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इरिमी की उड़ान वैश्विक उत्कृष्टता की ओर

 

भारतीय रेल यान्त्रिक एवं विद्युत अभियन्त्रण संस्थान (इरिमी), जमालपुर, बिहार में स्थित भारतीय रेलवे का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान है। एक लम्बे ऐतिहासिक विकासक्रम से गुजरते हुए आज यह संस्थान न केवल भारतीय रेलवे के तकनीकी प्रशिक्षण का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन चुका है, बल्कि हाल के प्रशासनिक निर्णयों के बाद यह वैश्विक स्तर पर आपदा प्रबन्धन और तकनीकी प्रशिक्षण के एक समेकित हब के रूप में भी उभर रहा है।

रेलवे बोर्ड द्वारा बेंगलुरु स्थित भारतीय रेलवे आपदा प्रबन्धन संस्थान (आईआरआईडीएम) के इरिमी में विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद इस संस्थान का महत्त्व और भी बढ़ गया है। अब इरिमी को एक एकीकृत केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान (सेंट्रल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहाँ मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और आपदा प्रबन्धन—तीनों क्षेत्रों की विशेषज्ञता एक साथ उपलब्ध होगी। इस निर्णय से न केवल रेलवे प्रशिक्षण व्यवस्था को नयी दिशा मिलेगी, बल्कि तकनीकी अनुसन्धान, नवाचार और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में भी एक नया अध्याय खुलेगा।

जमालपुर और मुंगेर क्षेत्र का इतिहास भी इस संस्थान की पृष्ठभूमि को विशिष्ट बनाता है। महाभारत काल में मुंगेर कर्ण द्वारा शासित अंग प्रदेश की राजधानी माना जाता था। मध्यकाल में यह बंगाल के नवाब मीर कासिम का प्रमुख गढ़ रहा, जहाँ से उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध संघर्ष किया। इस क्षेत्र में पारम्परिक रूप से आग्नेयास्त्र निर्माण की तकनीक प्रचलित थी। सम्भवतः इसी तकनीकी कौशल और सामरिक दृष्टि से सुरक्षित भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ईस्ट इण्डियन रेलवे ने जमालपुर को रेल कारखाने की स्थापना के लिए चुना। राजमहल पर्वतमाला की तलहटी में स्थित यह स्थान बाढ़ के खतरे से अपेक्षाकृत सुरक्षित था और प्राकृतिक रूप से संरक्षित भी।

जमालपुर रेलवे कारखाने की स्थापना 8 फरवरी 1862 को हुई। इसके कुछ दशकों बाद, 1888 में इसी परिसर में भारतीय रेलवे यान्त्रिक एवं विद्युत अभियन्त्रण संस्थान की स्थापना की गयी। प्रारम्भिक वर्षों में यह एक टेक्निकल स्कूल के रूप में कार्य करता था, जहाँ रेलवे कर्मचारियों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता था। धीरे-धीरे यह संस्थान भारतीय रेलवे के तकनीकी प्रशिक्षण का प्रमुख केन्द्र बन गया।

1905 में यहाँ यूरोपियन अप्रेंटिस का प्रशिक्षण आरम्भ हुआ और 1911 में भारतीय प्रशिक्षुओं के लिए “पार्टिशन अप्रेंटिस” प्रशिक्षण शुरू किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब भारतीय रेलवे की तकनीकी सीमाएँ उजागर हुईं, तब भारत में इण्डियन इण्डस्ट्रियल कमीशन का गठन किया गया। इसी दौर में इस संस्थान में भारतीय अप्रेंटिस मैकेनिकों को पर्यवेक्षक स्तर का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था प्रारम्भ की गयी।

14 फरवरी 1927 को इस संस्थान में स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस (एससीआरए) का पहला बैच शामिल हुआ। यह भारतीय रेलवे की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी प्रशिक्षण योजना थी, जिसके माध्यम से चयनित विद्यार्थियों को उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग प्रशिक्षण दिया जाता था। उस समय तक संस्थान को अभी भी टेक्निकल स्कूल के नाम से जाना जाता था। बाद में 1974 में इसका औपचारिक नामकरण ‘इण्डियन रेलवे इंस्टीट्यूट ऑफ मैकेनिकल एँड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग’ किया गया और इसके संचालन की जिम्मेदारी सीधे रेलवे बोर्ड के अधीन कर दी गयी।

समय के साथ इरिमी ने भारतीय रेलवे को अनेक उत्कृष्ट इंजीनियर, प्रशिक्षक और तकनीकी विशेषज्ञ दिए हैं। इसी संस्थान के स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस 1958 बैच के सदस्य राजेंद्र कुमार पचौरी ने वर्ष 2007 में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अध्यक्ष के रूप में नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त किया था। यह उपलब्धि इस संस्थान की बौद्धिक और तकनीकी परम्परा की वैश्विक पहचान का प्रमाण है। हालांकि 2015 में संघ लोक सेवा आयोग ने एससीआरए परीक्षा को बंद कर दिया और 2016 से यह नामांकन प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त कर दी गयी।

भारतीय रेलवे के विशाल नेटवर्क के संचालन में दक्षता, सुरक्षा और तकनीकी उन्नति सुनिश्चित करने के लिए कई केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना की गयी है। इनमें जमालपुर का इरिमी, नासिक का इरिन (इण्डियन रेलवे इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग) और बेंगलुरु का इरिडम (इण्डियन रेलवे इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट) प्रमुख हैं।

