राजनीति

अम्मा की याद में तमिलनाडु सुबक रहा है…

आधुनिकता से सशक्तिकरण तक

जयललिता की मृत्‍यु के बाद तमिलनाडु के परिदृश्‍य को देखकर यह बखूबी एहसास किया जा सकता है। जयललिता की मृत्‍यु सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों के लिए सदमे जैसी रही। जयललिता कोई आम महिला नहीं थी बल्कि राजनीतिक आयकन, एक सुप्रसिद्ध कलाकार और सफल महिला भी थी। वह महिला सशक्तिकरण की प्रतीक थीं।

जयललिता की पूरी जिंदगी पर नजर दौड़ाई जाये तो एक चीज बहुत ही महत्‍वपूर्ण है और व‍ह है उनका दृढ़ संकल्‍प। शायद यही वह गुण था जिसकी वजह से जिस चीज में जयललिता ने हाथ लगाया, उसमें अपार सफलता हासिल की। जयललिता को उनके प्रशंसक और उनकी पार्टी एआईएडीएमके के नेता तथा समर्थक ‘अम्‍मा’ के साथ-साथ ‘पुरात्चि थलाइवी’ भी कहा करते थे जिसका अर्थ है- क्रांतिकारी नेता। जयललिता ने अपने अंदर की इस क्रांति को सदैव बरकरार रखा और अपनी जिंदगी से जुड़ी हर क्षेत्र में इसका खूब इस्‍तेमाल किया।

अपनी जिंदगी की दास्‍तां बयां करती हुयी जयललिता ने कहा था कि मैंने अपनी जिंदगी का एक तिहाई हिस्‍से को मां के अनुसार जीया, दूसरी तिहाई जिंदगी एमजी रामचंद्रन के अनुसार जीया और बाकी की जिंदगी ही उन्‍होंने अपने अनुसार जी। जिंदगी का अधिकांश हिस्‍सा जिसने दूसरे के अनुसार जीया इसके बावजूद सफलता उनके कदम चूमे ऐसे व्‍यक्ति बिरले ही होते हैं। क्‍यों‍कि ऐसा माना जाता है कि बिना इच्‍छा के किसी काम को करने से उसमें सफलता नहीं मिलती।

अम्‍मा प्रारंभ से ही पढ़ाई में अच्‍छी थी. वे कामयाब वकील बनना चाहती थीं। किंतु बचपन में ही पिता का देहवासन हो जाने और घर की खराब स्थिति के कारण मां के कहने पर मजबूरन उन्‍होंने फिल्‍मी दुनिया में कदम रखा। इच्‍छा के विपरीत भी बीस साल की उम्र में जयललिता ने सुपर स्‍टार का दर्जा हासिल कर लिया। जब एम जी रामचंद्रन जयललिता को राजनीति में लेकर आये तो वह भी उनकी इच्‍छा के विपरीत था फिर भी जयललिता ने जो मुकाम हासिल किया वह कोई असाधारण व्‍यक्ति ही कर सकता था।

अम्‍मा की दृढ़ संकल्‍पता इससे भी देखी जा सकती कि उन्‍होंने कैसे फिल्‍मी दुनिया में स्‍त्री चित्रण को पूरी तरीके से बदलकर रख दिया। उन्‍होंने फिल्‍मों में भी काम अपनी शर्तों पर किया। जिस समय तमिल फिल्‍मों की अभिनेत्रियां सिर्फ साड़ी जैसे परिधान ही पहना करती थी, उस दौर में जयललिता ने बिकनी, स्‍कर्ट और अन्‍य पश्चिमी परिधानों में अभिनय कर सिर्फ फिल्‍मी जगत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण महिला समुदाय के बीच भी क्रांति पैदा कर दी। इस प्रकार फिल्‍मी दुनिया में भी स्‍त्री का एक नया प्रतिबिंब स्‍थापित किया।

