राजनीति

गाँधी का स्वराज और आम्बेडकर का सामाजिक न्याय

महात्मा गाँधी को लेकर भारतीय समाज में जितनी गहरी श्रद्धा रही है, उतनी ही तीखी असहमति भी। गाँधी के व्यक्तित्व और विचारों को लेकर आम्बेडकर, नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, जिन्ना, भगत सिंह, सावरकर और समाजवादी-मार्क्सवादी धाराओं के नेताओं के साथ उनके गम्भीर मतभेद रहे। गाँधी स्वयं भी अपने जीवन में अनेक बार बदले, अपने विचारों पर पुनर्विचार किया और कई अवसरों पर अपनी भूलों को स्वीकार किया। इसलिए गाँधी को किसी निष्कलंक महापुरुष के रूप में देखना जितना अधूरा है, उतना ही अधूरा उन्हें उनकी ऐतिहासिक भूलों और वैचारिक सीमाओं के आधार पर खारिज कर देना भी है। गाँधी को समझने के लिए सबसे पहले उस भारत को समझना होगा, जिसमें उनका राजनीतिक उदय हुआ और उस सामाजिक परिवर्तन को देखना होगा, जिसे उन्होंने अपनी राजनीति के माध्यम से सम्भव बनाया।

गाँधी से पहले भी भारत में स्वतन्त्रता की आकांक्षा थी। 1857 का विद्रोह, सामाजिक सुधार आन्दोलनों की लम्बी परम्परा, भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस की स्थापना, बंग-भंग विरोधी आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलन और अनेक क्रान्तिकारी गतिविधियाँ इस आकांक्षा के प्रमाण थे। लेकिन गाँधी ने स्वतन्त्रता को केवल शिक्षित मध्यवर्ग, वकीलों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का प्रश्न नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे गाँवों, खेतों, कस्बों, श्रमिक बस्तियों और सामान्य परिवारों तक पहुँचाया। यही गाँधी की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूमिका थी। उन्होंने राजनीति को जनता के जीवन से जोड़ा और जनता को राजनीति का सक्रिय कर्ता बनाया।

यही कारण है कि गाँधी की भूमिका को केवल अँग्रेजों के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष के सन्दर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने भारतीय समाज के भीतर भी कई जड़ताओं को चुनौती दी। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका अभियान, स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी, शराबबन्दी के आन्दोलन में महिलाओं की भूमिका, श्रम की प्रतिष्ठा, खादी और स्वावलम्बन का आग्रह तथा भय से मुक्ति का सन्देश—ये सब उस व्यापक राजनीतिक प्रशिक्षण का हिस्सा थे, जिसके माध्यम से सामान्य भारतीय पहली बार बड़ी संख्या में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रहा था।

गाँधी का राजनीतिक दर्शन इसी बिन्दु पर अपने समय के पारम्परिक राष्ट्रवाद से अलग दिखाई देता है। हिन्द स्वराज में गाँधी आधुनिक सभ्यता, औद्योगिक विकास, राष्ट्रवाद, राज्य और व्यक्ति के प्रश्नों पर अपने समय की प्रचलित धारणाओं से असहमति दर्ज करते हैं। उनकी दृष्टि में स्वराज केवल अँग्रेजी सत्ता के स्थान पर भारतीय सत्ता की स्थापना नहीं है। यदि शासक बदल जाए, लेकिन व्यक्ति भय, शोषण और पराधीनता में ही रहे, तो वह वास्तविक स्वराज नहीं होगा। गाँधी के लिए स्वराज व्यक्ति के आत्मनियन्त्रण, नैतिक स्वायत्तता और सामाजिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ था।

हिन्द स्वराज में गाँधी का राष्ट्रवाद भी महत्त्वपूर्ण है। उनके लिए भारत केवल उसकी नदियों, पहाड़ों, जंगलों और भूगोल का नाम नहीं था। भारत उसके लोगों में था—किसानों, मजदूरों, कारीगरों और उन करोड़ों सामान्य मनुष्यों में, जिनकी मेहनत से देश का जीवन चलता था। यही दृष्टि आगे चलकर उनके राजनीतिक कार्यक्रमों में दिखाई देती है। चम्पारण में नील की खेती से परेशान किसानों के बीच जाना हो या खेड़ा और अहमदाबाद के संघर्षों में हस्तक्षेप करना, गाँधी ने राष्ट्रीय राजनीति को लोगों के वास्तविक जीवन के प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया।

