
लोकतन्त्र, धर्म और पहचान की राजनीति
भारतीय समाज निरन्तर परिवर्तन का साक्षी रहा है। मनुष्य हमेशा किसी न किसी समूह से जुड़कर जीना चाहता है। परिवार, धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, संस्कृति और राष्ट्र उसकी पहचान के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। किन्तु पिछले कुछ दशकों में विश्व के अनेक देशों की तरह भारत में भी पहचान की राजनीति ने नयी शक्ति प्राप्त की है। इस राजनीति में धर्म सबसे प्रभावशाली पहचान के रूप में उभरा है। धार्मिक आस्था, जो मूलतः व्यक्ति का निजी और नैतिक विषय थी, धीरे-धीरे राजनीतिक लामबन्दी और सत्ता-संघर्ष का प्रमुख आधार बनती गयी। परिणामस्वरूप नागरिक की पहचान उसके संवैधानिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों के बजाय उसके धार्मिक या सामुदायिक परिचय से अधिक निर्धारित की जाने लगी।
लोगों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि उनका सबसे बड़ा परिचय उनका धर्म, जाति, भाषा या राजनीतिक समूह है। इसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य की व्यापक मानवीय पहचान सिकुड़कर छोटे-छोटे खाँचों में बँटती चली गयी। यह केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक लम्बी सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसने लोकतान्त्रिक संस्कृति और सामाजिक सह-अस्तित्व—दोनों को गहराई से प्रभावित किया है।
धर्म की आड़ लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक असहजता का वातावरण बनाया जा रहा है। राजनीति ने केवल समाज ही नहीं, परिवारों के भीतर भी गहरी दरारें पैदा कर दी हैं। पति-पत्नी राजनीतिक मतभेदों के कारण कटु हो जाते हैं। पिता-पुत्र अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं। भाई-भाई के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। मतभेद लोकतन्त्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन जब वे सम्बन्धों को नष्ट करने लगें तो यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक संकट बन जाता है।
भारतीय संविधान के आदर्श—न्याय, समानता और जनप्रतिनिधित्व—लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आधारशिला हैं। भारतीय राजनीति में धर्म हमेशा एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा है। कभी वह समाज को जोड़ने का माध्यम बना, तो कभी विभाजन का कारण। संविधान ने राज्य को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया ताकि शासन सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टि रखे। किन्तु वर्तमान परिदृश्य में धार्मिक उन्माद, जातीय विभाजन, सत्ता का बदलता स्वरूप, हिंसक बाजार और सांस्कृतिक धुँधलापन समाज को बेचैन कर रहे हैं। भाईचारे की बातें करने वाले भी आर्थिक उन्माद में उलझते दिखाई देते हैं। बाजार और सत्ता के सामने झुकते समाज की चिन्ताएँ अब अधिक स्पष्ट हो चुकी हैं।
जिस भारत ने अपनी स्वतन्त्रता की लड़ाई से विश्व के अनेक देशों को प्रेरणा दी, वही आज लोकतान्त्रिक संस्थाओं के क्षरण और बढ़ते केन्द्रीकरण की चिन्ता से घिरा दिखाई देता है। राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केन्द्रीय एजेंसियों के हस्तक्षेप, विभिन्न अवसरों पर विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने के आरोप, राजनीतिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक तनाव ने लोकतन्त्र की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाये हैं। इसके बावजूद लोकतन्त्र की सफलता के दावे लगातार किए जाते हैं।
धर्म, जो मूलतः नैतिकता, करुणा और अहिंसा का स्रोत था, आज अनेक बार सत्ता के औजार के रूप में प्रयुक्त होता दिखाई देता है। समय के साथ वह सत्ता की वैधता और विस्तार का माध्यम भी बन गया। उसके मूल नैतिक स्वरूप और राजनीतिक उपयोग के बीच का द्वन्द्व लगातार गहरा हुआ है। वर्चस्व की इस अन्धी दौड़ ने हिंसा, क्रूरता और सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा दिया है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतन्त्रता देता है, किन्तु वह लोकतान्त्रिक व्यवस्था को साम्प्रदायिक घृणा से मुक्त रखने की भी अपेक्षा करता है। इसलिए धर्म को सत्ता की राजनीति से अलग कर उसके मानवीय, सहिष्णु और नैतिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करना आज अत्यन्त आवश्यक है।
एक निष्पक्ष और मजबूत लोकतन्त्र के लिए मीडिया का जमीन से जुड़ा रहना अनिवार्य है। पत्रकारिता का दायित्व सनसनी और भटकाने वाले विमर्शों को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को केन्द्र में लाना है जो आम नागरिक, किसान, युवा, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और विकास से जुड़े हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि उससे प्रश्न पूछना है—चाहे सत्ता किसी भी दल की हो। निर्भीक और तथ्यपरक पत्रकारिता ही लोकतन्त्र को जीवन्त रख सकती है।
14 अगस्त 1947 की रात पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपने प्रसिद्ध ‘नियति से साक्षात्कार’ भाषण में जिस आधुनिक भारत का स्वप्न रखा था, वह आज कितना साकार हुआ है? स्वतन्त्रता के दशकों बाद भी लोकतन्त्र, मीडिया, राजनीति और सामाजिक उत्तरदायित्व की कसौटी पर हम कहाँ खड़े हैं? ऐसे अनेक प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं। देश का बुद्धिजीवी वर्ग भय, असुरक्षा, असन्तोष और अनैतिकता के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है। स्वाधीनता आन्दोलन के नेताओं के आदर्श और जीवन-मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। लोकतन्त्र तभी मजबूत होगा जब संविधान की भावना के अनुरूप संस्थाएँ सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता से अपनी भूमिका निभाएँ।