जयल‍लिता के कामयाबी का श्रेय हमेशा से एमजी रामचन्‍द्रन को दिया जाता है किंतु ये बात लोग भूल जाते हैं कि जब तक हमारे अंदर काबिलियत नहीं होगी तबतक हमे कहीं कोई तवज्‍जो नहीं दी जा सकती और ना ही हम अपनी कोई जगह बना सकते हैं। कोई भी व्‍यक्ति किसी को रास्‍ता दिखा सकता है लेकिन रास्‍ते पर कैसे चलना है और मंजिल को कैसे हासिल करना है यह स्‍वयं तय करना होता है। जयललिता ने अपनी काब‍लियत पर ही जिंदगी में इस तरह का मुकाम हासिल किया जो एक पुरूषवादी समाज में पुरूषों के लिए तो मुश्किल है ही महिलाओं के लिए यदि कहें कि नामुमकिन था तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। जयललिता जब राजनीति में आयीं तब वे कामयाबी के शिखर पर थी, उनकी लोकप्रियता सिर्फ दक्षिण तक ही नहीं सीमि‍त थी हिंदी सिनेमा में भी वे अपना खास मुकाम बना चुकी थी और जयललिता के उसी कामयाब और लोकप्रिय चेहरे को राजनीति में लाया गया था जिसके कारण पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी।

 

एमजीआर ने उन्‍हें यदि अन्‍नाद्रमुक का प्रोपेगेंडा सेक्रेटरी बनाया तो उसका मुख्‍य कारण था 92 तमिल फिल्‍मों में 85 सिल्‍वर जुबली और 28 तेलगु, कन्‍नड़ हिट फिल्‍में। तमिलनाडु ही नहीं, समूचा दक्षिण उनके नाटकों, नृत्‍यों और फिल्‍मों का दीवाना था। फिल्‍मी सितारों का राजनीति में अक्‍सर उपयोग किया जाता है। एमजीआर ने भी यही किया। वर्ना आठ साल से दूर रह रहे जयललिता से वे फिर से क्‍यों जुड़ते। हिंदी, अंग्रेजी पर जबरदस्‍त पकड़ और प्रभावशाली शैली के कारण ही एमजीआर ने जयललिता को करूणानिधि से लड़ने के लिए लिया न कि कोई परोसी गई सत्‍ता जयललिता को मिली।

फिल्‍म जगत में जयललिता के अलावा सिर्फ एमजी रामचंद्रन और एनटी रामा राव दो अन्‍य राजनेता हुए जिन्‍हें सफल सितारा राजनेता का दर्जा मिला। तमिल और अन्‍य भाषाओं की 120 फिल्‍मों में अभिनय करने वाली जयललिता, एमजीआर-एनजीआर श्रेणी की मेगास्‍टार नहीं थी फिर भी उन्‍होंने राजनीति में ज्‍यादा सफलता, लोकप्रियता हासिल की और इस क्षेत्र में टिकाऊ भी साबित हुईं। जबकि जयललिता को राजनीति विरासत में नहीं मिली थी, उन्‍हें इसके लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ा। एमजीआर के निधन के बाद सत्‍ता सीधे उनके हाथ में नहीं आयी बल्कि इसके लिए निरंतर उन्‍हें संघर्ष करना पड़ा।

जयललिता ने हर कदम पर मुश्किल, विरोध और संघर्ष इंतजार करता रहा, किंतु उन्‍होंने कभी हार नहीं मानी। 5 मार्च 1989 का वह दिन जब विधानसभा में जयललिता के साथ अभद्रता की गई, उस घटना से एक नई जयललिता का जन्‍म हुआ और मुख्‍यमंत्री बनकर लौटने का संकल्‍प उन्‍होंने ने पूरा कर, अम्‍मा का रूप धारण कर लिया। यह स्‍थान पितृसत्‍तामक समाज में किसी महिला द्वारा हासिल करना किसी स्‍वप्‍न से कम नहीं था। इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति में ऐसा भूचाल आया कि पूरा का पूरा राजनीतिक परिदृश्‍य ही बदल गया। अपने विपक्षी को अक्‍सर वह धूल चटा दिया करती थी। अच्‍छे-अच्‍छे राजनेता उनके सामने नतमस्‍तक हो जाया करते थे। एक बार जब वे सत्‍ता में आयी तो सदैव लोगों को अपने सामने झुकाया, कभी किसी के सामने झुकी नहीं।

जनता के साथ जयललिता के जबरदस्‍त तालमेल ने ही उन्‍हें ‘अम्‍मा’ बना दिया। उन्‍होंने विभिन्‍न जन कल्‍याण अथवा गरीब कल्‍याण योजनाओं के जरिये मातृसत्‍ता को स्‍थापित कर समाज में इसका वर्चस्‍व बनाया। जयललिता को तानाशाही स्‍वभाव का भी कहा जाता था इसके बावजूद इतना बेहतर जनसंपर्क होना अचंभित कर देता है।