1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में गाँधी का भाषण भी इसी सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। वहाँ उपस्थित राजाओं और धनिकों के सामने उन्होंने गरीबी और सामाजिक असमानता का प्रश्न उठाया। यह केवल भाषण नहीं था; यह उस राष्ट्रवाद की दिशा में एक संकेत था, जिसमें भारत की कल्पना उसके शासक वर्ग से नहीं, बल्कि उसके सामान्य नागरिक से की जानी थी।

गाँधी का दूसरा महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप स्त्रियों को सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में लाना था। भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति उस समय अत्यन्त सीमित थी। राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी गाँधी से पहले भी थी और गाँधी के अलावा भी अनेक नेताओं तथा संगठनों ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, लेकिन गाँधी ने महिलाओं की भागीदारी को व्यापक जन-आन्दोलन का अभिन्न हिस्सा बना दिया। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार से लेकर नमक सत्याग्रह और शराब की दुकानों के विरोध तक, महिलाओं ने प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्रवाई की। इससे स्त्रियों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का एक नया विस्तार हुआ।

यहाँ गाँधी की भूमिका को न तो बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता है और न उसे कम करके देखने की। गाँधी आधुनिक अर्थों में नारीवादी चिन्तक नहीं थे। स्त्री की स्वतन्त्रता, परिवार, काम और लैंगिक सम्बन्धों को लेकर उनके विचारों में ऐसी सीमाएँ थीं, जिनकी आज आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए। लेकिन इतिहास में किसी व्यक्ति के योगदान का मूल्यांकन उसके समय और उसके द्वारा उत्पन्न सामाजिक प्रक्रियाओं के सन्दर्भ में भी करना पड़ता है। गाँधी ने हजारों-लाखों महिलाओं को यह अनुभव दिया कि वे केवल घर की भूमिका तक सीमित नहीं हैं; वे राजनीतिक परिवर्तन की सक्रिय भागीदार भी हो सकती हैं।

दलित प्रश्न पर गाँधी की भूमिका इससे कहीं अधिक जटिल है। गाँधी ने अस्पृश्यता को हिन्दू समाज का कलंक माना और उसके विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया। उन्होंने अपने आश्रमों में अस्पृश्यता के प्रश्न को व्यवहारिक रूप से उठाया, तथाकथित अछूतों के बीच काम किया और सामाजिक सुधार को राष्ट्रीय आन्दोलन का हिस्सा बनाया। लेकिन आम्बेडकर की दृष्टि गाँधी से कहीं अधिक बुनियादी थी। आम्बेडकर के लिए समस्या केवल अस्पृश्यता नहीं थी; समस्या जाति व्यवस्था की पूरी संरचना थी। उनके लिए समानता दया या सामाजिक सद्भाव से नहीं, बल्कि अधिकार, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संरचना के परिवर्तन से आएगी।

यहीं गाँधी और आम्बेडकर का ऐतिहासिक संवाद भारतीय समाज को समझने की सबसे महत्त्वपूर्ण कुंजी बन जाता है। दोनों के रास्ते अलग थे, उनकी प्राथमिकताएँ अलग थीं और जाति के प्रश्न पर उनके विचारों में गम्भीर अन्तर था। 1932 का पूना समझौता इस मतभेद का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंग है। पृथक निर्वाचक मण्डल और दलित प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर गाँधी और आम्बेडकर के बीच हुआ संघर्ष केवल दो नेताओं का विवाद नहीं था; वह इस बुनियादी सवाल से जुड़ा था कि सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व किस प्रकार मिले। इस प्रसंग को समझे बिना गाँधी और आम्बेडकर के सम्बन्धों का समुचित मूल्यांकन सम्भव नहीं है।

