
युद्ध के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज
दुष्परिणामों को सारी दुनिया को झेलने के लिए तैयार रहना होगा। मानव सभ्यता बहुत से युद्धों की गवाह रही है। कभी राज्य विस्तार के लिए तो कभी एकछत्र निरंकुश साम्राज्य की युद्ध को लेकर जन मानस में मिश्र विचारधारा देखने को मिलती है। एक ओर युद्ध को महिमा मण्डित किया जाता है और युद्ध में जान गवाँने वाले सैनिकों को देश भक्त के तमगे से नवाजा जाता है, दूसरी ओर युद्ध को अनिवार्य अभिशाप कहा जाता है जिसका साफ अर्थ है कि युद्ध को रोका नहीं जा सकता लेकिन इससे होनेवाले स्थापना के लिए युद्ध होते रहे हैं। प्राचीन भारतीय साहित्य जहाँ युद्ध गाथाओं को गौरव गाथाओं की संज्ञा से अभिहित करता था और उन राजाओं की शौर्य गाथाओं को इतिहास में अंकित किया जाता था जिन्होंने बहुत से युद्ध जीते हों और शत्रु पक्ष का नृशंसता से खात्मा किया हो वहीं आधुनिक साहित्य की यह खासियत है कि इसने युद्ध के दुष्परिणामों को समझा, उसका मार्मिक अंकन किया और मानव जाति को सचेत करने की कोशिश की। मनुष्य की अधिकार लिप्सा और महत्त्वाकांक्षा के लिए होने वाले युद्धों ने सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका को देखकर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ नामक काव्य ग्रन्थ की रचना की जिसका प्रारम्भ ही युद्ध के दुष्परिणामों के वर्णन से होता है।
प्राचीन भारतीय साहित्य में दो बड़े युद्धों की कहानियाँ अंकित हैं, एक राम रावण का युद्ध और दूसरा महाभारत का युद्ध जिसमें लाखों सैनिकों के साथ एक राजा का पूरा वंश ही समाप्त हो गया था। इन दोनों ही युद्धों को नैतिकता के आधार पर आवश्यक और उचित ठहराया गया और उन योद्धाओं की यशगाथा उच्च कण्ठ से गाई गयी लेकिन आधुनिक युग की रचनाओं में युद्ध के प्रचण्ड वर्णन के साथ उसके बाद की स्थिति पर गम्भीर विचार विमर्श दिखाई देता है और यह पूरी प्रक्रिया युद्ध के खिलाफ प्रतिरोध की मजबूत आवाज के रूप में प्रतिध्वनित होती है।
साहित्य और कला माध्यमों में मुखरित एक सशक्त स्वर प्रतिरोध का होता है और यह प्रतिरोध तमाम विरूपताओं के उलट समाज को सुन्दर और सुगठित बनाने के लिए ही होता है। युद्ध से समस्याओं का सामयिक समाधान भले हो लेकिन इसके दूरगामी परिणाम भयावह ही होते हैं। महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि पर जब दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ लिखा तो उसमें युद्ध का महिमा मण्डन नहीं किया बल्कि उसके भयंकर दुष्परिणामों को गम्भीरता पूर्वक चित्रित किया।
युद्ध के पहले योद्धा की मानसिक स्थिति का वर्णन करते हुए दिनकर लिखते हैं –
“हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!
