आत्मकथ्य

जातीय विद्वेष और लैंगिक असमानता के विरुद्ध

 

  • सुशीला टाकभौरे

अवसर और सुविधाओं का न मिलना भी दुखद रहा। मैंने गणित साइंस विषय लिया था। नौवीं-दसवीं के बाद ग्यारहवीं कक्षा का साइंस सेक्शन नहीं बन सका । मेरे साथ जिन सवर्ण छात्र-छात्राओं ने गणित-साइंस लिया था वे खण्डवा, भोपाल, इटारसी, हरदा पढ़ने के लिए भेजे गए। कुछ छात्र सिवनी भी जाते थे, मगर मुझे कहीं भी नहीं भेजा गया। तब मैंने साइंस विषय छोड़कर आर्ट्स के विषय लेकर ग्यारहवीं हायर सेकंडरी की परीक्षा दी और आगे की पढ़ाई की थी। अगर मुझे अवसर मिलते तो मैं भी साइंस लेकर विशेष योग्यता हासिल करती परंतु अछूत, अभावग्रस्त होने के कारण मैं वह अवसर नहीं पा सकी।

उस समय मैं अपने गांव बानापुरा, तहसील सिवनी मालवा और होशंगाबाद जिले में अपनी जाति की पहली लड़की थी जिसने दसवीं हाईस्कूल और ग्यारहवीं हायर सेकंडरी स्कूल पास किया था। उस समय हमारी जाति में लड़कियों को पढ़ाने में में माता-पिता की रूचि अधिक नहीं थी। जो लड़कियाँ स्कूल जाती थीं, वे चौथी या छठवीं-आठवीं से आगे नहीं पढ़ सकी थीं। मैं पढ़ रही थी, लगातार पास हो रही थी, इस बात का अभिमान मेरे माता-पिता को था।

सिवनी के हमारी बस्ती के लोग अक्सर यही कहते थे- “कब तक लड़की को पढ़ाओगे? क्या ऐसे ही बूढ़ी कर लोगे? शादी ब्याह की फिक्र करो। शादी हो जाती तो अब तक लड़की एक-दो बच्चों की मां बन गई होती।” ऐसी मानसिकता वाले वातावरण को नकारते हुए मां कहती थी- “शादी भी कर देंगे। अच्छा पढ़ा-लिखा, अच्छी नौकरी वाला लड़का मिलेगा तभी शादी करेंगे। तब तक पढ़ती है तो पढ़ने दो, पढ़ाई करके आगे चलकर वह भी अच्छी नौकरी करेगी।”

माँ बहुत आशावादी थी| पिताजी प्रगतिवादी और परिवर्तनवादी थे। वे मां की बात मानते हुए उन्हें सहयोग देते थे। रिश्तेदारों ने मेरी पढ़ाई का विरोध किया था। उनके तरफ से मेरे स्वागत सम्मान की तो बात ही नहीं थी कि मैं अपनी जाति की एक लड़की यहाँ तक पढ़ सकी। गांव के किसी समाज-उद्धारक, समाजसेवी संस्था ने भी यह विचार नहीं किया। गांव के किसी गांधीवादी नेता ने भी यह नहीं सोचा। किसी बामन-बनिया ने भी यह विचार नहीं रखा कि अछूत जाति की एकमात्र मैट्रिक लड़की का सम्मान किया जाए। हमारे शिक्षकों ने भी यह विचार नहीं किया। उस समय हमारे गांव में यह बात विचार करने की नहीं थी। विचार करने की यह बात थी कि उस वातावरण में रहकर मैं कैसे मैट्रिक कर सकी? आगे की पढ़ाई कैसे कर सकी? गरीब के धन की तरह मां इस बात को गांव के बुरे लोगों की बुरी नजरों से बचाकर रखती थी। वह गौरव और गर्व की बातें नहीं करती थी, हमें भी विनम्र रहने की शिक्षा देती थी।