आम्बेडकर ने जिस सामाजिक क्रान्ति की वैचारिक और संवैधानिक नींव रखी, उसके लिए एक व्यापक राजनीतिक वातावरण भी आवश्यक था। गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन ने जिस तरह सामान्य लोगों को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया, उसी व्यापक जनक्षेत्र में सामाजिक समानता के प्रश्न ने भी नयी ताकत हासिल की। इसका अर्थ यह नहीं कि गाँधी ने आम्बेडकर के विचारों की जमीन तैयार की या दोनों की भूमिकाएँ एक-दूसरे की पूरक थीं। दोनों के बीच वास्तविक वैचारिक संघर्ष था। लेकिन इसी संघर्ष ने भारतीय समाज को जाति और समानता के प्रश्नों से बच निकलने नहीं दिया।

इसलिए यह कहना सार्थक है कि गाँधी ने जिस राजनीतिक जमीन को तैयार किया, उस पर आम्बेडकर ने सामाजिक लोकतन्त्र और संवैधानिक समानता की अधिक ठोस इमारत खड़ी की। दोनों की ऐतिहासिक भूमिकाएँ अलग थीं। गाँधी ने जनता को राजनीतिक संघर्ष में बड़े पैमाने पर सक्रिय किया; आम्बेडकर ने उस जनता के भीतर मौजूद असमानता को चुनौती देते हुए पूछा कि स्वतन्त्रता का अर्थ तब तक क्या है, जब तक मनुष्य मनुष्य के बराबर नहीं है।

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि गाँधी ने भय को राजनीतिक हथियार के रूप में पहचाना था। औपनिवेशिक सत्ता की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी सेना या कानून नहीं थी; वह जनता के भीतर पैदा किया गया भय भी था। गाँधी ने जेल जाने को अपमान के बजाय राजनीतिक प्रतिरोध का साधन बनाया। उन्होंने सामान्य व्यक्ति को यह विश्वास देने की कोशिश की कि सत्ता से असहमति सम्भव है। इससे भारतीय राजनीति में नागरिक अवज्ञा की एक नयी भाषा पैदा हुई।

गाँधी की राजनीति का यही जनतान्त्रिक पक्ष आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने जनता से केवल यह नहीं कहा कि कोई दूसरा उनके लिए स्वतन्त्रता लेकर आएगा। उन्होंने सामान्य व्यक्ति को आन्दोलन में भाग लेने, अपने जीवन में परिवर्तन करने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित किया। यही कारण है कि गाँधी के आन्दोलन में चरखा भी राजनीतिक प्रतीक बनता है, नमक भी और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार भी। रोजमर्रा की वस्तुएँ राजनीतिक प्रतिरोध के औजार बन जाती हैं।

लेकिन गाँधी को समझने के लिए उनकी सीमाओं को भी उसी गम्भीरता से देखना चाहिए। खिलाफत आन्दोलन के समर्थन से लेकर असहयोग आन्दोलन के अचानक स्थगन तक, जिन्ना और सुभाष के साथ उनके सम्बन्धों से लेकर जाति और वर्ण के प्रश्न पर उनके बदलते विचारों तक, गाँधी का राजनीतिक जीवन अनेक विवादों और अन्तर्विरोधों से भरा है। वे कोई देवता नहीं थे। उनका जीवन भी प्रयोगों, असफलताओं, आत्मसंघर्षों और पुनर्विचारों से बना था। शायद यही कारण है कि गाँधी की आत्मकथा का शीर्षक ही ‘सत्य के प्रयोग’ है। अपने जीवन को अन्तिम सत्य घोषित करने के बजाय उन्होंने उसे प्रयोग की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया।

गाँधी की यही विशेषता उन्हें केवल इतिहास की मूर्ति बनने से रोकती है। यदि गाँधी को सचमुच पढ़ना है, तो उनके साथ असहमति की गुंजाइश भी रखनी होगी। गाँधी को पढ़ने का अर्थ उनके हर विचार को स्वीकार करना नहीं है, बल्कि उनके विचारों के साथ बहस करना, उनकी सीमाओं को पहचानना और उनकी उपयोगी स्थापनाओं को नये समय में पुनर्परिभाषित करना है।

