अंतरराष्ट्रीय

युद्ध और मीडिया

 

शीत युद्धोपरांत उदारीकरण के दौर में राष्‍ट्र राज्‍यों के कमजोर पड़ने के साथ वैश्विक गाँव में तब्‍दील होती दुनिया में यह लगने लगा था कि युद्धों से अब धीरे-धीरे मानव सभ्‍यता अपना दामन छुड़ा लेगी लेकिन हकीकत में न साम्राज्‍यवाद समाप्‍त हो पाया है और न हम अपने मानव इतिहास से युद्धों के अध्‍याय को समाप्‍त कर पाये हैं। सोवियत संघ के पतन के बाद पहले एक ध्रुवीय हो गई दुनिया में और अब धीरे-धीरे बहुध्रुवीय होती जा रही दुनिया में 1990-91 के खाड़ी युद्ध से लेकर वर्तमान इजरायल (अमेरिका)-ईरान युद्ध के बीच लगातार हमारा साक्षात्‍कार संसाधनों के लिए होने वाले वैश्विक युद्धों और गृहयुद्धों से होता रहा है। दुनिया के आसमान पर छाये युद्ध के काले बादलों के बीच दुनिया का सैन्‍य खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।

निश्‍चय ही कोई भी युद्ध मृत्‍यु का समारोह कहा जा सकता है किंतु युद्धों के वर्तमान मीडिया कवरेज को देखकर लगता है कि युद्ध की वेदी पर सबसे पहले जिसकी बलि चढ़ती है, वह सत्‍य होता है। क्‍या यह आश्‍चर्य की बात नहीं है कि आज के डिजिटल मीडिया के दौर में जब युद्ध का लाइव प्रसारण करके युद्ध को एक समारोह में तब्‍दील कर दिया गया है, युद्ध को ड्रोनों, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों आदि के शक्ति प्रदर्शन की रंगभूमि में रूपांतरित कर दिया गया है, उसी दौर में युद्ध की भयावहता और वीभत्‍सता पर भी पर्दा डाल दिया गया है। युद्ध में हताहत और घायल होने वाले सैनिकों के साथ-साथ नागरिक ठिकानों पर पर होने वाले हमलों में जान गंवाने और क्षत-विक्षत होकर घायल हो गये लोगों की खबरें, तस्‍वीरें और वीडियो मीडिया कवरेज से बिल्‍कुल गायब से दिखते हैं। मीडिया द्वारा युद्ध की प्रस्‍तुति ऐसी प्रतीत होती है मानो कि हम कोई वीडियो गेम खेल और देख रहे हो जहाँ वास्‍तव में कोई हताहत नहीं होता है। मीडिया भी पहले तो मरने और घायल होने वाले लोगों की खबरें चलाने से बचता है और इस संदर्भ में वह कोई खबर चलाता भी है, तो हताहतों को मात्र आंकड़ों में तब्‍दील कर देता है। वह अपने दर्शकों में युद्ध से प्रभावित होने वाले बेकसूर लोगों के प्रति कोई संवेदना नहीं जगाता। आज प्रिंट और इले‍क्‍ट्रॉनिक मीडिया अपने-अपने राष्‍ट्र राज्‍यों के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही युद्ध की खबरें प्रसारित करता है। सेनाओं के जनसंपर्क अधिकारी युद्ध विषयक प्रचार को ही समाचार के रूप में प्रेस विज्ञप्ति के तौर पर जारी करते हैं और मीडिया आमतौर पर उसी प्रचार का हिस्‍सा बन जाता है। एक ओर युद्ध का सौंदर्यीकरण कर दिया जाता है, दूसरी ओर नागरिकों को संवेदनशून्‍य दर्शकों में रूपांतरित कर दिया जाता है। ब्रेकिंग मीडिया युद्ध की ख़बरों को सनसीनखेज बनाकर प्रस्‍तुत करता है लेकिन उसकी ख़बरें आपको रक्‍त, क्रूरता और जनसंहार से कमोबेश शून्‍य नज़र आएंगी। इजरायल के अख़बार और टेलीविज़न चैनलों से हमें यह नहीं पता चल सकता कि ईरान के मिसाइल हमलों में वहाँ कितने लोग मारे गये या घायल हुये हैं।

