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दिलीप कुमार: वजूद है अब सिर्फ दास्ताँ के लिए

 

  नया दौर (1957) के पंद्रह साल बाद दिलीप कुमार ने एक बार फिर बी.आर. चोपड़ा की फिल्म दास्तान (1972) में काम किया था। दरअसल यह चोपड़ा द्वारा निर्देशित पहली फिल्म अफसाना (1951) का ही रीमेक थी। मगर इस बार हीरो अशोक कुमार की जगह दिलीप कुमार थे, जिन्होंने मेले में बिछुड़े दो जुड़वां भाइयों का डबल रोल अदा किया था। दिलचस्प कथा-पटकथा और सधे हुए निर्देशन के बावजूद फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम से गिर जाना, चोपड़ा कैम्प के लिए ही नहीं वरन समूचे फिल्मोद्योग के लिए अप्रत्याशित घटना थी। इस फिल्म में साहिर लुधियानवी का लिखा गीत “न तू ज़मीं के लिये है.. न आसमां के लिये.. तेरा वजूद है सिर्फ दास्ताँ के लिये..” बेहद लोकप्रिय हुआ था। उसी असफल दास्तान का सफल नायक लम्बी बीमारियों से जूझते हुए 98 बरस की उम्र में 7 जुलाई को वाकई दास्तान में तब्दील हो गया।

 11 दिसम्बर 1922 को पेशावर में जन्मे मोहम्मद युसूफ खान का परिवार महाराष्ट्र में देवलाली होते हुए बम्बई आया था। ड्रायफ्रूट के पैतृक व्यवसाय में ज्यादा मन नहीं लगा तो फिल्मों में किस्मत आजमाने ख्याल जोर पकड़ने लगा। देविका रानी की फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टाकीज ने बाईस वर्षीय युवक को नए स्क्रीन नाम ‘दिलीप कुमार’ के साथ ज्वार भाटा (1944) में पहला मौका दिया। फिल्म के पोस्टर में बेटे की तस्वीर देखकर पिता को हेठी महसूस हुई क्योंकि तब फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। इधर न फिल्म चली न दिलीप कुमार को कोई शोहरत मिली।

कुछ और असफल फिल्मों के बाद उन्हें बॉक्स ऑफिस पर पहली कामयाबी मिली नायिका नूरजहाँ के साथ जुगनू (1947) में। अगली फिल्मों-शहीद और मेला के बाद महबूब खान की अंदाज़ ने उनके कैरियर को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। दिलीप कुमार, राज कपूर और नर्गिस के प्रेम त्रिकोण वाली इस फिल्म ने उन दिनों काफी धूम मचाई थी। जाहिर है चालीस और पचास के दशक में फिल्मों को दिलीप कुमार के रूप में एक नया सलीकेदार किन्तु रुलाने वाला हीरो मिल गया था।

शुरुआती फिल्मों में नूरजहाँ, नर्गिस, कामिनी कौशल, नलिनी जयवंत, निम्मी, मधुबाला जैसी शोख अभिनेत्रियाँ उनकी नायिकाएँ रहीं। फुटपाथ में मीना कुमारी तथा देवदास में वैजयंतीमाला व सुचित्रासेन के साथ उन्होंने पहली बार काम किया। अंदाज़, इंसानियत और पैगाम में पहली मर्तबा दर्शकों ने बड़े कौतुहल से उन्हें राज कपूर, देव आनंद और राजकुमार जैसे समकालीन सितारों के साथ परदे पर देखा। करीब एक दशक तक दिलीप कुमार की मुग़ल-ए-आज़म का जिक्र भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक कमाई करनेवाली फिल्म (हाथी मेरे साथी और शोले के पूर्व) के रूप में होता रहा।

दिलीप कुमार

साठ के दशक में उन्होंने गंगा जमुना से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। इस फिल्म की कथा पटकथा भी उन्होंने खुद ही लिखी थी। लीडर में भी कहानी का श्रेय दिलीप कुमार को दिया गया। दिल दिया दर्द लिया के बाद राम और श्याम में वहीदा रहमान और मुमताज़ के साथ बदले अंदाज़, नए रंग ढंग और डबलरोल में नज़र आये दिलीप कुमार को सत्तर के दशक में बैराग में सायरा बानों और लीना चंदावरकर के साथ ट्रिपलरोल में देखना उस दौर की विलक्षण अनुभूति रही। इससे पूर्व आदमी में मनोज कुमार के साथ अपाहिज राजा साहब के किरदार में तथा संघर्ष में संजीव कुमार के साथ बनारस के पण्डे की विरासत संभालने वाले कुंदन की भूमिका में उन्होंने खुद को नए सिरे से तराशा।

