
अमरीका और इजराइल की रणनीतिक साझीदारी
मध्यपूर्व में अमरीका और ईरान के बीच का मौजूदा संघर्ष वास्तव में इन दो ताकतों की वैश्विक महत्त्वाकाँक्षाओं का संघर्ष है। अमरीका मानता है कि महाशक्ति के रूप में विश्व पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए मध्यपूर्व में अपने वर्चस्व पर आँच आने नहीं देनी है। दूसरी ओर, ईरान के इस्लामी गणराज्य के रणनीतिकार भी अपने देश को एक भावी विश्वशक्ति के रूप में देखते रहे हैं और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए वे मध्यपूर्व पर अपना वर्चस्व आवश्यक समझते हैं। मूल में यह मध्यपूर्व पर वर्चस्व की लड़ाई है।
1979 की इस्लामी क्रान्ति के बाद ईरानी धार्मिक नेताओं ने यह घोषणा की थी कि वे पूरे मध्यपूर्व में इस्लामी क्रान्ति का निर्यात करेंगे। यानी मध्यपूर्व के सभी देशों से राजशाही को हटाकर ईरानी तर्ज पर इस्लामी गणराज्य की स्थापना उनका लक्ष्य होगा। अपने इस लक्ष्य के मार्ग में वे अमरीका को सबसे बड़ी बाधा मानते हैं; यानी जब तक मध्यपूर्व पर अमरीका का वर्चस्व है, ईरान के लिए वहाँ अपना दबदबा कायम करना सम्भव नहीं हो सकता।
इस्लामी क्रान्ति के साथ ही अमरीका और ईरान के रिश्ते शत्रुतापूर्ण हो गये। ईरान ने अमरीका को ‘बड़ा शैतान’ कहा और मध्यपूर्व में उसके सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझीदार इजराइल को ‘छोटा शैतान’। ईरान के अनुसार, बड़े शैतान से निबटने के लिए यह जरूरी है कि पहले छोटे शैतान से निबटा जाए। ईरान का मानना है कि इजराइल एक अवैध यहूदी देश है, जिसका सम्पूर्ण विनाश कर वहाँ स्वतन्त्र फिलिस्तीन की स्थापना की जानी चाहिए।
मध्यपूर्व के मौजूदा संघर्ष के सन्दर्भ में ‘बड़े शैतान’ और ‘छोटे शैतान’ के आपसी रिश्तों की ऐतिहासिक सन्दर्भ में पड़ताल आवश्यक हो जाती है। आधुनिक इजराइल अभी जिस भूभाग में स्थित है, लगभग उसी इलाके में हजारों वर्ष पहले उनका अपना देश हुआ करता था। यहाँ से 70 ईस्वी में वे रोमनों द्वारा विस्थापित कर दिए गये थे। लेकिन मूल देश में वापसी के अपने सपने को उन्होंने हमेशा जीवित रखा। यहाँ तक कि यह सपना उनकी दैनिक प्रार्थनाओं का अंग बन गया।
कालान्तर में फिलिस्तीन तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा बना। धीरे-धीरे यहाँ की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम हो गयी। यहाँ यहूदी और ईसाई भी थे, मगर नाममात्र के। प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की मित्र राष्ट्रों के विपक्षी खेमे में था। मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्धरत ब्रिटेन ने 1917 में यह घोषणा की कि यदि युद्ध में तुर्की की पराजय होती है और यहूदियों का प्राचीन इलाका मित्र देशों के अधिकार में आ जाता है, तो उस इलाके में यहूदियों के अपने देश की स्थापना की जाएगी और उनका हजारों वर्ष पुराना सपना साकार हो उठेगा। यह घोषणापत्र ब्रिटिश विदेश मन्त्री आर्थर जेम्स बेल्फौर के हस्ताक्षर से जारी हुआ था और उन्हीं के नाम पर यह ‘बेल्फौर घोषणापत्र’ के नाम से जाना जाता है। अमरीका भी मित्र राष्ट्रों के खेमे का सदस्य था और इस घोषणापत्र को उसका आशीर्वाद प्राप्त था।
