मुनादी

बचपन केवल बड़े होने की तैयारी नहीं

प्रिय अव्यान,

आज तुम्हारा जन्मदिन है और मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ। मैं जब तुम्हारे पास नहीं होता हूँ तब तुम मेरे पास सबसे अधिक होते हो। तुम अभी इतने बड़े नहीं हुए हो कि इस पत्र में लिखी बातें समझ सको। लेकिन मुझे विश्वास है कि जब तुम पढ़ने-समझने लायक हो जाओगे, तब शायद ये बातें तुम्हारे लिए और तुम्हारी पीढ़ी के तमाम बच्चों के लिए अर्थपूर्ण होंगी। तब भी एक सवाल तुम्हारे सामने होगा, जो आज मेरे सामने है—तुम्हारा बचपन कहाँ है?

यह सवाल तुम्हें अजीब लग सकता है। तुम्हारे पास घर है, स्कूल है, किताबें हैं, खिलौने हैं। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। वे चाहते हैं कि तुम खूब पढ़ो, अच्छे अंक लाओ, जीवन में सफल बनो और वह सब हासिल करो जो शायद वे स्वयं नहीं कर सके। उनकी इन इच्छाओं में तुम्हारे प्रति प्यार है, तुम्हारी चिन्ता है और तुम्हारे बेहतर जीवन का सपना भी। तुम्हारे भविष्य की इतनी चिन्ता के बीच तुम्हारे वर्तमान की चिन्ता कौन कर रहा है? क्या तुम्हारे पास अपने लिए भी कुछ समय है? क्या तुम कभी बिना किसी वजह के खिलखिलाकर हँसते हो? क्या बारिश में भीगने, मिट्टी में खेलने, पेड़ों को निहारने, दोस्तों के साथ शरारत करने और छोटी-छोटी बातों पर रूठने-मनाने का मौका मिलता है? क्या तुम्हें कभी ऐसा कुछ करने की छूट मिलती है, जिससे कोई इनाम न मिले, जिसका कोई उपयोग साबित न करना पड़े और जिसे तुम्हारी सफलता से जोड़कर न देखा जाए? मुझे डर है कि तुम्हारे बड़े होते जाने के साथ कहीं तुम्हारा बचपन छोटा तो नहीं होता जा रहा है।

बड़ों की दुनिया में तुम्हारे भविष्य की एक लम्बी योजना तैयार है। तुम्हें क्या बनना है, किस स्कूल में पढ़ना है, कितने अंक लाने हैं, किस प्रतियोगिता में सफल होना है और किस उम्र तक क्या हासिल कर लेना है—इन सबकी चिन्ता पहले से की जा रही है। तुमसे प्यार करने वाले लोग ही कई बार तुम्हारी जिन्दगी के सबसे बड़े निर्णायक बन जाते हैं। वे तुम्हारी भलाई चाहते हैं, इसलिए तुम्हारे लिए फैसले करते हैं।

अव्यान, तुम्हारे माता-पिता तुमसे प्यार करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हारी जिन्दगी पर केवल उन्हीं का अधिकार है। उनकी तरह तुम्हारी भी अपनी रुचियाँ, जिज्ञासाएँ और कल्पनाएँ हैं। जरूरी नहीं कि तुम्हें वही बनना अच्छा लगे जो वे चाहते हैं। यह भी जरूरी नहीं कि तुम्हारी सफलता का रास्ता वही हो, जिस पर सब चल रहे हैं। तुम्हें अपनी राह खोजने का अवसर मिलना चाहिए। गलतियाँ करने, उनसे सीखने और कभी-कभी असफल होने का अधिकार भी मिलना चाहिए। आखिर कोशिश किये बिना तुम कैसे जानोगे कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है और तुम क्या कर सकते हो?