वास्‍तव में युद्ध के वक्‍त समाचारों के पाठ, तस्‍वीरें, आवाजें और वीडियो डिजिटल जनसंचार के साधनों द्वारा कैसे निर्मित किये जाते हैं और कैसे उनका प्रसारण किया जात है, यह बहुत महत्‍वपूर्ण है। मीडिया के विभिन्‍न माध्‍यम कालनिरपेक्ष निष्‍पक्ष माध्‍यम नहीं होते जो सूचनाओं का संप्रेषण भर करते हों। इतिहास के अलग-अलग दौर में मीडिया ने लोगों के अवबोधन और मानसिकता को प्रभावित किया है। युद्ध को लेकर नागरिकों की राय बनाने और युद्ध के लिए उत्‍तरदायी कारकों आदि की व्‍याख्‍या को प्रभावित करने में मीडिया की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए वर्तमान ईरान युद्ध का कवरेज करने वाला अमेरिकी और इजरायली मीडिया अपने मृत सैनिकों के आंकड़ें पेश करने और उनके ताबूतों को दिखाने से सचेतन बचने की कोशिश कर रहा है। अगर मृत अमेरिकी सैनिकों के ताबूत अमेरिकी टी.वी. चैनलों पर दिखाये जाते हैं, तो अमेरिकी जनमत में राष्‍ट्रपति ट्रंप की ईरान विषयक युद्ध नीति को लेकर असंतोष तेजी से फैलने लगेगा। इसी प्रकार ईरान की बेकसूर स्‍कूली छात्राओं और आम नागरिकों पर की गई बमबारी की ख़बरें भी अमेरिका और इजरायल का मीडिया नहीं दिखाता जबकि ईरान का मीडिया इन ख़बरों को प्राथमिकता से पेश करता है ताकि विश्‍व जनमत मानवीयता के नाते उसके पक्ष में खड़ा होने लगे।

समय के साथ जैसे-जैसे युद्ध की तकनीक और हथियार बदले हैं, वैसे-वैसे युद्ध की मीडियाई प्रस्‍तुति में भी बदलाव आते गये हैं। युद्ध के डिजीटलीकरण के साथ-साथ मीडिया का भी डिजीटलीकरण हुआ है। स्‍थान और समय की दूरी अब जैसे युद्ध में कोई मायने नहीं रखती, अमेरिका के विमान जैसे हजारों किमी दूर स्थित ईरान के सैनिक और असैनिक ठिकानों को निशाना बना सकते हैं, वैसे ही मीडिया अमेरिका की इस बमबारी का जीवंत प्रसारण त्‍वरित ढंग से दुनियाभर में कर सकता है। इसके विपरीत जब मौखिक संप्रेषण का युग हुआ करता था और छापेखाने का आविष्‍कार तक नहीं हुआ था, उस वक्‍त युद्ध की ख़बरें और अफवाहें एक मुख से दूसरे मुख तक धीरे-धीरे फैलती थीं। हस्‍तलिखित संदेशों को पैदल धावकों और घुड़सवार-ऊँटसवार संदेशवाहकों द्वारा एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक भेजा जाता था। युद्ध के दौरान होने वाले हमलों, घेराबंदियों और जीत-हार के निर्णयों की सूचना वास्‍तविक घटनाक्रम घटित होने के कई-कई दिनों बाद ही पहुँच पाती थी। आज जैसे त्‍वरित मीडिया कवरेज की तो कल्‍पना तक उस वक्‍त नहीं की जा सकती थी। साक्षरता के विस्‍तार के साथ युद्ध कविता, नाटक, कहानी, उपन्‍यास जैसे सृजनात्‍मक पाठों का विषय बनने लगा किंतु छापेखाने के आगमन के बावजूद भी युद्ध विषयक ख़बरों पर राज्‍य का कठोर नियंत्रण हुआ करता था और गोपनीयता के नाम पर आम आदमी की इन तक पहुँच प्राय: असंभवप्राय: हुआ करती थी। यातायात और संचार के साधनों का पिछड़ापन लंबे समय तक प्रिंट मीडिया की गति को अवरुद्ध किये रहा था। उदाहरण के लिए वाटरलू की लड़ाई में हुई नेपोलियन की पराजय की ख़बर लंदन पहुँचने में तीन दिन लग गये थे जबकि दोनों स्‍थानों के बीच की दूरी मुश्किल से 350 किमी ही थी।