युद्ध में मित्र राष्ट्रों की जीत हुई और तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का अन्त हो गया। परिणामतः फिलिस्तीन का इलाका मित्र राष्ट्रों के अधिकार में आ गया। 1922 में तत्कालीन राष्ट्रसंघ ने फिलिस्तीन की देखरेख का जिम्मा ब्रिटेन को सौंप दिया। लेकिन ब्रिटेन के लिए अपना वायदा तुरन्त पूरा करना कठिन हो गया, क्योंकि उसने विभिन्न पक्षों से परस्पर विरोधी वायदे कर रखे थे और उन्हें निभा पाना सम्भव नहीं था।
ब्रिटेन ने इजराइल के निर्माण का अपना वायदा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, यानी 1948 में जाकर पूरा किया और इस प्रकार 14 मई 1948 को यहूदियों का यह पितृदेश अस्तित्व में आ गया।
लेकिन अरब देशों ने ब्रिटिश सरकार के इस कदम को विश्वासघात के रूप में देखा और इसे अरब देशों की पीठ में कटार भोंकने की संज्ञा दी। इजराइल की स्थापना के ठीक दूसरे ही दिन, यानी 15 मई 1948 को मिस्र, जॉर्डन, ईराक, सीरिया और लेबनान की सेनाओं ने इजराइल पर हमला कर दिया। अरब देशों की इस संयुक्त सेना का नवजात इजराइल ने डटकर मुकाबला किया और अरब गठबन्धन को पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस युद्ध के परिणामस्वरूप नवगठित इजराइल के भूभाग में लगभग 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी और इस प्रकार फिलिस्तीन का 78 प्रतिशत हिस्सा उसके अधिकार में आ गया। पश्चिमी यरुशलम पर भी उसका कब्जा हो गया, लेकिन पूर्वी यरुशलम जॉर्डन के अधिकार में आया।
इजराइल और अरब देशों के बीच दूसरा युद्ध 1967 में लड़ा गया। इस युद्ध में अरब गठबन्धन की और भी करारी हार हुई। इस युद्ध में इजराइल ने मिस्र से गाजा पट्टी और सिनाई प्रायद्वीप, जॉर्डन से वेस्ट बैंक एवं पूर्वी यरुशलम तथा सीरिया से गोलान हाइट्स जीत लिया। अरब देशों के लिए यह युद्ध एक डरावने सपने की तरह था। इस युद्ध के बाद इजराइल अपने युद्ध-पूर्व के क्षेत्रफल की तुलना में चौगुने आकार का हो गया।
पूर्वी यरुशलम को जॉर्डन से छीन लेने के बाद इजराइल ने यरुशलम के दोनों हिस्सों का एकीकरण कर लिया। सम्पूर्ण यरुशलम पर अधिकार इजराइल के लिए धार्मिक, ऐतिहासिक, रणनीतिक और राजनीतिक दृष्टि से एक बड़ी विजय थी। पश्चिमी दीवार यहीं पर है, जिसे यहूदी अत्यन्त पवित्र मानते हैं और जहाँ वे अपनी प्रार्थना करते हैं। यह दीवार टेम्पल माउंट नामक पवित्र पहाड़ी के पास ही है, जहाँ प्राचीन काल में यहूदियों के प्रथम और द्वितीय उपासना-गृह स्थित हुआ करते थे।
अपनी स्थापना के बाद से ही इजराइल का उद्देश्य यरुशलम को अपनी राजधानी बनाने का था। यरुशलम के एकीकरण के बाद इसे राजधानी बनाने का मार्ग प्रशस्त हो गया। 1980 में इसरायली संसद ने एक कानून द्वारा यरुशलम को इजराइल की राजधानी बनाने की घोषणा कर दी। यह अलग बात है कि यरुशलम की विवादास्पद स्थिति के कारण विश्व के अधिकांश देशों ने इसे इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता नहीं दी है और उनके दूतावास तेल अवीव से ही संचालित हो रहे हैं।
1973 के तीसरे अरब-इजराइल युद्ध में शुरुआती दौर में तो अरब देश हावी रहे, लेकिन शीघ्र ही इजराइल ने दोबारा अपनी बढ़त बना ली और अपने खोए हुए इलाके पुनः प्राप्त कर लिये।
