आवरण कथाशख्सियत

आदिवासी लेखन की उभरती चेतना की स्वरसंगिनी – प्रभाकर तिर्की

 

  • प्रभाकर तिर्की

 

दरअसल आदिवासी चेतना का लेखन, एक तरफ अपनी पीड़ा खुद कहने, अपने सामाधान खुद ढुंढने की चेष्टा है, वहीँ वह अपनी संस्कृति को नष्ट करने, अपने संसाधनों पर कब्जा जमाने के षडयंत्रों के बरक्स प्रतिरोध की चेतना से भी लैस है। यह आदिवासी अपने संगठन की वजह से पिछले पाँच हजार वर्षों से जिंदा है। आज आदिवासी साहित्य 90 भाषाओ में लिखा जा रहा। आज आदिवासियों में चेतना जगी है। वह नयी-नयी विचारधाराओं और क्रांतियों से परिचित हुआ है जिनके परिप्रेक्ष्य में वह अपनी नयी पुरानी परिस्थितियों को तोलने लगा है-रमणिका गुप्ता

आदिवासियों के बारे में यह बखान सिर्फ रमणिका गुप्ता ही कर सकती है और इसका आधार है रमणिका गुप्ता का आदिवासियों के पाँच हजार सालों का इतिहास, उनकी जीवन शैली, उनके जीवन मूल्यों पर आधारित जीवन दर्शन और उनकी उनकी संघर्ष गाथा पर गहरी वैचारिक समझ। अपने निजी जीवन को ही एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करने वाली सर्वगुण संपन्न साहित्य कला की धुरन्धर रमणिका जी ने अपने जीवन की आखिरी पारी बड़े ही आत्मविश्वास के साथ जिया है। यह पारी साहित्य को समर्पित पारी थी। उनके साहित्य का सफर शुरू होता है उनके राजनीतिक जीवन के संघर्ष से। दलित अधिकारों और मजदूरों के संघर्ष से शुरू होकर कलम को हथियार बना देने की र्कोइ कसर बाकी नहीं रखी रमणिका जी ने।

रमणिका जी के संस्मरणों के बारे में सम्पूर्ण चर्चा उनके लंबे जीवन काल की तरह लंबा और दुष्कर है। उनके जीवन की गहराईयों को चंद शब्दों में उतार पाना एक बड़ी चुनौती है। बावजूद उनके अविस्मरणीय कार्यों को आने वाली पीढ़ी तक लाना हमारे लिये बड़ी जिम्मवारी है। रमणिका जी ने आदिवासी लेखन को अपने साहित्य के माध्यम से एक स्वर दिया और आदिवासी साहित्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन्त बनाये रखने का रास्ता तैयार कर दिया। वास्तव में आदिवासी साहित्य को एक नया आयाम देना बड़ा ही एक चुनौती भरा रास्ता था। हम 21वीं सदी तक कहते रहे कि आदिवासी जनजीवन का परिचय उनकी लोक कथाओं में, उनके लोक संगीतों में, उनकी परम्पराओं में, उनकी सामाजिक मान्यताओं में जीवित है। लेकिन उनका संकलन और सम्पादन ऐसा कार्य था जो रमणिका जी के अलावा कोई नहीं कर पाता और रमणिका जी ने वह कर दिखाया। रमणिका जी ने आदिवासी साहित्य के सृजन का अदम्य साहस दिखाया है। आदिवासी साहित्य के रूप में उन्होने सिर्फ कुछ पहलओं पर नहीं बल्कि आदिवासी समाज के हर एक पहलू को छुआ है। आदिवासी सभ्यता का इतिहास, अपने सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिये होने वाले संघर्ष, आदिवासी अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिये होने वाले विद्रोहों के संकलन के साथ उनका तथ्यपरक विश्लेषण और उसकी विस्तृत रचना का कार्य किया रमणिका जी ने। रमणिका जी ने आदिवासी साहित्य सुजन के क्रम में हजारों लोक संगीतों, लोककलाओं, लोककथाओं और सामाजिक परम्पराओं में व्याप्त आदिवासी जीवन चरित्रों का संकलन हिन्दी भाषाओं में किया इससे केवल हिन्दी ही समृद्ध नहीं हुई बल्कि आदिवासी जीवन मूल्यों को हिन्दी पट्टियों और हिन्दी भाषी मानस ने कुछ हद तक ग्रहण किया।