लड़ना उसे पड़ता मगर।
औ’ जीतने के बाद भी,
रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;
वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में
विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।”
देशभक्ति का जयघोष करने वाले तकरीबन सभी साहित्यकारों ने युद्ध को आवश्यक माना है और शौर्य गाथाओं में नौजवानों के शौर्य का बढ़ा चढ़ाकर अंकन किया गया है। उदाहरण के लिए आल्हा-ऊदल के गीतों को लिया जा सकता है जिसकी शुरुआत ही इस तरह से होती है-
“बड़े लड़इया महोबा वाले जिनकी मार सही न जाए,
एक को मारे दुई मर जावैं तिजा खौफ खाय मर जाए”
अर्थात जिस योद्धा में संहार करने की शक्ति जितनी तेज होगी, वह उतना ही बड़ा योद्धा होगा। इसी काव्य ग्रन्थ में एक विशेष जाति के पुरुषों के लिए मात्र १८ वर्ष की आयु तक जीना ही पर्याप्त माना जाता था, उदाहरण देखिए –
बारह बरस लौ कूकर जीवै, अरु तेरह लौ जियै सियार।
बरस अठारह क्षत्री जीवै, आगे जीवै को धिक्कार॥”
अर्थात युद्ध जरूरी है, शौर्य प्रदर्शन आवश्यक है और देश की रक्षा के लिए लड़े जाने वाले युद्ध में युवाओं को अपना बलिदान करना चाहिए अन्यथा उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन इन शौर्य गाथाओं के लेखकों के अलावा ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने इस बात को गहराई से महसूस किया कि युद्धों के उपरांत जिस शून्यता या अभाव की सृष्टि होती है उसे किसी भी हालत में भरा नहीं था सकता है। धर्मवीर भारती का काव्य नाटक ‘अंधा युग’ भी महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया जिसमें युद्ध के बाद के बिखराव और भयावह शून्यता का जीवन्त अंकन करते हुए कवि लिखते हैं –
“युद्धोपरान्त,
यह अन्धा युग अवतरित हुआ
जिसमें स्थितियाँ, मनोवृत्तियाँ, आत्माएँ सब विकृत हैं”
युद्ध के षड्यन्त्र को कवि समझता है और अपनी रचनाओं में उन्हें बेनकाब हुए उसके खिलाफ एक हवा तैयार करता है, मानस को बदलने की कोशिश करता है। इस सन्दर्भ में उमेश प्रसाद सिंह की कविता ‘युद्ध के उन्माद में’ की ये पंक्तियाँ विचारणीय हैं-
“जो युद्ध के षड्यन्त्र को देख लेते हैं
उनकी आँखे बेकाम करार कर दी जाती हैं
जिनके कान सुन लेते हैं दुरभिसन्धि की
गोपनीय खबरें
उनको बहरा बना दिया जाता है।
युद्ध के अपराध में
शामिल न होने वाले
सबसे बड़े अपराधी
घोषित कर दिये जाते हैं
अपने समय में।”
हमारी सभ्यता दो महायुद्धों का सामना कर चुकी है और युद्ध की व्यर्थता और विनाश को भी समझ चुकी है। साहित्यिक कृतियाँ इसके विनाशक स्वरूप को सफलता के साथ रेखांकित करती हुई शौर्य के उलट प्रतिरोध का समानान्तर स्वर मुखरित करती हैं। इस सन्दर्भ में बांग्ला कथा साहित्य की बात करें तो विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की रचनाओं में युद्ध के परिणामस्वरूप उत्पन्न अकाल का भयावह चित्रण मिलता है। यह अकाल जितना प्रकृति प्रदत्त था उससे कहीं ज्यादा मानव निर्मित था। युद्ध के कारण अनाज की कीमतें इतनी ज्यादा बढ़ जाती हैं कि आम आदमी को भरपेट अन्न मिलना मुश्किल हो जाता है। उनके उपन्यास ‘अशनि संकेत’ जिस पर इसी नाम से सत्यजीत रे ने फिल्म भी बनायी है, में बंगाल के अकाल का मार्मिक चित्र देखने को मिलता है। युद्ध की खबरें गाँववासियों तक पहुँचती हैं, किसी को पता नहीं कि कौन किस से और क्यों लड़ रहा है। पण्डित महाशय अपनी आधी -अधूरी जानकारी के आधार पर बताते हैं कि हमारे राजा की लड़ाई जापान और जर्मनी से सिंगापुर के कब्जे को लेकर हो रही है अर्थात लड़ाई राजा की राजा से लेकिन उसका दण्ड भुगतना पड़ता है, आम जनता को। अचानक से चावल की बढ़ती कीमतों की भनक गाँववासियों तक पहुँच जाती है, चार रुपये मन मिलने वाला चावल साढ़े छः रुपये हो जाता है और अन्ततः चालीस रुपए किलो तक पहुँचकर गायब ही हो जाता है। आम लोग तो कन्द मूल खोदकर किसी तरह अपना पेट भरते हैं, सम्भ्रान्त घर के लोगों के पास भी कोई विकल्प नहीं बचता। मोती मोचिनी की मृत्यु अनाहार के कारण होती है और मरते हुए भी उसकी आँखों में भूख से मुक्ति पाने के लिए भात, मछली का झोल और चच्चड़ी का सपना दिखाई देता है। भूख एक