सामयिक

भारत के बीमार समाज में मृत्यु का मखौल

 

जैसी मौत वैसा समाज! या ऐसे भी कह सकते हैं, जिस प्रकार का समाज उसी प्रकार की मृत्यु। नॉर्बर्ट इलियास, बौद्रिलार और ज़िग्मन्ट बाउमैन जैसे अनेक आधुनिक समाज के चिन्तकों नें इस विषय पर काफी कुछ लिखा। इसी सहज और साधारण सी बात को समझाने के लिए इलियास ने एक पूरी क़िताब लिख डाली। शीर्षक था, लोनलीनेस ऑफ़ डाईंग (अकेलेपन में मरना)। और  ये दिखाया था कि विद्रूप हो गये समाज में सहजता से मरना  कितना कठिन होता जा रहा है। 

लॉक डाउन के दौरान हमारा समाज और उसकी संस्कृति भी कुछ ऐसी हीं हो गयी। किसी मनचले ने फिज़िकल डिस्टेंसिंग (शारीरिक दूरी) को सत्ता के नशे में धुत्त होकर सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) कह दिया। समाज अचानक से एक अपराधी हो गया। हमेशा से था, लेकिन महामहीम नेतृत्व के ओजस्वी मुख से एक फ्रायडियन स्लिप हो गया, और ग़लती से हीं सही लेकिन समाज का सच सामने आकर खड़ा हो गया। मृत्यु और समाज में पहले से हीं खटपट थी। धन्य हो सोशल डिस्टेंसिंग का, अब जैसे पूरा तलाक हो गया। एक साधारण, सुगम और सुन्दर मौत तो असम्भव हीं हो गया है।

विगत दो तीन महीनों में, मौत सचमुच में एक वीभत्स घटना है। मरने वालों के लिए शमशान और क़ब्रगाह कम पड़ रहे हैं। अर्थी उठाने और कांधा देने वाले भी नहीं मिलते। मृत्यु की सगी सहेली, राम नाम सत् है की संस्कृति, भी ख़तरे में पड़ गयी। जो रह गया है वो है एक भयानक घटना, जो ख़बर की शक्ल में हमें डराता रहता है।  

मृत्यु की हत्या

क्या हम ऐसी स्थिति में अज्ञेय की वो अद्भुत कविता गुनगुना पाएँगे, ‘उड़ चल हारिल लिए हाथ में एक अकेला पावन तिनका”? क्योंकि ये समाज और बाज़ारू संस्कृति, इसके इर्द गिर्द होने वाली राजनीति, मौत को भी एक व्यवसाय का हिस्सा बनाने से नहीं चूकते। और इस समाज में अब वो संस्कार भी नहीं रहे कि सुकर्मों को करते हुए लोग एक अच्छे मृत्यु की तरफ बढ़ें। अब तो संस्कार बस मॉब-लिंचिंग करने का हथियार है। हमारी परम्पराएँ सुसंस्कृत मृत्यु की कल्पना और कामना करती थीं। हिन्दू, जैन, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, पारसी,  सबमें मृत्यु को लेकर विकसित परम्पराएँ रही हैं। 

जब से परम्परा शब्द पर कुछ बाज़ारू पंडितों और उनके आका नेताओं का कब्ज़ा हुआ, सब बदल गया। रूढ़िवाद हीं परम्परा बन कर रह गयी। योग जैसी महान परम्परा भी कुछ व्यावसायिक बाबाओं के हथ्थे चढ़ गयी और राजनीतिक करतबों में बदल कर सामूहिक प्रदर्शनों का हिस्सा मात्र हो गयी। ऐसे में बिचारी मृत्यु की क्या बिसात। कुछ बिरले हीं अब पंडित कुमार गन्धर्व का गाया कबीर के दोहे सुनकर सुन्दर मृत्यु के विचार-मीमांसा में लीन होते हैं। लेकिन ध्यान से सुनें तो समझ में आता है कि कैसे हमारी संस्कृति हमें मृत्यु के लिए तैयार करती थी- उड़ जाएगा, हंस अकेला, जग दर्शन का मेला! 