भारत के इतिहास पर दृष्टि डालें तो धर्म और राजनीति के सम्बन्ध समय-समय पर बदलते रहे हैं। मोटे तौर पर इस प्रक्रिया को चार चरणों में देखा जा सकता है—सिन्धु घाटी सभ्यता से इस्लाम के आगमन तक, इस्लाम के आगमन से 1857 तक, 1857 से स्वतन्त्रता तक और स्वतन्त्रता के बाद का काल। इन सभी चरणों में धर्म और राजनीति का सम्बन्ध बना रहा, किन्तु उसकी प्रकृति, गहनता और स्वरूप निरन्तर बदलते रहे।
1980 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ आया, जब वह मण्डल, मन्दिर और बाजार के इर्द-गिर्द संगठित होती दिखाई दी। मण्डल आयोग की सिफारिशों ने सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व को राजनीति के केन्द्र में ला दिया। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। दूसरी ओर मन्दिर आन्दोलन ने धार्मिक पहचान को एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया। इसी समय आर्थिक उदारीकरण ने मध्यवर्गीय आकाँक्षाओं और आर्थिक संरचना को नयी दिशा दी। इन तीनों प्रक्रियाओं ने मिलकर भारतीय राजनीति के चरित्र को गहराई से प्रभावित किया।
इन परिवर्तनों का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा, मीडिया, साहित्य और सामाजिक संवाद भी इससे प्रभावित हुए। सार्वजनिक विमर्श में तर्क और तथ्य की जगह अनेक बार भावनात्मक अपीलों और प्रतीकों ने ले ली। इससे लोकतान्त्रिक बहस का स्तर प्रभावित हुआ और अनेक जटिल सामाजिक-आर्थिक प्रश्न पीछे छूटते गये। विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा की अपेक्षा पहचान-आधारित विवाद अधिक प्रमुख होते गये, जिसका प्रभाव लोकतान्त्रिक प्राथमिकताओं पर भी दिखाई देता है।
इतिहास भी राजनीतिक संघर्ष का क्षेत्र बन गया है। स्मृतियों, प्रतीकों और धार्मिक आख्यानों की पुनर्व्याख्या करके उन्हें सामूहिक पहचान और राजनीतिक ध्रुवीकरण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इतिहासकार ज्ञानेन्द्र पाण्डे, सैंड्रियो फ्रेटेश और आयशा जलाल सहित अनेक विद्वानों का मत है कि हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक चेतना का बड़ा हिस्सा आधुनिक औपनिवेशिक परिस्थितियों की उपज है, जिसमें ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। आज भी उस औपनिवेशिक विरासत के प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई देते हैं।
अली असगर इंजीनियर ने लिखा है कि साम्प्रदायिक द्वन्द्व का सम्बन्ध धर्म से अधिक उन राजनीतिक स्वार्थों से है, जिनके लिए धर्म का उपयोग किया जाता है। उनके अनुसार साम्प्रदायिक हिंसा के लिए केवल समुदायों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है; इसके पीछे राजनीतिक और आर्थिक कारण भी सक्रिय रहते हैं। इसी सन्दर्भ में अन्तरराष्ट्रीय संस्था वी-डेम इंस्टीट्यूट की डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2024 ने भारत के लोकतन्त्र को लेकर गम्भीर प्रश्न उठाये हैं।
भारतीय समाज में धर्म केवल आध्यात्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक व्यवहार और राजनीतिक आकाँक्षाओं से भी गहराई से जुड़ा रहा है। इसलिए जब राजनीति में पहचान, अस्मिता और प्रतीकों की भूमिका बढ़ती है, तब धर्म भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। किन्तु लोकतन्त्र का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और रचनात्मक सहयोग की संस्कृति विकसित करना है। यदि समाज में संवाद की जगह अविश्वास और ध्रुवीकरण ले लें, तो लोकतन्त्र का वास्तविक अर्थ कमजोर पड़ जाता है।
लोकतन्त्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और संवाद की क्षमता है। किसी भी समाज का भविष्य तब सुरक्षित रहता है, जब वहाँ विचारों के मतभेद के बावजूद संविधान, कानून और मानवीय गरिमा के प्रति साझा प्रतिबद्धता बनी रहे। धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजी अधिकार है, जबकि लोकतन्त्र सार्वजनिक जीवन की साझा व्यवस्था है। दोनों के बीच सन्तुलन बनाए रखना ही एक परिपक्व लोकतान्त्रिक समाज की पहचान है। यही सन्तुलन सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और लोकतान्त्रिक भविष्य की सबसे विश्वसनीय आधारशिला है।
धर्म और राजनीति के सम्बन्धों को केवल टकराव या सहअस्तित्व के सरल ढाँचे में नहीं समझा जा सकता। इसके लिए इतिहास, समाज, संस्कृति और विचार की बहुस्तरीय प्रक्रियाओं को साथ लेकर चलना होगा। किसी भी सभ्यता की पहचान सत्ता से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं से होती है। आज समाज को किसी नयी विचारधारा की अपेक्षा मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण की अधिक आवश्यकता है।
राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ साझा रहनी चाहिए। जिस दिन राजनीतिक पहचान पूरी तरह मानवीय संवेदनाओं पर हावी हो जाएगी, उस दिन समाज केवल भीड़ बनकर रह जाएगा। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी विचारधारा सही है, बल्कि यह है कि क्या हम अपने भीतर के मनुष्य को बचाए रख पाये हैं। यदि इसका उत्तर सकारात्मक है, तो लोकतन्त्र, समाज और भविष्य—तीनों सुरक्षित रहेंगे।









