना चाहिए कि रेणु भारतीयता के लेखक हैं; भारतीयता का इसलिए कि जिस ग्राम्य जीवन का सजीव चित्रण उन्होंने अपनी रचनाओं में किया है वह भारतीय समाज और संस्कृति का कम से कम सत्तर फीसदी हिस्सा तो रखता ही है।

साथ ही एक रचनाकार की सफलता उसके द्वारा निर्मित रचनाओं की देश-काल के साथ उसकी प्रासंगिकता पर भी निर्भर करता है और इस अर्थ में वे कालजयी हैं; वे कल और आज, यहाँ और वहाँ की सीमाओं से बाहर के लेखक हैं। उनकी छोटी से छोटी रचनाएँ वर्षों बाद भी किसी न किसी सन्दर्भ में समकालीन समाज को प्रतिबिंबित कर रही है। उदाहरण के लिए हम यहाँ ‘अक्ल और भैंस’ व्यंग्य को ही लेते हैं। आज कोविड-19 के समय में भी उनकी यह छोटी रचना सार्थक प्रतीत हो रही है। इस महामारी ने शहरी सभ्यता को सबसे अधिक तबाह किया है, और इस तबाही से दशकों से शहरों में बसे लोग भी शहरों को छोड़कर गाँवों की तरफ लौट रहें हैं या लौटने का सोच रहें हैं।

शहरों में जीवन-जीविका सब संकट में है, लोग इस आशा के साथ लौट रहें हैं कि गाँव में अपनी थोड़ी जमीन में खाने-पीने लायक कुछ उपजा कर चैन का जीवन गुजाडा जा सकता है, लेकिन यह इतना सरल नहीं जितना कि ग्राम्य जीवन के बारे में एक सामान्य सोच बना कर रख दिया गया है। लोग आने के बाद खेती-बाड़ी और अन्य तरह के कारोबार का प्रयास तो कर रहें हैं, लेकिन गाँव के बारे में उनकी समझ उनके प्रत्येक प्रयासों पर पानी फेर दे रही है। नये वातावरण और नये सामाजिक-आर्थिक मूल्यों के साथ तादात्मय स्थापित करने में लोगों को अनेकानेक समस्याओं का सामना करना पर रहा है।

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गाँव प्रथमदृष्टया अगर सहज और सुरम्य प्रतीत होता है, तो इसका दूसरा पक्ष इसकी महीन जटिलता और उबड़-खाबर सामाजिक-आर्थिक संरचना भी है। प्रकृति के अनिगिनत सौन्दर्य को समेटे इसके भीतर से एक अव्यक्त चीख भी निकलती रहती है जिसे समानुभूति के साथ सुने जाने की आवश्यकता है। साहित्य में तो गाँवों को इतना अधिक रोमांटीसाइज़ किया गया है कि इसके यथार्थ को समझने में एक शहरी जीवन मूल्यों से युक्त लोगों को और भी अधिक कठिनाई होती है।

उपरोक्त व्यंग्य शहर के मूल्यों के साथ प्रशिक्षित एक ऐसे ही शिक्षित व्यक्ति के गाँव में बसने के लिए किये गये भोले प्रयासों का निरूपण है। यह मूलतः दो खण्डों में समझा जा सकता है: पहला इनके शहर जाने की पृष्ठभूमि और शहर में बसने की जद्दोजहद, और दूसरा इनका गाँव लौटना और आजीविका के लिए किये गये मासूम समझदारी भरे कार्य जिसमे निरन्तर वह असफल होता रहता है। इन प्रक्रियाओं से वर्तमान ग्रामीण जीवन की त्रासदी के साथ ही साथ अस्त-व्यस्त और अनेक सामजिक-आर्थिक विषमताओं से लथपथ शहरों की समस्याओं का भी आकलन किया जा सकता है।

उपरोक्त रचना में अगमलाल जी लगभग सात वर्ष पहले अपने पैत्रिक गाँव और चार-पांच बीघे जमीन को बंटाई पर लगाकर निकट के शहर में आ गये थे। निस्संदेह खेती का कारोबार लाभप्रद नहीं था, जिस कारण उन्होंने शहर में ही बसने का निश्चय किया,लेकिन शहर में रोजगार के लिए उन्हें अनगिनत समस्याओं से दो-चार होना पड़ा, हालाँकि किसी तरह उन्होंने नौकरी तो प्राप्त कर लिया, लेकिन हरित क्रांति के नारों ने उन्हीं फिर से गाँव में ही बेहतर जीवन के लिए प्रेरित किया। गाँव छोड़ने के बाद भी उसके प्रति आकर्षण का बने रहना इस तथ्य की तरफ संकेत करता है कि शहर के जीवन से कहिं न कहिं वे असंतुष्ट थे और संभवतः जहाँ वे अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ अनुभव कर रहे थे।