जयललिता की सरकार ने ही स्‍त्री सशक्तिकरण के लिए सबसे पहले कदम उठाया और देश में स्‍त्री भ्रूण हत्‍या पर रोक लगवाई। तमिलनाडु पहला राज्‍य है जिसने पंचायत और म्‍युनिसिपल कार्पोरेशन में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों को लगातार दो कार्याकाल दिए। स्त्रियों की सुरक्षा के लिए महिला थाने बनवाए। 16 दिसंबर की घटना के बाद 16 सूत्री मांगों को सबसे पहले जयललिता ने ही उठाया था और महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम प्रयास किए।

आज देश में युवक-यवतियां जिस तरीके से छोटी- छोटी बातों पर हताश निराश होकर आत्‍महत्‍या को अपना हथियार बना लेते हैं ऐसे लोगों को जयललिता की जिंदगी से प्रेरणा लेनी चाहिए। जयललिता को जिंदगी के हर मोड़ पर गहरा आघात मिला। जिन लोगों को उन्‍होंने अपना समझा उन्‍हीं लोगों ने उनको स्‍वार्थ में अंधा होकर धोखा दिया। सबसे पहली चोट तब लगी जब उनकी सबसे अच्‍छी और विश्‍वासी सहेली ने एक लड़के के लिए जयललिता को धोखा दिया। यह धोखा जयललिता के जीवन की पहली कामयाबी की सी‍ढ़ी बनी। फिर तो जब-जब जयललिता को जीवन में आघात मिला तब-तब वे और ऊपर उठती चली गयीं। मां की मौत से टूटी जयललिता ने फिल्‍मों में सफल मुकाम बनाया तो अपने सबसे अच्‍छे दोस्‍त, मेंटर और मार्गदर्शक एमजी रामचंद्रन के मौत के बाद वे सफल राजनीतिज्ञ बनी। वहीं विधानसभा में बेइज्‍जती का बदला उन्‍होंने तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री बनकर लिया। भ्रष्‍टाचार के गंभीर आरोपों में जेल भेजे जाने से भी वे उबर गईं, यह उनकी हर विपरीत स्थिति को मात देकर उबरने की क्षमता ही दर्शाता है।

जयललिता का जीवन और व्‍यक्तित्‍व हर किसी व्‍यक्ति के लिए प्रेरणा है। आज के समय में अवसाद (डिप्रेशन)  से लोग सबसे ज्‍यादा ग्रसित हैं। लगातार डिप्रेशन की दवाओं का सेवन करते हैं, शराब, धूम्रपान तथा अन्‍य नशाओं को अपना जीवन बना लेते हैं और तब भी न उभर पाये तो मौत को गले लगा लेते हैं। ऐसी स्थिति में जयललिता की जिंदगी से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना उचित होगा।

जयललिता की जिंदगी इस बात का भी संकेत देती है कि कोई सहारा, काई साथ न ढूंढिए- अकेले ही लड़ना है। जिंदगी के बड़े हिस्‍से किसी के प्रभाव में ही गुजर जाते हैं, पर अपनी पहचान इसी में बनाना है तथा महिला को पुरूष आसानी से बढ़ने नहीं देंगे। एक अकेली नारी अबला और मजबूर नहीं होती यह जयललिता ने साबित कर दिया। उनकी अद्भूत सहनशीलता और विपरीत परिस्थितियों में लड़ने की ताकत एक बार फिर यह याद दिलाता है कि औरत शक्ति का प्रतीक है। उसे कितना भी झुका लो, डरा लो,  वह हार नहीं मानेगी।

गौतम बुद्ध ने कहा था कि “जीवन मिलना भाग्‍य की बात है। मृत्‍यु होना समय की बात है, पर मृत्‍यु के बाद भी लोगों के दिल में जीवित रहना ‘कर्मों’ की बात है।” जयललिता ने भी अपने कर्मों से ही लोगों के दिल में ऐसी जगह बनायी कि मृत्‍यु के बाद भी लोग उन्‍हें भूल नहीं पायें। उनकी मृत्‍यु के बाद लगभग 600 लोगों की मृत्‍यु हो जाना इस बात का परिचायक है कि जयललिता तमिलनाडु के आम जनता की धड़कन थी और यह उनके कर्म का ही परिणाम है।

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अमिता

लेखिका स्वतंत्र लेखक एवं शिक्षाविद हैं। सम्पर्क +919406009605, amitamasscom@gmail.com
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