
छः कविताएँ
गुंजन हिन्दी कविता का ऐसा युवा स्वर हैं, जिसकी दृढ़ता में कोमलता विन्यस्त है। जीवनानुभवों की विविधता उनकी कविताओं के क्षितिज को व्यापक बनाती है। कविता में ‘आत्माओं के यथार्थ से जुड़े दुखों’ की विवेचना एक कठिन शिल्प है, जो भावों की सान्द्रता के बिना सम्भव नहीं। गुंजन की कविताओं का भाव-पक्ष ही उनकी काव्य-संवेदना की निर्मिति करता है। वे विचार और संवेदना को वहन करते शब्दों के सहारे आत्मा के अतल में उतरती हैं। उनका यह काव्य-कौशल पाठक के मन-प्राण को आर्द्र करता है और दुःख, विषमता तथा वंचना से मुठभेड़ का साहस भी देता है।
इस अंक में प्रस्तुत उनकी कविताओं के स्वर को समकालीन ‘काव्य-कोलाहल‘ के बीच अलग से रेखांकित किया जा सकता है। बिम्ब सहजता से आते हैं और गहरे तक स्पर्श करते हैं। इन कविताओं का संसार दूर-दूर तक फैला है। एक ओर जलता हुआ देश है, तो दूसरी ओर लगन के महीने में जलता हुआ हिया। ‘पिता दिवस मुबारक’ में ‘जिनके पास फटकता नहीं है बचपन’ और ‘रोटियाँ होती हैं संवेदनाएँ’ जैसे बिम्बों के माध्यम से कवयित्री अभावग्रस्त बचपन की पीड़ा को मर्मभेदी ढंग से रेखांकित करती हैं। यही काव्य-चेतना उन्हें समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
हृषीकेश सुलभ
टोटका
हमारी जड़ें नहीं थीं
हम कौन थे, हमारी भाषा क्या थी
हमारे कुल देवता कौन थे
नहीं पता था
हम शहर शहर भटकते
सिर्फ पेट की भाषा जानते
हमारा अल्लाह हमारी हर मुश्किल में सहारा बनता
और दिन के अन्त में रोटी प्रसाद बनती
हम फ्लाईओवर के नीचे जमे रहते
प्रेम करते
कुत्तों की तरह चौकन्ना होकर
हमारे बच्चे बिलखते हुए बड़े होते
उनकी सुन्दर गढ़ी हुई काया पर
कोई फिदा नहीं होता
उनकी जात को लेकर सरकारों में शक बना रहता
हमारे खून की सफाई के लिए
बार-बार नये तरह के आईडी प्रूफ बनवाए जाते
हम आजादी के दिन का गुणगान करने से
ज्यादा जानते थे प्लेट में बची पूरी जलेबी के बारे में
हमारे बिखरे तने
जगह -जगह उग आते
और फिर राज्य की सरकारों से लेकर
चौकीदार तक के शक में
हमें लाइनों में लगकर
सत्यापित करनी होती थी अपनी पहचान
हमारे दुखों के लिए
न मन्दिर में जगह थी न अस्पतालों में
हमारे दुख आत्माओं के यथार्थ से जुड़े होते
चौरासी लाख योनियों का टोटका पूरा करने के बाद भी
हम मनुष्य न हो सके थे !
नशे में
कितने नशे में थे तुम कि
तुमसे पुकारा न गया मेरा नाम
तुमने कहीं
कितनी ही अनकही कहानियाँ
मगर न कह सके कि किस तरह नाचती थीं
तुम्हारी निगाहों की सफेद पुतलियाँ (मछलियाँ)
कबूतरों की लोच खाती हुई
गर्दनों की तरह
कितने नशे में था वक्त कि
उसने न कहा न देखा न सुना
अनजानी भीड़ में कुचलती
देह और मन की संवेदना
दगाबाजी अब कलाओं की एक विधा थी
और चिट फण्ड पर निकाले जा रहे थे मुहब्बतों के मसले
होश में बेसाख्ता-सी ख्वाहिशें बड़ी बेबाकी से
हाथ थाम लिया करती थीं
और बेहोशी में दुनियादारी
कितने नशे में थे हम कि
हमसे न किया जा सका प्रतिरोध
जबकि नालियों के पानी से बनाई जा रही थी गैस
पकाई जा रही थी खिचड़ी
लूटी जा रही थी गरीबों की जमीन
हम हो रहे थे गुलाम
अपने ही देश में
कुछ रुपयों के बल पर छीनी जा रही थी
हमसे सोचने समझने की ताकत
इस पर भी अगर कोई प्रश्न पूछ लेता
तो उस पर लगाया जा सकता था इल्जाम
