राग-ज़िन्दगी

जरा से बीज से कोपल निकल आई

(बोसकीयाना की खिड़की से ज़िन्दगी के झोंके)

फ़िल्में हमारे जीवन में इतनी रच बस गयी हैं कि लगता है लोकमानस को दिशा देने का काम करती हैं। यदि फ़िल्मकार गुलज़ार हों तो यह प्रभाव बहुत सलीके से गहरे तक उतरता है। जब 1971 में फिल्म ‘मेरे अपने’ प्रदर्शित हुई तो हिन्दी सिनेमा का मानो एक नया अध्याय खुला। हर उम्र के दर्शक को लगा कि ये उनकी कहानी है, जो घट रहा है वो ठीक उसके आसपास का है। समय की आग, एक आक्रोश को कविता की तरह हर दर्शक ने महसूस किया।

अपनी पहली फिल्म से ही गुलज़ार भारतीय जनमानस में संजीदा फ़िल्मकार के रूप में दर्ज हुए। बाद में परिचय, कोशिश, खुशबू, आंधी, मौसम, किनारा, मीरा, अंगूर, टीवी सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब वगैरह तमाम फ़िल्में किसको याद नहीं हैं! गीतकार की हैसियत से हिन्दी और उर्दू के लिए गुलज़ार वैसे भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण नाम है। इसीलिए गुलज़ार को गहराई से जानने की इच्छा प्रायः हर आदमी में रही है। उनको ले कर तमाम लेख, इंटरव्यू, रिपोर्ट वगैरह चाव से पढ़े सुने जाते रहे हैं लेकिन प्यास है की बुझती नहीं।

इस बात को शायद जाने-पहचाने प्रयोगशील लेखक, पत्रकार, संपादक डॉ. यशवंत व्यास ने शिद्दत से महसूस किया। वे गुलज़ार के सम्पर्क में दशकों से हैं। अनेक इंटरव्यू- बातचीत उन्होंने कविता और फिल्मों को लेकर समय समय पर की हैं। ‘बोसकीयाना’ यशवंत व्यास की ताजा पेशकश है जिसमें वे गुलज़ार को पाठकों के लिए यथासंभव खंगालते दिखाई देते हैं। सवा दो सौ पृष्ठों में जितने गुलज़ार हैं उतने ही यशवंत भी उपस्थित दिखाई देते हैं।

बोसकीयाना सिर्फ गुलज़ार को जानने की किताब नहीं है, इसमे आप यशवंत व्यास से भी उतना ही मिलते चलते हैं। किताब राधाकृष्ण प्रकाशन ने छापी है लेकिन प्रस्तुति यानी साज-सज्जा, प्रश्नोत्तरी में भाषा-भाव और सौन्दर्य, कलात्मक शोध की बुनावट और कसी हुई सामग्री पेशकार के खाते में दर्ज होती है। वे लिखते हैं- “गुलज़ार से जब भी मिलो, बस मिल जाओ। उनके सामने किसी और के बारे में भी जरा-सा हल्का नहीं बोल सकते। वकार, जुबान और जेब की जाँच हो जाएगी। ये मेरी नहीं हर मिलाने वाले की राय है ”। उर्दू गुलज़ार के लिए ग़ज़ल की, गीत की भाषा है तो संवाद की भी है। यशवंत लिखते हैं कि “मुझे उर्दू नहीं आती, खासतौर से नुक्ते के मामले में मैंने कई बार कहा, सिर्फ ‘ज़िन्दगी’ में नुक्ता ठीक लगना चाहिए, बाकी तो बाकी देख ही लेंगे। उनका कहना था कि लगा दो तो बेहतर ही होगा। मायने बदलने से रह जाएँगे।”

गुलज़ार बहुत कम, बोलते / खुलते हैं। वे अपनी बनाई लक्ष्मण रेखा में रहना पसन्द करते हैं। जाहिर है ऐसे में उनसे उनका बहुत कुछ जानने के लिए यशवंत व्यास ने बहुत कोशिश की होगी। किताबें उनका पहला शौक है, यही आज भी है। फ़िल्में उन्होंने की लेकिन मौका मिलते ही किताबों की और लौटे। वे कहते हैं “फ़िल्में आर्ट का बेहद ताकतवर फार्म है। पर यह भी सही है कि इल्म फिल्मों से नहीं किताबों से हासिल होता है।”

Image result for बोसकीयाना

फिल्मों ने उन्हें शोहरत दी, लेकिन फ़िल्में ही सब कुछ नहीं हैं। “मैं दो-एक वजहों से फिल्मों में गीत लिखता हूँ। पहला मुझे शायरी से प्यार है और गीत उसका मौका देते हैं।  दूसरा मेरी तमाम क्वालिफिकेशन मिलाकर…. इंटर फेल है, कोई मुझे पंद्रह सौ की नौकरी भी नहीं देगा। ये गीत मेरे घर कमाई लाते हैं। इससे मेरा किचन चलता है।” लेकिन उनके गीत केवल ‘व्यावसायिक’ नहीं हैं, उनका साहित्यिक, इंसानी मूल्य अधिक है। वे कहते हैं “जब तक आप यह न जानें कि ज़िन्दगी आम आदमी के साथ कैसे पेश आती है, आपकी संवेदनशीलता का दायरा बड़ा अधूरा रह जाता है, एकदम संकरा रहता है।” “कुछ अफसाने यों हुए कि फोड़ों की तरह निकले। वह हालात, माहौल और सोसाइटी के दिए हुए थे। कभी नज्म कहके खून थूक लिया और कभी अफसाना लिख कर जख्म पर पट्टी बांध ली”