इजराइल को अपने जन्म के साथ ही जिस शत्रुतापूर्ण माहौल का सामना करना पड़ा, उसने उसे सिखा दिया कि यदि मध्यपूर्व में जिन्दा रहना है और अपने मूल देश को दोबारा नहीं खोना है, तो राजनयिक चतुराई तथा सूझबूझ से काम लेने के साथ-साथ युद्ध के लिए भी हमेशा तैयार रहना पड़ेगा। ऐसे में अमरीका और इजराइल दोनों एक-दूसरे के काम के थे। जहाँ अमरीका को मध्यपूर्व पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वहाँ एक विश्वस्त मित्र की आवश्यकता थी, वहीं इजराइल को अमरीका जैसी महाशक्ति की सरपरस्ती की जरूरत थी। कुछ अमरीकी नेताओं और टिप्पणीकारों की नजर में इजराइल एक ऐसे अमरीकी विमानवाही युद्धपोत के समान है, जिसे डुबोया नहीं जा सकता।
इजराइल के अस्तित्व में आने के बाद उसे मान्यता देने वाला अमरीका पहला देश था। व्यवहारिक मान्यता तो इजराइल के अस्तित्व में आने के 11 मिनट बाद ही दे दी गयी। वैधानिक मान्यता साढ़े आठ महीने बाद, 31 जनवरी 1949 को प्रदान की गयी। आने वाले कई वर्षों तक इन दोनों देशों के रिश्तों में बहुत अधिक प्रगाढ़ता नहीं थी। खासतौर पर स्वेज नहर संकट के दौरान रिश्तों में कुछ खटास भी आयी थी। मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासर द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण से नाराज ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में इन्हें सफलता तो मिली, लेकिन अमरीका और सोवियत संघ द्वारा मिस्र के पक्ष में जबरदस्त कूटनीतिक दबाव बनाने की वजह से तीनों देशों को अपनी सेनाएँ वापस बुलानी पड़ीं, जो इजराइल को बिल्कुल पसन्द नहीं आया था।
यहाँ यह जिक्र करना जरूरी है कि अमरीका ने भले ही इजराइल को सबसे पहले मान्यता दे दी थी, लेकिन पचास के दशक में उसकी विदेश नीति अरब देशों और इजराइल के बीच रिश्तों में सन्तुलन बनाए रखने की थी। इजराइल के प्रति उसका रवैया अत्यन्त सतर्कतापूर्ण था। जहाँ अमरीका यह स्वीकार करता था कि इजराइल को अपने अस्तित्व की रक्षा का पूरा अधिकार है, वहीं उसे सैनिक साज-सामान की आपूर्ति करने से परहेज करता था। उस दौर में अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध प्रारम्भ हो चुका था और अमरीका नहीं चाहता था कि अरब देश उससे नाराज होकर सोवियत खेमे में जाएँ। साथ ही, तेल भण्डारों के स्वामी होने की वजह से अरब देश अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम थे और उन्हें अप्रसन्न करना बुद्धिमानी नहीं थी।
लेकिन साठ के दशक से अमरीका और इजराइल धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आने लगे। इस दशक के दौरान अमरीका ने इजराइल को भारी मात्रा में अत्यन्त उन्नत सैन्य साज-सामान उपलब्ध कराए। तर्क यह दिया गया कि इजराइल के पास अपने पड़ोसी देशों की तुलना में अधिक बेहतर हथियार और विमान होने चाहिए, ताकि वह अपनी रक्षा करने में समर्थ हो सके। मध्यपूर्व में मिस्र, सीरिया और इराक जैसे देशों का झुकाव समाजवाद की ओर था और वे सोवियत समर्थक माने जाते थे। ऐसे में अमरीका ने मध्यपूर्व में सोवियत प्रभाव को नियन्त्रित करने एवं अपने हितों की रक्षा के लिए इजराइल को ताकतवर बनाना जरूरी समझा। उधर, सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे अपने समर्थक अरब देशों को भी अमरीका ने हथियारों की सहायता देना जारी रखा, ताकि सम्बन्धों का सन्तुलन बना रहे।