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आज शहरों की तरफ होने वाले पलायन को देखे तो पता चलता है कि अधिकांश लोगों के लिए गाँवों से पलायन अन्तिम विकल्प ही होता है, उनका प्रथम प्रयास होता है कि वे अपने गाँव-समाज में ही अपने परंपरागत कृषिगत कार्यों के साथ जीवन जिए, लेकिन निरन्तर ग्रामीण-अर्थव्यस्था के टूटते रहने से पलायन को बढ़ावा मिलता रहा है। बिहार, ओड़िसा और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्यों से पलायन के लिए इसकी ग्रामीण आर्थिक संरचना का टूटना बड़ा कारण रहा है। पलायन के बाद भी इनके जीवन स्तर में बहुत बड़ा परिवर्तन सामन्यतया देखने को नहीं मिलता, विशेषकर खेतिहर मजदूरों और कृषकों के लिए शहर दुर्दम्य संघर्ष का ही स्थान रहा है जहाँ वे मात्र भूख मिटाने के लिए ही जाते हैं।

शहर पहुंचकर अगमलालजी को अपनी जीविका के लिए अत्यंत संघर्ष करना पड़ता है और इसके लिए उन्हें ट्यूशन पढ़ाने से लेकर प्रूफ रीडिंग तक का कार्य करना पड़ा। हर जगह उन्हें विभिन्न प्रकार की समस्याओं से निबटना पड़ा; गाँवों से पलायन के उपरांत समस्याओं का अंत नहीं होता, बल्कि यह एक समाधान आजीविका का तो किसी तरह दे देती है, लेकिन जीवन का अर्थ जीविका से बहुत ऊपर होता है और इस अर्थ में शहरी सभ्यता निरर्थक प्रतीत होती है।

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कोविड ने जो उथल-पुथल मचाया है उसमे शहरी सभ्यता को अपनी संरचना और बुनावट पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा, क्योंकि इसने हासिये के व्यक्ति और समुदाय को नितांत अकेला और असहाय कर दिया। अगमलाल जी हरित क्रांति से प्रभावित होकर गाँव लौटते हैं। उनका ये दृढ विश्वास है कि अब खेती से जीवन-जीविका चला पाना संभव है और इससे समृधि भी लाई जा सकती है, साथ ही उनका यह भी पक्का विश्वास है कि उनकी किताबी एवं साहित्यिक समझ खेती-बाड़ी के कार्यों में उनके लिए अतिरिक्त अवसर पैदा करेगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका। वे गाँव की कटु वास्तविकता से कोसों दूर थे। अगमलालजी के प्रयास गुदगुदाते  हैं, लेकिन इस गुदगुदाहट से उपजी हंसी के उपरांत समाज और व्यवस्था की पीड़ा भी देखी जा सकती है।

समकालीन भारतीय समाज विकास की आंधी से भटका हुआ प्रतीत होता है। अनियोजित एवं अदूरदर्शी नीतियाँ क्या गाँव, क्या शहर सबको एक निर्जनता की तरफ लिए चली जा रही है। गाँव उजाड़ दिये गये हैं, उनका पारंपरिक अर्थतंत्र तबाह हो गया है, लेकिन इससे भी दुखद तो ये है कि जिन शहरों को बसाने के लिए इन्हें बर्बाद किया गया वे शहर भी ठीक से नहीं बसे, अगर बसे होते तो महामारी के इस महाकाल में लोग शहर की समृधि को छोड़कर गाँव नहीं आते जहाँ बड़े-बड़े अस्पताल, कल-कारखाने, विश्वविद्यालय आदि भरे-पड़े हैं। इसी सन्दर्भ में अगर वर्तमान सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं जैसे स्मार्ट सिटीज परियोजना, नया किसान बिल आदि का मूल्यांकन करें तो यह कितना समावेशी होगा, यह भी एक यक्ष प्रश्न है, क्योंकि इस परियोजना के केंद्र में रेणु की दृष्टि की सत्तर फीसदी आबादी नहीं, बल्कि मुट्ठी भर वे लोग हैं जिनका सत्ता और वैश्विक पूँजी से सरोकार है।

आकांक्षा पाठक

स्वतंत्र लेखिका, दरभंगा में निवास. akankshapathak17893@gmail.com

केयूर पाठक

keyoor pathak

असिस्टेंट प्रोफेसर, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, जालंधर, सेल: 9885141477

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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