विलियम हॉवर्ड रसेल जैसे युद्ध संवाददाता टेलेग्राफ के माध्‍यम से द टाइम्‍स ऑफ लंदन को 1857 की भारतीय क्रांति से लेकर अमेरिकी गृहयुद्ध और फ्रेंको-प्रशिया के युद्ध तक की खबरें सीधे लड़ाई के मैदानों से तैयार करके अख़बार में छपने के लिए भेजने में सक्षम हो गये थे। यह अलग बात है कि युद्धों से जुड़ी दर्दनाक वास्‍तविकताओं का साक्षात्‍कार इन रिपोर्टों में आने से सैन्‍य महकमे नाखुश रहते थे जबकि हकीकत यह थी कि टेलेग्राफ के ऊपर सरकारी नियंत्रण हुआ करता था और युद्ध पत्रकारिकता सेंसर से गुजरने के बाद ही कोई रिपोर्ट अख़बार तक पहुँचा पाती थी। युद्ध की ख़बरों के व्‍यापक प्रसारण की शुरुआत 1904-1905 के रूस-जापान युद्ध से मानी जाती है। न्‍यूयार्क टाइम्‍स और टाइम्‍स ऑफ लंदन के लिए युद्ध संवाददाता के तौर पर काम करने वाले लिओनेल जेम्‍स ने पहली बार रेडियो का इस्‍तेमाल करके इन अख़बारों को युद्ध की ख़बरें भेजी थीं। रेडियो में सुविधा यह थी कि ख़बरों को सेंसर से बचाया जा सकता था और टेलेग्राफ की तुलना में रेडियो का इस्‍तेमाल कहीं ज्‍यादा सुविधाजनक था।

युद्ध को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया, अनुभव और राय को निर्धारित करने में 20वीं सदी में मीडिया के इलेक्‍ट्रॉनिकीकरण ने महत्‍वपूर्ण भू‍मिका निभाई थी। रेडियो और टेलीविज़न जिसप्रकार सीधे अपने श्रोताओं और दर्शकों के दिल-दिमाग पर छा जाते हैं, वैसे में मार्शल मैकलुहान की यह बात और सच साबित होती है कि माध्‍यम समाज के काम करने और सोचने-समझने को रूपाकार देते हैं। पहले रेडियो पत्रकारिता ने और फिर टेलीविज़न पत्रकारिता ने युद्ध के मैदान और श्रोता-दर्शक के बीच की भौगोलिक और कालिक दूरी के अंतर को पाट दिया। निरक्षरता के कारण प्रिंट मीडिया के सामने आने वाली चुनौती पर भी इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया द्वारा अब विजय पा ली गई। रेडियो सरकारी एजेंडे और युद्ध विषयक प्रचार को जन-जन तक पहुँचाने का सस्‍ता और सुगम माध्‍यम साबित हुआ। चार बार अमेरिका के राष्‍ट्रपति रहे रूजवेल्‍ट ने अमेरिकी जनता से सीधा और अनौपचारिक संवाद कायम करने के लिए अख़बारों की जगह रेडियो को वरीयता दी। 1933-1944 के दौरान ‘फायरसाइड चैट्स’ के माध्‍यम से उन्‍होंने अमेरिका को वैश्विक मंदी का सामना करने के लिए तैयार किया। इसके साथ-साथ अमेरिका के दरवाजे तक पहुँचा दिये गये विश्‍वयुद्ध का मुकाबला करने के लिए उन्‍होंने अपने देशवासियों का मनोबल बढ़ाया। यह भी रेडियो ही था जिसके द्वारा मुसोलिन और हिटलर जैसे तानाशाह अपनी जनता में युद्धोन्‍माद और आक्रामक राष्‍ट्रवाद का प्रचार-प्रसार करने में सफल रहे। मार्शल मैकलुहान ने यों ही नहीं कहा था कि द्वितीय विश्‍वयुद्ध रेडियो युद्ध था।

जहाँ मैकलुहान ने द्वितीय विश्‍वयुद्ध में जनसंचार के साधनों में रेडियो की भूमिका को सर्वोपरी बताया था, वहीं वियतनाम युद्ध को पहला टेलीविज़न युद्ध भी बताया था। टेलीविज़न ने नागरिक और सेना के बीच के अंतर को खत्‍म करते हुए युद्ध को दर्शकों के बैठक कक्ष तक ला दिया। युद्ध अब लोगों के नागरिक जीवन के कहीं ज्‍यादा नजदीक आ गया। अब दोनों एक-दूसरे को सीधे-सीधे प्रभावित करने लगे और एक-दूसरे से प्रभावित होने लगे। टेलीविज़न माध्‍यम युद्ध विषयक ख़बरों में निहित संदेश को अन्‍य माध्‍यमों की तुलना में कहीं ज्‍यादा रूपाकार देता था और जनता की प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप तब्‍दील होती थी। वियतनाम युद्ध में एक ओर अमेरिकी सैनिकों की क्रूरता और दूसरी ओर वियतनाम के आम आदमी के राष्‍ट्रीय प्रतिरोध के समक्ष हताहत होते अमेरिकी सैनिकों को टेलीविज़न पर देख अमेरिकी जनमत वियतनाम पर थोपे गये युद्ध को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ हो गया था।