ज़ाहिर है हमारे पत्रकार बन्धुओं को इतनी फ़ुरसत नहीं कि वो इन परम्पराओं को समझें, वहाँ से करुणा और अस्मिता का बोध अर्जित करें। उनसे संजीदगी की उम्मीद हीं बेकार है।  इसी रौशनी में हमें आत्महत्या की ख़बरों पर पत्रकारों के व्यवहार, ट्विटर सेलेब्रिटी के भौकाल, को समझने की ज़रूरत है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर उन पत्रकारों की छिछोरी मूर्खता पर बस हंसी के खिल्ली उड़ाने से काम नहीं होगा। समझना पड़ेगा उनकी मूर्खता की जड़ में क्या है, जो उन्हें ये एहसास भी नहीं होने देता कि वो मूर्ख हैं। और बस उन्हें हीं क्यों दोष दें?

उनको चाहने वाले करोड़ों दर्शकों की भागीदारी भी तो है। वो चाहे मुंबई में हों, या मोरादाबाद में, या मुज़फ़्फ़रपुर में। दिल्ली में, दादरी में या दरभंगा में। सब अपने घरों में बैठ के अपने चहेते पत्रकारों को देखते हुए एक बीमार समाज हीं तो हैं। सच ये है कि वो भी वैसे हीं हैं जैसे उनके सेलेब्रिटी, ट्विटर हीरो, पत्रकार।इस सामाजिक हम्माम में सब नंगे हैं, देखने वाले और दिखाने वाले भी। और वो सब ज़िम्मेदार हैं मृत्यु जैसे संजीदा अनुभव की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हत्या के लिए।   

     

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए जो लॉकडाउन लगा उसके दौरान आत्महत्या और मृत्यु की एक भयावह शृंखला बन गयी। अनेक रिपोर्ट से पता चलता है की इस दौरान मानसिक पीड़ा बढ़ी है। लौटते हुए बहुतेरे मज़दूरों की मौत की मार्मिक घटनाएँ सुनी गयीं। एक माँ जो अपने बच्चे के साथ घर लौट रही थी, मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर मर गयी। घर को लौट रहे रेल की पटरियों पर चलते मज़दूर रात में वहीं पटरियों पर सो गये, ट्रेन आकर काट गयी उन्हें। और ना जाने कितनी ऐसी मौत जो अखबारों के अन्दर के पन्नों में भी नहीं आयीं। साथ साथ अनेक और भी घटनाएँ सामने आयीं।

केरल में एक वयोवृद्ध ने कोरोना आइसोलेशन सेंटर में आत्महत्या कर लिया। मूल रूप से छपरा के एक सब्ज़ी बेचने वाले ने दिल्ली में फाँसी लगा ली। इंडियन रेवेन्यू सर्विस के दो अधिकारियों ने कोरोना के डर से आत्महत्या कर ली। एक टेलीविज़न में काम करने वाले कलाकार ने अपनी जान ले ली। गिनती कम पड़ जाएगी अगर गिनती की जाए। और फिर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद, सभी पत्रकारों और सेलेब्रिटियों के विमर्श की सुई जैसे अटक गयी, ये मानसिक कारणों से होने वाली मौतें हैं! इसके लिए सिर्फ़ मरने वाला ज़िम्मेदार है। कैसे कैसे शब्दों का प्रयोग किया गया- कायर, बीमार, बेचारे!                 