इरिमी मुख्यतः मैकेनिकल और औद्योगिक इंजीनियरिंग से सम्बन्धित प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिसमें लोकोमोटिव, वैगन, वर्कशॉप प्रबन्धन और औद्योगिक प्रक्रियाओं से जुड़े विषय शामिल हैं। वहीं नासिक स्थित इरिन रेलवे की विद्युत प्रणाली—जैसे ट्रैक्शन, पावर सप्लाई और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव—के क्षेत्र में इंजीनियरों को प्रशिक्षित करता है। बेंगलुरु का इरिडम रेल दुर्घटनाओं, आग, बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने के लिए कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान करता रहा है।

अब रेलवे की नयी रणनीति इन तीनों संस्थानों की विशेषज्ञता को एकीकृत करते हुए जमालपुर स्थित इरिमी को एक केन्द्रीय प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित करने की है। इस पहल का उद्देश्य “वन नेशन–वन रेलवे ट्रेनिंग सिस्टम” की अवधारणा को साकार करना है, जिससे बहु-कौशल युक्त इंजीनियर और अधिकारी तैयार किए जा सकें और अनुसन्धान तथा नवाचार को एक साझा मंच मिल सके।

रेलवे बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, बेंगलुरु स्थित भारतीय रेलवे आपदा प्रबन्धन संस्थान का प्रशासनिक नियन्त्रण अब इरिमी, जमालपुर के अधीन आ जाएगा। इससे प्रशिक्षण गतिविधियों को एकीकृत प्रशासनिक संरचना के अन्तर्गत संचालित किया जा सकेगा और आपदा प्रबन्धन की तैयारियों को और सुदृढ़ बनाया जा सकेगा।

यह भी उल्लेखनीय है कि इरिमी अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगा है। हाल ही में तंजानिया के 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमण्डल को यहाँ आपदा प्रबन्धन का प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रकार यह संस्थान केवल भारतीय रेलवे कर्मियों के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर क्षमता निर्माण के एक केन्द्र के रूप में उभर रहा है।

रेल मन्त्रालय ने हाल में मीडिया में आई उस खबर को भी खारिज किया है जिसमें दावा किया गया था कि इरिमी को जमालपुर से लखनऊ स्थानान्तरित किया जाएगा। मन्त्रालय के अनुसार ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। इसके विपरीत, सरकार का उद्देश्य इस संस्थान की गतिविधियों का विस्तार करना और इसे और अधिक सशक्त बनाना है।

इस दिशा में जमालपुर में एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रमों सहित कई नये शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई गयी है। इन कार्यक्रमों से न केवल रेलवे कर्मचारियों को उन्नत प्रशिक्षण मिलेगा, बल्कि बिहार और आसपास के क्षेत्रों के युवाओं के लिए भी उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध होंगे।

वर्ष 2025 में सांसद एवं केन्द्रीय मन्त्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) रेल मन्त्री अश्विनी वैष्णव के साथ जमालपुर रेल कारखाने पहुँचे थे। उस अवसर पर रेल मन्त्री ने इरिमी को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी और कहा था कि वर्ष 2026 से यहाँ नये प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ किए जाएँगे।

इन कार्यक्रमों के अन्तर्गत मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स विषयों में स्किल डेवलपमेंट प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा। यह व्यवस्था केवल रेलवे अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आम युवाओं के लिए भी प्रशिक्षण के अवसर खुले रहेंगे। इससे क्षेत्रीय स्तर पर तकनीकी कौशल विकास को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नयी ऊर्जा प्राप्त होगी।

जमालपुर रेल कारखाना पहले से ही इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार रहा है। यदि इरिमी को पूर्ण रूप से एकीकृत केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान के रूप में विकसित किया जाता है, तो यह न केवल तकनीकी प्रशिक्षण का बल्कि आर्थिक गतिविधियों का भी एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन सकता है।

इरिमी के महानिदेशक अनिमेष सिन्हा के अनुसार, “इरिमी अब केवल एक प्रशिक्षण संस्थान नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय रेलवे के भविष्य का ‘नर्व सेंटर’ बनने की दिशा में अग्रसर है। यहाँ विभिन्न संस्थानों की विशेषज्ञता के एकत्र होने से रेलवे की तकनीकी क्षमता, सुरक्षा और संचालन दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।”

इस संस्थान की भूमिका आधुनिक रेलवे तकनीक के विकास में भी महत्त्वपूर्ण रही है। वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों के संचालन और रखरखाव के लिए आवश्यक तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के निर्धारण में भी इरिमी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पटना में वंदे भारत प्रोपल्शन सिस्टम और विद्युत सुरक्षा से सम्बन्धित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए पाठ्यक्रम निर्धारण का कार्य भी इरिमी ने ही किया था।

इस प्रकार, लगभग डेढ़ शताब्दी पुराना यह संस्थान आज भी भारतीय रेलवे की तकनीकी प्रगति के केन्द्र में बना हुआ है। अपनी ऐतिहासिक विरासत, तकनीकी दक्षता और नयी नीतिगत पहलों के कारण इरिमी अब राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण और अनुसन्धान केन्द्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

यदि योजनानुसार इसका विकास जारी रहता है, तो निकट भविष्य में जमालपुर का यह संस्थान भारतीय रेलवे के तकनीकी ज्ञान, आपदा प्रबन्धन और कौशल विकास का एक ऐसा वैश्विक केन्द्र बन सकता है, जो न केवल देश की रेलवे व्यवस्था को मजबूत करेगा, बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता को भी विश्व पटल पर नयी पहचान दिलाएगा।

 

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कुमार कृष्णन

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं एवं 'सबलोग' के बिहार ब्यूरोचीफ़ हैं। सम्पर्क +919304706646 kkrishnanang@gmail.com
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