भयावह बीमारी में बदल जाती है और मृतक के पास रखा उबला कन्द एक बच्ची उठा ले जाती है। बड़े -बड़े राजनीतिकों की लिप्सा के कारण लड़े गए युद्ध का दुष्परिणाम आम लोगों को भोगना पड़ता है। उपन्यास के पन्नों से लेकर चित्र पट पर अंकित यह व्यथित कर देनेवाली कथा सोचने पर विवश कर देती है कि आखिरकार युद्धों की जरूरत ही क्या है। क्यों आम आदमी को इन युद्धों का भयावह परिणाम झेलने को विवश होना पड़ता है। बांग्ला के तकरीबन सभी साहित्यकारों ने युद्ध के परिणामस्वरूप उत्पन्न अकाल के अभाव और उसके भयंकर परिणामों को अपनी रचनाओं में जीवन्तता से अंकित करते हुए प्रकारान्तर से उन तमाम महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों से यह सवाल किया है कि आखिरकार इस युद्ध से क्या हासिल होता है। क्या युद्ध का परिदृश्य तैयार करने वाले लोगों को इसके लिए कोई पश्चाताप होता है? शायद नहीं या फिर शायद हाँ। इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध की एक कहानी, ‘क्लाड इथरली’ का जिक्र करना चाहूँगी। क्लाड इथरली वह विमान चालक था जिसके गिराए एटम बम से हिरोशिमा नष्ट हो गया था। अपनी कारगुजारी का दुष्परिणाम देखकर वह अपराधबोध से पगला गया। हालाँकि अमेरिकी सरकारी उसे ‘वार हीरो’ मानकर सम्मानित करती है लेकिन वह अपने अपराध का दण्ड पाने के लिए सरकारी नौकरी छोड़कर ऐसी वारदातें आरम्भ करता है जिससे गिरफ्तार होकर जेल जा सके लेकिन सरकार उसे जेल भेजने के स्थान पर, पागल समझकर जेल में डाल देती है। मुक्तिबोध इस पागलपन को व्याख्यायित करते हुए व्यंग्यात्मक ढंग से कहते हैं, “जो आदमी आत्मा की आवाज कभी-कभी सुन लिया करता और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है। जो लगातार सुनता मगर कुछ कहता नहीं है, वह भोला-भाला सीधा-सादा बेवकूफ है। जो उसकी आवाज बहुत ज्यादा सुना करता है और वैसा करने लगता है, वह समाज-विरोधी तत्त्वों में यों ही शामिल हो जाया करता है। लेकिन जो आदमी आत्मा की आवाज जरूरत से ज्यादा सुनके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने जमाने में सन्त हो सकता था। आजकल उसे पागलखाने में डाल दिया जाता है।” युद्ध की नृशंसता के विरुद्ध यह कहानी पश्चाताप का एक अलग पाठ रचती है।
समकालीन कविताओं में युद्ध की घटनाओं को लेकर एक अपराध बोध देखने को मिलता है। कभी न कभी इतिहास की इन क्रूरताओं पर इतिहासकार और साहित्यकार सभी शर्मिंदा होते हैं और उनकी यह शर्मिंदगी ही यह सिद्ध करती है कि युद्ध कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है। समकालीन परिदृश्य में महाशक्तियों के बीच जो जानलेवा युद्ध छिड़ा हुआ है, उसका फल हमारे सामने है। हजारों लोग मौत के घाट उतारे जा रहे हैं, होली के दौरान बच्चियों की मौत इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना थी, यह बात और है कि इन घटनाओं को समय के साथ भुला दिया जाता है। लेकिन साहित्यकार इसे याद रखते हैं और समय समय पर अपना प्रतिवाद दर्ज करते रहे। नवीन सागर की यह कविता देखिए –
“लड़ाई के समाचार
दूसरे सारे समाचारों को दबा देते हैं
छा जाते हैं
शान्ति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए
हम अपनी उत्तेजना में
मानो चाहते हैं
युद्ध जारी रहे।
फिर अटकलों और सरगर्मियों का दौर
जिसमें
फिर युद्ध छिड़ने की गुंजाइश दिखती है।
युद्ध रोमांचित करता है!
ध्वस्त आबादियों के चित्र
देखने का ढंग
बाद में शर्मिंदा करता है अकेले में।
कैसे हम बचे रहते हैं
और हमारा विश्वास बचा रहता है
कि हम बचे रहेंगे।”
दीपक जायसवाल की कविता ‘युद्ध और तितलियाँ’, युद्ध के दौरान धरती के बदसूरत होने का सादृश्य वृत्तान्त प्रस्तुत करती है। एक ही पंक्ति लोगों को आतंकित करने के लिए काफी है-
“युद्ध रंगों को निगल जाते हैं।”
येहूदा आमिखाई की कविता में बम के दुष्प्रभाव का आतंकित करने वाला दृश्य दिखाई देता है –
“तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा—दर्द और समय का
दो हस्पताल और कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफनाई गयी शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और भी बड़ा..’