सत्तर के दशक का अन्त आते-आते मध्यपूर्व की भू-राजनीति में बड़े बदलाव आये। फरवरी 1979 में ईरान में इस्लामी क्रान्ति हुई और अमरीका समर्थक शाह मुहम्मद रजा पहलवी के शासन का अन्त हो गया। नयी सत्ता अमरीका की धुर विरोधी और सोवियत संघ की समर्थक थी और इस वजह से अमरीका समर्थक अरब देशों के भी विरुद्ध थी। नयी ईरानी सत्ता के रवैये से अमरीका और इजराइल के साथ-साथ अरब देशों को भी यह लगने लगा कि ईरान उनका साझा शत्रु है। ऐसे में अरब देशों और इजराइल के आपसी सम्बन्धों में सुधार का मार्ग प्रशस्त होने लगा।
रूस समर्थक गमाल अब्देल नासर की 1970 में मृत्यु के बाद अनवर सादात मिस्र के राष्ट्रपति बने। वे एक व्यावहारिक दृष्टि वाले राजनेता थे और अमरीकी खेमे में उन्हें अधिक लाभ दिखाई दिया। धीरे-धीरे वे अपने देश को रूसी खेमे से बाहर निकालकर अमरीकी खेमे में ले आये। अमरीका के कूटनीतिक प्रयासों के बाद 1979 में मिस्र और इजराइल के बीच ऐतिहासिक शान्ति समझौता हुआ, जिसके अन्तर्गत मिस्र ने इजराइल को मान्यता दे दी और वह ऐसा करने वाला पहला अरब देश बन गया। मिस्र को इसका भरपूर लाभ भी मिला। इजराइल ने इकसठ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला सिनाई प्रायद्वीप, जिसे उसने 1967 के युद्ध में मिस्र से छीना था, वापस कर दिया। अमरीका ने भी इसके एवज में मिस्र को अरबों डॉलर की भारी-भरकम आर्थिक सहायता दी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को काफी लाभ पहुँचा। सभी पश्चिमी देशों से उसके रिश्ते भी सुधर गये। 1994 में जॉर्डन और इजराइल के बीच हुए शान्ति समझौते के बाद जॉर्डन ने भी इजराइल को मान्यता दे दी।
इजराइल और अरब देशों के आपसी सम्बन्धों में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ 2020 के अब्राहम समझौतों के बाद आया। ‘अब्राहम समझौता’ किसी एक खास समझौते का नाम नहीं है। यह अमरीका के प्रयत्नों से इजराइल और अलग-अलग मुस्लिम देशों के बीच सम्पन्न हुए कई समझौतों की एक शृंखला को दिया गया नाम है, जो ट्रम्प के प्रथम शासनकाल के दौरान सम्पन्न हुए थे। अब्राहम ईसाइयों, मुसलमानों और यहूदियों—तीनों के लिए श्रद्धेय माने जाते हैं। इन्हीं तीनों समुदायों की आपसी एकता के प्रतीक के रूप में इसे ‘अब्राहम समझौता’ का नाम दिया गया। इन समझौतों के बाद संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे खाड़ी देशों से इजराइल के सम्बन्ध सामान्य हो गये।
सऊदी अरब और इजराइल के आपसी सम्बन्धों को सामान्य बनाने की दिशा में भी अमरीका द्वारा प्रयत्न किए गये। लेकिन सऊदी अरब की समस्या यह है कि वह मुसलमानों के दो सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों, मक्का और मदीना, का देश है और इस नाते वह स्वयं को इस्लाम के अभिभावक के रूप में देखता है। उसे लगता है कि जब तक फिलिस्तीन की समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हो जाता, तब तक इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने की बात करना उसकी छवि के लिए नुकसानदेह होगा। लेकिन ये दिखाने के दाँत हैं। परोक्ष रूप से दोनों देशों के सम्बन्ध पहले की अपेक्षा काफी सुधरे हैं। सऊदी अरब के आकाश से होकर इजराइली यात्री विमानों को उड़ने की अनुमति मिली हुई है। दोनों देशों के बीच आपसी सुरक्षा को लेकर भी एक अघोषित समझौता है, जिसके अन्तर्गत दोनों देश आपस में चुपचाप गोपनीय सामरिक सूचनाएँ साझा करते रहते हैं।