आगे चलकर टेलीविज़न पर होने वाली युद्ध रिपोर्टिंग के क्षेत्र में सैटेलाइट प्रसारण के कारण आमूलचूल बदलाव आ गया। समय और स्‍पेस का अंतराल अब बिल्‍कुल मिट गया और युद्ध का जीवंत प्रसारण अब संभव हो गया था। सीएनएन द्वारा पहले खाड़ी युद्ध का जिस प्रकार 24X7 बेरोकटोक लाइव प्रसारण किया गया था उसने पहली बार सही अर्थों में युद्ध के सीधे वैश्विक प्रसारण को जमीनी हकीकत बना दिया। मिसाइल हमलों के लाइव दृश्‍यों ने युद्ध को वीडियो गेम सरीखा बना डाला। तकनीकी दृष्टि से युद्ध का लाइव प्रसारण युद्ध पत्रकारिता के लिए अब तक की बहुत बड़ी उपलब्धी थी लेकिन इस प्रसारण की एकपक्षीयता ने यह भी साबित कर दिया कि टेलीविज़न अब वियतनाम युद्ध की तुलना में राष्‍ट्र राज्‍य द्वारा कहीं ज्‍यादा नियन्त्रित हो चुका था। अब अमेरिकी टेलीविज़न के ऊपर पेंटागन की कड़ी सेंसरशिप काम करने लगी थी।

आज जनसंचार की क्रांति इलेक्‍ट्रॉनिक दौर से डिजिटल दौर में पहुँच चुकी है। आज अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, सोशलसाइटें और बेवसाइटें डिजीटली रूप से परस्‍पर आबद्ध हैं। सैटेलाइट, ऑप्टिकल फाइबर और वाई-फाई के द्वारा पूरी दुनिया में अब वास्‍तविक समय में सूचनाओं और ख़बरों का प्रसारण पहले से कहीं ज्‍यादा सहज-सुलभ हो चुका है। डेस्‍कटॉप, लैपटॉप, स्‍मार्टफोन, ऑडियो-वीडियो की डिजिटल रिकॉर्डिंग, क्‍लाउड स्‍टोरेज और वीडियो कॉन्‍फ्रेंस के विभिन्‍न माध्‍यमों ने परंपरागत प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यमों के विभाजन को समाप्‍त करके पत्रकारिता का डिजिटल युग ला दिया है। एक ओर युद्ध की लाइव और रिकॉर्डेड रिपोर्टिंग इस डिजिटल पत्रकारिता में पहले की तुलना में कम खर्चीली और तकनीकी रूप से कहीं ज्‍यादा आसान हो चुकी है किंतु दूसरी ओर मीडिया पर कसते पूँजीवादी शिकंजे के कारण युद्ध की रिपोर्टिंग अब पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों की इंसानीयत को झकझोर कर जगाती नहीं है, बल्कि ब्रेकिंग रिपार्टों की सनसनी उन्‍हें संवेदनाशून्‍य बना रही है। युद्ध की ख़बरों को लेकर जो सरकारी सेंसरशिप लगातार बढ़ती जा रही है, उसके सामने मीडिया की कथित स्‍वतन्त्रता दांव पर लग चुकी है। आज जनसंपर्क और पत्रकारिता के कॉकटेल में निपुण तपे-तपाये पत्रकार, सेना और सरकार के प्रवक्‍ता और हथियारों का बाज़ार देखने वाले पेशेवेर लोग मिलकर युद्ध पत्रकारिता की पटकथा तैयार करते हैं। वे दर्शकों को युद्ध रूपी खेल की अपनी पटकथा की प्रस्‍तुति से ललचाते हैं और रक्‍तपात रहित युद्ध की आभासी दुनिया में ले जाकर उन्‍हें युद्ध की प्रगति से सूचित करते हैं। डिजिटल मीडिया के स्‍तर पर भी लड़े जा रहे युद्धों में यूक्रेन और ईरान द्वारा ए.आई. सृजित डिजिटल प्रवक्‍ताओं का इस्‍तेमाल तक देखने को मिला है।