बड़ी बात तो और तब हुई जब रमणिका जी ने आदिवासी लोककथाओं, लोकसंगीतों, और उनकी सामाजिक सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं को आदिवासियों की अपनी मातृभाषाओं में संकलित एवं संपादित कर आदिवासी साहित्य की जड़ को मजबूत करने का कार्य किया है। उन्होंने अपनी प्रकाशित पुस्तिकाओं-आदिवासी स्वर और नई शताब्दी, आदिवासी साहित्य यात्रा, युद्धरत आम आदमी के जरिये पूरे आदिवासी समाज को साहित्य रचना के माध्यम से जीवन्त बना दिया। झारखण्ड की 32 आदिवासी समुदायों की भाषाओं संथाली, मुंडारी, कुड़ुख, हो, खड़िया एवं अन्य सभी भाषाओं में साहित्य रचना के प्रयासों ने रमणिका जी ने आदिवासी समुदाय के दिलों में अपनी जगह बना ली। आदिवासी भाषाओं में कवितायें, रचनायें, लोककथाएँ खुद आदिवासी कवियों और लेखकों साहित्यकारों ने लिखी। थोड़े समय में सुसुप्त आदिवासी लेखन जीवित हो गयीं। आदिवासी कथाकारों, कवियों और साहित्यकारों में लेखन चेतना जागृत हो गयी। आज झारखण्ड में अगर आदिवासी साहित्य ने एक नया मुकाम हासिल किया है तो यह एक अविस्मरणीय परिघटना है जो रमणिका जी के साथ जुड़ी हैं।

आज आदिवासी साहित्य ने नई पीढ़ी से अपने सम्बन्ध कायम कर लिये हैं। अब नयी पीढ़ी पुरानी सदियों की तरह अपने इतिहास बोध से नहीं भटक सकती। अब आदिवासी साहित्य की लेखन चेतना सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रह सकती, अब यह नयी पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ने की एक नई कड़ी बन चुकी है। यही सपने देखे थे रमणिका जी ने। रमणिका जी की साहित्य रचना ने अलिखित आदिवासी संस्मरण को एक नये अध्याय में परिणत कर दिया है। बीसवीं सदी के उतरार्द्ध एवं इक्कीसवीं सदी के प्रथमार्ध के बीच आदिवासी साहित्य का नया अध्याय लिखा गया है यह काल खण्ड आदिवासी साहित्य या़त्रा का नया संस्करण जो रमणिका जी की आदिवासी साहित्य यात्रा को एक कदम और आगे बढ़ाती है।

हमें दुःख रहेगा इस बात का कि आज रमणिका जी हमारे बीच नहीं हैं। जिन्होंने आदिवासी साहित्य को एक नया आयाम देने का सपना देखा। आज हमारे बीच वह स्वप्नद्रष्टा नहीं रही जिन्होंने आदिवासी समाज की सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए आदिवासी साहित्य रचना का सपना देखा। सम्पूर्ण आदिवासी समाज आज उस महान साहित्यकार, संघर्षशील व्यक्तित्व का ऋणी रहेगा। उनके इस महान योगदान को आदिवासी समाज कभी भूल नहीं सकता। उनके प्रति हमारी श्रद्धांजली तभी पूरी होगी जब हम उस राह की मंजिल तक पहुंचने के लिये अपना कदम बढ़ाते रहेंगे, जिस राह को रमणिका जी ने हमारे अस्तित्व और पहचान की रक्षा के लिये चुना और एक चुनौती भरा कार्य हमारे लिये छोड़ गयी।

साहित्य की यात्रा कभी पूरी नहीं होती। यह हमेशा प्रगतिशील होती है। हमें प्रगतिशील बन कर साहित्य रचना के सफर को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना होगा। नित नये आयामों को सामने लाकर साहित्य में हमेशा नई कड़ी जोड़ने के लिये तत्पर रहना होगा। अपनी लेखनी को सशक्त बनाकर साहित्य को सशक्त बनाने के लिये संघर्षशील होना होगा। अपने साहित्य के माध्यम से व्यापक समाज को यह प्रेरणा देनी होगी कि आदिवासी जीवन शैली सृष्टि के नवनिर्माण की दिशा में एक ऐसा मार्ग है जिस पर चल कर सम्पूर्ण विश्व की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है।

साहित्य के माध्यम से रमणिका जी की यह प्रेरणा हमें हमेशा याद आते रहेंगे। उन्हें श्रद्धांजली देते हुए सम्पूर्ण सम्मान एवं आदर देते हैं|

लेखक आजसू के संस्थापक अध्यक्ष तथा कांग्रेस के प्रदेश (झारखण्ड) प्रवक्ता हैं|

सम्पर्क- +917250375650, prabhakartirki05@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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