हमारी जरूरतों और पढ़ाई के खर्च की अहमियत को समझते हुए, माँ डाक बंगले में झाड़ने-बुहारने की प्राइवेट नौकरी करने लगी थी। घर खर्च और पढ़ाई के खर्च की जिम्मेदारी मां उठाती थी। बड़े भाइयों की पढ़ाई में भी अधिक खर्च होता था। किताब-कॉपी, पेन-पेंसिल का खर्च बड़ा खर्च था, तब मां क्या करती? बड़े भैया की पढ़ाई और नौकरी के लिए मां ने अपने गहने भी बेच दिए थे। पिताजी घर परिवार का खर्च और जिम्मेदारी उठाने के लिए यथाशक्ति सहयोग देते थे। जरूरत होने पर भी वे अपने लिए कोई वस्तु या कपड़ा कई महीने तक नहीं खरीद पाते थे। एक बार माँ ने पिताजी की फटी बनियान फैलाकर देखते हुए कहा था- “अब तो पहनने लायक ही नहीं रही। पता नहीं कब नई बनियान लेनो होयगो।” उस दिन मैंने मां के दर्द और पिताजी के कष्टों को बहुत गहराई के साथ महसूस किया था। कितने कष्ट सहे थे हमने।

हम घर में चूल्हे की जली हुई लकड़ी के कोयले को पीसकर अथवा चूल्हे की राख से सुबह दाँत साफ करते थे। कभी कोयला अच्छा न होने पर मुँह में छाले आ जाते मगर मजबूरी रहती, दूसरा विकल्प नहीं रहता। कभी-कभी मैं मंजन नहीं करती थी। आज मुझे उन दिनों की अपनी मजबूरी और नासमझी का दुख होता है। अभाव और कुपोषण से गरीबों के दाँत क्यों जल्दी खराब हो जाते हैं, उनका दर्द मैं जानती हूँ।

हमारी भूख का इंतजाम भी कुछ ऐसा ही रहता था। रात की बासी रोटी, एक या आधा टुकड़ा काली चाय के साथ सुबह खाना ही हमारा नाश्ता था। यह खाकर ही हम सब बहन भाई स्कूल जाते थे। दोपहर के बाद रोटियाँ बनाई जातीं, साथ में हरी मिर्ची। दाल तरकारी महंगी होने के कारण दोपहर में नहीं बनाई जाती थी। हरी या सूखी लाल मिर्ची तवे पर थोड़े तेल में तल लेते। दो-दो मिर्ची के साथ रोटी खाकर, परिवार के सभी लोग पानी से पेट भर लेते थे।

सालो-साल यही चलता रहा। कभी जानने की कोशिश नहीं की- ‘ऐसा क्यों है?’ जैसे रूखा, सूखा, बासी खाना ही हमारी किस्मत थी। कभी विद्रोह नहीं किया। बड़े भाई कभी लड़-झगड़कर, चिल्लाकर, गुस्सा करके अपने खाने के लिए अच्छा कुछ बनवा लेते। मगर हम बहनें रूखा सूखा खाकर ही रहतीं, माँ और नानी की मजबूरी को समझकर चुप रह जातीं। कभी मैं झगड़ा भी करती थी, अपने हिस्से के लिए, अपने हक और अधिकार के लिए झगड़ती थी। गुस्से में घर के सामान की तोड़ -फोड़ करती। मुझे डराने-धमकाने की कोशिश की जाती मगर मेरे जिद्दी स्वभाव और दृढ़ निश्चय के सामने उन्हें मेरी बात माननी पड़ती थी। माँ उधार रुपए  लाती, झिड़कियों के साथ मिले रुपयों की बात जानकर मेरा मन दुखी हो जाता था। बढ़ती महंगाई से हमारा जीवन अधिक कष्टों से भर गया था।

देश में अकाल पड़ा था तब अच्छा अनाज महंगा होकर दुर्लभ हो गया था। 1967 के आसपास हमारे घर लेवी का लाल गेहूँ और ज्वार लाते थे। ‘कंट्रोल’ की राशन दुकान में अच्छा अनाज नहीं दिया जाता था। मैंने सुना था अमेरिका में ऐसा अनाज जानवरों को खिलाया जाता है। लाल गेहूँ के आटे की रोटी बनाते समय गूंधा हुआ आटा रबर की तरह लगता। आटे की लोई को ताकत लगाकर बेलते, जो हाथ हटाते ही सिकुड़ जाती थी। बहन और मैं बहुत तकलीफ के साथ रोटी बनाते थे। विदेशी सहायता के रूप में विदेश का घटिया अनाज आता था जिसे हम जैसे गरीब लोग खरीद कर खाते थे। कभी यह भी नहीं मिल पाता था।