सत्तर के दशक में दार्जिलिंग के चाय बागानों में मजदूरों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले श्रमिक नेता पर केन्द्रित बंगाली फिल्म सगीना महतो सफल रही। लेकिन जब तपन सिन्हा ने चार साल बाद उसे दुबारा हिन्दी में सगीना शीर्षक से बनाया तो असफलता ही हाथ लगी। इस बीच सायरा बानों के साथ आई गोपी ने दिलीप कुमार का क्रेज़ दर्शकों में बनाए रखा मगर पहली बार शर्मिला टैगोर के साथ आई बी.आर.चोपड़ा की दास्तान बॉक्स ऑफिस पर लुढ़क गयी। और इसी के साथ हीरो के रूप में दिलीप कुमार की पारी पूरी हुई। अलबत्ता, गुलज़ार की कोशिश और हृषिकेश मुखर्जी की फिर कब मिलोगी में वे अतिथि भूमिकाओं में कुछ देर के लिए नज़र आये।

1966 में उन्होंने अपने से आधी उम्र की सायरा बानों से शादी करके सबको चौंका दिया था; तो 1981 में हैदराबाद की आसमां बी से हुआ निकाह भी कई दिनों तक सुर्ख़ियों में बना रहा। निजी ज़िन्दगी में एक ओर जहाँ निस्संतान होने का ग़म ज़िन्दगी भर उन्हें सालता रहा। वहीं कोर्ट कचहरी में परिजनों से सम्पत्ति के विवाद में उलझने की विडम्बना भी झेलनी पड़ी। 1976 से 1981 के बीच उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली थी।

अस्सी के दशक में मनोज कुमार की क्रांति से चरित्र अभिनेता के बतौर उनकी दूसरी पारी शुरू हुई। क्रांति और शक्ति के बाद विधाता, मजदूर, मशाल, दुनिया, धर्म अधिकारी, कर्मा, कानून अपना अपना, इज्जतदार और सौदागर में दिलीप कुमार की मौजूदगी फिल्म का असर बढाने के लिहाज से काफी थी। कर्मा की रिलीज़ के सात साल बाद आई उमेश मेहरा की किला बिगड़ती सेहत के चलते दिलीप कुमार की आखिरी फिल्म साबित हुई।

गंगा जमुना और दिल दिया दर्द लिया में दिलीप कुमार के छद्म निर्देशन की खबरें आती रहीं। असित सेन के निर्देशन में बनी मुशीर रियाज़ की महत्वाकाक्षी फिल्म बैराग की रिलीज़ में हुए अत्यधिक विलम्ब का ठीकरा भी उनके माथे पर फोड़ने की चेष्टा हुई, पर उन्होंने कभी किसी विवाद में कैफियत नहीं दी। 1992 में निर्माता सुधाकर बोकाड़े ने उन्हें कलिंगा में अभिनय के साथ साथ विधिवत निर्देशन के लिये भीराजी कर लिया था पर अन्यान्य कारणों से यह फिल्म भी अधूरा ख्वाब सिद्ध हुई। उनकी आग का दरिया जैसी कई अधूरी फिल्मों का कोई अता-पता नहीं है। सुभाष घई के निर्देशन में दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान को लेकर बनने वाली युद्ध फिल्म भी शाहरुख के पीछे हट जाने से बन नहीं पाई। अजय देवगन और प्रियंका चोपड़ा के साथ उनकी 2001 में घोषित ‘असर’ भी कागजों में सिमट कर रह गई।

बहुभाषी दिलीप कुमार हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, पश्तो के अलावा पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। अवधी और भोजपुरी बोलियों पर भी उनका अधिकार था। संगीत और खेलों में उनकी रूचि जगजाहिर थी। खासकर क्रिकेट से उनका लगाव अद्भुत था। विश्व कीर्तिमान की पुस्तक गिनीज बुक में उनका नाम दुनिया में सर्वाधिक अवार्ड प्राप्त फिल्म अभिनेता के रूप में दर्ज है। 1980 में वे मुंबई के शेरिफ तथा कांग्रेस के टिकट पर 2000 से 2006 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्म भूषण और 2005 में पद्म विभूषण का अलंकरण प्रदान किया था। 1994 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1998 में पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण निशान-ए-इम्तियाज़ मिलने पर उनकी खूब छीछालेदार हुई। एक बेजोड़ अभिनेता के रूप में दिलीप कुमार को ढेरों अवार्ड मिले। उन्हें आठ बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया। 1994 में उन्हें फिल्म फेयर ने लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया था।

दिलीप कुमार जैसे शख्स कभी नहीं मरते। जो आदमी अपने जीवन में जीते जी अनेक किरदारों को हमेशा के लिये जीवंत कर जाए वह अमर ही तो कहलाएगा

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म समीक्षक एवं स्तम्भकार हैं। सम्पर्क: +919425437902, vinodnagar56@gmail.com

2 responses to “दिलीप कुमार: वजूद है अब सिर्फ दास्ताँ के लिए”

  1. Reshma tripathi says:

    सटीक विश्लेषण

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