तुम्हारी जिन्दगी कोई ऐसी परीक्षा नहीं है, जिसका परिणाम पहले से तय हो और जिसमें हर हाल में सबसे आगे निकलना जरूरी हो। मौजूदा समय में बचपन को लेकर सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम बच्चों के लिए सब कुछ करना चाहते हैं, लेकिन कई बार उनसे यह पूछना भूल जाते हैं कि वे क्या चाहते हैं। हम उन्हें अच्छा भविष्य देना चाहते हैं, पर इस प्रक्रिया में उनका वर्तमान छीन लेते हैं। उन्हें सफल बनाने की जल्दी में हम यह भूल जाते हैं कि बचपन केवल बड़े होने की तैयारी नहीं, अपने आप में जीवन का एक महत्त्वपूर्ण दौर है।

मैं चाहता हूँ कि तुम्हें अच्छी शिक्षा मिले। तुम खूब पढ़ो, मेहनत करो और अपनी क्षमताओं को पहचानो। लेकिन इसके लिए तुम्हें जीने का समय भी मिलना चाहिए। तुम्हारी किताबों में केवल प्रश्नों के उत्तर न हों, तुम्हारे मन में नये प्रश्न पैदा करने की जगह भी हो। तुम्हारे स्कूल में परीक्षा की तैयारी हो, लेकिन जीवन को समझने की तैयारी भी हो।

तुम्हारी दुनिया में मोबाइल और इण्टरनेट भी हैं। इनके सहारे तुम दूर-दूर की दुनिया देख सकते हो, नयी बातें सीख सकते हो और अपनी कल्पना को नये रास्ते दे सकते हो। मैं नहीं चाहता कि तुम तकनीक से दूर रहो। मैं चाहता हूँ कि तकनीक तुम्हारी मददगार बने, तुम्हारी सोच की जगह न ले। हर सवाल का तैयार जवाब मिल जाना सुविधाजनक है, लेकिन कभी-कभी जवाब खोजने की यात्रा भी जरूरी होती है।

लेकिन मोबाइल के लिए तुम्हें ही दोष देना भी ठीक नहीं होगा। जरा सोचो, तुम्हारे आसपास खेलने के लिए कितने मैदान हैं? क्या तुम सड़क पर बिना डर के साइकिल चला सकते हो? क्या तुम्हारे मोहल्ले में ऐसी जगह है, जहाँ तुम दोस्तों के साथ बैठकर बातें कर सको? जब बाहर की दुनिया बच्चों के लिए छोटी और असुरक्षित होती जाती है, तो वे अपनी जगह मोबाइल की दुनिया में ही खोजते हैं। इसलिए बड़ों को बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सलाह देने से पहले उनके लिए एक खुली, सुरक्षित और जीवन्त दुनिया भी बनानी होगी।

अव्यान, तुम्हें यह भी जानना चाहिए कि हर बच्चे का बचपन एक जैसा नहीं होता। कुछ बच्चों के पास अच्छे स्कूल, महँगे खिलौने और हर तरह की सुविधाएँ हैं, फिर भी वे समय और अपनेपन के लिए तरसते हैं। दूसरी ओर, बहुत-से बच्चे ऐसे हैं जिनके पास खेलने के लिए खिलौने तो दूर, भरपेट भोजन और स्कूल जाने का अवसर भी नहीं है। कई बच्चे कम उम्र में काम करने लगते हैं। कई परिवार की जिम्मेदारियों के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं। बहुत-सी लड़कियाँ घर के काम और छोटे भाई-बहनों की देखभाल में अपना समय बिताती हैं। गरीबी, जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता भी बच्चों के अवसर छीन लेते हैं। इसलिए बचपन का सवाल केवल तुम्हारे स्कूल, मोबाइल और परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ा है कि हमारा समाज हर बच्चे को बराबर मानता है या नहीं। क्या हर बच्चे को अच्छी शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और सम्मान मिलता है? क्या हर बच्चे को अपनी क्षमता विकसित करने का अवसर मिलता है? जब एक बच्चा महँगी कोचिंग में भविष्य बनाने की कोशिश कर रहा हो और दूसरा पेट भरने के लिए काम कर रहा हो, तब केवल मेहनत और प्रतिभा की बात करना काफी नहीं है। हमें उन परिस्थितियों को भी बदलना होगा जो बच्चों के अवसरों में इतना बड़ा फर्क पैदा करती हैं।

क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी दुनिया पर बाजार का बहुत असर है। विज्ञापन बताता है कि कौन-सा खिलौना अच्छा है, कौन-से कपड़े पहनने चाहिए और दूसरों के बीच लोकप्रिय होने के लिए तुम्हारे पास क्या-क्या होना चाहिए। धीरे-धीरे तुम्हें लग सकता है कि खुशी उन चीजों में है, जिन्हें तुम खरीद सकते हो। लेकिन क्या सबसे महँगा खिलौना तुम्हें सबसे अधिक खुशी देता है? क्या दूसरों के पास मौजूद हर चीज तुम्हारे पास भी होनी चाहिए?

मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे जीवन में किताबों और कहानियों के लिए भी जगह हो। कहानियाँ तुम्हें ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसे तुमने अपनी आँखों से नहीं देखा। वे तुम्हें दूसरे लोगों के सुख-दुःख से परिचित कराती हैं और अपने से अलग लोगों की जगह खड़े होकर सोचने का अवसर देती हैं। किताबों की तरह जीवन से सीखने के अवसर भी जरूरी हैं। पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-पहाड़, मिट्टी और मौसम से तुम्हारा रिश्ता बने। तुम प्रकृति को केवल किसी तस्वीर या मोबाइल की स्क्रीन पर न देखो। तुम उसे छुओ, उसके बदलावों को महसूस करो और उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी समझो। तुम्हें यह जानने का अवसर मिले कि दुनिया केवल मनुष्यों की इच्छाएँ पूरी करने के लिए नहीं बनी है। उसमें दूसरे जीवों का भी जीवन है, जिसकी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।

इस पत्र में मैं तुमसे इतनी बातें कर रहा हूँ, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि बड़े लोग तुमसे बात करें। वे तुम्हारे बारे में बहुत कुछ तय करते हैं, लेकिन क्या वे तुम्हारी बात ध्यान से सुनते हैं? जब तुम किसी बात से असहमत होते हो, तो क्या वे तुम्हारी असहमति को समझने की कोशिश करते हैं? जब तुम किसी काम से डरते हो, तो क्या वे तुम्हारे डर को सुनते हैं या तुम्हें कमजोर कहकर आगे बढ़ जाने की सलाह दे देते हैं?

तुम्हारी हर बात सही हो, यह जरूरी नहीं। उम्र और अनुभव के कारण बड़े कई ऐसी बातें जानते हैं, जिन्हें तुम अभी नहीं जानते। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि तुम्हारी बात का कोई महत्त्व नहीं है। तुम्हारे अनुभव तुम्हारे अपने हैं। तुम्हारी परेशानियाँ तुम्हारे लिए वास्तविक हैं। तुम्हारे सवालों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि तुम छोटे हो। तुम्हें अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। सवाल पूछने पर डाँट नहीं, जवाब मिलना चाहिए। तुम्हारी निजता का सम्मान होना चाहिए और तुम्हारी सुरक्षा से जुड़ी किसी शिकायत को गम्भीरता से सुना जाना चाहिए।

अपनी बात कहना और दूसरों की बात सुनना, दोनों लोकतन्त्र के जरूरी संस्कार हैं। इनकी शुरुआत संसद से नहीं, घर और स्कूल से होती है। जिस बच्चे को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता, उससे बड़े होकर स्वतन्त्र और जिम्मेदार नागरिक बनने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी अन्याय पर सवाल उठाए, अपने विवेक से फैसले करे और दूसरों की स्वतन्त्रता का सम्मान करे, तो हमें आज ही बच्चों के सवालों और असहमतियों का सम्मान करना होगा।

इसके लिए बड़ों को सफलता की अपनी परिभाषा बदलनी होगी। केवल अच्छे अंक लाना, बड़ी नौकरी पाना या दूसरों से आगे निकल जाना ही सफलता नहीं है। एक संवेदनशील, जिज्ञासु, ईमानदार और जिम्मेदार मनुष्य बनना भी उतना ही जरूरी है। अनुशासन और जिम्मेदारी जीवन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन अनुशासन भय पैदा करने के लिए नहीं, अपने फैसले लेने योग्य बनाने के लिए होना चाहिए। नियम बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए हों, उनकी जिज्ञासा को कुचलने के लिए नहीं। बड़ों का मार्गदर्शन उन्हें अपनी राह पहचानने में मदद करे, उनकी राह हमेशा के लिए तय न कर दे।

