एतिहासिकशख्सियत

अमृता शेरगिल और नेहरू

  • सुधीर विद्यार्थी 
मैं ऐसे समय में जवाहरलाल नेहरू को याद कर रहा हूं जब वर्तमान सत्ताधारी दल उन पर अनर्गल प्रहार करते हुए देश की हर समस्या के लिए उन्हें ही जिम्मेवार मान रहा है। यहां मैं नेहरू के पक्ष में या उनके बचाव के लिए कोई दलील प्रस्तुत नहीं कर रहा अपितु विश्व चित्रकला की धरोहर अमृता शेरगिल के नेहरू के नाम लिखे गए 6 नवम्बर 1937 के एक पत्र को पढ़ रहा हूं। पहले यह बता दिया जाए कि उन्हीं दिनों जब अमृता शेरगिल कुछ दिन दिल्ली ठहरीं और एक प्रदर्शनी भी आयोजित की, वहीं वे नेहरू से पहली बार मिली थीं। इसी भेंट के बारे में वह लिखती हैं कि मैं दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू से मिली। मेरी यह इच्छा थी कि मैं उनसे मिलूं। मेरा ख्याल है कि उन्होंने मुझे उतना ही पसंद किया है, जितना कि मैंने उन्हें। वह मेरी प्रदर्शनी में आए और हमारी एक लंबी बातचीत हुई।
बाद में नेहरू ने अमृता के चित्रों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें अपनी आत्मकथा भी भेजी।
अब नेहरू के नाम लिखे अमृता के उस पत्र को देखिए :
आपका पत्र पाकर आश्चर्य हुआ, बल्कि कहूं तो सुखद आश्चर्य।
पुस्तक के लिए धन्यवाद।
सामान्यतः जीवनियों और आत्मकथाओं से मुझे अरुचि है।उनमें अयथार्थ का स्वर होता है। आडंबर और आत्मप्रदर्शन। पर लगता है मुझे आपकी आत्मकथा पसन्द आएगी। आप यदा-कदा अपने प्रभामंडल से बाहर आ पाते हैं।
मुझे आपको बेहतर ढंग से जानना चाहिए। मुझे सदैव ऐसे लोग आकर्षित करते हैं, जिनके व्यक्तित्व का यह अभिन्न अंग होता है, कि वे बेसुरे हुए बिना सामंजस्यहीन हो सकते हैं, और जो अपने पीछे, पछतावे के चिपचिपे चिन्ह नहीं छोड़ जाते।
मैं नहीं समझती कि यह जीवन की दहलीज होती है जहां व्यक्ति स्वयं को अव्यवस्थित पाता है, बल्कि जब वह दहलीज पार कर चुकता है तो उसे प्रतीति होती है, की जो चीजें और भावनाएं सहज लगती थीं, वे अनवरत रूप से विषम और पेचीदा हैं। मेरा आशय है, विसंगति में ही संगति है। पर, बेशक, आपके पास सुव्यवस्थित मस्तिष्क है।
मुझे नहीं लगता कि वास्तव में आपको मेरे चित्रों में दिलचस्पी थी। आपने मेरे चित्रों पर दृष्टिपात किया था, (उन्हें) देखा न था।
आप कठोर नहीं हैं। आपका मुखमंडल सौम्य है। मुझे आपका चेहरा पसंद है। विवेकशील, विलासी और बेलाग।
….अमृता और नेहरू के बीच हुआ यह संवाद इन दो शख्सियतों को जानने की एक कुंजी हो सकती है।
  

लेखक क्रन्तिकारी इतिहास के अन्वेषक व विश्लेषक हैं|

सम्पर्क- +919760875491, vidyarthisandarsh@gmail.com

.

.
.
सबलोग को फेसबुक पर पढने के लिए लाइक करें|
कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x