कवि अपने समय का सजग प्रहरी होता है और हर अन्याय का पुरजोर विरोध करना उसकी शख्सियत की खास पहचान होती है, इसी कारण वह अपने दौर के हुक्मरानों और सियासी ताकतों के सामने पूरी ताकत के साथ युद्ध में मारे जाने वाले बच्चों की तरफ से यह सवाल उठाता है कि इन हत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन है। ब्रजमोहन सिंह की कविता ‘युद्ध में मरते बच्चे: मरता भविष्य’ सोचने के लिए विवश करती है कि जब बच्चे ही मर जाएँगे तो भला इस दुनिया का भविष्य किसके कन्धों पर सिर रखकर मुस्कराएगा, कवि सजगता और संवेदनशीलता के साथ पूछता है-
“कौन है वह युद्ध का हत्यारा
जो बच्चों का मारता है,
भविष्य को मारता है ?
आज भी हर माँ
यही दुआ करती है—
दुनिया के सारे बच्चे स्कूल जाएँ
और
लौट आएँ समय से
उन्हें न देखना पड़े वह दिन
जब वे यह कहें
मलबे में जिन्दा है बच्चे
पर उन्हें निकालनेवाला कोई नहीं।”
युद्ध बच्चों के साथ पूरे देश के भविष्य को निगल लेता है। एक दृश्य अभी तक जेहन में घाव की तरह ताजा है जब सोशल मीडिया और अखबारों में गाजा के तट पर मारे गए एक मासूम बच्चे की तस्वीर वायरल हुई थी। लोग सहानुभूति से आप्लावित होकर आह भरकर रह जाते हैं और बाद में तमाम बुरी यादों की तरह उसे भी भुला दिया जाता है लेकिन कवि उसे इतिहास में दर्ज करके आपको भूलने नहीं देता। सीमा आजाद की कविता ‘फिलीस्तीन के बच्चे’ उन्हीं रक्तरंजित पन्नों को हमारे सामने खोलती है जिसमें एक मासूम बच्चा अपनी हत्या के कारणों की तलाश करता है –
“मैं तो फूल रोप रहा था
जब उस रॉकेट ने हमें मारा
मेरे बाबा कहते हैं
उनके अब्बू ने
इस धरती पर देखे थे
बहुत से सुन्दर फूल
अब वहाँ उगा है
इजरायली राकेट के टुकड़े
जिनके पीछे लिखा है यूएस।”
गाजा के ये मासूम बच्चे जिन्हें खिलने से पहले ही मिट्टी में दफ्न कर दिया गया अपने सीने में बहुत से सवालों को दबाए खामोश हो जाते हैं लेकिन उनके सवाल कविताओं में ढल कर आम आदमी को बेचैन कर देते हैं। कविता कृष्णपलल्वी ‘गाजा के एक बच्चे की कविता’ में इन बच्चों की तकलीफों को दर्दीले अन्दाज में दर्ज करती हैं –
“बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ
खून सनी मिट्टी से लथपथ
मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं
मेरी आँखें अन्धी होती जा रही हैं
आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से
——— ———– ——–
मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग
क्यों जला देते हैं जैतून के बागों को।”
हर सजग कवि युद्ध के खिलाफ खड़ा होता है। राजेन्द्र राजन उस मानसिकता का बयान करते हैं जो युद्ध को महिमान्वित करने वालों का विरोध करती है-
“जो युद्ध के पक्ष में नहीं होंगे
उनका पक्ष नहीं सुना जाएगा
बमों और मिसाइलों के धमाकों में
आत्मा की पुकार नहीं सुनी जाएगी
धरती की धड़कन दबा दी जाएगी टैंकों के नीचे”
वर्तमान समय में दुनिया युद्ध के आतंक की चाय में साँस ले रही है। जाहिर तौर पर शामिल देशों को भले ही सीधा नुकसान हो रहा है लेकिन इसके दूरगामी दुष्परिणामों को पूरे विश्व को झेलना पड़ेगा। जरूरी है कि हम अपने इतिहास से सीख ग्रहण करते हुए युद्धों से दूरी बनाएँ लेकिन युद्ध की शुरुआत आम आदमी नहीं करता और न इसे रोकना उसके बस में है। वह तो बस फरियाद कर सकता है जैसा हमारे साहित्यकार कर रहे हैं। युद्धों के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज को और भी तीव्रता से मुखरित करने की जरूरत है तभी शायद पूरी दुनिया और मानवता की रक्षा हो पाएगी।