अब अन्त में फिर उसी सवाल पर लौटता हूँ, जिससे यह पत्र शुरू हुआ था—बचपन कहाँ है? मुझे लगता है, बचपन वहाँ है जहाँ तुम बिना किसी डर के हँस सकते हो। जहाँ तुम्हारे सवालों को जगह मिलती है। जहाँ गलती करने पर तुम्हें अपमानित नहीं किया जाता। जहाँ तुम्हें खेलने, पढ़ने, सोचने और सपने देखने का समय मिलता है। जहाँ तुम्हें हर समय यह साबित नहीं करना पड़ता कि तुम कितने होशियार हो और भविष्य में कितना कमा सकोगे। बचपन कोई बाधा नहीं है, जिसे जल्दी पार कर लेना चाहिए। यह जीवन का वह समय है, जिसमें मनुष्य के भीतर जिज्ञासा, कल्पना, संवेदना और स्वतन्त्रता की नींव पड़ती है।

यदि हम इसी समय को भय, दबाव और प्रतियोगिता से भर देंगे, तो तुम बड़े होकर बहुत कुछ हासिल कर सकते हो, लेकिन क्या अपने भीतर की सहज खुशी, दूसरों के प्रति संवेदना और दुनिया को नये ढंग से देखने की क्षमता बचा पाओगे?

मैं चाहता हूँ कि तुम बड़े होओ, खूब सीखो, दुनिया को समझो और उसे बेहतर बनाने में अपना योगदान दो। लेकिन बड़े होने की जल्दी में अपने बचपन को पीछे मत छोड़ देना। और तुमसे भी ज्यादा मैं उन बड़ों से कहना चाहता हूँ, जो तुम्हें सफल बनाने के लिए सब कुछ करना चाहते हैं—तुम्हारे भविष्य की चिन्ता में तुम्हारा वर्तमान छीन नहीं जाए।

क्योंकि तुम केवल आने वाले कल के नागरिक नहीं हो। तुम आज भी इस दुनिया का हिस्सा हो। तुम्हारे वर्तमान का भी उतना ही महत्त्व है, जितना तुम्हारे भविष्य का। जिस समाज में बच्चों को खेलने का समय नहीं, सवाल पूछने की आजादी नहीं और अपनी पसन्द से सपने देखने का अधिकार नहीं, वह समाज चाहे जितनी तरक्की कर ले, भीतर से अधूरा रहेगा। बच्चों का बचपन बचाना केवल उनका भविष्य बचाना नहीं है। यह मनुष्य के भीतर बची हुई आजादी, कल्पना और संवेदना को बचाना भी है।

अव्यान, तुम्हारे जन्मदिन पर मैं तुम्हें कोई उपदेश नहीं देना चाहता। मैं चाहता हूँ कि जब तुम बड़े होकर इस पत्र को पढ़ो, तो तुम्हें अपने दादा का स्नेह महसूस हो। तुम्हें यह भी पता चले कि तुम्हारे जन्मदिन ने मुझे केवल तुम्हारे जीवन के तीन वर्ष पूरे होने की खुशी नहीं दी, बल्कि उस दुनिया के बारे में सोचने का अवसर भी दिया, जिसमें तुम्हें बड़ा होना है।

मेरी कामना है कि जब तुम पीछे मुड़कर अपने बचपन को देखो, तो तुम्हें केवल परीक्षाओं, अंकों और उपलब्धियों की याद न आए। तुम्हें वे दोपहरें भी याद आएँ, जब तुम दोस्तों के साथ खेलते-खेलते समय भूल जाते थे। वे कहानियाँ भी याद आएँ, जो तुम्हें किसी दूसरी दुनिया में ले जाती थीं। वे सवाल भी याद आएँ, जिनके जवाब तुम्हें किसी ने तैयार करके नहीं दिये थे। और वे सपने भी, जिन्हें देखने के लिए तुम्हें किसी की अनुमति की जरूरत नहीं थी।

तुम्हारा बचपन केवल तुम्हारे बड़े होने की तैयारी नहीं है। वह तुम्हारा वर्तमान है, तुम्हारा अधिकार है। उसे बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। तुम्हारे बेहतर वर्तमान  और बेहतर कल की कामना के साथ,

तुम्हारा दादा

किशन कालजयी

 

 

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किशन कालजयी

लेखक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'संवेद' और लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक 'सबलोग' के सम्पादक हैं। सम्पर्क +918340436365, kishankaljayee@gmail.com
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