“शायरी मेरे लिए एक रिले रेस की तरह है। आप कुछ भाव चुनते हैं, कुछ नया जोड़ देते हैं। यह हमेशा आपको जगाए हुए रखती है। मैं उस क्षण की चमक को जीने की कोशिश करता हूँ और यही मुझे आगे बढ़ने के लिए चार्ज कर देती है।”  “बड़े लोगों का लिखा पढ़ते हुए महसूस करता हूँ जितना जाना है उससे कितना ही गुना जानना बाकि है”।

यशवंत व्यास बहुत उलझे हुए सवाल भी पूछते हैं और गुलज़ार से। मसलन “रचना किसी आदमी को किस हद तक निर्मल करती है? क्योंकि कहा जाता है कि कला आदमी को उद्दात्त बनाती है। मगर हम देखते हैं कि कभी कभी एक अच्छे कलाकार का दूसरा पक्ष बड़ा डार्क होता है। कविताएँ गज़ब की लिखते हैं मगर अफसरी पर बैठते हैं तो घूसखोरी आयर चरित्रहीनता में सानी नहीं गज़ब के हिंसक मगर कविताओं का मफलर डाले साहित्य के जंगल में शान से टहल रहे हैं !” गुलज़ार का उत्तर संक्षिप्त लेकिन बहुत सधा हुआ है।

यह भी पढ़ें – बौद्धिक छद्म को उजागर करती “कवि की मनोहर कहानियाँ”

किताब के पन्ने पलटते हुए महसूस होता है कि गुलज़ार के कितने करीब से गुजर रहे हैं आप। सादगी इतनी कि लगता है दो घर छोड़ कर रहने वाला पड़ौसी हैं कोई। और बातें उनकी हैं या आपके दिल की कहना कठिन। जब वे कहते हैं कि ”मशीनों को हेंडल करना सीख सकते हैं लेकिन इंसानी रिश्तों को हेंडल करना सीखना मुश्किल है”। तब बरबस मुँह से निकलता है ‘यहीतो’। बार बार हम चौंकते हैं कि हर बार उनसे सहमत हैं !! कम शब्दों में, बहुत नपातुला और सारवान! हर वक्तव्य शोधा सा। वे कहते हैं “जब आप ज्यादा बोलने लगते हैं तो जनता आपको सुनना बंद कर देती है। ज्यादा बार कही किसी बात का असर घट जाता है और वह निरर्थक हो जाती है। थोड़े शब्द ज्यादा ताकतवर, ज्यादा असरदार होते हैं”

यहाँ सिर्फ अपनी बात नहीं है, इंडस्ट्री के चलन और चाल पर भी दिलचस्प चर्चा है। फिल्म बनाने का आसान दिखने वाला काम कितना कठिन है, पता चलता है। चर्चा में गुलज़ार की तमाम फिल्मों के लिखने-बनने की तफसील है जो न केवल जानकारी से भरी है अपितु गज़ब की रोचक भी है। कई पृष्ठों में फैली फिल्म निर्माण की अंदरूनी अनुभवजनित बातचीत किताब को अलग तरह से मूल्यवान बनाती है। बेटी बोस्की के बहाने पिता गुलज़ार को जानना भी अलग तरह का अनुभव है। गुलज़ार और बोस्की की कहानी पर काफी पृष्ठ है और हमारी जिज्ञासा को शांत करते हैं।

वे कहते हैं –“बोसकी के ताल पाताल’ तेरहवें जन्मदिन की किताब थी। यह साल कुछ खास था। एक मैसेज देना था,जो पहले से अलग था।”इसके बाद संगीत और शब्द की गहराई पर क्लासिक संवाद पाठक को समृद्ध करता है। यशवंत यहाँ उनसे शनदार जुगलबंदी करते नजर आते हैं। संजीव की भीगी सी याद और उनकी बरसी पर लिखी कविता पाठक को भी नम कर देती है। आखरी में आभार और काम की फेहरिस्त के साथ अध्ययन कक्ष के बीच यशवंत व्यास और गुलज़ार की कहती-सुनती तस्वीर आपकी नज़रों में ठहर जाती है।

पन्नों से उतर कर एक गुलज़ार की एक कविता जैसे आपको बिदा करने आती है —

मैं अपनी फिल्मों में सब जगह हूँ

सजावटें और बनावटें सारी मुझसे उतारी हैं, मैंने दी हैं

वो ढलते सूरज की शान-ओ-शौकत, गुरुर मैं हूँ

वो दिन भी मेरी ही सल्तनत था जो लुट गया

वो सुबह जो पत्तियों के पीछे नाहा कर तैयार हो रही है

उसे भी मैंने ही उस जगह पर खड़ा किया है

कहानियों के बहुत से किरदार हैं जो मैं हूँ

सभी में से कोई न कोई हिस्सा है मेरी अपनी जिन्दगी का

किसी अपाहिज के दस्त-ओ-बाजू उतारके मैंने रख लिए हैं

कहीं पर मैं अपनी जात पर रहम खा रहा हूँ

कहीं पे अपनी जात से इन्तेकाम लेकर, हरीफ पर चोट कर रहा हूँ

वोशौक मेरे। खौफ मेरे

अधूरे पूरे, जो मेरे अन्दर बसे हुए हैं

ग्लेशियर की तरह खड़े हैं

मेरी उम्मीदें भी पस-मंजर अलाप कराती सुनाई देंगी

मेरी ये फ़िल्में हैं और मैं हूँ।

.

पुस्तक – बोसकीयाना
पेशकार – यशवंत व्यास
प्रकाशक- राधकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली-110002
मूल्य –  रू. 1200/—

 

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं। सम्पर्क - +919431178550, jc.indore@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






1
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x