इस सन्दर्भ में हिन्द स्वराज को फिर से पढ़ना विशेष रूप से जरूरी है। आज विकास का अर्थ प्रायः उत्पादन, उपभोग और आर्थिक विस्तार से तय किया जाता है। गाँधी हमें यह प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करते हैं कि विकास का अन्तिम उद्देश्य क्या है और उसमें मनुष्य कहाँ है। मशीन, बाजार और तकनीक अपने आप में न अच्छे हैं, न बुरे; प्रश्न यह है कि वे मनुष्य के जीवन को किस दिशा में ले जाते हैं और समाज में शक्ति का वितरण किस प्रकार बदलते हैं। गाँधी का औद्योगिक सभ्यता पर संदेह आज की दुनिया में हूबहू समाधान नहीं देता, लेकिन वह विकास की नैतिकता पर गम्भीर प्रश्न अवश्य खड़ा करता है।

गाँधी की सबसे महत्त्वपूर्ण विरासत यह है कि उन्होंने राजनीति को नैतिक प्रश्नों से अलग करने से इनकार किया। सत्ता किसके पास है, यह जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण यह भी है कि सत्ता का इस्तेमाल किसके लिए होता है। स्वतन्त्रता किसे मिली, यह जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति कितना स्वतन्त्र हुआ। स्वराज का अर्थ केवल संसद, सरकार और चुनाव नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा और उसकी स्वतन्त्रता भी है।

आज गाँधी की सबसे अधिक जरूरत उनकी मूर्ति को बचाने के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ असहमति करने की लोकतान्त्रिक क्षमता को बचाने के लिए है। गाँधी की पूजा करने से गाँधी नहीं बचेंगे। गाँधी को पढ़ने, उनसे असहमत होने, उनकी गलतियों को स्वीकार करने और उनकी जनपक्षीय स्थापनाओं को नए सन्दर्भों में आगे बढ़ाने से गाँधी की प्रासंगिकता बनी रह सकती है।

और शायद गाँधी तथा आम्बेडकर को साथ पढ़ने का सबसे सार्थक अर्थ भी यही है। गाँधी ने भारतीय जनता को राजनीतिक रूप से जगाया; आम्बेडकर ने उस जागरण को सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों की दिशा में आगे बढ़ाया। गाँधी ने स्वतन्त्रता को जन-आन्दोलन का विषय बनाया; आम्बेडकर ने पूछा कि स्वतन्त्रता का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक कैसे पहुँचेगा। गाँधी ने स्वराज को व्यक्ति के भीतर खोजा; आम्बेडकर ने स्वतन्त्र व्यक्ति के लिए संविधान में समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुत्व की संस्थागत जमीन तैयार की।

इसलिए गाँधी को केवल राष्ट्रपिता कहकर स्मरण कर लेना उनके साथ न्याय नहीं है। गाँधी को समझने का अर्थ उस जनता को समझना है जिसे उन्होंने राजनीति के केन्द्र में ला खड़ा किया। और गाँधी की सबसे गम्भीर आलोचना को समझने का अर्थ आम्बेडकर को पढ़ना है। इन दोनों को साथ पढ़ने पर ही आधुनिक भारत की वह जटिल तस्वीर सामने आती है जिसमें राजनीतिक स्वतन्त्रता, सामाजिक न्याय, व्यक्ति की गरिमा और लोकतान्त्रिक स्वायत्तता एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

गाँधी की सबसे बड़ी विरासत शायद कोई एक विचार नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं बनता—साधारण मनुष्य भी इतिहास का निर्माता हो सकता है। और आम्बेडकर की सबसे बड़ी सीख यह है कि उस साधारण मनुष्य की स्वतन्त्रता तब तक अधूरी है जब तक वह समान मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। भारतीय लोकतन्त्र की असली चुनौती आज भी इन्हीं दोनों प्रश्नों के बीच खड़ी है।

 

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राकेश कुमार गुप्त

लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं तथा संस्कृतिकर्म और लेखन में सक्रिय हैं। grakesh80@gmail.com +919839448782
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