जहाँ तक इजराइल के एक अन्य पुराने दुश्मन सीरिया का प्रश्न है, दिसम्बर 2024 में हुए तख्तापलट के बाद सीरिया के इजराइल के प्रति रवैये में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है। वहाँ के नये राष्ट्रपति अहमद अल-शारा फिलहाल इजराइल के साथ सीरिया के सम्बन्ध सामान्य बनाने के इच्छुक नहीं हैं और गोलान हाइट्स पर इजराइल के अधिकार को इसमें एक बड़ी बाधा मानते हैं। लेकिन वे यह अवश्य चाहते हैं कि सीरिया और इजराइल के बीच कम-से-कम शान्ति तो स्थापित हो ही जाए, ताकि सुरक्षा मामलों में आपसी सहयोग का माहौल बन सके।
इस प्रकार हम पाते हैं कि पिछले लगभग आठ दशकों में मध्यपूर्व का घटनाचक्र पूरी तरह घूम चुका है। अमरीका की लगातार कोशिशों का ही यह परिणाम है कि इजराइल की स्थापना के समय जो अरब राष्ट्र उसके कट्टर दुश्मन थे, वे अब या तो उसके दोस्त बन चुके हैं या फिर उसके अस्तित्व की वास्तविकता को स्वीकार कर चुके हैं। दूसरी ओर अमरीका से उसकी प्रगाढ़ता के कारण प्रारम्भ में जिस ईरान के इजराइल के साथ दोस्ताना सम्बन्ध थे और जो उसे मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम देश था, आगे चलकर रिश्ते इतने कटु हो गये कि ईरान उसे मटियामेट करने की बात करने लगा। रिश्तों की कड़वाहट अभी चरम पर है।
बीतते समय के साथ अमरीका और इजराइल की मित्रता केवल राजनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने बहुआयामी स्वरूप ग्रहण कर लिया है। अमरीका के लिए इजराइल मध्यपूर्व में ऐसा विश्वसनीय रणनीतिक सहयोगी है, जिसके माध्यम से वह इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा, ऊर्जा, आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों पर नजर बनाए रख सकता है। दोनों देशों के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और आतंकवाद-रोधी अभियानों में गहरा सहयोग विकसित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र जैसे अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर भी अनेक अवसरों पर अमरीका ने इजराइल का खुलकर समर्थन किया है, जबकि इजराइल ने क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अमरीकी रणनीति को व्यावहारिक आधार प्रदान किया है। ईरान के बढ़ते प्रभाव, परमाणु कार्यक्रम और उसके समर्थक संगठनों की सक्रियता ने इस साझेदारी को और मजबूत किया है। अमरीका का मानना है कि यदि मध्यपूर्व में शक्ति-सन्तुलन उसके पक्ष में बनाए रखना है, तो इजराइल की सैन्य और तकनीकी बढ़त बनाए रखना आवश्यक है। दूसरी ओर, इजराइल भी अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्वीकार्यता के लिए अमरीकी समर्थन को अपरिहार्य मानता है। अमरीका सुरक्षा परिषद् का एकमात्र स्थायी सदस्य देश है जो यरुशलम को इजराइल की राजधानी और गोलन हाइट्स को इजराइल के हिस्से के रूप में स्वीकारता है। रणनीतिक उद्देश्यों को लेकर कभी-कभी आपसी मतभेद भी हो जाते हैं लेकिन वह दो प्रेमियों के बीच की तात्कालिक तकरार से अधिक कुछ नहीं होता।
मध्यपूर्व की भू-राजनीति पर समग्रता से विचार करने के लिए फिलिस्तीनी लोगों की समस्या पर चर्चा आवश्यक हो जाती है। पूरे विवाद में वे महत्त्वपूर्ण हितधारक हैं और इस क्षेत्र की भू-राजनीति उन्हें ही केन्द्र में रखकर संचालित होती है। अगले अंक में हम इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।