डिजिटल मीडिया का इस्‍तेमाल करके युद्ध को आज एक भव्‍य तमाशे में बदला जा चुका है। आकाश में उड़ते ड्रोनों की चकाचौंध, युद्ध के मैदानों में आगे बढ़ते टैंकों का आग उगलना, उन्‍नत तकनीक से लैस लड़ाकू विमानों की गर्जना, सैकड़ों-हजारों किमी से दागी जाती बैलिस्टिक मिसाइलें और उन्‍हें रोकने वाली आयरन डोम सरीखी मिसाइल रक्षा प्रणालियों का महिमामंडन, इन सब के बीच आज दर्शक उलझकर रह जाता है। बीच-बीच में कूटनीतिक बैठकों के वीडियो, आतंकवाद और दुश्‍मन देश के खिलाफ जारी होने वाली आधिकारिक चेतावनियों और युद्ध के मोर्चे पर अपनी सफलता दावा करती प्रेस कॉन्‍फ्रेंसों द्वारा दर्शकों को युद्ध विषयक रणनीतियों का विशेषज्ञ भी बना दिया जाता है। युद्ध पत्रकारिता की भाषा के क्षेत्र में भी नयी-नयी शब्‍दावलियों की बमबारी की धमक देर तक कानों में गूँजती रहती है: सर्जिकल स्‍ट्राइक, नागरिक क्षति, मानवीय सहायता, सुरक्षित क्षेत्र, संघर्ष विराम, विशेष ऑपरेशन और हाइब्रिड वारफेयर आदि। इन सबके बीच युद्ध के मोर्चों पर होने वाली मौतें और रक्‍तपात की खबरें, बलात्‍कार की हृदयविदारक घटनाएँ, इलाज के अभाव में तड़पते घायलों की चीत्‍कारें, भुखमरी और बीमारियों से जूझते आम लोगों की बदहाली, बच्‍चों से छिनते स्‍कूल और खेल के मैदान एक साजिशाना तरीके से अख़बार की सुर्खियों, रेडियो बुलेटिनों और टी.वी. पर होने वाली युद्ध की लाइव रिर्पोटिंग से गायब कर दिये गये हैं। उदाहरण के लिए इजरायल द्वारा गाजा में किये गये जनसंहार पर पश्चिमी मीडिया में एक रणनीतिगत खामोशी मिलती है।

इस संवेदनहीन डिजिटल युद्ध पत्रकारिता ने आज के जिस दौर में दर्शकों को विचारशून्‍य और उदासीन बना दिया है, उनमें सही और गलत, अच्‍छे और बुरे के बीच अंतर करने का विवेक मिटा दिया है, युद्ध की ख़बरें मनोरंजक तमाशा बना दी गई है, उसी दौर में सूचनाओं के डिजिटलीकरण ने इस युद्धपिपासु डिजिटल युद्ध पत्रकारिता की घेरेबंदी को तोड़ने का एक रास्‍ता भी खोल दिया है। डिजिटल मल्‍टीमीडिया के समय में अब सूचनाओं को बहुत आसानी से और लगभग बहुत कम लागत में पुनरुत्‍पादित किया जा सकता है, उनकी प्रतिलिपियाँ तैयार की जा सकती हैं और उनका वितरण भी संभव है। यही कारण है कि मुख्‍यधारा के वाणिज्यिक मीडिया और सरकार नियन्त्रित मीडिया, दोनों को वैकल्पिक मीडिया माध्‍यमों द्वारा चुनौती देना आज तकनीकी दृष्टि से पहले की तुलना में ज्‍यादा संभव है। विकिलिक्‍स ने अमेरिका के युद्ध अपराधों और दुरभिसंधियों को सामने लाकर यह साबित भी कर दिया है। हमारे अपने देश में कुछ पक्षधर पत्रकार अपने यू-ट्यूब चैनलों द्वारा युद्धोन्‍मादी राष्‍ट्रवाद के शोरगुल के बीच भी युद्ध के अमानवीय पहलुओं को बार-बार सामने लाते रहते हैं, उसकी अनिवार्यता पर सवाल खड़े करते रहते हैं। आज जरूरत ऐसे युद्धविरोधी वैकल्पिक विद्रोही मीडिया की स्‍वतन्त्रता को बनाये रखने की है।

Show More

प्रमोद मीणा

लेखक भाषा एवं सामाजिक विज्ञान संकाय, तेजपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर हैं। सम्पर्क +917320920958, pramod.pu.raj@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x