देशद्रोही होने का
यह एक वीभत्स नशे का दौर था
जहाँ तुम नशे में ज्यादा सम्भले हुए थे
कितनी बेचैनियाँ नशे के नीम अँधेरों में नाच रही थीं
और देश नशे में डूब रहा था।
पिता दिवस मुबारक
जिन्होंने नहीं देखा पिता का चेहरा
नहीं जानते की उनकी उँगलियों की पोर/ ललाट या कन्धे मिलते हैं उनके पिता से
जिनके पास फटकता ही नहीं है बचपन
वो वयस्क पैदा होते हैं
बुढ़ापे को ढोते हुए
जीवन का सफर तय करते हैं
भावनाओं से इतर
रोटियाँ होती हैं संवेदनाएँ इनकी
थोड़े रूखे भूखे और उचाट्ट दुपहरी को
पसीने और आँसू को निगल लेते हैं
खट्टी मीठी टाफियों की तरह
उन सभी बच्चों को पिता दिवस मुबारक
लगन का महीना
आषाढ़ के बादल गरजते हैं और
भीतर तक एक भय
देह में अपनी पैठ बनाता है
भूख नहीं आती
और जी मिचलाता है
पेट में बौराए ख्वाबों की सड़ान्ध मचती है
शाम से एक ताप
नसों में उतरता है
रात नवोदित छिपकलियों के संसार में डूबी
छत निहारते हुए
एकाएक कब ये छिपकलियाँ
इतनी बड़ी हो जाती हैं कि
पता नहीं चलता उसकी देह में इस लिजलिजेपन की वजह क्या है
दूर कहीं ढोलक पर औरतों का मुक्त कण्ठ
गाता है गीत समधी की छिनरई का
उसकी देह एक अव्यक्त
भँवर में फँसती जाती है
वह अपनी ठण्डी उँगलियों से लिपटे
एक-एक फूँक को यूँ देती है हवा
जैसे यह किसी ध्यान की अवस्था हो
ऐसे में छत पर गिरते मेघ
माथे के अन्दर टीस-सी भरते हुए
गाते हैं कोई शोक गीत
यह वही महीना है जब
माँ बेटियों की कराहों पर
चुप्पियाँ साध लेती हैं
और जुगनू अपनी ही रोशनी से राख हुए जाते हैं।
प्रतिबद्धता
हम सब प्रतिबद्धता से
खोदने की प्रक्रिया में शामिल हैं
कल को ढूँढते हुए
आज की निरर्थकता पर थूकते हैं
बेरोजगारी से झुंझलाते
अपना जूता दे मारते हैं दीवारों पर
कि कुछ झड़े
झड़े दो हजार दो
और विकराल बनकर निगल ले आज को
गाल बजाती थोथी बातों को
झड़े कोई एक गुम्बद
और सीना ठोककर हम
देखते रहें जलते घर
दारा शिकोह का टंगा हुआ सर
हुमायूँ का मकबरा
और मुमताज की शोहबत
मेंटेनेंस से आखिर मैनेज करेंगे कब तक
खोदो आज तुम्हारा घर
कि निकले अन्दर से कोई कब्रिस्तान का अन्धड़
मलबे में दबने दो जिन्दगानियाँ
ईर्ष्या अहंकार और बेचैनियों से भरा वर्तमान
अतीत के कबाड़ से ढूँढ लाएगा
बेहिस/ बेकार /उन्मादी
नौजवानों की नौकरियाँ
आत्महत्या को उत्सुक और
तमाशा बनाने वालों की जमात के पास
अब और कोई दृश्य नहीं बच रहा
न्यायतन्त्र की पोर्टल पर
चुप स्तब्ध खड़ा है यह वक्त।
कीमती आदमी
सहस्रों वर्षों के बाद
गली हुई पिण्डलियों और कटे गर्दन के साथ
असंख्य कविताओं पर सवार
जब तक ढूँढ पाती अपना ही माथा
मुझे मिला था एक कीमती आदमी
जिसके पास थी भाषा
मेरे अर्थ को अपने शब्दों से बुनने की
मेरे होने के रंग को समझने की
मगर वह कीमती था सामान्य नहीं
बहुतेरे मौकों पर चूक गये अर्थों से
बना लाता था शब्द
और बहुतेरे शब्दों के छूट जाने पर अर्थ
वक्त नहीं था कि
सम्मोहन की उस दशा को जिया जा सके
बस उसके आसपास का इन्तजार
दिन रात के तबादले के साथ
बढ़ता चुभता
मौसमों की रूमानियत के साथ
बढ़ता झरता
एक अजीब दिलकशी
पर अजनबियत तारी रहती
और न जाने मेरी कितनी
गुमनाम रातों में वह तारें भरता
और न जाने कितने ही चाँद
दिल मसोस कर रह जाते
भोथरे इश्क
गुलाबी अँधेरा और कुछ प्रपंच में।