हमें भूखे रहने के अनुभव बहुत मिले थे। घर में गेहूँ नहीं, आटा नहीं। दाल-सब्जी नहीं, चावल का दाना नहीं। रुपये नहीं, पैसे नहीं- तब सभी सुबह से शाम तक भूखे रहते थे। विनती और खुशामद करके माँ, नानी किसी से अनाज या रुपये उधार लेकर आतीं, अथवा घर की पीतल की गुण्डी या गागर गिरवी रखकर रुपयों का इंतजाम किया जाता, तब कहीं शाम के समय चूल्हा जल पाता। दिनभर भूखे रहने का कष्ट सहकर जब रात में खाना खाते तब बहुत राहत मिलती। जीवन के इन उतार- चढ़ाव को हम सहज ही मानकर सहन करते रहे। माँ और नानी हमें यही सिखाती थीं- “दुख के बाद सुख भी मिलता है इसीलिए संतोष रखो।”

संतोष रखने का उपदेश जैसे ऋषि-मुनियों ने हम जैसे धनहीन, अवसरहीन, अधिकारहीन लोगों के लिए ही दिया था। स्कूल की हमारी पाठ्य पुस्तकों में ऐसे निबंध, कहानी, कविता, एकांकी, नाटक और लेख संग्रहित रहते थे जो गरीब आम जनता और दलित पिछड़े वर्ग को धर्म, आदर्श, त्याग और बलिदान की शिक्षा देते थे। ब्राह्मण और ब्राह्मणवादी साहित्यकारों द्वारा लिखे गए ऐसे साहित्य को पढ़कर हमारी मानसिकता इन आदर्शों के प्रति निष्ठावान रहती थी। हमें ईश्वरवाद, भाग्यवाद, जन्मवाद, कर्मवाद की शिक्षा दी जाती, इस कारण हम इसके विरुद्ध सोच नहीं पाते थे।

मैं देखती थी, धन सम्पन्न लोगों के पास सब कुछ होने के बाद भी उन्हें संतोष नहीं था। शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार से उनका काला धन बढ़ता रहता। हम अछूत गरीब ईमानदारी के साथ मेहनत करके भी दाने-दाने को तरसते थे। ऐसे कष्ट से बचने के लिए खर्च में हमेशा काट-कसर की जाती। खाना कम बनता, तब कम खाकर ही गुजारा अरना पड़ता। खाने के लिए भाई-बहनों में झगड़े होते। माँ, पिताजी से शिकायतें की जातीं, तब भोजन के बदले प्यार और दिलासा देकर चुप और संतुष्ट कर दिया जाता। ऐसे समय माँ अपने दिल का हाल खुद जानती होगी मगर मुझे यह खुशी होती, ज्यादा खानेवाले की अपेक्षा माँ मुझको ज्यादा प्यार करती है। बाद में माँ मुझे ही सबकुछ देगी। ऐसे समय माँ के दिल से हमारे लिए आशीर्वाद जरूर निकलते होंगे। मुझे माँ के ऐसे आशीर्वाद बहुत मिले हैं। भाई बड़े हों या छोटे, वे बड़े ही रहते हैं, बेटे पुरुष सत्ता के अधिकारी होते हैं। बेटियां दया और सहानुभूति की पात्र बनकर रह जाती हैं। न चाहते हुए भी माँ “पुरुष प्रधान सत्ता” के समक्ष सिर झुकाकर अपना अतिरिक्त प्रेम और ममता मेरी झोली में दाल देती थी, तब यही मेरे लिए संतोष बन जाता।

लेखिका की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ से साभार

लेखिका प्रसिद्द साहित्यकार हैं|

सम्पर्क- +919422548822, stakbhoure@gmail.com

 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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