ट्विटर स्टार-सेलेब्रिटी पत्रकार  

इस परिदृश्य में भी ये समझना ज़रूरी है कि हमारा समाज कैसा है, और इसकी संदिग्ध सामाजिकता क्या है। वर्ग-जाति-लिंग भेद से भी बढ़कर, इस समाज की बीमारी है, अमानवीयता।लॉकडाउन के दरम्यान ये ज़ाहिर हो गया कि ये समाज हीं एक भयंकर वायरस से ग्रस्त है। अमानवीयता का वायरस! तभी तो हम मौत को भी अपने अपने खेल का मोहरा बना लेते हैं। किसी की हत्या, आत्महत्या और मृत्यु पर भी अपनी अपनी दुकान चलाने लगते हैं। और पत्रकार हवा में तो जनमते नहीं! वो भी इसी संदिग्ध सामाजिकता वाली समाज की हीं उपज हैं जहाँ हम-आप जैसे लोग भी हैं। उनको भी अमानवीयता के सामजिक वायरस ने काट खाया है।       

चाहे एल्क्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिन्ट, एक बात तय है कि बड़े-बड़े महारथी और छुटभैये पत्रकारों को जीवन और मृत्यु के मायने का कम हीं ज्ञान है। अगर होता तो आत्महत्या के मुद्दे पर पत्रकारों में गिद्ध प्रवृति नहीं दिखाई देती। व्यावसायिकता की सनक, लाभ-हानि का बाज़ारू गणित तो एक पक्ष है। लेकिन त्रासदी उससे भी बड़ी है। ऐसा लगता है कि पत्रकारों को जीवन और मृत्यु का समाज, संस्कृति और राजनीति से सम्बन्ध का रत्ती भर ज्ञान नहीं।और आत्महत्या तो जैसे उनके लिए एक भयानक पहेली है। अब इन पत्रकारों को कौन बताये कि एक टूटे फूटे समाज में विभिन्न प्रकार के आत्महत्या की पूरी संभावना होती है। 

 

उन्नीसवीं सदी के अन्त में एक फ़्रांसिसी समाजशास्त्री एमिले दुर्खीम  ने आत्महत्या पर एक पुख़्ता थीसिस लिखा था। समाजशात्र पढ़ने वाले हर एक बच्चे को ये मालूम है। दुर्खीम की क़िताब, आत्महत्या: एक समाजशात्रीय अध्ययन, विस्तार से हमें समाज और आत्महत्या के सम्बन्ध को समझाता है। अब भारत के ट्विटर स्टार, सेलेब्रिटी पत्रकार कुछ पढ़ना लिखना ना चाहें, तो काम से काम समाजशास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थियों से बातें हीं कर लें।      

चूँकि भारतीय पत्रकारों की शिक्षा दीक्षा के कारण इस पहेली को समझने की उनमें क्षमता नहीं है, इसीलिए वो हर एक ऐसे घटनाओं को एक मज़ेदार ख़बर बनाने की जल्दी में रहते हैं। भारत के पत्रकारों के एक बड़े गुरु घंटाल ने कहा है, और एक कार्यक्रम का नाम भी रखा है, कट द क्लटर! माने ये कि एडिटिंग टेबल पर खबर के साथ लगे अनावश्यक बातों को हंटाओ! शायद ये फार्मूला घटनाओं को रिपोर्ट करने में कारगर हो। रिपोर्टिंग तो टू-द-पॉइंट होना हीं चाहिए। लेकिन अगर इन घटनाओं के विश्लेषण में यही फार्मूला आँख मूँद कर लगा दें तो बात का बतनग्गड़ हो जायेगा। क्योंकि ज़िन्दगी तो अपने आप में एक बड़ा ‘मीनिंगफुल क्लटर’ है! जिसमें कितने हीं जाने-अनजाने मायने गुथ्थम-गुथ्था रहते हैं। और मौत भी ज़िन्दगी से कम और अलग नहीं होती।

तभी तो चच्चा ग़ालिब ने भी कहा था, लेकिन हम भूल गये शायद क़ैद-ए-हयात ओ बन्द-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं! या शायद हमने बीमार समाज में समझदार चाचाओं-काकाओं-मामाओं की बातें सुननी बन्द कर दी है।

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देव नाथ पाठक

लेखक साउथ एशियाई विश्विद्यालय में समाजशास्त्री हैं और उनकी लिखित पुस्तकें मैथिली लोक गीत, संस्कृति की राजनीति, दक्षिण एशिया के समाज आदि विषयों पर हैं। सम्पर्क +919910944431, dev@soc.sau.ac.in
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